Agricultural University BAU Sabour, Bhagalpur ने वर्ष 2025 में कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में एक नई उपलब्धि हासिल की है। विश्वविद्यालय को “Best AICRP–Linseed Centre Award 2024–25” से सम्मानित किया गया है,और देश का पहला स्वदेशी Patent in Linseed भी अपने नाम किया है। इस सफलता ने Linseed Research को एक नया मुकाम दिया है–
नई विकसित Linseed Varieties: किसानों को लाभ
डॉ. अनिल कुमार सिंह (निदेशक अनुसंधान, BAU Sabour) के नेतृत्व में शोधकर्ता आर.बी.पी. निराला और उनकी टीम (रामानुज विश्वकर्मा, शिवशंकर आचार्य, एस.के. चौधरी, ए. लोकेश्वर रेड्डी) ने 2021-24 की अवधि में तीन नई Linseed किस्में विकसित की हैं:
- Sabour Tisei-2: उच्च तेल प्रतिशत (≥ 42%), अच्छी उपज, मध्यम अवधि वाली किस्म।
- Sabour Tisei-3: रोग-प्रतिरोधी किस्म; बीमारी-सहिष्णु।
- Sabour Tisei-4: गर्मी व सूखा प्रतिरोधी; जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के अनुरूप।
नवीन तकनीक: Nano-Urea Foliar Spray
इन शोधों के साथ टीम ने एक इनोवेशन भी पेश किया है: Nano-Urea Foliar Spray (3 मिलीलीटर प्रति लीटर) की तकनीक, जिससे:
- नाइट्रोजन उपयोगिता में 18-20% की वृद्धि हुई,
- रासायनिक खाद व कीटनाशक की लागत कम हुई,
- पर्यावरण पर प्रभाव घटा।
सम्मान और Patent: कब और कहाँ मिला
यह उपलब्धि 11 सितंबर 2025 को बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, रांची में आयोजित वार्षिक समीक्षा बैठक (Annual Review Meeting) में मिली, जहां BAU Sabour की टीम को Best AICRP–Linseed Centre Award 2024-25 तथा प्रथम देशी Linseed Patent प्रमाणपत्र प्रदान किया गया।

आर्थिक एवं सामाजिक महत्व
ये नई किस्में भारत में कुल 21.4% Breeder Seed Production की नींव बन चुकी हैं।Linseed (अलसी) न सिर्फ ओमेगा-3 फैटी एसिड और प्रोटीन का स्रोत है, बल्कि औषधीय तथा औद्योगिक उपयोग (varnish, paint, functional foods आदि) के लिए भी महत्वपूर्ण है।जिन क्षेत्रों में गर्मी, सूखा विशेष समस्या हो, वहां Sabour Tisei-4 जैसे तनाव-प्रतिरोधी किस्में किसानों के लिए आर्थिक रूप से सहयोगी होंगी।
BAU Sabour:स्थान
- बिहार कृषि विश्वविद्यालय, Sabour, जिला Bhagalpur, बिहार में स्थित है।
- पिन-कोड है 813210।
- विश्वविद्यालय की अधिकारिक वेबसाइट पर इसका उल्लेख ‘Sabour, Bhagalpur’ के रूप में है।
निष्कर्ष: भारत की कृषि एवं नवाचार के लिए नई उम्मीद
BAU Sabour की यह उपलब्धि Linseed Research में सिर्फ एक नवाचार नहीं है, बल्कि यह किसानों की आय, पोषण सुरक्षा और कृषि-उद्योग को नई दिशा देने वाला कदम है। जब खेतों से शोध तक, अनुसंधान से पेटेंट तक की यात्रा संभव हो सके, तो छोटे किसान भी बड़े लाभ उठा सकते हैं।
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