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मार्कापुरम बस-ट्रक हादसा: 13 की मौत, धू-धू कर जली बस; क्या भारतीय सड़कों पर ‘मौत का सफर’ बन गई हैं प्राइवेट बसें?

मार्कापुरम बस-ट्रक हादसा

आंध्र प्रदेश के प्रकाशम जिले में गुरुवार की सुबह एक ऐसी चीख-पुकार के साथ शुरू हुई, जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। मार्कापुरम के पास रायवरम में एक निजी बस और पत्थर से लदे टिपर ट्रक के बीच हुई आमने-सामने की भीषण टक्कर में अब तक 13 यात्रियों की जिंदा जलकर मौत हो गई है। यह हादसा केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि भारतीय परिवहन प्रणाली में मौजूद उन नियामक खामियों (Regulatory Gaps) का जीता-जागता सबूत है, जो हर साल सैकड़ों मासूमों की जान ले रही हैं।

तड़के 3 बजे का वो खौफनाक मंजर

हादसा सुबह करीब 3:00 बजे हुआ, जब हैदराबाद से पमुरू जा रही एक प्राइवेट ट्रेवल्स की बस अनियंत्रित होकर डिवाइडर लांघते हुए विपरीत दिशा से आ रहे ट्रक से टकरा गई। टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि देखते ही देखते दोनों वाहनों ने आग पकड़ ली। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, बस का दरवाजा जाम होने के कारण यात्री अंदर ही फंस गए और उन्हें बाहर निकलने का मौका तक नहीं मिला। पुलिस और दमकल विभाग की टीमों ने कड़ी मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया, लेकिन तब तक 13 जिंदगियां राख में तब्दील हो चुकी थीं।

सरकार की प्रतिक्रिया और मुआवजे का ऐलान

मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने इस घटना पर गहरा शोक व्यक्त किया है और गृह मंत्री वंगलपुदी अनीता को मौके पर स्थिति की निगरानी करने के निर्देश दिए हैं। गंभीर रूप से झुलसे 25 यात्रियों को गुंटूर के सरकारी अस्पताल (GGH) में भर्ती कराया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस त्रासदी पर दुख जताते हुए मृतकों के परिजनों को 2-2 लाख रुपये और घायलों को 50-50 हजार रुपये की अनुग्रह राशि देने की घोषणा की है।

मार्कापुरम बस-ट्रक हादसा
मार्कापुरम बस-ट्रक हादसा

AIS-052 सुरक्षा मानक: कागजों पर सख्त, सड़क पर बेअसर?

इस हादसे ने एक बार फिर AIS-052 (Bus Body Code) की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। भारत में बसों के डिजाइन और सुरक्षा के लिए यह कोड अनिवार्य है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है:

• ज्वलनशील सामग्री का उपयोग: नियमों के अनुसार बसों के इंटीरियर में ‘फायर रिटार्डेंट’ सामग्री का उपयोग होना चाहिए, लेकिन निजी ऑपरेटर लागत बचाने के लिए सस्ते और अत्यधिक ज्वलनशील फोम और कपड़ों का उपयोग करते हैं।

• इमरजेंसी एग्जिट की अनदेखी: अक्सर देखा गया है कि स्लीपर बसों में अतिरिक्त बर्थ लगाने के चक्कर में आपातकालीन खिड़कियों और दरवाजों को अवरुद्ध कर दिया जाता है।

• फायर डिटेक्शन सिस्टम की कमी: AIS-135 के तहत बसों में आग का पता लगाने वाले सेंसर (FDSS) अनिवार्य करने की बात कही गई है, लेकिन आज भी अधिकांश पुरानी और प्राइवेट बसों में यह सिस्टम नदारद है।

‘ट्रांसपोर्ट माफिया’ और नियामक चुनौतियां

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में निजी बस ऑपरेटर अक्सर ‘ट्रांसपोर्ट माफिया’ की तरह काम करते हैं। ये ऑपरेटर अपनी बसों का पंजीकरण ऐसे राज्यों में कराते हैं जहां नियम ढीले हैं, ताकि वे सुरक्षा ऑडिट से बच सकें। पुरानी बसों का नवीनीकरण किए बिना उन्हें लंबी दूरी के मार्गों पर चलाना और ड्राइवरों की थकान (Driver Fatigue) इस तरह के हादसों के मुख्य कारण बनकर उभर रहे हैं।

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अब सख्त कार्रवाई की दरकार

मार्कापुरम का यह हादसा एक चेतावनी है। क्या हम सिर्फ मुआवजे का ऐलान करके अगली दुर्घटना का इंतजार करेंगे? अब समय आ गया है कि सरकार स्लीपर बसों के डिजाइन की समीक्षा करे, अवैध मॉडिफिकेशन करने वाले बॉडी बिल्डरों पर भारी जुर्माना लगाए और देशभर में ‘वन नेशन, वन सेफ्टी स्टैंडर्ड’ को कड़ाई से लागू करे। जब तक सड़कों पर दौड़ते इन ‘जलता ताबूतों’ पर लगाम नहीं लगेगी, तब तक यात्रियों का सफर कभी सुरक्षित नहीं होगा।

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