Land for Job Scam: सुप्रीम कोर्ट में CBI की दो टूक – ‘कोर्ट को बुलडोज नहीं कर सकते’, क्या राबड़ी देवी की मुश्किलें और बढ़ेंगी?

सुप्रीम कोर्ट

Land for Job Scam Case Update: बिहार की राजनीति और लालू परिवार के लिए आज का दिन सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में काफी गहमागहमी भरा रहा। ‘लैंड फॉर जॉब’ (नौकरी के बदले जमीन) मामले में राबड़ी देवी की याचिका पर सुनवाई के दौरान CBI ने बेहद सख्त रुख अपनाया है। केंद्रीय जांच एजेंसी ने कोर्ट में साफ़ कह दिया है कि कानूनी प्रक्रिया को “बुलडोज” नहीं किया जा सकता।

आज के इस आर्टिकल में हम जानेंगे कि आखिर कोर्ट रूम के अंदर क्या हुआ, CBI ने इतना बड़ा बयान क्यों दिया और इसका लालू यादव, राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव पर क्या असर पड़ेगा।

सुप्रीम कोर्ट में आज क्या हुआ?

मामला IRCTC और लैंड-फॉर-जॉब स्कैम (Land for Job Scam) से जुड़े केस को एक विशेष अदालत से दूसरी जगह ट्रांसफर करने या मुकदमों को एक साथ चलाने की मांग से जुड़ा था। इस पर सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता (CBI की तरफ से) और बचाव पक्ष के वकीलों के बीच तीखी बहस हुई।

सुप्रीम कोर्ट

CBI की दलील: ‘कानून का अपना रास्ता है’

जब राबड़ी देवी और अन्य आरोपियों की तरफ से यह दलील दी गई कि अलग-अलग ट्रायल चलाने से उन्हें परेशान किया जा रहा है और मामलों को एक साथ कर देना चाहिए या ट्रांसफर करना चाहिए, तो CBI ने इसका कड़ा विरोध किया।

CBI की तरफ से पेश हुए वकीलों ने जजों की बेंच के सामने तर्क दिया कि:

“आरोपी पक्ष अपनी शर्तों पर ट्रायल नहीं चलवा सकता। कोर्ट की अपनी प्रक्रिया होती है और किसी भी दलील के आधार पर कोर्ट को ‘बुलडोज’ (Bulldoze) नहीं किया जा सकता यानी दबाव में लेकर फैसले नहीं बदलवाए जा सकते।”

CBI का कहना है कि हर अपराध की प्रकृति (Nature of Crime) अलग है और जांच अभी भी कई चरणों में चल रही है, इसलिए इसे इतनी आसानी से क्लब (Club) या ट्रांसफर नहीं किया जा सकता।

राबड़ी देवी की याचिका और बचाव पक्ष का तर्क

लालू परिवार के वकीलों का कहना है कि यह मामला बहुत पुराना है और एक ही तरह के आरोपों के लिए अलग-अलग चार्जशीट और अलग-अलग ट्रायल का सामना करना उनके मुवक्किलों (Clients) के मौलिक अधिकारों का हनन है।

बचाव पक्ष की मुख्य मांगें:

• मामले में अनावश्यक देरी न की जाए।

• संबंधित मामलों को एक ही जगह सुना जाए ताकि बार-बार कोर्ट के चक्कर न लगाने पड़ें।

• राजनीतिक द्वेष के तहत कार्रवाई का आरोप।

लेकिन आज सुप्रीम कोर्ट में CBI के आक्रामक रुख ने यह साफ़ कर दिया है कि राहत मिलना इतना आसान नहीं होगा।

क्या है लैंड फॉर जॉब स्कैम?

