Coca-Cola Sponsors Indian Football: डूबती नैया का खेवैया बना ‘विदेशी’? अंबानी-अडानी क्यों रह गए पीछे!

Coca-Cola

क्या आपको वो पुरानी कहावत याद है— “घर का भेदी लंका ढाए”? खैर, यहाँ स्थिति थोड़ी उल्टी है। यहाँ घर वाले तो मुंह फेर कर बैठे हैं, लेकिन ‘सात समुंदर पार’ वाला एक विदेशी पड़ोसी मदद का हाथ बढ़ा रहा है। हम बात कर रहे हैं भारतीय महिला फुटबॉल टीम (The Blue Tigresses) की। वो टीम जो भारतीय फुटबॉल के सबसे बुरे दौर में भी उम्मीद की मशाल थामे हुए है। जब इस टीम को सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब देश के बड़े-बड़े अरबपति—जिनके पास IPL टीमों पर लुटाने के लिए अरबों रुपये हैं—खामोश रहे। और बाजी कौन मार ले गया? अमेरिका की कंपनी Coca-Cola।

कोका-कोला ने अगले 3 साल के लिए भारतीय महिला फुटबॉल का ‘ऑफिशियल स्पॉन्सर’ बनने का ऐलान किया है। यह खबर खुशी से ज्यादा एक ‘आईना’ है, जो हमारे देसी कॉरपोरेट्स को देखना चाहिए।

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सौदा जो सिर्फ व्यापार नहीं, ‘संजीवनी’ है

सबसे पहले खबर की अहमियत समझिए। All India Football Federation (AIFF) और Coca-Cola India के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हुआ है। अगले तीन सालों तक, कोका-कोला सिर्फ जर्सी पर चिपकने वाला एक लोगो नहीं होगा, बल्कि वह भारतीय महिला फुटबॉल की रीढ़ बनेगा।

यह पैसा सिर्फ नेशनल टीम के लिए नहीं, बल्कि उन हजारों लड़कियों के लिए है जो छोटे शहरों और गांवों में नंगे पैर फुटबॉल खेलने का सपना देखती हैं। कोका-कोला का पैसा ग्रासरूट लेवल (जमीनी स्तर), यूथ लीग्स और ट्रेनिंग कैम्प्स में लगेगा। जहां भारतीय पुरुष टीम संघर्ष कर रही है, वहीं महिला टीम सीमित संसाधनों में भी जान लड़ा रही है। कोका-कोला का आना उनके लिए रेगिस्तान में पानी मिलने जैसा है।

अरबपतियों की खामोशी: रिस्क या बेरुखी?

अब उस चुभते हुए सवाल पर आते हैं— भारत के धनकुबेर कहां हैं?

भारत आज दुनिया की 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। हमारे पास रिलायंस, टाटा, अडानी और महिंद्रा जैसे विशाल साम्राज्य हैं। क्रिकेट के एक सीजन में ये कंपनियां जितना पैसा पानी की तरह बहा देती हैं, उसका 10% भी अगर फुटबॉल या हॉकी को मिल जाए, तो हमारी बेटियां ओलंपिक में गोल्ड मेडल की लाइन लगा दें।

लेकिन कड़वा सच यह है कि भारतीय कॉरपोरेट्स अक्सर “पके हुए फल” के इंतजार में रहते हैं।

वे वहां पैसा लगाते हैं जहां पहले से ही भीड़ हो, जहां स्टारडम हो, और जहां मुनाफा पक्का हो। महिला फुटबॉल अभी ‘संघर्ष’ के दौर में है। यहाँ पैसा लगाने का मतलब है—भविष्य के लिए बीज बोना। और दुख की बात है कि हमारी देसी कंपनियों को ‘फसल काटने’ की जल्दी है, बीज बोने और उसे सींचने का धैर्य उनके पास नहीं दिखता।

विदेशी ब्रांड्स और ‘इमोशंस’ का गणित

हम अक्सर शिकायत करते हैं कि विदेशी ब्रांड्स भारत में इतना फलते-फूलते क्यों हैं? इसका जवाब कोका-कोला की इस डील में छिपा है।

विदेशी कंपनियां एक बात बहुत अच्छे से जानती हैं— “भारत के लोगों की जेब तक पहुंचना है, तो उनके दिल के रास्ते जाओ।”

जरा सोचिए, जब एक आम भारतीय देखेगा कि उसकी देश की बेटियां कोका-कोला की जर्सी पहनकर देश का नाम रोशन कर रही हैं, तो उसके मन में उस ब्रांड के लिए क्या आएगा? इज्जत (Respect)।

वे हमारी ‘देशभक्ति’ और ‘इमोशंस’ में निवेश कर रहे हैं। अगली बार जब आप दुकान पर जाएंगे, तो शायद अनजाने में ही कोका-कोला उठा लेंगे, क्योंकि आपके दिमाग के किसी कोने में यह बात बैठी होगी कि “इसने हमारे मुश्किल वक्त में साथ दिया था।”

इसे कहते हैं Emotional Branding। हमारे देसी ब्रांड्स यहीं चूक जाते हैं। वो बैलेंस शीट देखते रह गए, और विदेशी कंपनी ‘गुडविल’ (Goodwill) लूट ले गई।

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अब जागने का वक्त है

कोका-कोला का स्वागत है। कम से कम किसी ने तो उन लड़कियों के हुनर को पहचाना जो देश के लिए पसीना बहा रही हैं। लेकिन यह घटना हमारे लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ होनी चाहिए।

सिर्फ सोशल मीडिया पर “Support Local” लिखने से देश महान नहीं बनेगा। देश तब आगे बढ़ेगा जब टाटा, बिड़ला और अंबानी जैसे हमारे अपने दिग्गज क्रिकेट के सुरक्षित घेरे से बाहर निकलेंगे और उन खेलों में पैसा लगाएंगे जिन्हें वाकई मदद की जरूरत है।

वरना वो दिन दूर नहीं जब हमारे हर जज्बात, हर खेल और हर गर्व के पल पर किसी विदेशी कंपनी का लोगो लगा होगा, और हम बस ताली बजाते रह जाएंगे।

आपकी क्या राय है? क्या भारतीय कंपनियों को रिस्क लेकर छोटे खेलों को सपोर्ट नहीं करना चाहिए? कमेंट बॉक्स में अपनी आवाज उठाएं!

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