देश में जनगणना (Census) का काम चल रहा है, और इसके साथ ही सोशल मीडिया और यूट्यूब पर अफवाहों की बाढ़ सी आ गई है। हर दूसरा वीडियो यह दावा कर रहा है कि सरकारी कर्मचारी आपसे जो जानकारी मांग रहे हैं, उससे आपकी ‘प्राइवेसी’ (निजता) खत्म हो जाएगी, आपका डेटा निजी कंपनियों को बेच दिया जाएगा, या सरकार आपकी संपत्ति छीन लेगी।
आम जनता इस बात से सबसे ज्यादा परेशान है कि आखिर सरकार हमारे घर के बाथरूम, किचन, टीवी, मोबाइल और बिजली जैसी बेहद निजी चीजों की जानकारी क्यों मांग रही है? ‘ApniVani’ की इस विशेष ‘फैक्ट-चेक रिपोर्ट’ में आइए इन तमाम सवालों का वैज्ञानिक और कानूनी सच जानते हैं, ताकि आपके मन का हर डर हमेशा के लिए खत्म हो जाए।
सबसे बड़ा झूठ: “आपका डेटा लीक या बेच दिया जाएगा”
सोशल मीडिया पर फैल रहा यह दावा पूरी तरह से हवा-हवाई है। भारत में जनगणना का काम ‘सेंसस एक्ट 1948’ (Census Act, 1948) के तहत होता है।
इस कानून के तहत आपका दिया गया एक-एक शब्द ‘अत्यधिक गोपनीय’ (Highly Confidential) होता है। कानून इतना सख्त है कि कोई भी सरकारी एजेंसी, पुलिस, या यहां तक कि देश का सुप्रीम कोर्ट भी आपके व्यक्तिगत डेटा को सबूत के तौर पर नहीं मांग सकता। आपका डेटा सिर्फ और सिर्फ ‘आंकड़ों’ (Numbers) के रूप में देखा जाता है, किसी के ‘नाम’ या ‘पहचान’ के रूप में नहीं। इसे बेचना तो दूर, लीक करने पर कर्मचारी को कड़ी सजा और जुर्माने का प्रावधान है।

बाथरूम, किचन और बिजली की जानकारी क्यों चाहिए?
जब कर्मचारी आपसे पूछता है कि आपके घर में शौचालय (Latrine) है या नहीं, या किचन में खाना किस चीज पर पकता है, तो इसका मतलब आपकी जासूसी करना नहीं है।
सरकार इन्हीं आंकड़ों के आधार पर यह तय करती है कि देश के कितने घरों में अभी भी शौचालय नहीं है, ताकि ‘स्वच्छ भारत अभियान’ का फंड वहां भेजा जा सके। इसी तरह, किचन में लकड़ी जलती है या गैस, यह डेटा ‘उज्ज्वला योजना’ (फ्री गैस सिलेंडर) और बिजली का डेटा ‘सौभाग्य योजना’ (फ्री बिजली कनेक्शन) जैसी योजनाओं की नीतियां बनाने के काम आता है।
टीवी, मोबाइल और इंटरनेट पूछने के पीछे क्या राज है?
लोगों को लगता है कि अगर उन्होंने बता दिया कि उनके पास टीवी, फ्रिज या कार है, तो उनका टैक्स बढ़ा दिया जाएगा या राशन कार्ड काट दिया जाएगा। यह एकदम गलत है!
ये सवाल इसलिए पूछे जाते हैं ताकि सरकार ‘लिविंग स्टैंडर्ड’ (जीवन स्तर) को नाप सके। मोबाइल और इंटरनेट के सवाल से यह पता चलता है कि देश में ‘डिजिटल डिवाइड’ कितना है, यानी कितने गांवों में अभी भी इंटरनेट या फोन की सुविधा नहीं पहुंची है। इसी डेटा से भविष्य में मोबाइल टावर लगाने और टेलीकॉम नीतियां बनाने का फैसला लिया जाता है।

मोबाइल नंबर देना सुरक्षित है या नहीं?
जनगणना कर्मचारी जब आपसे आपका मोबाइल नंबर मांगता है, तो कई लोग डर जाते हैं कि कहीं उनके बैंक खाते न खाली हो जाएं या कंपनियों के स्पैम कॉल न आने लगें।
सच्चाई यह है कि आपका नंबर पूरी तरह सुरक्षित है। नंबर मांगने का इकलौता मकसद ‘डिजिटल वेरिफिकेशन’ है। अगर भविष्य में जनगणना पोर्टल पर आपकी दर्ज की गई जानकारी में कोई गलती निकलती है, तो अधिकारी आपको संपर्क करके उसे सुधार सकें, बस इसीलिए नंबर लिया जाता है। इसे किसी भी मार्केटिंग कंपनी के साथ शेयर नहीं किया जाता।
एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते आपको क्या करना चाहिए?
जनगणना कोई सरकारी हथकंडा नहीं है, बल्कि यह हमारे देश के भविष्य का आईना है। अगले 10 सालों तक स्कूल, अस्पताल, सड़क, और रोजगार की नीतियां इसी डेटा के आधार पर बनेंगी।
अगर आप डर कर गलत जानकारी देंगे (जैसे टीवी होते हुए भी मना कर देना), तो अंततः नुकसान आम जनता का ही होगा, क्योंकि सरकार के पास सही नीतियां बनाने के लिए सटीक आंकड़े ही नहीं होंगे।
ApniVani की बात
सोशल मीडिया के चंद ‘व्यूज’ और ‘लाइक्स’ के लिए भ्रामक जानकारी फैलाने वालों से सावधान रहें। जब भी जनगणना कर्मचारी आपके दरवाजे पर आएं, तो पूरे सम्मान और निडरता के साथ उन्हें सही जानकारी दें। आपका डेटा देश की तिजोरी में सुरक्षित है और यह आपके ही विकास के काम आने वाला है।