इंदौर में इस दशहरे पर एक ऐसा कार्यक्रम चर्चा में आया है जिसने सामाजिक संवेदनाओं और कानूनी सीमाओं की नई जंग छेड़ दी है। ‘ नामक संगठन ने घोषणा की कि इस साल रावण दहन की परंपरा के बजाय ‘शूर्पणखा दहन’ होगा, जिसमें 11 महिलाओं के चेहरे वाले पुतले जलाए जाएंगे, जिन पर हत्या या अन्य गंभीर अपराध के आरोप हैं।
आरोप, सार्वजनिक प्रतिक्रिया और कानूनी हस्तक्षेप
आयोजकों का कहना है कि यह प्रतीकात्मक विरोध है—बुराई को पुरुष या महिला से नहीं बाँधा जा सकता, न्याय चाहते हैं कि अपराधी हो, चाहे उसका लिंग कोई भी हो। पर इस कार्यक्रम ने समाज में नाराजियों की खाईं खोल दी। कुछ लोग इसे “आधुनिक जागरूकता” मान रहे हैं, जबकि कईयोन ने यह कहा कि न्यायालयीन स्वीकृति के बिना सार्वजनिक स्थान पर किसी महिला का पुतला जलाना “मानव सम्मान” के खिलाफ है।
इसी बीच मध्यप्रदेश हाई कोर्ट, इंदौर बेंच ने सरकार को निर्देश दिया है कि किसी का पुतला जलाना सुनिश्चित रूप से रोका जाए, जब तक कि कोई न्यायालयीन निर्णय ना आए। कोर्ट ने साफ कहा कि किसी का मामला विचाराधीन है तो उस व्यक्ति को सार्वजनिक ध्वज प्रदर्शनी या दहन के माध्यम से अपराधी घोषित नहीं किया जा सकता।

“संवेदनाएँ vs दर्शकवाद”: क्या बदल गई है दशहरे की परंपरा?
दशहरे की परंपरा कि रावण की मूर्ति जलकर बुराई का अंत हो, प्रतीक है। लेकिन जब प्रतीक बदल जाए और उस दूसरी ओर मानवीय भावनाओं, न्याय की प्रक्रिया और सार्वजनिक संगति की सीमाएँ उभर आएँ, तो सवाल बनता है—क्या संबंधों और संवेदनाओं का अहिटान सामाजिक न्याय की कीमत पर हो रहा है?
कुछ लोगों का मानना है कि ऐसे प्रदर्शन सामाजिक जागरूकता बढ़ाते हैं, अपराधियों को शर्मिंदा करते हैं। लेकिन विरोधियों का तर्क है कि ख़ाकी-कानूनी प्रक्रिया को नजरअंदाज़ करना और सार्वजनिक रूप से किसी को आरोपी मान लेना संविधान सुरक्षा के सिद्धांतों के खिलाफ है। नुकसान सिर्फ नाम का नहीं, प्रतिष्ठा और आत्मसम्मान का हो सकता है।
कानूनी स्थिति: अपराधी बनाना अदालत का काम है
भारतीय न्यायप्रणाली में सिद्धांत है—“एक व्यक्ति दोषी तब माना जाए जब न्यायालय फैसला करे।” IPC या अन्य कानूनों में ऐसा कोई अधिकार नहीं है कि सार्वजनिक आयोजनों में विचाराधीन आरोपियों को अभियुक्त घोषित कर पुतला जलाया जाए। हालाँकि, सार्वजनिक_ORDER और मानव गरिमा का संरक्षण संविधान में दर्ज है।
उदाहरण के लिए, Madras High Court ने कहा है कि केवल effigy-burning होना, अपने आप में दंडनीय अपराध नहीं है—जबतक वह सार्वजनिक सुरक्षा या कानून-व्यवस्था को प्रभावित न करे। इंदौर की हाई कोर्ट की ताज़ा कार्रवाई इस बात की याद दिलाती है कि कानून सिर्फ परंपराओं से ऊपर है। जब न्याय प्रक्रिया अधूरी हो, नाम मात्र के आरोप सार्वजनिक रूप से उजागर होने लगें, तब संवैधानाओं और अधिकारों की रक्षा करना ज़रूरी है।
समाज का पल: परंपरा जहाँ खिंचाव में है
इस घटना ने हमें यह दिखाया है कि समाज कितने हिस्सों में बंटा है—परंपरावादी, न्याय-प्रेमी, संवेदनशील दृष्टिकोण रखने वाले। कुछ का कहना है कि महिलाएँ भी “रावण” बन जाएँ, अगर अपराध साबित हो। दूसरों का कहना है कि न्याय ज़रूरी है लेकिन सार्वजनिक न्याय नहीं, अदालत की निर्णय प्रक्रिया ज़रूरी है। और कुछ यह मानते हैं कि परंपरा को बदला जा सकता है लेकिन सम्मान की सीमाएँ होती हैं।
इस दशहरे पर हमें क्या सीख मिलती है?
इंदौर की ‘Shurpanakha Dahan’ सिर्फ पुतले जलाने की कहानी नहीं है; यह कानून, नैतिकता और सामाजिक मंथन की कहानी है। जीत-हार नहीं, सम्मान, विचार और न्याय की सच्ची परीक्षा है। इस विवाद ने साफ किया है कि परंपरा तब तक बनी रह सकती है जब वह दूसरों की गरिमा के साथ मिलकर हो—और कि बदलाव तब ही स्वीकार्य है जब वह संवेदनशीलता और न्याय की कसौटी पर खरा उतरे।
Also Read :
म्यूज़िक इंडस्ट्री में बदलाव : 75M स्पैम हटाकर Spotify अब बताएगा गाने में AI का कितना इस्तेमाल हुआ
