आसाराम बापू को मिली जमानत : Gujarat High Court का बड़ा फैसला, Justice या Sympathy?

आसाराम बापू

स्वयंभू संत आसाराम बापू, जिन्हें कभी लाखों अनुयायी “गुरुदेव” कहकर पुकारते थे, अब जेल की सलाखों के पीछे एक दोषी के रूप में जाने जाते हैं। 2013 में दर्ज हुए रेप केस में उन्हें आजीवन कारावास (Life Imprisonment) की सजा सुनाई गई थी। ये मामला उस नाबालिग पीड़िता से जुड़ा था, जो उनके जोधपुर आश्रम में पढ़ने गई थी। करीब 11 साल से जेल में सजा काट रहे आसाराम के केस में अब गुजरात हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है।

Gujarat High Court का फैसला

7 नवंबर 2025 को गुजरात हाईकोर्ट ने आसाराम बापू को 6 महीने की अंतरिम जमानत (interim medical bail) दी। ये जमानत उनकी सजा को खत्म नहीं करती बल्कि सिर्फ इलाज के उद्देश्य से दी गई है। कोर्ट ने कहा कि यह राहत “मानवीय आधार” पर दी गई है क्योंकि उनकी उम्र अब 84 से ऊपर है और स्वास्थ्य लगातार गिर रहा है।

कोर्ट में क्या हुआ

अदालत में आसाराम के वकीलों ने तर्क दिया कि उनकी उम्र 84 वर्ष है।वे दिल की बीमारी, हाईपरटेंशन, थाइरॉइड, एनीमिया और पाचन संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हैं।जेल अस्पताल की सुविधाएं उनकी स्थिति के अनुरूप नहीं हैं। वहीं, राज्य सरकार और पीड़िता के वकील ने इसका कड़ा विरोध किया।

आसाराम बापू

राज्य का कहना था कि जेल में पर्याप्त चिकित्सा सुविधा उपलब्ध है और उन्हें बाहर जाने की जरूरत नहीं। लेकिन अदालत ने सभी पक्षों को सुनने के बाद कहा — “स्वास्थ्य और जीवन का अधिकार (Right to Life and Health) संविधान का मूल हिस्सा है। इलाज से वंचित रखना मानवीय दृष्टि से उचित नहीं।”

कोर्ट की शर्तें

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह जमानत सिर्फ मेडिकल उपचार के लिए है। आसाराम को कोई भी सार्वजनिक, धार्मिक या प्रवचन कार्यक्रम करने की अनुमति नहीं होगी। वे पुलिस निरीक्षण में रहेंगे और इलाज की संपूर्ण जानकारी अदालत व पुलिस को देनी होगी।

इसके अलावा—

  • हर 15 दिन में मेडिकल रिपोर्ट जमा करनी होगी।
  • स्थान बदलने से पहले स्थानीय प्रशासन को सूचना देना अनिवार्य है।
  • यदि किसी प्रकार का उल्लंघन पाया गया, तो जमानत तुरंत रद्द की जा सकती है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर राजस्थान सरकार या पीड़िता पक्ष सुप्रीम कोर्ट में इस आदेश को चुनौती देता है, तो गुजरात सरकार भी ऐसा कर सकती है।

पहले भी मिली थी राहत

इससे पहले भी राजस्थान हाईकोर्ट ने इसी आधार पर उन्हें 6 महीने की राहत दी थी। उस समय भी तर्क यही था कि उम्र और स्वास्थ्य बिगड़ने के चलते उनका जेल में रहना खतरनाक हो सकता है। हालांकि, हर बार राहत सीमित अवधि और कड़ी शर्तों के साथ ही दी गई।

सवाल जो अब उठ रहे हैं

यह फैसला कई नैतिक और कानूनी सवाल खड़े करता है:

  1. क्या गंभीर अपराधों में “मानवीय आधार” पर जमानत देना न्यायसंगत है?
  2. क्या अदालत द्वारा लगाई गई शर्तों का पालन असल में कराया जा सकेगा?
  3. क्या समाज में ऐसे फैसले धार्मिक प्रभाव या सार्वजनिक भावना से प्रभावित लगते हैं?

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि अदालत ने संविधान के “Right to Health” सिद्धांत को ध्यान में रखकर निर्णय दिया, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि राहत अस्थायी है।

जनभावना: दो हिस्सों में बंटा समाज

समाज इस फैसले को लेकर बंटा हुआ नज़र आ रहा है ;

  • एक वर्ग कहता है: “बीमारी किसी की सजा नहीं हो सकती, इलाज का हक सबको है।”
  • दूसरा वर्ग मानता है: “इतना गंभीर अपराध और फिर बार-बार राहत — ये न्याय नहीं, नरमी है।”

कानून बनाम करुणा का संतुलन

“Asaram Bapu Bail Case” एक बार फिर सवाल उठाता है;

  • क्या कानून को कभी-कभी करुणा के लिए झुकना चाहिए?
  • या न्याय की कठोरता ही समाज में संतुलन रखती है?

फिलहाल, आसाराम बापू जेल से बाहर होंगे — पर केवल अस्पताल तक सीमित, जहां उनका इलाज जारी रहेगा और अदालत की नजर भी हर पल उन पर रहेगी।

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