आज 15 अगस्त को पूरा देश आज़ादी का जश्न मना रहा है। स्कूल, कॉलेज से लेकर लाल किले की प्राचीर तक हर जगह देशभक्ति के गीत और तिरंगे की शान दिखाई दे रही है। हम सब बचपन से यही पढ़ते आए हैं कि 15 अगस्त 1947 की आधी रात को देश आज़ाद हुआ और प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लाल किले पर तिरंगा फहराया।
लेकिन अगर आप इतिहास के पन्नों को गहराई से खंगालेंगे, तो आपको ऐसी चौंकाने वाली बातें पता चलेंगी जिन्हें 99% लोग नहीं जानते। आज Apni Vani की इस खास रिसर्च रिपोर्ट में हम आपको 15 अगस्त 1947 से जुड़े 3 ऐसे दुर्लभ और ऐतिहासिक सच बताने जा रहे हैं, जो आज भी मुख्यधारा की चर्चाओं से गायब हैं।
लाल किले पर 15 अगस्त को नहीं, बल्कि 16 अगस्त की सुबह फहराया गया था तिरंगा
ज्यादातर लोग यह मानते हैं कि 15 अगस्त 1947 को ही लाल किले पर तिरंगा फहरा दिया गया था। लेकिन आधिकारिक सरकारी दस्तावेजों और मशहूर इतिहासकार लैरी कॉलिन्स और डोमिनिक लापिएरे की चर्चित किताब ‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ (Freedom at Midnight) के अनुसार, यह बात पूरी तरह सही नहीं है।
15 अगस्त की आधी रात को संविधान सभा (अब संसद भवन) में पंडित नेहरू ने अपना ऐतिहासिक भाषण ‘ट्रिस्ट विद डेस्टिनी’ दिया था। 15 अगस्त के दिन इंडिया गेट के पास प्रिंसेस पार्क में तिरंगा फहराया गया था, जहाँ भारी भीड़ उमड़ पड़ी थी। लाल किले की प्राचीर पर पहली बार तिरंगा फहराने का ऐतिहासिक कार्यक्रम 15 अगस्त को नहीं, बल्कि 16 अगस्त 1947 की सुबह 8:30 बजे हुआ था। उसी दिन पंडित नेहरू ने लाल किले से अपना पहला सार्वजनिक भाषण दिया था।
15 अगस्त की तारीख अंग्रेजों की पसंद थी, लेकिन ‘आधी रात’ का वक्त ज्योतिषियों ने चुना था
आज़ादी के लिए 15 अगस्त की तारीख भारतीय नेताओं ने नहीं चुनी थी। लॉर्ड माउंटबेटन की जीवनी लिखने वाले इतिहासकारों के अनुसार, माउंटबेटन इस तारीख को अपने लिए बहुत लकी मानते थे क्योंकि 15 अगस्त 1945 को ही द्वितीय विश्व युद्ध में जापानी सेना ने उनके सामने आत्मसमर्पण किया था। इसलिए उन्होंने ब्रिटिश संसद में 15 अगस्त 1947 को सत्ता सौंपने का ऐलान कर दिया।
लेकिन जब यह तारीख तय हुई, तो देश के बड़े ज्योतिषियों और विद्वानों ने इसका कड़ा विरोध किया। प्रसिद्ध लेखक के.एम. मुंशी के संस्मरणों के अनुसार, ज्योतिषियों का कहना था कि 15 अगस्त का दिन ग्रहों के हिसाब से अशुभ है। जब अंग्रेज तारीख बदलने को तैयार नहीं हुए, तो एक बीच का रास्ता निकाला गया। ज्योतिषियों ने 14 और 15 अगस्त की दरमियानी रात 11:51 से 12:39 के बीच ‘अभिजीत मुहूर्त’ का समय तय किया। इसी वजह से देश को आधी रात को आज़ाद कराने का फैसला लिया गया ताकि हिंदू पंचांग और अंग्रेजी कैलेंडर दोनों का तालमेल बैठ सके।
15 अगस्त को लाखों लोगों को पता ही नहीं था कि वे भारत में हैं या पाकिस्तान में
इतिहास का सबसे दर्दनाक सच यह है कि जब 15 अगस्त को आज़ादी का जश्न मनाया जा रहा था, तब पंजाब और बंगाल के करोड़ों लोगों को यह मालूम ही नहीं था कि उनका घर भारत में है या पाकिस्तान में। मशहूर इतिहासकार यास्मीन खान की किताब ‘द ग्रेट पार्टीशन’ (The Great Partition) और ब्रिटिश लेखक लियोनार्ड मोसले की ‘द लास्ट डेज ऑफ द ब्रिटिश राज’ में इसका पूरा कच्चा चिट्ठा दर्ज है।

सीमा रेखा खींचने वाले सर सिरिल रैडक्लिफ ने 12 अगस्त तक ही भारत-पाकिस्तान के बंटवारे का नक्शा (Radcliffe Line) तैयार कर लिया था। लेकिन लॉर्ड माउंटबेटन ने उस नक्शे को एक सीलबंद लिफाफे में बंद कर अपने दराज में रखवा दिया और उसे 17 अगस्त 1947 को सार्वजनिक किया। माउंटबेटन को डर था कि अगर बंटवारे की सीमा 15 अगस्त से पहले बता दी गई, तो दंगे भड़क उठेंगे और आज़ादी के जश्न का रंग फीका पड़ जाएगा। इसका नतीजा यह हुआ कि पंजाब के गुरदासपुर और बंगाल के मालदा-मुर्शिदाबाद जैसे इलाकों में लोग दो दिनों तक अपनी नागरिकता को लेकर भारी असमंजस और दहशत में रहे।
Apnivani की बात
इन ऐतिहासिक तथ्यों का विश्लेषण करने पर यह समझ आता है कि 15 अगस्त सिर्फ एक जश्न का दिन नहीं था, बल्कि यह भारी कूटनीतिक दबाव, हड़बड़ी और लाखों बेकसूर लोगों के असमंजस का गवाह भी था। अंग्रेजों ने जिस जल्दबाजी में देश का बंटवारा किया और नक्शे को छुपाकर रखा, उसने देश को एक गहरा ज़ख्म दिया। आज़ादी के इस पावन पर्व पर हमें न सिर्फ अपने वीर शहीदों के बलिदान को नमन करना चाहिए, बल्कि इतिहास की इन अनसुनी सच्चाइयों से सीख लेकर अपने देश की एकता और संप्रभुता को और मजबूत बनाना चाहिए।