World Soil Day 2025: मिट्टी सिर्फ धूल नहीं, हमारा जीवन है! जानिए विश्व मृदा दिवस का इतिहास, महत्व और भविष्य की चुनौतियां

मिट्टी

मिट्टी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोहे…” कबीर दास जी का यह दोहा हमें मिट्टी की विनम्रता और शक्ति दोनों की याद दिलाता है। आज 5 दिसंबर है, यानी विश्व मृदा दिवस (World Soil Day)। हम अक्सर आसमान में चमकते तारों या टेक्नोलॉजी की दुनिया में इतने खो जाते हैं कि अपने पैरों के नीचे मौजूद उस सतह को भूल जाते हैं जो हमें ज़िंदा रखे हुए है।

क्या आप जानते हैं कि एक चम्मच स्वस्थ मिट्टी में इतने सूक्ष्मजीव (micro-organisms) होते हैं, जितनी पूरी धरती पर इंसानों की आबादी भी नहीं है? आज का यह ब्लॉग पोस्ट सिर्फ एक तारीख के बारे में नहीं है, बल्कि यह हमारे अस्तित्व को बचाने की एक मुहीम है। आइए, गहराई से जानते हैं मिट्टी के इस विज्ञान और महत्व को।

इतिहास: 5 दिसंबर ही क्यों चुना गया?

विश्व मृदा दिवस को मनाने के पीछे एक रोचक इतिहास है जो सीधे तौर पर थाईलैंड के राजपरिवार से जुड़ा है।साल 2002 में, अंतर्राष्ट्रीय मृदा विज्ञान संघ (IUSS) ने सबसे पहले इस दिन को मनाने का प्रस्ताव रखा था। इस प्रस्ताव को संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) ने अपना समर्थन दिया।

लेकिन 5 दिसंबर की तारीख ही क्यों? दरअसल, यह तारीख थाईलैंड के दिवंगत राजा भूमिबोल अदुल्यादेज (King Bhumibol Adulyadej) के जन्मदिन को समर्पित है। राजा भूमिबोल ने अपने जीवनकाल में कृषि और मिट्टी की गुणवत्ता को सुधारने के लिए जमीनी स्तर पर बहुत काम किया था। उनके इन्हीं प्रयासों को सम्मान देने के लिए 2013 में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UN General Assembly) ने सर्वसम्मति से 5 दिसंबर को ‘विश्व मृदा दिवस’ घोषित किया और पहला आधिकारिक दिवस 2014 में मनाया गया।

मिट्टी

क्यों कहा जाता है मिट्टी को ‘काला सोना’? (Soil Importance)

हम जो खाना खाते हैं, उसका 95% हिस्सा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मिट्टी से ही आता है। लेकिन मिट्टी का काम सिर्फ फसल उगाना नहीं है। इसके महत्व को इन बिंदुओं से समझा जा सकता है:

  • प्राकृतिक फिल्टर: मिट्टी बारिश के पानी को अपने अंदर सोखती है और उसे फिल्टर करके भूमिगत जल (Groundwater) के रूप में जमा करती है। अगर मिट्टी ठोस या बंजर हो जाए, तो पानी जमीन के अंदर नहीं जाएगा और बाढ़ का खतरा बढ़ जाएगा।
  • क्लाइमेट चेंज से लड़ाई: मिट्टी दुनिया का सबसे बड़ा ‘कार्बन सिंक’ (Carbon Sink) है। यह वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को सोखकर उसे अपने अंदर जमा रखती है। अगर हम मिट्टी को नुकसान पहुंचाते हैं, तो यह कार्बन वापस हवा में मिल जाता है, जिससे ग्लोबल वार्मिंग बढ़ती है।
  • जैव विविधता का घर: दुनिया की लगभग 25% जैव विविधता (Biodiversity) मिट्टी के अंदर पाई जाती है। केंचुए, बैक्टीरिया और फंगस मिलकर मिट्टी को उपजाऊ बनाते हैं।
  • दवाइयों का स्रोत: पेनिसिलिन जैसी कई जीवन रक्षक एंटीबायोटिक्स बनाने वाले सूक्ष्मजीव मिट्टी में ही पाए जाते हैं।

वर्तमान स्थिति: हम अपनी मिट्टी के साथ क्या कर रहे हैं?

