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भारत के सामने नई मुश्किल : सऊदी-पाक डिफेंस डील से बढ़ेगा दबाव, लेकिन है एक बड़ा मौका भी

सऊदी-पाक डिफेंस डील – सऊदी अरब और पाकिस्तान ने हाल ही में एक अहम रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसने पूरे दक्षिण एशिया और खाड़ी क्षेत्र में नए राजनीतिक और कूटनीतिक समीकरण खड़े कर दिए हैं। भारत के लिए यह समझौता केवल पड़ोसी पाकिस्तान और पश्चिम एशिया की राजनीति का मामला नहीं है, बल्कि उसकी सुरक्षा, ऊर्जा नीति और विदेश संबंधों से सीधा जुड़ा हुआ है।

रक्षा समझौते की रूपरेखा

इस समझौते के तहत पाकिस्तान और सऊदी अरब ने रक्षा क्षेत्र में सहयोग को बढ़ाने का फैसला किया है। इसमें हथियारों का निर्माण और आपूर्ति, संयुक्त सैन्य अभ्यास, प्रशिक्षण कार्यक्रम और तकनीकी सहयोग शामिल हैं। पाकिस्तान, जो JF-17 लड़ाकू विमान और विभिन्न मिसाइल प्रणालियों का उत्पादन कर रहा है, अपनी इस क्षमता को सऊदी अरब के साथ साझा करेगा। दूसरी ओर, सऊदी अरब पाकिस्तान को वित्तीय सहयोग और आधुनिक उपकरण उपलब्ध कराएगा। भारत के लिए यह इसलिए चिंता का विषय है क्योंकि पाकिस्तान की रक्षा क्षमताओं को सऊदी अरब का आर्थिक सहयोग एक नई मजबूती दे सकता है।

भारत की सुरक्षा पर असर

भारत और पाकिस्तान के रिश्ते दशकों से तनावपूर्ण रहे हैं। LOC पर लगातार संघर्षविराम उल्लंघन और आतंकवादी गतिविधियों ने भारत को हमेशा सतर्क रखा है। अब अगर पाकिस्तान को सऊदी अरब से वित्तीय मदद और तकनीकी सहयोग मिलता है, तो उसकी सैन्य शक्ति में इजाफा होगा। भारत को यह आशंका भी है कि इस सहयोग का इस्तेमाल पाकिस्तान आतंकवादी संगठनों को परोक्ष रूप से मजबूत करने में कर सकता है। भारत पहले भी कई बार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह मुद्दा उठाता रहा है कि पाकिस्तान की सेना और आतंकवादी संगठन आपस में जुड़े हुए हैं। ऐसे में रक्षा सहयोग भारत के लिए सीधी सुरक्षा चुनौती बन सकता है।

भारत-सऊदी रिश्तों की जटिलता

पिछले एक दशक में भारत और सऊदी अरब के रिश्ते काफी मजबूत हुए हैं। ऊर्जा क्षेत्र में सऊदी अरब भारत का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है। लाखों भारतीय प्रवासी सऊदी अरब में रहते हैं, जो दोनों देशों की अर्थव्यवस्था को जोड़ने वाला अहम पहलू है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के बीच हुई मुलाकातों ने दोनों देशों के रिश्तों को निवेश, व्यापार और सुरक्षा सहयोग के नए स्तर तक पहुंचाया है। लेकिन पाकिस्तान के साथ हुआ यह रक्षा समझौता भारत-सऊदी संबंधों में दरार डालने वाला कदम साबित हो सकता है।

सऊदी-पाक डिफेंस डील

क्षेत्रीय राजनीति पर असर

सऊदी अरब और पाकिस्तान का यह समझौता सिर्फ द्विपक्षीय सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे क्षेत्रीय परिदृश्य को प्रभावित करेगा। ईरान और सऊदी अरब के रिश्तों में ऐतिहासिक प्रतिस्पर्धा रही है। भारत ईरान के साथ चाबहार पोर्ट और ऊर्जा प्रोजेक्ट्स में साझेदारी कर रहा है। ऐसे में सऊदी-पाक नजदीकी भारत की पश्चिम एशिया रणनीति पर असर डाल सकती है।

पाकिस्तान पहले से ही चीन का करीबी सहयोगी है। अब अगर सऊदी अरब भी पाकिस्तान के रक्षा क्षेत्र में सहयोगी बन जाता है, तो यह भारत के लिए दोहरी चुनौती होगी। चीन और सऊदी दोनों का पाकिस्तान को सपोर्ट करना भारत के रणनीतिक हितों के लिए खतरनाक हो सकता है। अमेरिका परंपरागत रूप से सऊदी अरब का रक्षा साझेदार रहा है। लेकिन अगर सऊदी अरब पाकिस्तान के साथ ज्यादा जुड़ता है, तो वॉशिंगटन और नई दिल्ली के बीच नए समीकरण बन सकते हैं।

 

भारत की रणनीति

भारत इस समझौते का सीधा विरोध करने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि उसकी ऊर्जा सुरक्षा और खाड़ी क्षेत्र में प्रवासियों का मुद्दा उससे जुड़ा है। लेकिन भारत को अपनी विदेश नीति और रक्षा रणनीति दोनों स्तरों पर नए कदम उठाने होंगे। भारत को सऊदी अरब के साथ संवाद बनाए रखना होगा और यह संदेश देना होगा कि पाकिस्तान को दिया जाने वाला कोई भी सहयोग भारत की सुरक्षा चिंताओं को प्रभावित न करे। इसके साथ ही भारत को अपने रक्षा आधुनिकीकरण कार्यक्रम, स्वदेशी उत्पादन और वैश्विक साझेदारियों को और मजबूत करना होगा।

कूटनीति के स्तर पर भारत को बहुपक्षीय मंचों जैसे संयुक्त राष्ट्र और G20 का इस्तेमाल करना होगा ताकि पाकिस्तान को मिलने वाले किसी भी सैन्य सहयोग को वैश्विक स्तर पर चुनौती दी जा सके।

विशेषज्ञों की राय

विशेषज्ञ मानते हैं कि यह समझौता भारत के लिए एक “wake-up call” है। सुरक्षा विश्लेषकों का कहना है कि भारत को अपनी सीमा सुरक्षा और आतंकवाद-रोधी क्षमताओं को और तेज़ी से बढ़ाना होगा। कूटनीति के जानकारों का मानना है कि भारत को खाड़ी देशों के साथ अपने रिश्तों को और गहराई देनी होगी ताकि पाकिस्तान को मिलने वाला लाभ सीमित किया जा सके। आर्थिक दृष्टि से विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत के पास अभी भी बढ़त है, क्योंकि वह सऊदी अरब का सबसे बड़ा ऊर्जा खरीदार है और यह स्थिति रियाद को भारत की चिंताओं को नजरअंदाज करने से रोक सकती है।

भविष्य की राह

सऊदी अरब और पाकिस्तान का यह रक्षा समझौता भारत के लिए एक सीधी चुनौती है। यह केवल सैन्य संतुलन का मामला नहीं है, बल्कि कूटनीतिक और आर्थिक रणनीति का भी हिस्सा है। आने वाले समय में भारत को बेहद सावधानी से अपनी नीतियाँ तय करनी होंगी। अगर भारत समय रहते अपनी सुरक्षा तैयारियों और कूटनीतिक चालों को मजबूत कर लेता है, तो इस नई स्थिति को अपने पक्ष में भी मोड़ा जा सकता है।

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