Telephone से Mobile तक का सफर : Bharat में Communication Revolution की पूरी कहानी

Telephone से Mobile तक का सफर – सोचने की बात है कि आज से लगभाग 5000 हजार साल पहले सभी लोग कबूतर से अपना संदेश भेजते थे।उसके बाद पत्र के माध्यम से ये काम किया जेन लगा.इन डोनो मी समय की कोई सिमा नहीं थी, संदेश पहुंचेगा भी की नहीं, ये भी निश्चित नहीं था।फिर 1876 में जब Alexander Graham Bell ने टेलीफोन का आविष्कार किया, तो दुनिया चौंक गई। उस दौर में ये चमत्कार से कम नहीं था कि आवाज़ एक तार के जरिए दूसरी जगह सुनी जा सकती है। मगर ये भी सच है कि टेलीफोन तारों में बंधा हुआ था—घर, दफ़्तर या टेलीफोन बूथ तक सीमित।

टेलीफोन की शुरुआत और समस्याएं

भारत में टेलीफोन की शुरुआत 1881 में हुई, जब ब्रिटिश सरकार ने यहां पहली टेलीफोन सेवा शुरू की। मगर ये सुविधा आम जनता तक पहुँचने में कई दशक लग गए। शहरों तक ही सीमित लाइनें थीं और ग्रामीण भारत तो इस सुविधा से लगभग वंचित ही रहा। फिर भी, धीरे-धीरे टेलीफोन सामाजिक और व्यावसायिक ज़िंदगी का अहम हिस्सा बनने लगा।

लेकिन इंसान की ज़रूरत वहीं रुकने वाली नहीं थी। जैसे-जैसे दूरियाँ बढ़ीं और रिश्तों-कारोबार का दायरा फैला, एक ऐसे साधन की चाहत और बढ़ गई जो तारों से आज़ाद हो। यही से मोबाइल की कहानी शुरू होती है।

The Brick-कैसे और कब हुआ पहला मोबाइल कॉल

1973 में जब Motorola के इंजीनियर Martin Cooper ने पहला मोबाइल कॉल किया, तो दुनिया को पता चला कि भविष्य किस दिशा में है। उस फोन का नाम पड़ा “The Brick”—क्योंकि उसका वजन लगभग 1 किलो था, बैटरी 30 मिनट की थी और चार्ज करने में दस घंटे लगते थे। लेकिन इतिहास के लिए वो एक क्रांतिकारी पल था।

भारत में इस क्रांति की शुरुआत

भारत में मोबाइल क्रांति की शुरुआत 1995 में हुई, जब कोलकाता से पहला मोबाइल कॉल किया गया। धीरे-धीरे 2G, GSM और CDMA नेटवर्क आए और मोबाइल का जाल बुनना शुरू हुआ। उस दौर में कॉल रेट बहुत महंगे होते थे—लोग सेकंड के हिसाब से कॉल काटते थे ताकि बिल ज़्यादा न आए। मोबाइल रखना किसी स्टेटस सिंबल से कम नहीं था।

2000 के दशक में सस्ते हैंडसेट्स और सस्ती कॉलिंग ने तस्वीर बदल दी। Nokia जैसे फोन, जिनमें Snake गेम और टॉर्च होते थे, हर हाथ में दिखाई देने लगे। इसके बाद आया SMS और रिंगटोन का ज़माना। मोबाइल अब सिर्फ कॉलिंग का साधन नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन गया।

2007 के बाद तस्वीर ने एक और बड़ा मोड़ लिया, जब स्मार्टफोन आए। भारत में Android और iPhone ने कदम रखा और इंटरनेट मोबाइल में समा गया। अब फोन सिर्फ बातचीत का जरिया नहीं रहा—ये कैमरा, म्यूज़िक प्लेयर, बैंक, किताबें, ऑफिस और मनोरंजन का पूरा पैकेज बन गया था।

Telephone से Mobile तक का सफर

 

भारत में इस क्षेत्र में विकास

आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा मोबाइल बाज़ार है। जियो जैसी टेलीकॉम कंपनियों ने डेटा को सस्ता कर इंटरनेट हर गाँव तक पहुँचा दिया। अब मोबाइल से UPI पेमेंट्स होते हैं, किसान मौसम की जानकारी देखते हैं, स्टूडेंट्स ऑनलाइन क्लास करते हैं, और परिवार वीडियो कॉल पर जुड़े रहते हैं। सच कहा जाए तो मोबाइल भारत के सामाजिक और आर्थिक जीवन की रीढ़ बन चुका है।

अगर 90 के दशक में मोबाइल रखने वाले लोग आज के स्मार्टफोन देख लें तो यक़ीनन दंग रह जाएँगे—छोटी सी जेब में ऐसा डिवाइस है जिसमें कैमरा, GPS, बैंक, दुकान, लाइब्रेरी, और मनोरंजन सब कुछ समाया हुआ है।

यह सफर केवल तकनीक का विकास नहीं है, बल्कि भारत की जीवनशैली और सोच में आया क्रांतिकारी बदलाव है। टेलीफोन से मोबाइल तक का यह सफर हमें याद दिलाता है कि ज़रूरतें इंसान को नए सपने दिखाती हैं और सपने उसे नए आविष्कारों की ओर ले जाते हैं। और शायद यही वजह है कि आज का स्मार्टफोन कोई आख़िरी पड़ाव नहीं, बल्कि नई मंज़िलों की शुरुआत है—जहाँ AI, 5G और आने वाले कल की तकनीक हमें और भी क़रीब लाने वाली है।

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