भारत में सरकारी नौकरी पाना अब सिर्फ ‘मेहनत’ का खेल नहीं रहा, यह ‘किस्मत’ और ‘जाति’ के गणित में उलझ गया है। हाल ही में Supreme Court ने स्पष्ट किया है कि यदि आरक्षित वर्ग (SC/ST/OBC) का कोई उम्मीदवार मेरिट में आता है, तो उसे ‘General’ Seat दी जाएगी। कानूनी तौर पर यह सही हो सकता है, लेकिन सामाजिक तौर पर यह जनरल कैटेगरी (General Category) के लाखों छात्रों के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं है। सवाल यह है—जब आरक्षित वर्ग के पास ‘कोटा’ और ‘ओपन’ दोनों रास्ते हैं, तो जनरल वाले सिर्फ ‘बची-कुची’ सीटों पर कब तक लड़ेंगे? क्या यह समानता है या एक नई असमानता?
आज के इस ब्लॉग में हम उस दर्द और तर्क की बात करेंगे जिसे अक्सर ‘संविधान’ की दुहाई देकर चुप करा दिया जाता है।
दो दरवाजे बनाम एक दरवाजा: यह कैसा न्याय?
सबसे बड़ा सवाल जो आज हर युवा पूछ रहा है— “खेल के नियम सबके लिए अलग क्यों?”

इस व्यवस्था को ऐसे समझिए:
* आरक्षित वर्ग (Reserved Category): इनके पास दो दरवाजे हैं। अगर अच्छे नंबर आए, तो ‘General’ के दरवाजे से अंदर आ जाओ। अगर थोड़े कम आए, तो अपने ‘कोटे’ वाले दरवाजे से आ जाओ।
* अनारक्षित वर्ग (General Category): इनके पास सिर्फ एक दरवाजा है—’Open Seat’। और अब उस दरवाजे से भी आरक्षित वर्ग के मेधावी छात्र (Toppers) अंदर आ रहे हैं।
नतीजा? जनरल कैटेगरी के लिए सीटें लगातार सिकुड़ रही हैं। 100 सीटों की वैकेंसी में हकीकत में जनरल के लिए लड़ने लायक शायद 30-40 सीटें ही बचती हैं।
मेरिट का सम्मान या जनरल का अपमान?
सुप्रीम कोर्ट का तर्क है कि ‘General Seat’ कोई सवर्ण आरक्षण नहीं है, यह सबके लिए खुली है। यह तर्क सुनने में अच्छा लगता है कि “प्रतिभा (Talent) को कोटे में नहीं बांधना चाहिए।”
लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि जनरल कैटेगरी के छात्र को उसी सीट के लिए दुगनी मेहनत करनी पड़ती है।
* एक जनरल छात्र 90% लाकर भी फेल हो जाता है।
* वहीं, सिस्टम की वजह से उससे कम नंबर लाने वाले को नौकरी मिल जाती है।
जब एक ही क्लास में बैठकर, एक ही फीस देकर पढ़ने वाले दो दोस्तों का रिजल्ट इतना अलग होता है, तो मन में हताशा (Frustration) का आना स्वाभाविक है।
‘पिछड़ापन’ अब वो नहीं रहा जो 1950 में था
संविधान जब बना था, तब हालात अलग थे। तब आरक्षण की सख्त जरूरत थी। लेकिन आज 75 साल बाद स्थिति बदल चुकी है।
आज कई आरक्षित परिवारों के बच्चे बेहतरीन स्कूलों में पढ़ रहे हैं, उनके पास संसाधन हैं।
* अगर एक संपन्न (Well-off) आरक्षित उम्मीदवार, जो सुख-सुविधाओं में पला-बढ़ा है, वह ‘General’ की सीट ले जाता है, तो यह उस गरीब जनरल छात्र के साथ अन्याय है जो बिना कोचिंग के लैम्प की रोशनी में पढ़ रहा था।
* कई समझदार आरक्षित छात्र भी यह मानते हैं कि “अगर हम सक्षम हैं, तो हमें कोटे या डबल बेनिफिट की क्या जरूरत?”
मानसिक तनाव और आत्महत्या: एक कड़वी सच्चाई
यह मुद्दा अब सिर्फ नौकरी का नहीं, बल्कि जीवन-मरण का बन गया है। जब सालों साल तैयारी करने के बाद भी एक जनरल छात्र देखता है कि कट-ऑफ (Cut-off) आसमान छू रहा है और उसके पास कोई ‘बैकअप’ (कोटा) नहीं है, तो वह टूट जाता है।
कोटा, राजस्थान से लेकर प्रयागराज तक, छात्रों की आत्महत्या की खबरें इसी हताशा का परिणाम हैं। उन्हें लगता है कि इस देश के सिस्टम में उनके लिए कोई जगह नहीं बची है। वे खुद को अपने ही देश में ‘दोयम दर्जे’ का नागरिक महसूस करने लगे हैं।
क्या बदलाव का समय आ गया है? (Way Forward)
हम सुप्रीम कोर्ट को गलत नहीं ठहरा रहे, क्योंकि वे संविधान की व्याख्या (Interpretation) कर रहे हैं। लेकिन क्या अब संसद को संविधान संशोधन के बारे में नहीं सोचना चाहिए?
कुछ संभावित समाधान जिन पर चर्चा होनी चाहिए:
* वन पर्सन, वन बेनिफिट: अगर आप मेरिट से जनरल सीट ले रहे हैं, तो भविष्य में आपको प्रमोशन या अन्य लाभों में आरक्षण न मिले।
* सभी सीटें ओपन हों (Ideal Scenario): जैसा कि मांग उठ रही है, अगर मेरिट ही आधार है, तो पूरी 100% सीटें ओपन कर दी जाएं ताकि असली ‘प्रतिभा’ का पता चले।
* क्रीमी लेयर का विस्तार: संपन्न आरक्षित परिवारों को आरक्षण से बाहर किया जाए ताकि फायदा उनके ही समाज के गरीब लोगों को मिले, न कि वे जनरल की सीटें खाएं।

वोट बैंक या संविधान
लोकतंत्र में ‘संख्या बल’ (Vote Bank) सब कुछ होता है, शायद इसीलिए कोई भी सरकार इस मुद्दे को छूना नहीं चाहती। लेकिन जब देश का एक बड़ा युवा वर्ग (General Category) यह महसूस करे कि उसके साथ सिस्टमैटिक भेदभाव हो रहा है, तो यह देश की तरक्की के लिए अच्छा संकेत नहीं है।
आरक्षण का मकसद ‘हाथ पकड़कर ऊपर उठाना’ था, ‘दूसरे का गला घोंटना’ नहीं। समय आ गया है कि इस “दोहरे लाभ” (Double Benefit) की नीति पर फिर से विचार हो।
दोस्तों, क्या आप इस विचार से सहमत हैं? क्या जनरल कैटेगरी के लिए अलग से सुरक्षा होनी चाहिए? कमेंट में अपनी राय जरूर लिखें।