Singur Farmers Crisis 2026: पश्चिम बंगाल का सिंगुर, जो कभी अपनी उपजाऊ जमीन और रिकॉर्ड आलू उत्पादन के लिए जाना जाता था, आज एक बार फिर दर्द और बदहाली के आंसू रो रहा है। करीब 20 साल पहले शुरू हुआ नैनो कारखाने का विवाद तो खत्म हो गया, लेकिन किसानों की किस्मत आज भी अधर में लटकी है। साल 2026 की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, सिंगुर में आलू और धान के उत्पादन में 50% से 70% तक की भारी गिरावट दर्ज की गई है। किसानों का कहना है कि उनकी जमीन अब पहले जैसी ‘उर्वर’ नहीं रही और सरकार के वादे सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह गए हैं।
क्यों बंजर हो रही है सिंगुर की जमीन? असल वजहें
सिंगुर के किसानों की सबसे बड़ी समस्या जमीन की क्वालिटी का खराब होना है। 2006-08 के दौरान टाटा नैनो प्रोजेक्ट के लिए जब जमीन का अधिग्रहण हुआ, तो वहां कंक्रीट और भारी मशीनों का इस्तेमाल किया गया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जमीन तो वापस मिल गई, लेकिन मिट्टी की ऊपरी परत (Top Soil) पूरी तरह नष्ट हो चुकी है।

आज स्थिति यह है कि जिस खेत में कभी प्रति हेक्टेयर 25 टन आलू निकलता था, वहां अब मुश्किल से 12 टन की पैदावार हो रही है। धान की खेती भी अब साल में दो बार के बजाय सिर्फ एक बार ही हो पा रही है। पानी के जमाव और सिंचाई की समुचित व्यवस्था न होने के कारण हजारों किसान कर्ज के बोझ तले दब गए हैं।
राजनीति और वादों के बीच फंसा किसान
सिंगुर का मुद्दा हमेशा से पश्चिम बंगाल की राजनीति का केंद्र रहा है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने इसी आंदोलन के दम पर सत्ता हासिल की थी, लेकिन 2026 में भी किसान खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। हालांकि सरकार ने ‘कृषक बंधु’ जैसी योजनाएं शुरू की हैं, लेकिन सिंगुर के जमीनी हालात को सुधारने के लिए कोई ठोस ‘पुनर्वास पैकेज’ नहीं दिया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक पुरानी फैक्ट्रियों के अवशेष पूरी तरह हटाकर जमीन को समतल नहीं किया जाता, तब तक खेती में सुधार नामुमकिन है।
आलू और धान की फसल पर दोहरी मार
सिंगुर का आलू पूरे बंगाल में मशहूर है, लेकिन इस साल बेमौसम बारिश और बढ़ती लागत ने कमर तोड़ दी है। खाद, बीज और बिजली के दाम पिछले दो सालों में दोगुने हो गए हैं, जबकि मंडी में किसानों को सही भाव नहीं मिल रहा है। छोटे किसान (जो कुल संख्या का 60% हैं) अब खेती छोड़कर शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं। बुजुर्ग और महिलाएं, जो घर पर रहकर खेती संभालती थीं, अब आर्थिक तंगी के कारण संकट में हैं।
समाधान की तलाश
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि सिंगुर को बचाने के लिए युद्धस्तर पर काम करने की जरूरत है। इसके लिए कुछ सुझाव दिए गए हैं:
• मिट्टी का उपचार (Soil Treatment): सरकारी स्तर पर मिट्टी का परीक्षण कर उसे फिर से उपजाऊ बनाने के लिए जरूरी पोषक तत्व और जैविक खाद मुहैया कराई जाए।
• ड्रिप इरिगेशन: सिंचाई की समस्या दूर करने के लिए आधुनिक तकनीक और सब्सिडी दी जाए।
• कोऑपरेटिव फार्मिंग: छोटे किसानों को एकजुट कर सहकारी खेती को बढ़ावा दिया जाए ताकि लागत कम हो सके।
• बाजार तक पहुंच: किसानों को दलालों से बचाने के लिए स्थानीय स्तर पर सरकारी मंडियां (Kisan Mandis) मजबूत की जाएं।

क्या सुधरेगी सिंगुर की तस्वीर?
सिंगुर के किसानों की लड़ाई सिर्फ जमीन की नहीं, बल्कि उनके आत्म-सम्मान और आजीविका की है। 2026 के विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, ऐसे में बीजेपी और टीएमसी दोनों ही इस मुद्दे को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या भाषणों से किसानों के पेट भरेंगे? सिंगुर का संकट हमें याद दिलाता है कि औद्योगीकरण और कृषि के बीच संतुलन बनाना कितना जरूरी है।
किसान भाइयों, अगर आप भी इस समस्या से जूझ रहे हैं, तो जिला कृषि कार्यालय में अपनी शिकायत दर्ज कराएं और सरकारी योजनाओं की जानकारी के लिए हेल्पलाइन 1800-180-1551 पर संपर्क करें। सिंगुर के संघर्ष की हर अपडेट के लिए हमारे साथ जुड़े रहें।
क्या आपको लगता है कि सिंगुर के किसानों को कभी पूरा न्याय मिल पाएगा? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।
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