एक कृषि छात्र या जागरूक नागरिक होने के नाते, आपको यह जानना जरूरी है कि स्थिति कितनी गंभीर है। एफएओ (FAO) की एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया की लगभग 33% मिट्टी खराब (degraded) हो चुकी है।इसका सबसे बड़ा कारण है—रसायनों का अंधाधुंध प्रयोग।

मिट्टी

हरित क्रांति (Green Revolution) के बाद से हमने उत्पादन बढ़ाने के लिए यूरिया और कीटनाशकों का इतना ज्यादा इस्तेमाल किया कि मिट्टी की प्राकृतिक ताकत खत्म हो गई है। इसे ‘मिट्टी का बंजर होना’ या ‘Soil Salinization’ कहते हैं। इसके अलावा, वनों की कटाई से मिट्टी का कटाव (Soil Erosion) हो रहा है। ऊपरी उपजाऊ परत, जिसे बनने में हजारों साल लगते हैं, बारिश और हवा के साथ बहकर बर्बाद हो रही है। वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि अगर यही हाल रहा, तो अगले 60 सालों में खेती के लिए उपजाऊ मिट्टी बचेगी ही नहीं।

भारत के संदर्भ में मृदा स्वास्थ्य (Indian Context)

भारत एक कृषि प्रधान देश है, और यहाँ मिट्टी की सेहत सीधे तौर पर किसान की जेब और देश की जीडीपी (GDP) से जुड़ी है।भारत में पंजाब, हरियाणा और बिहार जैसे राज्यों में रसायनों के ज्यादा इस्तेमाल से मिट्टी में कार्बनिक कार्बन (Organic Carbon) की मात्रा बहुत कम हो गई है। एक स्वस्थ मिट्टी में कम से कम 0.5% से 1% कार्बनिक कार्बन होना चाहिए, लेकिन कई जगहों पर यह 0.3% से भी नीचे गिर गया है।

सरकार के प्रयास:

भारत सरकार ने ‘मृदा स्वास्थ्य कार्ड’ (Soil Health Card Scheme) की शुरुआत की है। यह एक क्रांतिकारी कदम है। इसमें किसान के खेत की मिट्टी की जांच की जाती है और उन्हें बताया जाता है कि उनके खेत में नाइट्रोजन, फास्फोरस या पोटाश में से किसकी कमी है। इससे किसान बिना वजह यूरिया डालने से बचते हैं और सही खाद का प्रयोग करते हैं।

World Soil Day 2025 की थीम और हमारा कर्तव्य

हर साल की तरह 2025 में भी इस दिवस का उद्देश्य “मिट्टी के डेटा, निगरानी और प्रबंधन” पर जोर देना है। भविष्य की खेती अब ‘अंधाधुंध खेती’ नहीं, बल्कि ‘स्मार्ट खेती’ होगी।

मिट्टी

हम और आप क्या कर सकते हैं?

ब्लॉग पढ़ने के बाद सवाल उठता है कि एक आम आदमी क्या करे?

  • किचन वेस्ट से खाद बनाएं: अपने घर के गीले कचरे (सब्जी के छिलके आदि) को डस्टबिन में फेंकने के बजाय उससे खाद (Compost) बनाएं। यह मिट्टी के लिए ‘अमृत’ है।
  • सिंगल यूज़ प्लास्टिक को ना कहें: प्लास्टिक मिट्टी में नहीं गलता और उसे जहरीला बना देता है।
  • जागरूकता: अगर आप किसान परिवार से हैं, तो अपने बड़ों को ‘फसल चक्र’ (Crop Rotation) और जैविक खेती (Organic Farming) के फायदे बताएं।
  • पेड़ लगाएं: जड़ों की पकड़ ही मिट्टी को कटने से रोकती है।

क्या महत्वपूर्ण है?

अंत में, हमें यह समझना होगा कि मिट्टी हमारे पूर्वजों की दी हुई विरासत नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों का उधार है। अगर हम उन्हें बंजर धरती देकर जाएंगे, तो वे जीवित कैसे रहेंगे?आज विश्व मृदा दिवस पर, चलिए संकल्प लेते हैं कि हम मिट्टी को ‘धूल’ नहीं, बल्कि ‘मां’ समझकर उसका सम्मान करेंगे। थोड़ी सी जागरूकता और हमारी छोटी-छोटी आदतें इस धरती को फिर से हरा-भरा और उपजाऊ बना सकती हैं।

मिट्टी स्वस्थ, तो हम स्वस्थ!

Read more