“काशी तीनों लोकों से न्यारी है।” यह कहावत सिर्फ शब्दों का खेल नहीं, बल्कि एक अहसास है। वाराणसी (बनारस) की गलियों में बसने वाले बाबा विश्वनाथ सिर्फ एक देवता नहीं, बल्कि इस प्राचीन शहर की धड़कन हैं। गंगा के तट पर स्थित Kashi Vishwanath Mandir हिंदू धर्म के सबसे पवित्र स्थलों में से एक है। यह 12 ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आज हम जिस भव्य मंदिर के दर्शन करते हैं, उसका इतिहास कितना रक्तरंजित रहा है?
इस मंदिर को कई बार तोड़ा गया, लूटा गया और फिर से बनाया गया। आज के इस ब्लॉग में हम जानेंगे बाबा के मंदिर का वो इतिहास जो हर सनातनी को जानना चाहिए—मुगलों के आक्रमण से लेकर अयोध्या (बाबरी) जैसे कानूनी संघर्ष तक।

12 ज्योतिर्लिंगों में सबसे खास: बाबा विश्वनाथ
काशी को भगवान शिव की नगरी कहा जाता है। मान्यता है कि प्रलय काल में भी इस नगरी का नाश नहीं होता क्योंकि भगवान शिव इसे अपने त्रिशूल पर धारण कर लेते हैं।
यहाँ स्थापित शिवलिंग ‘विश्वनाथ’ या ‘विश्वेश्वर’ कहलाता है, जिसका अर्थ है—ब्रह्मांड का शासक। स्कंद पुराण के काशी खंड में इस मंदिर का विस्तृत वर्णन मिलता है। कहा जाता है कि एक बार गंगा स्नान और बाबा के दर्शन मात्र से मोक्ष (मुक्ति) की प्राप्ति हो जाती है।
मंदिर पर हुए क्रूर आक्रमण (History of Attacks)
काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास जितना पुराना है, उतना ही संघर्षपूर्ण भी रहा है। इस पवित्र स्थल पर विदेशी आक्रांताओं की बुरी नजर हमेशा रही।
कुतुबुद्दीन ऐबक (1194): सबसे पहला बड़ा हमला 1194 ई. में मोहम्मद गोरी के सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ने किया था। उसने कन्नौज के राजा को हराने के बाद काशी के कई मंदिरों को ध्वस्त कर दिया था।
हुसैन शाह शर्की और सिकंदर लोदी: 15वीं सदी में जौनपुर के सुल्तान और बाद में सिकंदर लोदी के शासनकाल में भी मंदिर को भारी नुकसान पहुँचाया गया।
लेकिन सबसे काला अध्याय अभी लिखा जाना बाकी था।
औरंगजेब का फरमान और 1669 का विध्वंस
इतिहास के पन्नों में 18 अप्रैल 1669 की तारीख काले अक्षरों में दर्ज है। मुगल बादशाह औरंगजेब ने एक फरमान जारी किया था—”काफिरों के मंदिरों को गिरा दिया जाए।”
इस आदेश के बाद, काशी विश्वनाथ के भव्य मंदिर को पूरी तरह से तोड़ दिया गया।
कहा जाता है कि जब मुगल सेना मंदिर तोड़ने आ रही थी, तो मंदिर के मुख्य पुजारी ने ज्योतिर्लिंग को बचाने के लिए उसे गले से लगा लिया और पास ही स्थित ज्ञानवापी कूप (कुएं) में कूद गए।
औरंगजेब ने मंदिर के मलबे और दीवारों का इस्तेमाल करके उसी जगह पर एक मस्जिद का निर्माण करवाया, जिसे आज हम ‘ज्ञानवापी मस्जिद’ के नाम से जानते हैं। आज भी मस्जिद की पश्चिमी दीवार पर पुराने मंदिर के अवशेष साफ देखे जा सकते हैं।

अहिल्याबाई होल्कर: जिन्होंने लौटाया गौरव
लगभग एक सदी तक बाबा विश्वनाथ का कोई विधिवत मंदिर नहीं था। भक्त ज्ञानवापी कुएं के पास ही पूजा करते थे।
Credit -Free press journal
फिर उदय हुआ मराठा शक्ति का। 1780 ई. में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने मस्जिद के ठीक बगल में वर्तमान काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण करवाया।
बाद में, पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने इस मंदिर के शिखरों को मढ़ने के लिए 1000 किलो शुद्ध सोना दान दिया था, जिसके बाद इसे ‘गोल्डन टेम्पल’ (Golden Temple of Varanasi) भी कहा जाने लगा।
अयोध्या (बाबरी) और काशी की समानता: एक नया धर्मयुद्ध
आज काशी में जो कानूनी लड़ाई चल रही है, वह काफी हद तक अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद जैसी है।
बाबरी मस्जिद कनेक्शन: जिस तरह अयोध्या में बाबरी मस्जिद के नीचे राम मंदिर के सबूत मिले थे, उसी तरह हिंदू पक्ष का दावा है कि ज्ञानवापी मस्जिद असली विश्वनाथ मंदिर के ढांचे पर बनी है।
नंदी का इंतजार: आज भी काशी विश्वनाथ मंदिर के बाहर स्थापित विशाल ‘नंदी’ का मुख ज्ञानवापी मस्जिद की ओर है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, नंदी हमेशा शिवलिंग की ओर देखते हैं, जो यह इशारा करता है कि असली शिवलिंग मस्जिद के वजूखाने में है।
हाल ही में हुए ASI (Archaeological Survey of India) के सर्वे और कोर्ट केस ने इस दावे को और मजबूती दी है कि वहां मंदिर था।

काशी विश्वनाथ कॉरिडोर: एक नया अध्याय
इतिहास के घावों पर मरहम लगाते हुए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘काशी विश्वनाथ कॉरिडोर’ (Kashi Vishwanath Corridor) का निर्माण करवाया।
8 मार्च 2019 को शुरू हुई यह परियोजना 13 दिसंबर 2021 को पूरी हुई।
पहले मंदिर तक जाने के लिए तंग गलियों से गुजरना पड़ता था।
अब गंगा घाट (ललिता घाट) से सीधे मंदिर परिसर तक एक भव्य रास्ता बनाया गया है।
यह कॉरिडोर 5 लाख वर्ग फीट में फैला है और इसने काशी की दिव्यता को भव्यता के साथ जोड़ दिया है।

सिर्फ मंदिर नहीं, एक पवित्र आस्था
काशी विश्वनाथ मंदिर सिर्फ ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा है। औरंगजेब की तलवारें इस आस्था को नहीं काट सकीं।
आज जब हम भव्य कॉरिडोर और मंदिर को देखते हैं, तो हमें अहिल्याबाई होल्कर के त्याग और उन पुजारियों के बलिदान को याद करना चाहिए जिन्होंने शिवलिंग की रक्षा की। ज्ञानवापी का सत्य अब कोर्ट के सामने है, लेकिन बाबा के भक्तों के लिए काशी का कण-कण शिवमय है।
“हर हर महादेव!”