Language War Turns Deadly: मुंबई लोकल में हिंदी बोलने पर हमला—कल्याण के अर्नव ने दी जान 

कौन था अर्नव खैरे? क्या हुआ उस सुबह?

कल्याण (ठाणे) का 19 वर्षीय अर्नव जितेन्द्र खैरे—मुलुंड के प्रसिद्ध केलकर कॉलेज का B.Sc प्रथम वर्ष छात्र। 18 नवंबर 2025 की सुबह वह रोज़ की तरह अम्बरनाथ–कल्याण फास्ट लोकल से कॉलेज जा रहा था। ट्रेन में कड़ी भीड़ के बीच उसने एक यात्री से बिल्कुल सामान्य तरीके से कहा— “थोड़ा आगे बढ़िए।” बस इतना ही। यह हिंदी वाक्य उस दिन उसकी ज़िंदगी बदल देगा—किसी ने सोचा भी नहीं था

हिंदी बोलने पर भीड़ का हमला—अर्नव का डर, गुस्सा और असहायता हिंदी सुनते ही पास के 4–5 युवकों ने भाषा को लेकर झगड़ा शुरू कर दिया।

उनके चिल्लाने वाले शब्द—

“मराठी क्यों नहीं बोलता?”, “अरे अपनी भाषा छोड़ हिंदी क्यों बोलता है?”इसके बाद गंदी गालियाँ, धक्के, थप्पड़, बाल पकड़कर गिराने की कोशिश— अर्नव बेचारा थाने स्टेशन पर डरकर उतर गया, मुलुंड पहुंचा, लेकिन सदमे में होने की वजह से प्रैक्टिकल एग्जाम भी नहीं दे सका।

Language War

घर पर पिता से आखिरी बातचीत—

“पापा, बहुत बुरा हुआ… मैं ठीक नहीं हूं।”

शाम को पिता घर लौटे—और अर्नव फंदे पर लटका मिला।

19 साल का एक लड़का… एक भाषा को लेकर खत्म हो गया।

जांच, CCTV, देश भर में गुस्सा—

मुंबई पुलिस ने मामले को अप्राकृतिक मृत्यु के रूप में दर्ज किया है लेकिन CCTV, यात्रियों और कॉलेज के बयानों की जांच तेज़ हो चुकी है। सोशल मीडिया पर #JusticeForArnav पूरे देश में ट्रेंड।

लोग सवाल पूछ रहे हैं—

क्या भाषा के नाम पर हिंसा स्वीकार्य है?क्या युवाओं की मानसिक स्वास्थ्य स्थितियाँ हमें अनदेखी नहीं करनी चाहिए?मुंबई लोकल जैसी भीड़भाड़ वाली जगहों पर सुरक्षा का क्या? अर्नव का परिवार—फूट-फूटकर रोता हुआ—एक ही बात कह रहा है:

“हमारे बेटे को हिंदी बोलने की सज़ा क्यों मिली?

Language War पर सख़्त टिप्पणी: भारत में यह जहर कहाँ-कहाँ फैल रहा है?

भारत की विविधता हमारी ताकत है—लेकिन हाल के वर्षों में Language Intolerance कई राज्यों में तेज़ी से बढ़ा है, खासकर: महाराष्ट्र में हिंदी बनाम मराठी विवाद,कर्नाटक में कन्नड़ बनाम हिंदी बहस,तमिलनाडु में Anti-Hindi भावना पूर्वोत्तर में स्थानीय भाषाओं की रक्षा बनाम बाहरी भाषाएँ

यह बहस लोकतांत्रिक अधिकार की नहीं— बल्कि असहिष्णुता, असुरक्षा और राजनीति से उत्पन्न जहर का परिणाम है। भारत में कोई भी भाषा दूसरे से बड़ी नहीं— और न ही किसी भारतीय नागरिक को अपनी पसंद की भाषा बोलने से रोका जा सकता है। अर्नव की मौत इस खतरनाक ट्रेंड की चेतावनी है—भाषा नहीं, नफ़रत मार रही है।

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