127 साल बाद दुनिया देखेगी भगवान बुद्ध के ‘असली’ अवशेष: पिपरहवा की खुदाई से निकले धरोहर की पूरी कहानी और धार्मिक महत्व

भगवान बुद्ध

भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनके अवशेषों को लेकर सदियों से कौतूहल रहा है, लेकिन उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले के पिपरहवा से मिले अवशेषों ने इतिहास की दिशा बदल दी। करीब 127 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद, इन दुर्लभ और पवित्र अवशेषों को सार्वजनिक प्रदर्शनी के लिए रखा जा रहा है, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय सभ्यता का ‘अटूट हिस्सा’ करार दिया है।

पिपरहवा स्तूप: जहाँ से मिला बुद्ध का पवित्र साक्ष्य

उत्तर प्रदेश का सिद्धार्थनगर जिला, जो कभी प्राचीन शाक्य गणराज्य का हिस्सा था, आज वैश्विक सुर्खियों में है। 1898 में विलियम क्लैक्सटन पेपे (W.C. Peppe) नामक एक ब्रिटिश अधिकारी ने पिपरहवा के एक प्राचीन टीले की खुदाई करवाई थी। इस खुदाई में एक भारी पत्थर का संदूक मिला, जिसके भीतर मिट्टी के बर्तन और कीमती पत्थरों के साथ पांच छोटे कलश (Urns) प्राप्त हुए।

इन कलशों पर अंकित ब्राह्मी लिपि के लेखों ने दुनिया को चौंका दिया। अभिलेखों के अनुसार, ये अवशेष स्वयं भगवान बुद्ध के थे और इन्हें उनके ‘शाक्य’ परिजनों द्वारा स्थापित किया गया था। आज 127 साल बाद, इन अवशेषों को एक भव्य अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी के माध्यम से श्रद्धालुओं और इतिहासकारों के सामने पेश किया जा रहा है।

प्रधानमंत्री का संबोधन: ‘सभ्यता का अटूट हिस्सा’

हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन अवशेषों के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि “भगवान बुद्ध के ये अवशेष केवल धार्मिक प्रतीक नहीं हैं, बल्कि ये हमारी महान भारतीय सभ्यता और संस्कृति के उस गौरवशाली अध्याय का हिस्सा हैं, जिसने पूरी दुनिया को शांति और करुणा का मार्ग दिखाया।”

सरकार की योजना इन अवशेषों को ‘बुद्धिस्ट सर्किट’ (Buddhist Circuit) के केंद्र के रूप में स्थापित करने की है, ताकि कुशीनगर, लुम्बिनी, सारनाथ और श्रावस्ती आने वाले पर्यटक पिपरहवा के इस ऐतिहासिक महत्व को समझ सकें।

पिपरहवा अवशेषों का ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व

इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के लिए पिपरहवा का स्तूप हमेशा से एक पहेली और शोध का विषय रहा है। कई विद्वानों का मानना है कि यही वह असली ‘कपिलवस्तु’ है, जहाँ भगवान बुद्ध ने अपने जीवन के शुरुआती 29 वर्ष व्यतीत किए थे।

1. 1898 की खुदाई और पेपे का योगदान

विलियम पेपे को खुदाई के दौरान जो कलश मिले थे, उनमें से एक पर लिखा था— “Iyam salila nidhane Budhasa bhagavate sakiyanam sukitibhātinam sayaputanadalanam”. इसका अर्थ है कि यह भगवान बुद्ध के शरीर के अवशेष हैं, जिन्हें उनके शाक्य भाइयों, पुत्रों और पत्नियों द्वारा सम्मानपूर्वक यहाँ रखा गया है।

2. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की पुष्टि

1970 के दशक में के.एम. श्रीवास्तव के नेतृत्व में ASI ने यहाँ दोबारा खुदाई की। उस समय और भी अधिक गहराई में दो अन्य कलश मिले, जिनसे यह सिद्ध हुआ कि पिपरहवा का यह स्थल बुद्ध के परिनिर्वाण के तुरंत बाद बनाया गया था। यह साक्ष्य इसे दुनिया के सबसे प्रामाणिक बौद्ध स्थलों में से एक बनाता है।

वैश्विक स्तर पर बौद्ध कूटनीति (Buddhist Diplomacy)

भारत सरकार इन पवित्र अवशेषों के माध्यम से दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों जैसे थाईलैंड, म्यांमार, श्रीलंका और वियतनाम के साथ अपने संबंधों को और मजबूत कर रही है। इन अवशेषों की प्रदर्शनी न केवल धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देगी, बल्कि ‘सॉफ्ट पावर’ के रूप में भारत की वैश्विक छवि को भी निखारेगी।

हाल के वर्षों में बुद्ध के अवशेषों को मंगोलिया और थाईलैंड भेजा गया था, जहाँ लाखों की संख्या में लोगों ने उनके दर्शन किए थे। अब पिपरहवा के इन विशेष अवशेषों को लेकर सरकार एक बड़े रोडमैप पर काम कर रही है।

सिद्धार्थनगर और पिपरहवा का पर्यटन भविष्य

पिपरहवा को एक अंतरराष्ट्रीय पर्यटन हब बनाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार मिलकर काम कर रही हैं।

बेहतर कनेक्टिविटी: कुशीनगर इंटरनेशनल एयरपोर्ट और लुम्बिनी के पास होने के कारण यहाँ विदेशी पर्यटकों की पहुंच आसान हो गई है।

म्यूजियम का आधुनिकरण: पिपरहवा से प्राप्त अन्य कलाकृतियों और खुदाई में मिली वस्तुओं के लिए एक अत्याधुनिक डिजिटल म्यूजियम बनाने की योजना है।

आध्यात्मिक केंद्र: यहाँ ध्यान केंद्र (Meditation Centres) और अंतरराष्ट्रीय स्तर के विश्राम गृह बनाए जा रहे हैं।

भगवान बुद्ध की शिक्षाएं और आज का समय

ऐसे समय में जब दुनिया संघर्षों और युद्धों से जूझ रही है, भगवान बुद्ध के अवशेषों का सार्वजनिक प्रदर्शन एक शांति का संदेश देता है। बुद्ध का ‘मध्यम मार्ग’ और ‘अहिंसा’ का सिद्धांत आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना 2500 साल पहले था। पिपरहवा के ये अवशेष हमें याद दिलाते हैं कि शांति की खोज बाहर नहीं, बल्कि भीतर है।

विरासत का सम्मान

127 साल बाद पिपरहवा के इन अवशेषों का गौरवपूर्ण तरीके से सामने आना केवल एक पुरातात्विक घटना नहीं है, बल्कि यह भारत की अपनी जड़ों की ओर लौटने की एक प्रक्रिया है। यह आयोजन आने वाली पीढ़ियों को हमारे समृद्ध इतिहास और आध्यात्मिक गहराई से परिचित कराएगा।

प्रधानमंत्री के शब्दों में, यह हमारी सभ्यता का ‘अटूट हिस्सा’ है जो सदैव हमें मानवता और करुणा की राह दिखाता रहेगा।

क्या आपको लगता है कि पिपरहवा को दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण बौद्ध पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

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