Jallianwala Bagh Massacre Unknown Facts: 13 अप्रैल का वो काला दिन! शहादत को नमन, जानें इतिहास के दर्दनाक और अनसुने सच

Jallianwala Bagh Massacre Unknown Facts

आज 13 अप्रैल है। यह तारीख सुनते ही हर सच्चे हिंदुस्तानी का सिर सम्मान से झुक जाता है और आंखें नम हो जाती हैं। आज से ठीक 107 साल पहले, 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के पावन पर्व पर पंजाब के अमृतसर स्थित ‘जलियांवाला बाग’ में ब्रिटिश हुकूमत ने जो दरिंदगी दिखाई थी, उसने इंसानियत को शर्मसार कर दिया था।

रॉलेट एक्ट और अपने प्रिय नेताओं (डॉ. सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू) की गिरफ्तारी का शांतिपूर्ण विरोध कर रहे हजारों निहत्थे पुरुषों, महिलाओं और मासूम बच्चों को जनरल डायर (General Dyer) ने गोलियों से भून दिया था। आज ‘Apni Vani’ के इस विशेष श्रद्धांजलि अंक में हम उन वीर शहीदों को नमन करते हुए इस हत्याकांड के उन 5 अनसुने तथ्यों का विश्लेषण करेंगे, जो इतिहास का वो ‘एक सत्य’ हैं जिसे अक्सर भुला दिया जाता है।

10 मिनट और 1650 राउंड गोलियां: क्रूरता की हद

हम सब जानते हैं कि वहां गोलियां चली थीं, लेकिन इस क्रूरता का असली आंकड़ा रोंगटे खड़े कर देने वाला है। जनरल डायर ने अपने 90 सैनिकों (जिसमें ज्यादातर गोरखा और बलूच रेजिमेंट के थे) के साथ बाग के एकमात्र संकरे निकास द्वार को बंद कर दिया था।

बिना किसी चेतावनी के डायर ने ‘फायर’ का आदेश दिया। यह गोलीबारी लगातार 10 मिनट तक चलती रही। सैनिक तब तक गोलियां चलाते रहे जब तक कि उनकी गोलियां खत्म नहीं हो गईं। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, उस निहत्थी भीड़ पर ठीक 1650 राउंड गोलियां दागी गई थीं।

अगर रास्ता चौड़ा होता, तो लाखों लाशें बिछ जातीं

जनरल डायर की मंशा सिर्फ डराने की नहीं, बल्कि ‘खत्म’ करने की थी। इतिहास का एक खौफनाक सच यह है कि डायर अपने साथ दो बख्तरबंद गाड़ियां (Armored Cars) भी लाया था, जिन पर भारी मशीनगनें (Machine Guns) फिट थीं।

लेकिन जलियांवाला बाग तक जाने वाला रास्ता इतना संकरा था कि वो गाड़ियां अंदर नहीं जा सकीं और उन्हें बाहर ही छोड़ना पड़ा। अगर वो मशीनगनें अंदर पहुँच जातीं, तो मरने वालों की संख्या हजारों में नहीं, बल्कि लाखों में होती।

‘शहीदी कुआं’ (Martyrs’ Well): जहाँ 120 लोगों ने एक साथ दी जान

गोलियों की बौछार से बचने के लिए वहां मौजूद लोगों में भगदड़ मच गई। बाग के ऊंचे दीवारों को फांदना नामुमकिन था। अपनी जान और अपने मासूम बच्चों को गोलियों से बचाने के लिए सैकड़ों लोग बाग के बीचों-बीच मौजूद एक कुएं में कूद गए।

बाद में जब लाशें निकाली गईं, तो सिर्फ उस एक कुएं से ही 120 से अधिक लाशें बरामद हुई थीं। आज भी यह कुआं ‘शहीदी कुएं’ के रूप में वहां मौजूद है, जो उन मासूमों की चीखें समेटे हुए है।

मौत से ज्यादा दर्दनाक था ‘कर्फ्यू’ का खौफ

इस हत्याकांड का सबसे अमानवीय पहलू गोलीबारी के बाद शुरू हुआ था। घटना के तुरंत बाद पूरे शहर में सख्त ‘मार्शल लॉ’ (कठोर क‌र्फ्यू) लगा दिया गया।

इसका सीधा मतलब था कि जो लोग घायल होकर बाग में खून से लथपथ तड़प रहे थे, उन्हें अस्पताल ले जाने या पानी पिलाने की इजाजत किसी को नहीं थी। रात भर तड़प-तड़प कर सैकड़ों लोगों ने बिना इलाज के वहीं दम तोड़ दिया। यह ब्रिटिश हुकूमत के चेहरे पर लगा वो दाग है जो कभी नहीं धुल सकता।

एक मशहूर लेखक ने डायर को बताया था ‘हीरो’

इस घटना ने पूरे भारत को झकझोर कर रख दिया था, लेकिन ब्रिटेन में कुछ लोगों की मानसिकता कितनी नीच थी, यह जानकर आपका खून खौल उठेगा।

मशहूर अंग्रेजी लेखक और ‘द जंगल बुक’ के रचयिता रुडयार्ड किपलिंग (Rudyard Kipling) ने इस नरसंहार की निंदा करने के बजाय जनरल डायर को “भारत को बचाने वाला शख्स” कहा था। इतना ही नहीं, ब्रिटेन के कई अमीरों ने डायर के सम्मान में एक फंड बनाकर उसे भारी धनराशि भी इनाम के रूप में दी थी।

Apni Vani की विनम्र श्रद्धांजलि

जलियांवाला बाग सिर्फ ईंट-पत्थरों से घिरा एक मैदान नहीं है, बल्कि यह भारत की आज़ादी की नींव का वो पत्थर है जिसे हमारे पूर्वजों ने अपने खून से सींचा था। इसी घटना ने भगत सिंह और ऊधम सिंह जैसे क्रांतिकारियों के सीने में आज़ादी की वो आग जलाई थी, जिसने अंततः ब्रिटिश साम्राज्य को राख कर दिया।

आज 13 अप्रैल के दिन हम सभी भारतीयों का यह कर्तव्य है कि हम कुछ पल रुककर उन गुमनाम शहीदों को याद करें, जिनकी शहादत की बदौलत आज हम आज़ाद हवा में सांस ले रहे हैं।

आपकी श्रद्धांजलि: भारत माता के उन अमर सपूतों और मासूम शहीदों के लिए कमेंट बॉक्स में ‘जय हिंद’ लिखकर अपनी श्रद्धांजलि अवश्य दें। आप हमारे इंस्टाग्राम पेज @9vaniapni पर जाकर भी इस ऐतिहासिक बलिदान को याद कर सकते हैं। ॐ शांति!

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