होली-छठ 2026: घर जाने की राह हुई पथरीली! ट्रेनों में लंबी वेटिंग और हवाई किराए में 40% का उछाल, जानें कैसे पहुचें घर

होली

त्योहारों का सीजन आते ही प्रवासी भारतीयों और उत्तर भारतीयों के लिए अपने घर पहुंचना एक बड़ी चुनौती बन गया है। होली 2026 (3-4 मार्च) और आगामी छठ पर्व के लिए दिल्ली, मुंबई और गुजरात जैसे बड़े शहरों से बिहार और उत्तर प्रदेश जाने वाली ट्रेनों में टिकटों की भारी मारामारी शुरू हो गई है। आलम यह है कि फरवरी के आखिरी हफ्ते से लेकर मार्च के पहले हफ्ते तक प्रमुख ट्रेनों में कन्फर्म सीटें मिलना लगभग नामुमकिन हो गया है।

होली
ट्रेनों में लंबी वेटिंग

प्रमुख ट्रेनों में ‘नो रूम’: वेटिंग लिस्ट भी हुई बंद

दिल्ली से पटना, दरभंगा, मुजफ्फरपुर और वाराणसी जाने वाली ट्रेनों जैसे संपूर्ण क्रांति एक्सप्रेस, बिहार संपर्क क्रांति, श्रमजीवी और मगध एक्सप्रेस में 25 फरवरी से 10 मार्च तक स्लीपर और एसी कोच पूरी तरह फुल हो चुके हैं। कई ट्रेनों में तो वेटिंग लिस्ट इतनी लंबी हो गई है कि रेलवे ने ‘नो रूम’ (No Room) का बोर्ड लगा दिया है, यानी अब उनमें वेटिंग टिकट भी नहीं मिल रहे हैं।

जेब पर भारी ‘त्योहार’: किराए में 30-40% की बढ़ोतरी

यात्रियों को न केवल सीटों की कमी, बल्कि महंगे किराए का भी सामना करना पड़ रहा है।

• डायनामिक प्राइसिंग: प्रीमियम ट्रेनों में डायनामिक प्राइसिंग और तत्काल के चलते स्लीपर क्लास का टिकट 500-800 रुपये और एसी कोच का किराया 2,000 रुपये तक महंगा हो गया है।

• हवाई किराया: फ्लाइट के टिकटों में भी 40% तक की बढ़ोतरी देखी गई है। दिल्ली से पटना का जो किराया सामान्य दिनों में 4,000 रुपये के आसपास रहता था, वह पीक डेट्स पर 10,000 रुपये के पार पहुंच गया है।

होली स्पेशल ट्रेनों का इंतजार: कब आएगी लिस्ट?

यात्रियों की भारी भीड़ को देखते हुए रेलवे बोर्ड जल्द ही ‘होली स्पेशल ट्रेनों’ की घोषणा करने वाला है।

• अपेक्षित रूट्स: आनंद विहार-सहरसा, नई दिल्ली-राजेंद्र नगर (पटना), दिल्ली-दरभंगा और मुंबई-वाराणसी जैसे रूट्स पर स्पेशल ट्रेनें चलाने की योजना है।

• लिस्ट कब आएगी: संभावना है कि 10 से 15 फरवरी के बीच रेलवे 100 से ज्यादा स्पेशल ट्रेनों का शेड्यूल जारी करेगा। पिछले पैटर्न के अनुसार, आनंद विहार और नई दिल्ली से बिहार के लिए कई जोड़ी स्पेशल गाड़ियाँ (जैसे 04093/04094) चलाई जा सकती हैं।

होली-छठ 2026
ट्रेनों में लंबी वेटिंग

यात्रियों के लिए सलाह: घर पहुंचने के स्मार्ट तरीके

• वैकल्पिक रूट्स: यदि मुख्य ट्रेनों में जगह नहीं है, तो कनेक्टिंग ट्रेनों या बस सेवाओं का उपयोग करें।

• फ्लाइट टाइमिंग: यदि आप फ्लाइट से जाना चाहते हैं, तो देर रात की फ्लाइट चुनकर आप 4-5 हजार रुपये तक बचा सकते हैं।

• वंदे भारत एक्सप्रेस: थोड़ी महंगी होने के बावजूद वंदे भारत में अन्य ट्रेनों की तुलना में सीट मिलने की संभावना थोड़ी अधिक रहती है।

• तत्काल बुकिंग: यात्रा से एक दिन पहले सुबह 10 बजे (AC) और 11 बजे (Sleeper) के लिए IRCTC ऐप पर एक्टिव रहें।

