Supreme Court’s Firecracker Ban : क्या “स्वच्छ हवा में सांस लेने का अधिकार” जीतेगा या फिर त्योहारों की परंपरा?

सुप्रीम कोर्ट का Firecracker Ban फिर से नेशनल डिबेट का बड़ा मुद्दा बन गया है। 12 सितम्बर 2025 को कोर्ट ने साफ कहा कि अगर “स्वच्छ हवा में सांस लेना” एक मौलिक अधिकार है, तो फिर ये प्रतिबंध सिर्फ दिल्ली-एनसीआर तक क्यों सीमित रहे? इसे पूरे देश में लागू होना चाहिए या फिर इस पर दोबारा विचार किया जाए। अब सबकी नज़रें 22 सितम्बर 2025 पर टिकी हैं, जब कोर्ट अपना अंतिम फैसला सुनाएगा।

Supreme Court’s Firecracker Ban – दायरा और तर्क

कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब हर नागरिक को साफ हवा में सांस लेने का अधिकार है, तो फिर बैन केवल दिल्ली-एनसीआर तक क्यों सीमित? इसके लिए कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट से विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि साल भर के प्रदूषण में पटाख़ों का योगदान भले ही छोटा हो, लेकिन दिवाली के समय इसका असर बहुत बढ़ जाता है—खासकर उत्तरी भारत में, जहां पहले से ही पराली जलाना और वाहनों का धुआँ हवा को खतरनाक स्तर पर पहुँचा देता है।

सांस्कृतिक और धार्मिक पहलू

  • हिंदू त्योहारों पर असर –: दिवाली पर पटाख़े सदियों पुरानी परंपरा माने जाते हैं। ऐसे में बैन को कई लोग धार्मिक स्वतंत्रता पर चोट मानते हैं।

  • अन्य अवसरों पर प्रयोग –: शादियों, न्यू ईयर और कुछ गैर-हिंदू त्योहारों में भी पटाख़े चलाए जाते हैं, लेकिन बहस अक्सर दिवाली और हिंदू त्योहारों तक ही सीमित रह जाती है।

  • कोर्ट का रुख –: सुप्रीम कोर्ट पहले भी कह चुका है—“कोई धर्म ऐसी परंपरा को बढ़ावा नहीं देता जो सार्वजनिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाए।” यानी परंपरा और स्वास्थ्य में से प्राथमिकता हमेशा स्वास्थ्य को दी जाएगी।

जनता और उद्योग की प्रतिक्रिया

  • समर्थक –: शहरी युवा, पर्यावरणविद, डॉक्टर और मध्यमवर्गीय माता-पिता मानते हैं कि बैन ज़रूरी है, क्योंकि बच्चों, बुज़ुर्गों और अस्थमा के रोगियों पर इसका सबसे बुरा असर पड़ता है।

  • विरोधी –: तमिलनाडु के शिवकाशी का पटाख़ा उद्योग 5 लाख से ज़्यादा परिवारों की रोज़ी-रोटी से जुड़ा है। उनका कहना है कि अगर पूर्ण बैन लगाया गया तो छोटे कस्बों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर सीधा असर पड़ेगा।

  • धार्मिक संगठन –: कई हिंदू संगठन मानते हैं कि ऐसे बैन “सलेक्टिव” लगते हैं और ये सांस्कृतिक पहचान पर हमला है।

ग्रीन पटाख़े और अमल की चुनौतियाँ

सरकार ने पिछले कुछ सालों से “ग्रीन क्रैकर्स” को बढ़ावा दिया है, जिनसे लगभग 30% तक कम प्रदूषण होता है। लेकिन ज़मीनी हकीकत ये है कि—

  • जनता को इनके बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं है,

  • काले बाज़ार में पारंपरिक पटाख़े आसानी से मिल जाते हैं,

  • और अमल (enforcement) अक्सर चुनिंदा जगहों तक ही सीमित रह जाता है।

राजनीतिक और वैश्विक पहलू

  • राजनीतिक बहस –: विपक्ष का आरोप है कि न्यायपालिका बार-बार सांस्कृतिक मुद्दों में दखल दे रही है, जबकि सत्तापक्ष इसे स्वास्थ्य-केंद्रित नीति बताता है।

  • दुनियाभर में स्थिति –: चीन, अमेरिका और यूरोप के कई शहरों में भी पटाख़ों पर आंशिक प्रतिबंध हैं, लेकिन वहाँ ज़्यादातर ज़ोर “कंट्रोल्ड पब्लिक डिस्प्ले” पर होता है, न कि घरों में पूरी तरह बैन पर।

स्वास्थ्य और पर्यावरण सबसे ऊपर

डॉक्टर और पर्यावरण विशेषज्ञ लगातार चेतावनी देते हैं कि दिवाली के बाद हवा की गुणवत्ता खतरनाक स्तर पर पहुँच जाती है। बच्चों और अस्थमा के रोगियों के लिए हालात सबसे खराब हो जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट भी इसी बात पर जोर दे रहा है कि “त्योहार की खुशी सार्वजनिक स्वास्थ्य से बड़ी नहीं हो सकती।”

आगे क्या?

अब मामला केवल “पर्यावरण बनाम परंपरा” नहीं रहा—ये रोज़गार, धर्म, राजनीति और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा सवाल बन चुका है।
22 सितम्बर 2025 का फैसला यह तय करेगा कि—

  • क्या पटाख़ों पर बैन पूरे भारत में लागू होगा?

  • क्या सिर्फ “ग्रीन क्रैकर्स” की अनुमति दी जाएगी?

  • या फिर कोर्ट ये निर्णय सरकार पर छोड़ देगा?

जो भी नतीजा हो, ये साफ है कि पटाख़े अब सिर्फ दिवाली की चमक का हिस्सा नहीं रहे, बल्कि भारत में पर्यावरण बनाम परंपरा की सबसे बड़ी जंग बन चुके हैं।

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