जो पाठक इस मामले से पूरी तरह वाकिफ नहीं हैं, उनके लिए यह जानना जरुरी है:

• समय: यह मामला 2004 से 2009 के बीच का है जब लालू प्रसाद यादव केंद्र में रेल मंत्री थे।

• आरोप: आरोप है कि रेलवे में ग्रुप-डी (Group-D) की नौकरी देने के बदले में उम्मीदवारों से जमीनें (Land) लिखवाई गईं। ये जमीनें लालू यादव के परिवार के सदस्यों (राबड़ी देवी, मीसा भारती, हेमा यादव आदि) के नाम पर बहुत कम दामों में खरीदी गईं या गिफ्ट की गईं।

• CBI और ED की एंट्री: इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग की जांच ED कर रही है और आपराधिक साजिश की जांच CBI कर रही है।

अब आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनी हैं। CBI का यह कहना कि “कोर्ट को बुलडोज नहीं किया जा सकता”, यह दर्शाता है कि एजेंसी के पास पुख्ता सबूत हैं और वे किसी भी हाल में ट्रायल में ढील देने के मूड में नहीं हैं।

अगर सुप्रीम कोर्ट CBI के तर्कों से सहमत होता है, तो:

• लालू परिवार को अलग-अलग तारीखों पर कोर्ट में पेश होना पड़ेगा।

• ट्रायल लंबा चलेगा, जिससे बिहार विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

सुप्रीम कोर्ट इस पर क्या अंतिम फैसला सुनाता है, इस पर हमारी नजर बनी रहेगी।

आपकी राय: क्या आपको लगता है कि यह केवल राजनीतिक बदला है या वास्तव में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक जरुरी कार्रवाई? कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर लिखें।

सुप्रीम कोर्ट

FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)

Q1: लैंड फॉर जॉब स्कैम में मुख्य आरोपी कौन हैं?

Ans: इस मामले में लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, तेजस्वी यादव और मीसा भारती समेत कई अन्य लोग आरोपी हैं।

Q2: आज सुप्रीम कोर्ट में CBI ने क्या कहा?

Ans: CBI ने राबड़ी देवी की याचिका का विरोध करते हुए कहा कि कानूनी प्रक्रिया को दबाव में बदला नहीं जा सकता और कोर्ट को ‘बुलडोज’ नहीं किया जा सकता।

Q3: क्या तेजस्वी यादव को जेल हो सकती है?

Ans: मामला अभी कोर्ट में विचाराधीन (Sub-judice) है। फैसला आने के बाद ही कुछ कहा जा सकता है, लेकिन मुश्किलें जरूर बढ़ी हैं।

Read more

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: अब PF और पेंशन में पत्नी ही नहीं, मां का भी होगा बराबर का हक! जानिए पूरी डिटेल

सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला अक्सर नौकरीपेशा लोग अपने PF (भविष्य निधि) या पेंशन अकाउंट में अपनी पत्नी या बच्चों को नॉमिनी (Nominee) बनाते हैं। हम यही मानते आए हैं कि हमारे न रहने पर सारा पैसा नॉमिनी को ही मिलेगा। लेकिन सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के एक हालिया और ऐतिहासिक फैसले ने इस धारणा को बदल दिया है।

अगर आप नौकरी करते हैं और आपका पीएफ कटता है, तो यह खबर आपके और आपके परिवार के लिए बेहद जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसके पीएफ और पेंशन पर सिर्फ पत्नी का नहीं, बल्कि उसकी मां का भी बराबर का अधिकार है।

आइए आसान भाषा में समझते हैं कि कोर्ट ने क्या कहा, नियम क्या हैं और इसका आप पर क्या असर होगा।\

1. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए यह साफ कर दिया कि केवल ‘नॉमिनी’ होने से कोई व्यक्ति पैसे का पूरा मालिक नहीं बन जाता। कोर्ट ने कहा कि मां भी ‘Class-I Heir’ (प्रथम श्रेणी की उत्तराधिकारी) होती है, इसलिए उसे बेटे की संपत्ति या फंड से वंचित नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट

फैसले की मुख्य बातें:

• चाहे नॉमिनी के तौर पर सिर्फ पत्नी का नाम हो, फिर भी मां का हक खत्म नहीं होता।

• भविष्य निधि (PF) और पेंशन का पैसा उत्तराधिकार कानून (Succession Law) के तहत बंटेगा।

• बेटे की कमाई या जमा पूंजी पर बूढ़ी मां का भी उतना ही अधिकार है जितना पत्नी और बच्चों का।

2. नॉमिनी (Nominee) बनाम उत्तराधिकारी

(Legal Heir): असली मालिक कौन?

