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Artificial Intelligence : मानव बुद्धि से आगे का सफर जिसे जानकर आप हैरान रह जाएँगे

Artificial Intelligence यानि ‘AI’ नाम तो अब हर जगह सुनने को मिलता है, लेकिन इसके पीछे की कहानी इतनी रोमांचक है कि समझने पर पता चलता है कि ये सिर्फ एक तकनीक नहीं, एक पूरी क्रांति है। आइए इस सफर पर चलें,जहाँ AI ने इंसानी सोच को एक नई दिशा दी है।

AI की शुरुआत और बड़े milestones

1956 में डार्टमाउथ कॉलेज में एक सम्मेलन में वैज्ञानिक John McCarthy ने “Artificial Intelligence” शब्द रचा, और वहीं से AI की आधुनिक परिभाषा की नींव पड़ी। एलन ट्यूरिंग ने इससे पहले ही सवाल उठाया था—क्या मशीनें सोच सकती हैं? वो सपना धीरे-धीरे सच होने लगा। 1970-80 के दशक में Artificial Intelligence के प्रयोगों में सिर्फ छोटे-लॉजिक प्रॉब्लम, गेम्स और सीमित डेटा पर काम हुआ करता था।

फिर आई 1997 की वह ऐतिहासिक घड़ी जब IBM का Deep Blue विश्व शतरंज चैंपियन Garry Kasparov से जीता। यह पहली बार था जब एक कंप्यूटर ने इंसानी दिमाग की रणनीति को चुनौती दी। इसके बाद 2011 में Watson ने Jeopardy नामक टीवी क्विज़ शो जीतकर दिखाया कि AI सिर्फ संख्या-और-मॉडल नहीं, बल्कि भाषा, बुद्धि और त्वरित निर्णयों में भी सक्षम है।

सबसे चौंकाने वाली घटना आई 2016 में, जब DeepMind का AlphaGo नामक AI प्रोग्राम ने दक्षिण कोरिया के महान खिलाड़ी Lee Sedol को गो (Go) नामक जटिल खेल में 4-1 से हराया। गो गेम में मान्यता थी कि इंसान सबसे उन्नत है क्योंकि संभावनाएँ बहुत जटिल होती हैं—लेकिन AlphaGo ने self-learning और reinforcement learning के ज़रिए उन संभावनाओं का रास्ता खोज लिया।

और उससे भी आगे जाकर, AlphaGo Zero नामक AI ने बिना किसी मानव गेम डेटा के सिर्फ नियम बताए जाने पर खुद-से-खेलकर उसी AlphaGo को भी हरा दिया।

ChatGPT और वर्तमान दौर की झलक

2022 में OpenAI ने ChatGPT लॉन्च किया, जिसने एक नए युग की शुरुआत की जहाँ AI सिर्फ कंप्यूटर या रिसर्च प्रयोग नहीं बल्कि आम आदमी की भाषा, उसकी ज़रूरतों और सवालों का जवाब बन गया। ChatGPT ने लिखने, समझने, अनुवाद करने, रचनात्मक काम जैसे कि कविता, कहानी आदि में भी अपनी छाप छोड़ी है। यह दिखाता है कि AI अब सिर्फ तर्क या खेल नहीं, बल्कि भाषा, संवाद और क्रिएटिव सोच में भी इंसानों के काफी करीब पहुँच चुका है।

वर्तमान में AI मॉडल जैसे GPT-4o आदि मल्टीमॉडल क्षमताएँ दिखा रहे हैं—मतलब ये टेक्स्ट ही नहीं, इमेज, ऑडियो आदि इनपुट को भी समझ सकते हैं और आउटपुट दे सकते हैं।

Artificial Intelligence

भारत के नजरिए से AI का असर

भारत में AI की शुरुआत हो रही है बड़ी चुनौतियों और बड़ी उम्मीदों के साथ। सरकारी योजनाएँ, स्टार्टअप्स, शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े क्षेत्र इस टेक्नोलॉजी को जल्दी अपनाने की कोशिश कर रहे हैं। उदाहरण के लिए:

Artificial Intelligence की Limitations

Artificial Intelligence ने बहुत कुछ कर दिखाया है, लेकिन उसे पूरी तर तरह सटीक या त्रुटिहीन नहीं कहा जा सकता। जैसा कि AlphaGo-Zero ने दिखाया कि AI खुद-से सीख सकता है, लेकिन यह प्रक्रिया बहुत भारी डेटा, बहुत समय और कम्प्यूटेशन संसाधन मांगती है। कुछ AI मॉडल “hallucinate” कर देते हैं—यानी गलत जानकारी बना डालते हैं, विशेषतः जब उनके पास सटीक डेटा न हो। AI हमेशा context समझ नहीं पाता। भावनाएँ, सांस्कृतिक-सामाजिक अंतर्दृष्टि या नैतिक फैसलों में इंसानी संवेदना की कमी नजर आती है। गो-खेल जीतना या बाजार-डेटा एनालिसिस करना आसान नहीं है जब real-world messy हो, डेटा अधूरा हो या biased हो।

AI की ऐसी शक्तियाँ जो आपको चौंकाएँंगी

Artificial Intelligence अब चेहरे पहचान, आवाज़ पहचान आदि कामों में इतने सटीक हो चुके हैं कि कुछ मामलों में इंसानों से बेहतर भी। मेडिकल क्षेत्र में AI ने कुछ ऐसे इलाज प्रस्तावित किए हैं जो पहले कई महीनों काम लेंगे, वो कुछ ही हफ़्तों या हफ़्तों से कम समय में सुझाव देते हैं। कला और संगीत में AI ने न सिर्फ इंसानों की नकल की है, बल्कि कुछ नए और अलग तरह के कला-प्रयोग भी किए हैं—Poems, Paintings, Generative art। भाषा के मामले में, translation अब सिर्फ शब्दों का काम नहीं रहा—भाव, संदर्भ और शैली में भी AI बेहतर हो रहा है।

आगे की राह और सवाल

Artificial Intelligence आज हमारे बैंक, अस्पताल, स्कूल, ऑफिस, फोन और घर का हिस्सा बन चुका है। पर अभी भी सवाल हैं की डेटा प्राइवेसी कैसे होगी? AI का दुरुपयोग कैसे रोका जाएगा? नौकरियाँ कैसे प्रभावित होंगी? और सबसे बड़ा सवाल, क्या AI को पूरी तरह इंसानी नैतिकता और संवेदनाएँ सिखाई जा सकती हैं?

AI हमारा साथी है, प्रतिद्वंदी नहीं। इसका सही इस्तेमाल, समझ और नियंत्रण ही तय करेगा कि यह क्रांति हमें कहाँ ले जाती है—उन्नति की दिशा में या अल्प-नियंत्रित भय की ओर।

Artificial Intelligence की यात्रा इंसानी सोच से शुरू हुई थी, आज इसे परख रही है दुनिया, और कल यह हमें ऐसी मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सीमाओं से भी आगे ले जाएगी जिन्हें हम आज कल्पना नहीं कर सकते।

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