Railway Fare Hike : अब ट्रेन सफर हुआ महंगा! नॉन-AC पर ₹10 और AC पर सरचार्ज, लेकिन सुविधाओं का क्या? जानिए 5 कड़वे सच

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Indian Railway ने किराए में बढ़ोतरी कर दी है। नॉन-AC में 10 रुपये और AC में 2 पैसे/किमी की बढ़ोतरी हुई है। लेकिन क्या सुविधाएं सुधरीं? पढ़िए वेटिंग लिस्ट, लेट लतीफी और जनरल डिब्बों के हाल पर यह विस्तृत रिपोर्ट। भारतीय रेल, जिसे देश की ‘लाइफलाइन’ कहा जाता है, अब आम आदमी की जेब पर और भारी पड़ने वाली है। ताज़ा खबरों के मुताबिक, रेलवे ने किराए में चुपके से बढ़ोतरी कर दी है। एक तरफ जहां प्लेटफॉर्म टिकट के दाम पहले ही आसमान छू रहे थे, वहीं अब यात्रा का मूल किराया भी बढ़ा दिया गया है।

सरकार और रेलवे बोर्ड का तर्क हमेशा की तरह “बेहतर सुविधाओं और विकास” का है। लेकिन जमीनी हकीकत पर नजर डालें, तो यात्री आज भी उन्हीं पुरानी समस्याओं से जूझ रहे हैं जिनसे वे दस साल पहले जूझ रहे थे। आइए जानते हैं क्या है नया किराया और क्या है वो कड़वी सच्चाई जिसे हर यात्री झेल रहा है।

समझिए गणित: आपकी जेब से अब कितना एक्स्ट्रा जाएगा?

Railway के नए नोटिफिकेशन के अनुसार, किराए में दो तरह से बढ़ोतरी की गई है:

नॉन-AC (General & Sleeper) : अब नॉन-एसी क्लास के हर टिकट पर 10 रुपये का सीधा सरचार्ज या बढ़ा हुआ किराया जोड़ा गया है। सुनने में 10 रुपये कम लग सकते हैं, लेकिन एक गरीब मजदूर या डेली पैसेंजर के लिए महीने का हिसाब लगाने पर यह एक बड़ी रकम बन जाती है।

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AC क्लास : वातानुकूलित श्रेणियों (AC 3-Tier, 2-Tier, 1st Class) के लिए किराए में 2 पैसे प्रति किलोमीटर की बढ़ोतरी की गई है। यानी अगर आप 1000 किलोमीटर का सफर कर रहे हैं, तो आपकी टिकट का दाम अपने आप बढ़ जाएगा।

ट्रेनें कम, भीड़ ज्यादा: जनरल डिब्बों का ‘नरक’ जैसा हाल

किराया बढ़ने पर सबसे पहला सवाल यही उठता है कि क्या ट्रेनें बढ़ाई गईं? जवाब है – नहीं। आज भी लोकल पैसेंजर ट्रेनों (Passenger Trains) और जनरल बोगियों की हालत किसी से छिपी नहीं है। जनरल डिब्बों में पैर रखने की जगह नहीं होती। लोग टॉयलेट के पास बैठकर या दरवाजों पर लटककर जान जोखिम में डालकर सफर करने को मजबूर हैं। पैसेंजर ट्रेनों की संख्या घटाई जा रही है और ‘स्पेशल’ के नाम पर ज्यादा किराया वसूला जा रहा है, लेकिन सुविधाएं वही ‘भेड़-बकरी’ वाली हैं।

‘Confirm Ticket’ एक सपना: वेटिंग लिस्ट का मायाजाल

आप 4 महीने पहले टिकट बुक करें या 4 दिन पहले, Waiting List का झंझट खत्म होने का नाम नहीं ले रहा। त्योहारों की बात तो छोड़िये, सामान्य दिनों में भी कन्फर्म सीट मिलना लॉटरी जीतने जैसा हो गया है। तत्काल (Tatkal) का टिकट बुक करना किसी युद्ध लड़ने से कम नहीं है। चंद सेकंड में सारी सीटें गायब हो जाती हैं। हजारों यात्री वेटिंग टिकट लेकर प्लेटफॉर्म पर खड़े रहते हैं, और टीटीई के पास सीट नहीं होती। तो फिर किराया बढ़ाने का औचित्य क्या है जब सीट ही न मिले?

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ट्रेन लेट, तो हर्जाना कौन देगा?

Railway के नियमों के मुताबिक अगर आप टिकट कैंसिल करते हैं, तो कैंसिलेशन चार्ज (Cancellation Charge) तुरंत काट लिया जाता है। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू देखिये:

अगर ट्रेन 10-12 घंटे लेट हो जाए, तो यात्री को क्या मिलता है? कुछ नहीं। सर्दियों में कोहरे के नाम पर और गर्मियों में मेंटेनेंस के नाम पर ट्रेनें घंटों नहीं, बल्कि दिनों तक लेट हो रही हैं। यात्री का समय बर्बाद होता है, उसकी कनेक्टिंग ट्रेन छूट जाती है, लेकिन रेलवे की तरफ से कोई जवाबदेही नहीं होती। पैसा पूरा लिया जाता है, लेकिन समय की कोई गारंटी नहीं।

कैंसिलेशन के नाम पर ‘लूट’

सबसे ज्यादा गुस्सा यात्रियों को तब आता है जब मजबूरी में टिकट कैंसिल करना पड़ता है। अगर ट्रेन कैंसिल हो जाए या डाइवर्ट हो जाए, तो रिफंड (Refund) लेने के लिए भी पापड़ बेलने पड़ते हैं। और अगर यात्री अपनी मर्जी से टिकट कैंसिल कराए, तो अच्छी-खासी रकम ‘क्लर्कल चार्ज’ और जीएसटी के नाम पर काट ली जाती है। वेटिंग टिकट, जो कन्फर्म ही नहीं हुआ, उसे कैंसिल कराने पर भी पैसा कटता है। यह सिस्टम आम आदमी की समझ से परे है।

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विकास चाहिए, लेकिन सुविधा भी

हम आधुनिकीकरण या ‘वंदे भारत’ जैसी नई ट्रेनों के खिलाफ नहीं हैं। देश को आगे बढ़ना चाहिए। लेकिन रेलवे का असली आधार वो करोड़ों यात्री हैं जो स्लीपर और जनरल क्लास में सफर करते हैं।

सिर्फ किराया बढ़ा देने से विकास नहीं होता। जब तक हर यात्री को सम्मानजनक तरीके से सीट नहीं मिलती, ट्रेनें समय पर नहीं चलतीं और वेटिंग लिस्ट का डर खत्म नहीं होता, तब तक यह बढ़ा हुआ किराया जनता को ‘जुर्माना’ ही लगेगा।

आपकी राय: क्या आप इस किराए बढ़ोतरी से सहमत हैं? या आपको लगता है कि रेलवे को पहले अपनी सुस्त व्यवस्था सुधारनी चाहिए? कमेंट बॉक्स में अपनी भड़ास जरूर निकालें!

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