भारतीय संसद, जिसे लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता है, अक्सर तीखी राजनीतिक बहसों, शोर-शराबे और गंभीर विधेयकों पर चर्चा के लिए खबरों में रहती है। लेकिन, पिछले कुछ दिनों से संसद भवन की चर्चा एक बिल्कुल अलग और अनोखे कारण से हो रही है। यह कारण कोई राजनेता नहीं, बल्कि एक चार पैरों वाला ‘मेहमान’ है।
जी हाँ, हम बात कर रहे हैं कांग्रेस की वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री रेणुका चौधरी के पालतू कुत्ते की, जिसकी संसद परिसर में मौजूदगी ने एक नई राष्ट्रीय बहस को जन्म दे दिया है। एक तरफ जहाँ पशु प्रेमी इसे सामान्य बात मान रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ संसदीय मर्यादा और सुरक्षा के सवाल भी उठाए जा रहे हैं।
आखिर एक कुत्ते के संसद परिसर में आने पर इतना बवाल क्यों है? क्या हैं नियम और क्यों बंटी हुई है जनता की राय? आइए, इस विस्तृत रिपोर्ट में जानते हैं इस पूरे मामले की गहराई।

पूरा मामला क्या है?
हाल ही में, संसद के सत्र के दौरान कांग्रेस नेता रेणुका चौधरी को अपनी गाड़ी में अपने पालतू कुत्ते के साथ संसद भवन परिसर में आते देखा गया। जैसे ही उनकी गाड़ी मीडिया के कैमरों के सामने रुकी, लोगों का ध्यान पिछली सीट पर बैठे या खिड़की से झांकते उनके कुत्ते पर गया।
देखते ही देखते ये तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए। अमूमन संसद के गेट पर कड़ी सुरक्षा होती है और केवल सांसदों, कर्मचारियों और मान्यता प्राप्त पत्रकारों को ही प्रवेश मिलता है। ऐसे में, एक वीआईपी गाड़ी में कुत्ते की मौजूदगी ने सभी का ध्यान खींचा और यह चर्चा का विषय बन गया।
क्यों छिड़ी बहस? दो तरफा हुई जनता की राय
रेणुका चौधरी और उनके ‘बेजुबान साथी’ के वीडियो सामने आते ही देश में एक बहस छिड़ गई। यह बहस मुख्य रूप से दो तर्कों के बीच है: ‘संसदीय मर्यादा’ बनाम ‘पशु प्रेम’।
1. विरोध में तर्क: मर्यादा और सुरक्षा का सवाल
- एक बड़ा वर्ग इस बात से नाखुश है। उनके तर्क कुछ इस प्रकार हैं:
- संसदीय गरिमा: आलोचकों का कहना है कि संसद देश की सर्वोच्च विधायी संस्था है। यह कोई पार्क या पिकनिक स्पॉट नहीं है। यहाँ जानवरों को लाना इस गरिमामयी स्थान की गंभीरता को कम करता है।
- ध्यान भटकना (Distraction): संसद में देश के ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए। जब ऐसी घटनाएं होती हैं, तो मुख्य मुद्दों से मीडिया और जनता का ध्यान भटक जाता है।
- सुरक्षा प्रोटोकॉल: संसद एक अति-संवेदनशील सुरक्षा क्षेत्र (High Security Zone) है। अगर सांसदों को अपने पालतू जानवर लाने की छूट दी गई, तो यह सुरक्षाकर्मियों के लिए एक नई चुनौती बन सकता है। सवाल यह भी है कि यह छूट कहाँ तक जाएगी?
2. समर्थन में तर्क: पेट्स भी हैं परिवार का हिस्सा
- दूसरी ओर, पशु प्रेमी और रेणुका चौधरी के समर्थक इसे एक सामान्य घटना मान रहे हैं:
- पारिवारिक सदस्य: आज के दौर में लोग अपने पालतू जानवरों को परिवार का हिस्सा मानते हैं। अगर कुत्ता सिर्फ गाड़ी में है और किसी को नुकसान नहीं पहुँचा रहा, तो इसमें क्या बुराई है?
- भावनात्मक सहारा (Emotional Support): कई लोग तर्क देते हैं कि राजनेताओं पर बहुत तनाव होता है, और उनके पालतू जानवर उनके लिए भावनात्मक सहारे का काम करते हैं।
- आधुनिक सोच: समर्थकों का कहना है कि हमें पुरानी सोच से बाहर निकलना चाहिए। दुनिया भर में कई दफ्तरों में ‘पेट-फ्रेंडली’ माहौल बनाया जा रहा है।
क्या कहते हैं संसद के नियम?

यह जानना बेहद जरूरी है कि नियम क्या कहते हैं।
- तकनीकी रूप से, संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के चैंबर के भीतर किसी भी जानवर को ले जाना सख्त मना है। यह संसदीय शिष्टाचार और नियमों का स्पष्ट उल्लंघन है।
- हालाँकि, विवाद ‘संसद परिसर’ (Parliament Premises) का है, जिसमें पार्किंग क्षेत्र और बाहरी हिस्से शामिल हैं। नियमों के अनुसार, सांसदों की गाड़ियों को परिसर में प्रवेश की अनुमति होती है। आमतौर पर सुरक्षाकर्मी वीआईपी गाड़ियों की उस तरह तलाशी नहीं लेते, जैसी आम आगंतुकों की होती है।
- रेणुका चौधरी का कुत्ता संसद के अंदर नहीं, बल्कि उनकी गाड़ी में परिसर तक आया था। यह एक ‘ग्रे एरिया’ (अस्पष्ट क्षेत्र) है जहाँ नियम पूरी तरह साफ नहीं हैं कि क्या सांसद अपनी निजी गाड़ी में जानवर ला सकते हैं या नहीं। इसी अस्पष्टता के कारण बहस ने तूल पकड़ा है।
रेणुका चौधरी का पक्ष
रेणुका चौधरी अपने बेबाक अंदाज के लिए जानी जाती हैं। वह पहले भी अपने कुत्ते के साथ सार्वजनिक जगहों पर देखी गई हैं और वह एक जानी-मानी पशु प्रेमी हैं। उनका मानना है कि जानवर उनके परिवार का हिस्सा हैं और जब तक वे किसी कार्यवाही में बाधा नहीं डाल रहे हैं, इसे मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए।
निष्कर्ष: मर्यादा और आधुनिकता के बीच संतुलन
- यह घटना सिर्फ एक कुत्ते के संसद पहुँचने की नहीं है, बल्कि यह बदलती सामाजिक मान्यताओं और स्थापित प्रोटोकॉल के बीच के टकराव को दर्शाती है। जहाँ एक तरफ संसद की गंभीरता और सुरक्षा सर्वोपरि है, वहीं दूसरी तरफ जानवरों के प्रति बढ़ता प्रेम और उन्हें परिवार मानने की भावना भी प्रबल है।
- शायद यह समय है कि संसद की सुरक्षा समितियां इस ‘ग्रे एरिया’ पर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करें ताकि भविष्य में ऐसे विवादों से बचा जा सके और संसद का कीमती समय देश के जरूरी मुद्दों पर लग सके।
आपकी राय मायने रखती है!
क्या आपको लगता है कि सांसदों को अपने पालतू जानवरों को संसद परिसर (गाड़ी में ही सही) में लाने की अनुमति होनी चाहिए? या यह संसद की मर्यादा के खिलाफ है? अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें।