JNU Slogans: ‘मोदी-शाह की मौत’ के नारे और उमर खालिद की बेल! 5 सच जो आपको जानने चाहिए 

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क्या देश की सबसे प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में देश के प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की मौत की दुआ मांगना ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ है? कल रात (सोमवार, 5 जनवरी) JNU (जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी) एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गया। सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिल्ली दंगे के आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका (Bail Plea) खारिज करने के तुरंत बाद कैंपस में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए।

खबरों के मुताबिक, इस प्रदर्शन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ बेहद आपत्तिजनक नारे लगाए गए। यह घटना कई गंभीर सवाल खड़े करती है—क्या यह सिर्फ विरोध है या नफरत? और जब फैसला सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया है, तो गुस्सा सरकार पर क्यों?

आइए, इस ब्लॉग में इस पूरे मामले की गहराई से पड़ताल करते हैं।

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कल रात JNU में क्या हुआ?

सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगे (2020) की साजिश रचने के आरोप में जेल में बंद उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया। जैसे ही यह खबर आई, JNU के वामपंथी छात्र संगठनों (Left-wing student groups) ने कैंपस में मार्च निकाला।

आरोप है कि इस दौरान “मोदी-शाह की मौत” और अन्य विवादित नारे लगाए गए। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में छात्र सुप्रीम कोर्ट के फैसले को मानने के बजाय सरकार को कोसते नजर आ रहे हैं। भाजपा नेताओं ने इसे “टुकड़े-टुकड़े गैंग” और “अर्बन नक्सल” की मानसिकता बताया है।

आरोपी के समर्थन में इतना प्यार क्यों? (Why Support the Accused?)

आपका सवाल बिल्कुल जायज है कि एक आरोपी, जिसके खिलाफ कोर्ट को सबूत मिले हैं, उसके लिए छात्र क्यों लड़ रहे हैं?

राजनीतिक चश्मा: JNU में एक बड़ा वर्ग (खासकर लेफ्ट संगठन) इन आरोपियों को ‘दंगाई’ नहीं बल्कि ‘पोलिटिकल प्रिजनर’ (राजनीतिक कैदी) मानता है। उन्हें लगता है कि सरकार अपनी विचारधारा के खिलाफ बोलने वालों को जेल में डाल रही है।

ब्रेनवॉश या विचारधारा? इसे पूरी तरह ‘पैसे देकर नारे लगवाना’ कहना शायद गलत होगा, लेकिन यह वैचारिक ब्रेनवॉश (Ideological Indoctrination) का मामला ज्यादा लगता है। यहाँ छात्रों को यह समझाया जाता है कि ‘स्टेट’ (सत्ता) हमेशा दमनकारी होती है, इसलिए हर पुलिस कार्रवाई का विरोध करना ‘क्रांति’ है।

कोर्ट का फैसला, फिर मोदी को गाली क्यों? (Govt vs Court Logic)

यह इस पूरे मामले का सबसे तार्किक (Logical) पहलू है जिसे आम लोग अक्सर मिस कर देते हैं।

सिस्टम कैसे काम करता है: पुलिस (सरकार के अधीन) गिरफ्तार करती है और सबूत पेश करती है। लेकिन जमानत देना या न देना अदालत (Judiciary) का काम है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला: कल सुप्रीम कोर्ट (जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच) ने साफ कहा कि उमर खालिद और शरजील इमाम के खिलाफ “प्रथम दृष्टया” (Prima Facie) साजिश के सबूत सही लगते हैं।

विपक्ष का खेल: विपक्षी पार्टियां और JNU के छात्र नेता यह बात जानते हैं, लेकिन वे अपने फॉलोअर्स को यह बताते हैं कि “कोर्ट सरकार के दबाव में है।” यह एक नैरेटिव (Narrative) है ताकि वे अपने वोट बैंक और समर्थकों का गुस्सा सरकार की तरफ मोड़ सकें।

हैरानी की बात है कि इसी कोर्ट ने कल 5 अन्य आरोपियों को जमानत दे दी, लेकिन उमर खालिद को नहीं। अगर कोर्ट बिका होता, तो किसी को जमानत न मिलती। यह फर्क उनके फॉलोअर्स को नहीं बताया जाता।

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JNU ही क्यों? (Why always JNU?)

