भारत की ‘नारी शक्ति’ अब सिर्फ घरों को नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को संभाल रही है।” यह लाइनें सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि नए भारत की सच्चाई हैं। हाल ही में केंद्रीय शिक्षा मंत्री श्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने एक ताज़ा लेख में इस बात पर मुहर लगाई है कि कैसे साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और गणित (STEM) में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी पूरे देश की दिशा बदल रही है।
उन्होंने साफ कहा कि भारत का ‘विकसित भारत’ (Viksit Bharat) बनने का सपना बिना नारी शक्ति के अधूरा है। लेकिन अगर हम इतिहास के पन्ने पलटें, तो महिलाओं की शिक्षा का यह सफर इतना आसान नहीं था। आइए गहराई से समझते हैं कि बीते कल और आज के इस ‘नॉलेज इकोनॉमी’ (Knowledge Economy) के दौर में क्या और कैसे बदला है।

बीते कल का सच: जब दायरा सिर्फ ‘होम साइंस’ तक सीमित था
अगर हम कुछ दशकों पहले (1980 या 1990 के दशक) की बात करें, तो महिलाओं की शिक्षा को लेकर समाज का नज़रिया बहुत संकुचित था।
- विषयों का बंटवारा: उस दौर में यह मान लिया गया था कि लड़कियां सिर्फ ‘आर्ट्स’ (Arts) या ‘होम साइंस’ (Home Science) ही पढ़ सकती हैं। साइंस (Science) और गणित को तो सीधे तौर पर “लड़कों का विषय” कह दिया जाता था।
- रिसर्च में शून्य भागीदारी: लड़कियों को हायर एजुकेशन (Higher Education) के लिए बाहर भेजना या सालों तक रिसर्च फेलोशिप करने की अनुमति देना आम परिवारों में किसी पाप से कम नहीं माना जाता था। परिवार का मुख्य फोकस लड़की को थोड़ी-बहुत शिक्षा देकर उसकी शादी करने पर होता था।

आज की तस्वीर: STEM में आधी आबादी का शानदार दबदबा
आज हालात पूरी तरह से पलट चुके हैं। शिक्षा मंत्री ने अपने लेख में जिन प्रमुख ट्रेंड्स का जिक्र किया है, वे वाकई हैरान करने वाले हैं:
- STEM में बंपर एनरोलमेंट: आज इंजीनियरिंग कॉलेज हों या मेडिकल यूनिवर्सिटीज़, लड़कियों का प्रतिशत हर जगह तेजी से बढ़ रहा है। भारत आज दुनिया के उन चुनिंदा देशों में से एक है जहाँ STEM ग्रेजुएट्स में महिलाओं का प्रतिशत 40% से अधिक है।
- हायर एजुकेशन और रिसर्च: जहाँ पहले महिलाएँ ग्रेजुएशन के बाद पढ़ाई छोड़ देती थीं, वहीं आज रिसर्च फेलोशिप (Research Fellowships) और पीएचडी (PhD) प्रोग्राम्स में लड़कियां लड़कों को कड़ी टक्कर दे रही हैं। चंद्रयान-3 से लेकर भारत के स्वदेशी डिफेंस प्रोजेक्ट्स तक, महिला वैज्ञानिक इस मोर्चे को लीड कर रही हैं।

‘विकसित भारत’ और नॉलेज इकोनॉमी की नई लीडर्स
भारत ने 2047 तक एक पूर्ण विकसित राष्ट्र (Viksit Bharat) बनने का जो लक्ष्य रखा है, उसकी चाबी ‘नॉलेज इकोनॉमी’ में है।
नॉलेज इकोनॉमी का मतलब है ऐसी अर्थव्यवस्था जो नई सोच, पेटेंट्स, सॉफ्टवेयर, एआई (AI) और रिसर्च पर चलती हो। धर्मेंद्र प्रधान जी का यह कहना बिल्कुल सटीक है कि जब देश की आधी आबादी (महिलाएं) इस ज्ञान-आधारित सेक्टर में कदम रखती है, तो देश का विकास दोगुना हो जाता है। आज की महिलाएँ सिर्फ नौकरियां नहीं कर रही हैं, बल्कि नए-नए स्टार्टअप्स खोलकर लाखों लोगों को रोजगार भी दे रही हैं।

ApniVani की बात (Conclusion)
शिक्षा मंत्रालय का यह ताज़ा अपडेट इस बात का सबूत है कि सरकार भी मान चुकी है कि देश को विश्वगुरु बनाने का रास्ता महिलाओं के सशक्तिकरण से होकर ही गुज़रता है। पुरानी बेड़ियों को तोड़कर आज की इस हाई-टेक और ‘साइंस-ड्रिवेन’ उड़ान तक का भारत की बेटियों का यह सफर हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है।
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