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देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन का ट्रायल शुरू, प्रदूषण मुक्त सफर का नया अध्याय

हाइड्रोजन ट्रेन

भारतीय रेलवे ने आज परिवहन के क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत कर दी है। देश की पहली हाइड्रोजन-ट्रेन (Hydrogen-Powered Train) का ट्रायल रन सफलतापूर्वक शुरू हो गया है, जो भारत को वैश्विक स्तर पर ‘ग्रीन एनर्जी लीडर’ बनाने की दिशा में सबसे बड़ा कदम है। यह ट्रेन न केवल शोर-शराबे से मुक्त होगी, बल्कि धुएं की जगह केवल पानी की वाष्प (Water Vapor) छोड़ेगी, जिससे पर्यावरण संरक्षण को एक नई गति मिलेगी।

हाइड्रोजन ट्रेन क्या है और यह कैसे काम करती है?

हाइड्रोजन ट्रेन, जिसे अक्सर ‘हाइड्रेल’ (Hydrail) कहा जाता है, पारंपरिक डीजल इंजनों से पूरी तरह अलग होती है। जहां डीजल इंजन कार्बन डाइऑक्साइड और हानिकारक गैसें उत्सर्जित करते हैं, वहीं हाइड्रोजन ट्रेनें फ्यूल सेल (Fuel Cell) तकनीक का उपयोग करती हैं।

हाइड्रोजन ट्रेन

तकनीक और कार्यप्रणाली

इन ट्रेनों के ऊपर या विशेष कोच में हाइड्रोजन टैंक लगे होते हैं। जब ऑक्सीजन और हाइड्रोजन का रासायनिक मिलन होता है, तो उससे बिजली पैदा होती है। इसी बिजली से ट्रेन की मोटर चलती है। इस पूरी प्रक्रिया का एकमात्र ‘बाय-प्रोडक्ट’ शुद्ध पानी और भाप होता है।

‘ग्रीन हाइड्रोजन’ की भूमिका

भारत सरकार का लक्ष्य केवल हाइड्रोजन ट्रेन चलाना नहीं, बल्कि इसे ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ से संचालित करना है। ग्रीन हाइड्रोजन वह है जिसे सौर ऊर्जा या पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों (Renewable Energy) का उपयोग करके पानी के इलेक्ट्रोलिसिस से बनाया जाता है।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह ट्रायल?

भारतीय रेलवे दुनिया का सबसे बड़ा बिजली से चलने वाला नेटवर्क बनने की राह पर है, लेकिन अभी भी कई दुर्गम और पहाड़ी इलाकों में डीजल इंजन का प्रयोग होता है। हाइड्रोजन ट्रेन उन क्षेत्रों के लिए एक गेम-चेंजर साबित होगी।

नेट जीरो उत्सर्जन (Net Zero Carbon Emission): भारत ने 2070 तक नेट जीरो का लक्ष्य रखा है, जबकि भारतीय रेलवे ने खुद को 2030 तक ‘नेट जीरो कार्बन उत्सर्जक’ बनाने का संकल्प लिया है।

डीजल पर निर्भरता में कमी: वर्तमान में रेलवे डीजल पर सालाना हजारों करोड़ रुपये खर्च करता है। हाइड्रोजन तकनीक के विस्तार से विदेशी तेल आयात पर निर्भरता कम होगी।

ध्वनि प्रदूषण से मुक्ति: ये ट्रेनें बहुत शांत होती हैं, जिससे यात्रियों को एक प्रीमियम और आरामदायक अनुभव मिलता है।

ट्रायल रन और रूट्स की विस्तृत जानकारी

रेल मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, शुरुआती ट्रायल रन हरियाणा के जींद-सोनीपत सेक्शन पर केंद्रित हैं। यह रूट लगभग 89 किलोमीटर लंबा है, जहां बुनियादी ढांचे और हाइड्रोजन फिलिंग स्टेशन का काम पहले ही पूरा किया जा चुका है।

H3: पहले चरण में शामिल होने वाले रूट

सरकार की योजना ‘हेरिटेज रूट्स’ पर सबसे पहले इन ट्रेनों को उतारने की है ताकि प्राकृतिक सुंदरता वाले क्षेत्रों में प्रदूषण कम हो:

• कालका-शिमला रेलवे (हिमाचल प्रदेश)

• दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे (पश्चिम बंगाल)

• नीलगिरी माउंटेन रेलवे (तमिलनाडु)

• माथेरान हिल रेलवे (महाराष्ट्र)

