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National Voters Day: सिर्फ 1 दिन के ‘बादशाह’ हैं आप! बंगाल की हिंसा और आपके वोट की ताकत का कड़वा सच

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आज 25 जनवरी है मतलब ‘राष्ट्रीय मतदाता दिवस’ (National Voters’ Day)। सारे जगह आपको बताया जाएगा कि आप देश के मालिक हैं। टीवी पर बड़े-बड़े नेता कहेंगे कि “वोट आपका अधिकार है।” लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस उंगली पर स्याही लगवाकर आप सेल्फी पोस्ट करते हैं, उसकी असली ताकत क्या है? क्या हम वाकई लोकतंत्र के राजा हैं, या सिर्फ 5 साल में एक दिन के लिए ‘इस्तेमाल’ किए जाने वाले लोग?

आज इस विशेष रिपोर्ट में हम बात करेंगे वोट की ताकत की, उन लोगों की जो राजनीति से नफरत करते हैं, और बंगाल (Bengal) जैसे राज्यों के उस अजीब सच की जहाँ वोट देना ‘अधिकार’ नहीं, बल्कि ‘जान जोखिम’ में डालना बन गया है।

Suppressing Voters in Bengal

“मुझे राजनीति में इंटरेस्ट नहीं”—यह सबसे बड़ी बेवकूफी है

आजकल के युवाओं का सबसे कॉमन डायलॉग है— “यार, पॉलिटिक्स गंदी है, मुझे इसमें कोई इंटरेस्ट नहीं है।”

अगर आप भी ऐसा सोचते हैं, तो यह कड़वी बात सुन लीजिए: आप राजनीति में भाग लें या न लें, राजनीति आप में पूरी दिलचस्पी लेती है। जिस सड़क पर आप चलते हैं, उसका ठेका राजनीति तय करती है। जिस कॉलेज में आप पढ़ते हैं, उसकी फीस राजनीति तय करती है। आपकी गाड़ी का पेट्रोल और घर का राशन—सब कुछ राजनीति से जुड़ा है। अगर आप वोट नहीं देते, तो आपको शिकायत करने का भी कोई हक नहीं है। जब आप घर बैठते हैं, तो आप एक ‘गलत आदमी’ को चुनने में मदद कर रहे होते हैं।

प्लेटो ने कहा था— “राजनीति में भाग न लेने की सजा यह है कि आपको अपने से बुरे लोगों द्वारा शासित होना पड़ता है।”

5 साल के ‘नौकर’ और 1 दिन के ‘राजा’

हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना (Irony) यही है। जिस दिन चुनाव होता है, उस दिन बड़े से बड़ा नेता, जो 5 साल तक अपनी गाड़ी का शीशा नीचे नहीं करता, वो आपके पैरों में गिर जाता है। आपके सामने हाथ जोड़ता है, जाति-धर्म की दुहाई देता है, और दारू-मुर्गा भी बांटता है। क्यों? क्योंकि उसे पता है कि अगले 24 घंटे के लिए असली ‘बॉस’ आप हैं।

लेकिन सवाल यह है कि यह ताकत सिर्फ एक दिन क्यों?जैसे ही चुनाव खत्म होता है, वह नेता ‘राजा’ बन जाता है और जनता वापस ‘प्रजा’ बन जाती है। वोट की ताकत का यह असंतुलन हमें सोचना होगा। क्या हम सिर्फ एक दिन के मालिक हैं?

बंगाल की हकीकत: जहाँ वोट देना ‘जुर्म’ बन जाता है

अब आते हैं सिक्के के दूसरे पहलू पर। हम कहते हैं “वोट देना हमारा हक है,” लेकिन क्या भारत के हर कोने में यह हक सुरक्षित है? पश्चिम बंगाल (West Bengal) के पिछले कुछ चुनावों को याद कीजिए। क्या मंजर था? वोट देने जाने वालों को डराया गया। चुनाव के बाद हिंसा (Post-Poll Violence) हुई, घर जलाए गए, और महिलाओं के साथ बदसलूकी हुई। पंचायत चुनावों में तो मतपेटियां (Ballot Boxes) तक तालाब में फेंक दी गईं।

यह कैसा लोकतंत्र है जहाँ अपनी मर्जी का बटन दबाने पर जान का खतरा हो? सिर्फ बंगाल ही नहीं, बिहार और यूपी के कई बाहुबली इलाकों में भी आज भी ‘साइलेंट कैप्चरिंग’ होती है। जब तक हर नागरिक बिना डरे वोट नहीं डाल सकता, तब तक National Voters’ Day की बधाई देना बेमानी है। प्रशासन और चुनाव आयोग (ECI) दावा करते हैं कि चुनाव निष्पक्ष हैं, लेकिन जब एक गरीब आदमी को डंडे के जोर पर वोट डालने से रोका जाता है, तो लोकतंत्र मर जाता है।

सुधार कैसे आएगा?

सिर्फ कमियां गिनाने से कुछ नहीं होगा। अगर हमें इस सिस्टम को सुधारना है, तो हमें अपनी एक दिन की ताकत को 5 साल की ताकत में बदलना होगा।

अपना हक खुद मांगना सीखो

आज 25 जनवरी है। आज शपथ लीजिए कि चाहे धूप हो, बारिश हो या लंबी लाइन—अगले चुनाव में आप वोट जरूर डालेंगे। याद रखिए, आपकी उंगली पर लगी वह नीली स्याही (Ink) सिर्फ एक निशान नहीं है, वह इस देश के भ्रष्ट सिस्टम के खिलाफ आपका सबसे बड़ा हथियार है। अगर आप आज चूक गए, तो अगले 5 साल तक रोने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा।

जागो मतदाता, जागो!

आपकी राय: क्या आपको लगता है कि भारत में ‘राइट टू रिकॉल’ (Right to Recall) यानी काम न करने पर नेता को हटाने का कानून होना चाहिए? कमेंट में अपनी राय जरूर दें।

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