The Queen Who Redefined Courage: Rani Lakshmibai की जयंती पर पूरा देश नतमस्तक

Rani Lakshmibai

मनिकर्णिका से झांसी की रानी तक—साहस की अमर गाथा 19 नवम्बर को पूरा भारत Rani Lakshmibai की जयंती को वीरता और देशभक्ति के उत्सव के रूप में मनाता है। 1828 में वाराणसी में जन्मी मनिकर्णिका (बचपन का नाम) ने छोटी उम्र से ही अद्भुत प्रतिभा, घुड़सवारी, तलवारबाज़ी और नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया। विवाह के बाद वे झांसी की रानी बनीं और पति राजा गंगाधर राव के निधन के बाद अकेले ही राज्य के सिंहासन को संभाला। 1857 की क्रांति में उनका संघर्ष, अदम्य साहस और “झांसी नहीं दूंगी” का जज़्बा उन्हें भारत के स्वतंत्रता संग्राम का अमर प्रतीक बना देता है।

देशभर में जयंती समारोह—वीरता का भव्य उत्सव

झांसी, वाराणसी, ग्वालियर और देश के सभी प्रमुख शहरों में आज उनकी जयंती पर विशाल समारोह आयोजित हो रहे हैं— पुष्पांजलि कार्यक्रम,वीरांगना रैलियाँ,स्कूल-कॉलेजों में सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ,तलवारबाज़ी और घुड़सवारी प्रदर्शन,देशभक्ति गीत, नाटक और संगोष्ठियाँ,महिला संगठनों, प्रशासन और युवा समूहों ने रानी की गाथा को जीवंत करने के लिए विशेष आयोजन किए हैं। उनकी रणनीति, बुद्धिमत्ता और साहस आज भी हर भारतीय को प्रेरित करता है।

Rani Lakshmibai

राष्ट्र का सम्मान—नेताओं और जनता की श्रद्धांजलि

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई राष्ट्रीय नेता, साहित्यकार और कलाकारों ने सोशल मीडिया व समारोहों में रानी लक्ष्मीबाई को नमन किया है। जगह-जगह अश्वारोहण रैलियाँ, कविता पाठ और उनके जीवन पर आधारित नाट्य मंचन आयोजित हो रहे हैं, जहाँ युवा पीढ़ी इतिहास को नए रूप में जान रही है।

नारी शक्ति की असली परिभाषा—साहस, स्वाभिमान और स्वतंत्रता

रानी लक्ष्मीबाई की जयंती सिर्फ एक ऐतिहासिक स्मरण नहीं, बल्कि भारत की महिलाओं के आत्मबल, स्वतंत्रता और नेतृत्व की प्रेरणा है। उनका जीवन बताता है कि—

“साहस उम्र नहीं देखता, सिर्फ इरादे देखता है।”

आज भी उनका नारा “मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी” हर भारतीय के दिल में गूंजता है, और देश को याद दिलाता है कि आज़ादी, सम्मान और कर्तव्य की रक्षा सबसे बड़ा धर्म है।

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