आँकड़े और निवेश

रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रत्येक हाइड्रोजन ट्रेन की लागत लगभग 80 करोड़ रुपये आती है, जबकि ग्राउंड इंफ्रास्ट्रक्चर (जैसे हाइड्रोजन प्लांट) के लिए प्रति रूट 70 करोड़ रुपये का अतिरिक्त निवेश आवश्यक है। ‘हाइड्रोजन फॉर हेरिटेज’ योजना के तहत रेलवे ने कुल 35 ऐसी ट्रेनों के निर्माण का खाका तैयार किया है।

वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति

हाइड्रोजन ट्रेन चलाने वाला भारत दुनिया का तीसरा और एशिया का दूसरा देश बनने की राह पर है। जर्मनी ने 2022 में दुनिया की पहली हाइड्रोजन संचालित यात्री ट्रेन शुरू की थी, जिसके बाद चीन ने भी इस तकनीक को अपनाया। भारत अब इस एलीट क्लब में शामिल होकर अपनी स्वदेशी तकनीक ‘वंदे भारत’ की तरह ही ‘वंदे मेट्रो’ (हाइड्रोजन संस्करण) को पेश कर रहा है।

चुनौतियां और भविष्य की राह

इतनी बड़ी सफलता के बावजूद, कुछ चुनौतियां अभी भी बरकरार हैं:

• लागत: हाइड्रोजन का उत्पादन अभी भी बिजली या डीजल की तुलना में महंगा है।

• भंडारण (Storage): हाइड्रोजन एक अत्यधिक ज्वलनशील गैस है, इसलिए इसके भंडारण और परिवहन के लिए उच्चतम सुरक्षा मानकों की आवश्यकता होती है।

• रिफ्यूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर: पूरे देश में हाइड्रोजन स्टेशन बनाना एक जटिल और समय लेने वाली प्रक्रिया है।

हालांकि, नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के तहत जिस तरह से निवेश बढ़ रहा है, विशेषज्ञों का मानना है कि अगले 5-10 वर्षों में इसकी लागत में भारी कमी आएगी।

हाइड्रोजन ट्रेन

यात्रियों के अनुभव में क्या बदलेगा?

एक आम यात्री के लिए हाइड्रोजन ट्रेन का सफर किसी बुलेट ट्रेन या वंदे भारत जैसा ही आधुनिक होगा। इन ट्रेनों में:

• पूरी तरह से वातानुकूलित कोच होंगे।

• ऑटोमैटिक दरवाजे और जीपीएस आधारित सूचना प्रणाली होगी।

• इंजन का शोर न होने के कारण यात्रा बहुत सुकून भरी होगी।

भारतीय रेलवे द्वारा हाइड्रोजन ट्रेन का ट्रायल शुरू करना केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वच्छ पर्यावरण का वादा है। ‘मेक इन इंडिया’ के तहत इन ट्रेनों का निर्माण भारत की इंजीनियरिंग क्षमता को दर्शाता है। यदि यह ट्रायल सफल रहता है, तो भारत के परिवहन इतिहास में यह सबसे बड़ा क्रांतिकारी बदलाव साबित होगा।

यह कदम न केवल ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ लड़ाई में भारत की स्थिति मजबूत करेगा, बल्कि देश के टूरिज्म सेक्टर, खासकर पहाड़ी इलाकों में पर्यटन को एक नई और ‘ग्रीन’ पहचान देगा।

आप क्या सोचते हैं? क्या हाइड्रोजन ट्रेनें भविष्य में पूरी तरह से डीजल और बिजली इंजनों की जगह ले पाएंगी? अपनी राय हमें कमेंट में जरूर बताएं।

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लालू प्रसाद यादव को दिल्ली हाई कोर्ट से बड़ा झटका, चार्ज फ्रेमिंग पर रोक से इनकार; जानें क्या है पूरा कानूनी विवाद

लालू प्रसाद यादव

बिहार की राजनीति के दिग्गज और राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की कानूनी मुश्किलें एक बार फिर बढ़ती नजर आ रही हैं। बहुचर्चित IRCTC लैंड फॉर जॉब स्कैम और भ्रष्टाचार के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने लालू यादव को कोई भी अंतरिम राहत देने से साफ इनकार कर दिया है।

कोर्ट ने उस याचिका पर रोक लगाने से मना कर दिया है जिसमें लालू यादव ने निचली अदालत द्वारा ‘आरोप तय’ (Charge Framing) किए जाने की प्रक्रिया को चुनौती दी थी। न्यायमूर्ति की इस टिप्पणी के बाद अब राजद खेमे में हलचल तेज हो गई है, क्योंकि इसका सीधा अर्थ है कि ट्रायल कोर्ट में उनके खिलाफ मुकदमे की कार्यवाही बिना किसी रुकावट के जारी रहेगी।

क्या है दिल्ली हाई कोर्ट का ताजा फैसला?

सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान लालू प्रसाद यादव के कानूनी दल ने दिल्ली हाई कोर्ट से गुहार लगाई थी कि जब तक उच्च न्यायालय उनकी मुख्य याचिका पर विचार नहीं कर लेता, तब तक निचली अदालत (CBI Special Court) को उनके खिलाफ आरोप तय करने से रोका जाए। लालू यादव की दलील थी कि सीबीआई द्वारा पेश किए गए साक्ष्य अपर्याप्त हैं और कानूनी प्रक्रियाओं का पूरी तरह पालन नहीं किया गया है।

हालांकि, दिल्ली हाई कोर्ट ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि वह फिलहाल इस स्तर पर ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही में हस्तक्षेप नहीं करेगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) के तहत चल रहे मामलों में देरी करना न्याय के हित में नहीं है।

कोर्ट ने जांच एजेंसी CBI (Central Bureau of Investigation) को नोटिस जारी कर इस मामले पर अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। अब इस मामले की अगली सुनवाई कुछ हफ्तों बाद होगी, लेकिन तब तक ट्रायल कोर्ट को अपने आदेश सुनाने की पूरी आजादी रहेगी।

लालू प्रसाद यादव

IRCTC घोटाला: भ्रष्टाचार की पूरी कहानी और पृष्ठभूमि

यह मामला करीब दो दशक पुराना है, जो साल 2004 से 2009 के बीच का है। उस समय लालू प्रसाद यादव केंद्र की यूपीए-1 (UPA-1) सरकार में रेल मंत्री के पद पर तैनात थे। सीबीआई का आरोप है कि पद का दुरुपयोग करते हुए रेल मंत्री ने भारतीय रेलवे खानपान और पर्यटन निगम (IRCTC) के दो होटलों के रखरखाव और संचालन का ठेका निजी हाथों में सौंपा था।

1. होटलों का आवंटन और धांधली

रेलवे के पास रांची और पुरी में दो ऐतिहासिक होटल थे—BNR रांची और BNR पुरी। इन होटलों के निजीकरण की प्रक्रिया के दौरान ‘सुजाता होटल्स’ नामक कंपनी को टेंडर दिया गया। आरोप है कि टेंडर की शर्तों को इस तरह से तोड़ा-मरोड़ा गया कि कोचर बंधुओं की कंपनी ‘सुजाता होटल्स’ ही एकमात्र योग्य उम्मीदवार के रूप में सामने आए।

2. ‘जमीन के बदले ठेका’ का खेल

सीबीआई की जांच के अनुसार, इस टेंडर के बदले में लालू प्रसाद यादव के परिवार को पटना में एक बहुत ही कीमती जमीन का टुकड़ा दिया गया। यह जमीन पहले कोचर बंधुओं ने ‘लारा प्रोजेक्ट्स’ (LARA Projects LLP) नामक कंपनी को हस्तांतरित की, जिसके मालिकाना हक में राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव का नाम शामिल था। चौंकाने वाली बात यह है कि करोड़ों की यह जमीन सर्कल रेट से बहुत कम कीमत पर या लगभग मुफ्त के बराबर हस्तांतरित की गई थी।

चार्ज फ्रेमिंग क्या है और यह लालू के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, चार्ज फ्रेमिंग (आरोप तय करना) किसी भी आपराधिक मुकदमे का वह पड़ाव है जहाँ अदालत यह तय करती है कि अभियुक्त के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हैं या नहीं।

ट्रायल की शुरुआत: एक बार आरोप तय हो जाने के बाद, मुकदमे की नियमित सुनवाई (Trial) शुरू हो जाती है। इसके बाद अभियोजन पक्ष (CBI) अपने गवाहों को बुलाता है।

बचने का रास्ता बंद: लालू यादव चाहते थे कि चार्ज फ्रेमिंग पर रोक लग जाए, ताकि मामला लंबा खिंच सके। अब रोक न लगने का मतलब है कि उन्हें अदालत में हर तारीख पर पेश होना पड़ सकता है और गवाहों का सामना करना पड़ सकता है।

