History of exams: आखिर किसने बनाया पढ़ाई का यह सिरदर्द? जानें परीक्षाओं से जुड़े 4 अनोखे सच

History of exams

जब भी परीक्षा का समय पास आता है, तो रातों की नींद उड़ जाना, किताबों के पन्ने पलटते रहना और मन में भारी तनाव होना बहुत ही आम बात है। चाहे स्कूल के बोर्ड एग्जाम हों, कॉलेज के सेमेस्टर्स हों या फिर सरकारी नौकरी की तैयारी, ‘एग्जाम’ एक ऐसा शब्द है जिसे सुनते ही हर स्टूडेंट का दिल थोड़ा तेज़ धड़कने लगता है।

लेकिन क्या आपने कभी देर रात तक पढ़ते हुए यह सोचा है कि आखिर इस परीक्षा सिस्टम को चालू किसने किया था? ऐसा कौन इंसान था जिसके दिमाग में सबसे पहले यह आइडिया आया कि बच्चों को एक कमरे में बैठाकर उनके ज्ञान का टेस्ट लिया जाए? Apni Vani की आज की इस स्पेशल फैक्ट रिपोर्ट में हम आपको एग्जाम की शुरुआत और इसके 1400 साल पुराने सफर की पूरी कहानी बताने जा रहे हैं।

सबसे पहले परीक्षा कहाँ शुरू हुई? (History Of Exams)

अगर आपको लगता है कि एग्जाम कोई नई सदी की देन है, तो आप बिल्कुल गलत हैं। दुनिया में सबसे पहले औपचारिक परीक्षा की शुरुआत आज से लगभग 1400 साल पहले चीन में हुई थी। ईस्वी 606 में चीन के सुई राजवंश (Sui Dynasty) ने एक खास परीक्षा प्रणाली शुरू की थी, जिसे ‘इंपीरियल एग्जामिनेशन’ कहा जाता था।

उस ज़माने में राजा के दरबार में बड़े-बड़े पदों और सरकारी नौकरियों पर केवल अमीर और ऊंचे घरानों के लोगों को ही जगह मिलती थी। इस पक्षपात को खत्म करने के लिए चीन के राजा ने एक ऐसी परीक्षा बनाई, जहाँ कोई भी इंसान अपनी योग्यता और पढ़ाई के दम पर सरकारी अफसर बन सकता था। यानी शुरू में परीक्षा का मकसद किसी को परेशान करना नहीं, बल्कि सबको बराबर मौका देना था।

हेनरी फिश्चेल और आधुनिक परीक्षाओं का आविष्कार

जब भी इंटरनेट पर लोग खोजते हैं कि “एग्जाम का आविष्कार किसने किया?”, तो सबसे पहला नाम हेनरी फिश्चेल (Henry Fischel) का सामने आता है। 19वीं सदी में अमेरिका के एक विचारक और बिजनेसमैन हेनरी फिश्चेल को आधुनिक परीक्षाओं का जनक माना जाता है।

हेनरी फिश्चेल का मानना था कि किसी भी इंसान को किसी विषय में एक्सपर्ट मानने से पहले यह देखना ज़रूरी है कि उसने जो पढ़ा है, क्या वह उसे सही से समझ भी पाया है या नहीं। उन्होंने ही पहली बार एक ऐसा ढांचा तैयार किया जहाँ एक तय समय सीमा के अंदर छात्रों से सवाल पूछे जाते थे और उनके जवाबों के आधार पर उन्हें नंबर दिए जाते थे। आज दुनिया भर के स्कूलों और कॉलेजों में जो रिटेन टेस्ट (Written Exams) होते हैं, उनकी नींव काफी हद तक इसी विचार पर टिकी है।

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी और भारत में बोर्ड एग्जाम की एंट्री

जैसे-जैसे दुनिया आगे बढ़ी, वैसे-वैसे परीक्षाओं का तरीका भी बदलने लगा। 19वीं सदी के मध्य में, यानी 1858 के आसपास, इंग्लैंड की मशहूर कैम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने पहली बार पूरे देश के लिए एक जैसा स्टैंडर्ड एग्जाम आयोजित करना शुरू किया। इसका मकसद यह था कि देश के हर स्कूल के बच्चे को एक ही तराजू में परखा जा सके।

ब्रिटिश शासन के दौरान यही परीक्षा प्रणाली भारत में भी लाई गई। अंग्रेजों को भारत में अपना शासन चलाने के लिए पढ़े-लिखे और अनुशासित कर्मचारियों की ज़रूरत थी। इसके लिए उन्होंने भारत में स्कूल और यूनिवर्सिटी लेवल पर परीक्षाएं कराना शुरू किया। आगे चलकर यही व्यवस्था हमारे देश के सीबीएसई (CBSE) और अलग-अलग राज्यों के बोर्ड एग्जाम में बदल गई।

History of exams
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परीक्षा का असली मकसद क्या था और आज यह क्या बन गई?

इतिहास को गहराई से देखें तो परीक्षाओं को बनाने के पीछे दो ही बड़े कारण थे—पहला, सबको बराबरी का हक देना ताकि केवल अमीर या ताकतवर लोग ही आगे न बढ़ें, और दूसरा, यह देखना कि स्टूडेंट ने अपनी पढ़ाई से क्या सीखा है।

लेकिन आज के समय में एग्जाम का रूप काफी हद तक बदल चुका है। आज यह सिर्फ ज्ञान परखने का जरिया नहीं रहा, बल्कि नंबरों की एक दौड़ बन गया है। माता-पिता का दबाव और कट-ऑफ लिस्ट की होड़ ने इसे थोड़ा तनावपूर्ण जरूर बना दिया है। फिर भी, यह सच है कि अगर सही तरीके से देखा जाए तो एग्जाम हमें अनुशासन, समय का प्रबंधन और मुश्किल हालात में ध्यान लगाना सिखाते हैं।

Apnivani की बात

एग्जाम चाहे चीन के राजा ने शुरू किया हो या फिर हेनरी फिश्चेल ने, यह हमारी शिक्षा प्रणाली का एक अहम हिस्सा बन चुका है। अगली बार जब आप परीक्षा देने बैठें, तो इसे खुद को साबित करने का एक मौका समझें, न कि कोई बहुत बड़ा बोझ।

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