यह सबसे ज्यादा कन्फ्यूजन वाला हिस्सा है। लोग सोचते हैं कि जिसे नॉमिनी बना दिया, पैसा उसी का है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे बहुत ही बारीकी से समझाया है।

नॉमिनी का काम: नॉमिनी सिर्फ एक ‘केयरटेकर’ या ‘ट्रस्टी’ होता है। उसका काम है कि वह विभाग से पैसे ले और उसे असली वारिसों (Legal Heirs) तक पहुंचाए।

असली मालिक: हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (Hindu Succession Act) के तहत, अगर कोई वसीयत (Will) नहीं बनी है, तो संपत्ति ‘Class-I Heirs’ में बराबर बंटेगी।

* Class-I Heirs कौन हैं?: इसमें व्यक्ति की मां, पत्नी और बच्चे शामिल होते हैं।

सरल उदाहरण: मान लीजिए किसी व्यक्ति के PF खाते में 10 लाख रुपये हैं और उसने अपनी पत्नी को नॉमिनी बनाया है। उसकी मृत्यु के बाद, भले ही चेक पत्नी के नाम पर आए, लेकिन कानूनन उसे उस पैसे में से अपनी सास (मृतक की मां) को उनका हिस्सा देना होगा।

3. यह फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?

भारतीय समाज में अक्सर देखा गया है कि बेटे की मृत्यु के बाद बहुएं या ससुराल वाले बुजुर्ग माता-पिता को बेसहारा छोड़ देते हैं। पेंशन या पीएफ का सारा पैसा पत्नी को मिल जाता है और माता-पिता खाली हाथ रह जाते हैं।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन बुजुर्ग माताओं के लिए एक सुरक्षा कवच है। यह सुनिश्चित करता है कि बुढ़ापे में बेटे के न रहने पर भी मां को आर्थिक तंगी का सामना न करना पड़े।

4. अब आपको क्या करना चाहिए?

इस फैसले के बाद कुछ बातें जिनका आपको ध्यान रखना चाहिए:

नॉमिनेशन चेक करें: अपने पीएफ और बैंक खातों में देखें कि आपने किसे नॉमिनी बनाया है।

वसीयत (Will) जरूर बनाएं: अगर आप चाहते हैं कि आपके बाद आपकी संपत्ति को लेकर परिवार में झगड़ा न हो, तो एक स्पष्ट ‘वसीयत’ बनाना सबसे अच्छा है। वसीयत में आप लिख सकते हैं कि किसको कितना हिस्सा मिले।

परिवार को जानकारी दें: अपने घर के सदस्यों को इन नियमों के बारे में बताएं ताकि भविष्य में कोई विवाद न हो।

सुप्रीम कोर्ट

FAQ: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

Q1: अगर मैंने सिर्फ पत्नी को नॉमिनी बनाया है, तो क्या मां क्लेम कर सकती है?

– हाँ, बिल्कुल। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, मां कानूनी वारिस (Legal Heir) है और वह कोर्ट के जरिए अपना हिस्सा मांग सकती है।

Q2: क्या यह नियम प्राइवेट और सरकारी दोनों कर्मचारियों पर लागू है?

– हाँ, यह उत्तराधिकार का सामान्य कानून है जो जमा पूंजी (PF/Gratuity आदि) पर लागू होता है।

Q3: अगर पिता जीवित हैं, तो क्या उन्हें भी हिस्सा मिलेगा?

– हिंदू कानून के तहत पिता ‘Class-II Heir’ में आते हैं। अगर मां, पत्नी और बच्चे (Class-I) मौजूद हैं, तो पहला हक उनका होता है। लेकिन वसीयत बनाकर पिता को भी हिस्सा दिया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला समाज में संतुलन लाने वाला है। यह याद दिलाता है कि पत्नी जीवनसाथी है, लेकिन मां वह है जिसने जन्म दिया है। कानून की नजर में दोनों का स्थान महत्वपूर्ण है।

अगर आपको यह जानकारी काम की लगी हो, तो इसे अपने दोस्तों और परिवार के साथ जरूर Share करें। जागरूक बनें, सुरक्षित रहें!

Read more