राजनीतिक प्रभाव: 2026 के राजनीतिक परिदृश्य में, यदि लालू यादव पर आरोप तय होते हैं, तो यह विपक्षी गठबंधन के लिए एक नैतिक चुनौती बन सकता है।

सीबीआई और ईडी की संयुक्त जांच

इस मामले की गंभीरता को देखते हुए न केवल सीबीआई, बल्कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने भी मनी लॉन्ड्रिंग के तहत जांच शुरू की थी। जांच एजेंसियों का दावा है कि यह केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं थी, बल्कि एक सुनियोजित आर्थिक अपराध था।

एजेंसियों द्वारा पेश किए गए मुख्य साक्ष्य:

हस्ताक्षर और दस्तावेज: सीबीआई ने कई ऐसे फाइल नोटिंग्स बरामद किए हैं जिन पर तत्कालीन रेल मंत्री के निर्देश स्पष्ट रूप से दर्ज हैं।

शेल कंपनियां: ईडी ने उन कंपनियों के नेटवर्क का खुलासा किया है जिनके जरिए पैसे और संपत्तियों का लेन-देन हुआ।

सरकारी गवाह: इस मामले में कुछ पूर्व रेल अधिकारियों के बयान भी महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो रहे हैं जिन्होंने दबाव में काम करने की बात स्वीकार की है।

लालू प्रसाद यादव – जमानत पर , मुख्य साजिशकर्ता और पद का दुरुपयोग |

राबड़ी देवी – जमानत पर , वित्तीय लाभ प्राप्तकर्ता

तेजस्वी यादव – जमानत पर , बेनामी संपत्ति में हिस्सेदारी

विजय कोचर – आरोपी , रिश्वत देने और टेंडर हासिल करने का आरोप

लालू यादव की दलील और बचाव पक्ष का तर्क

लालू यादव के वकील सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल और अन्य विशेषज्ञों ने कोर्ट में तर्क दिया कि यह पूरा मामला राजनीतिक द्वेष से प्रेरित है। उनका कहना है कि 15 साल पुराने मामले को केवल चुनाव और राजनीति को प्रभावित करने के लिए फिर से जीवित किया जा रहा है। बचाव पक्ष का यह भी कहना है कि होटलों का आवंटन रेलवे बोर्ड के नियमों के तहत हुआ था और इसमें लालू यादव की कोई व्यक्तिगत भूमिका नहीं थी।

हालांकि, हाई कोर्ट ने इन दलीलों को फिलहाल ‘ट्रायल का विषय’ (Subject of Trial) माना है, जिसका अर्थ है कि इन बातों पर फैसला मुकदमे की सुनवाई के दौरान होगा, न कि शुरुआती स्तर पर।

लालू प्रसाद यादव

भविष्य की चुनौतियां और कानूनी रास्ते

अब लालू प्रसाद यादव के पास सीमित विकल्प बचे हैं। वह इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं, लेकिन आमतौर पर सुप्रीम कोर्ट भी निचली अदालत के ट्रायल में तब तक हस्तक्षेप नहीं करता जब तक कि कोई गंभीर संवैधानिक खामी न हो।

ट्रायल की गति: दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट अब तेजी से आरोप तय करने की दिशा में बढ़ेगी।

स्वास्थ्य का हवाला: लालू यादव की बढ़ती उम्र और किडनी ट्रांसप्लांट के बाद की स्थिति को देखते हुए, उनका पक्ष स्वास्थ्य के आधार पर रियायत की मांग कर सकता है।

गवाहों की जिरह: आने वाले महीनों में इस केस में कई महत्वपूर्ण गवाहों की गवाही शुरू हो सकती है, जो बिहार की राजनीति में भी सुर्खियां बटोरेगी।

दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रही कानूनी लड़ाई में एक बड़ा पड़ाव है। लालू प्रसाद यादव जैसे कद्दावर नेता के लिए यह एक स्पष्ट संकेत है कि कानूनी प्रक्रिया अपनी गति से चलेगी। चार्ज फ्रेमिंग पर रोक लगाने से इनकार करना यह दर्शाता है कि अदालतें अब आर्थिक अपराधों और भ्रष्टाचार के मामलों में ‘स्थगन की राजनीति’ को स्वीकार करने के मूड में नहीं हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि सीबीआई के जवाब के बाद हाई कोर्ट का रुख क्या होता है।

क्या आपको लगता है कि दशकों पुराने भ्रष्टाचार के मामलों में अब तेजी से सुनवाई होनी चाहिए, या यह नेताओं को परेशान करने का एक जरिया मात्र है? अपनी राय हमें नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

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