JNU देश की सबसे बेहतरीन यूनिवर्सिटीज में से एक है, लेकिन यह वामपंथी राजनीति (Left Politics) का गढ़ भी है।

यहाँ छात्रों को पढ़ाई के साथ-साथ ‘एक्टिविज्म’ की घुट्टी पिलाई जाती है।

एक खास विचारधारा है जो मानती है कि भारत का मौजूदा ढांचा गलत है। इसलिए जब भी सरकार (खासकर भाजपा) कोई कदम उठाती है, तो JNU सबसे पहले विरोध करता है।

यह एक “इकोसिस्टम” बन गया है जहाँ सरकार विरोधी होना ‘बौद्धिक’ (Intellectual) होने की निशानी मानी जाती है।

मौत की दुआ मांगना: विरोध या विकृति?

लोकतंत्र में विरोध का अधिकार सबको है। आप कह सकते हैं कि “मैं सरकार की नीतियों से सहमत नहीं हूँ।”

लेकिन, “मोदी-शाह की मौत” जैसे नारे लगाना विरोध नहीं, बल्कि हेट स्पीच (Hate Speech) है। यह दर्शाता है कि विरोध अब वैचारिक लड़ाई से आगे बढ़कर व्यक्तिगत नफरत में बदल गया है। जब तर्क खत्म हो जाते हैं, तब गालियां और बददुआएं शुरू होती हैं।

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क्या शिक्षा पर हावी हो रही राजनीति ?

JNU की दीवारों पर लिखे नारे और हवा में गूंजती आवाजें यह बताती हैं कि वहां शिक्षा से ज्यादा राजनीति हावी है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करना हर नागरिक का कर्तव्य है। अगर कोर्ट ने जमानत नहीं दी, तो इसका मतलब है कि कानून को सबूतों में दम दिखा है।

ऐसे में छात्रों का एक आरोपी के पक्ष में देश के नेताओं को मरने की बददुआ देना न केवल शर्मनाक है, बल्कि यह उस ‘माइंड वॉश’ की ओर इशारा करता है जहाँ सच और झूठ का फर्क मिटा दिया गया है।

आपकी इस पर क्या राय है? क्या छात्रों को कोर्ट के फैसले के खिलाफ ऐसे नारे लगाने चाहिए? कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: अब PF और पेंशन में पत्नी ही नहीं, मां का भी होगा बराबर का हक! जानिए पूरी डिटेल

सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला अक्सर नौकरीपेशा लोग अपने PF (भविष्य निधि) या पेंशन अकाउंट में अपनी पत्नी या बच्चों को नॉमिनी (Nominee) बनाते हैं। हम यही मानते आए हैं कि हमारे न रहने पर सारा पैसा नॉमिनी को ही मिलेगा। लेकिन सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के एक हालिया और ऐतिहासिक फैसले ने इस धारणा को बदल दिया है।

अगर आप नौकरी करते हैं और आपका पीएफ कटता है, तो यह खबर आपके और आपके परिवार के लिए बेहद जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसके पीएफ और पेंशन पर सिर्फ पत्नी का नहीं, बल्कि उसकी मां का भी बराबर का अधिकार है।

आइए आसान भाषा में समझते हैं कि कोर्ट ने क्या कहा, नियम क्या हैं और इसका आप पर क्या असर होगा।\

1. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए यह साफ कर दिया कि केवल ‘नॉमिनी’ होने से कोई व्यक्ति पैसे का पूरा मालिक नहीं बन जाता। कोर्ट ने कहा कि मां भी ‘Class-I Heir’ (प्रथम श्रेणी की उत्तराधिकारी) होती है, इसलिए उसे बेटे की संपत्ति या फंड से वंचित नहीं किया जा सकता।

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फैसले की मुख्य बातें:

• चाहे नॉमिनी के तौर पर सिर्फ पत्नी का नाम हो, फिर भी मां का हक खत्म नहीं होता।

• भविष्य निधि (PF) और पेंशन का पैसा उत्तराधिकार कानून (Succession Law) के तहत बंटेगा।

• बेटे की कमाई या जमा पूंजी पर बूढ़ी मां का भी उतना ही अधिकार है जितना पत्नी और बच्चों का।

2. नॉमिनी (Nominee) बनाम उत्तराधिकारी

(Legal Heir): असली मालिक कौन?

यह सबसे ज्यादा कन्फ्यूजन वाला हिस्सा है। लोग सोचते हैं कि जिसे नॉमिनी बना दिया, पैसा उसी का है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे बहुत ही बारीकी से समझाया है।

नॉमिनी का काम: नॉमिनी सिर्फ एक ‘केयरटेकर’ या ‘ट्रस्टी’ होता है। उसका काम है कि वह विभाग से पैसे ले और उसे असली वारिसों (Legal Heirs) तक पहुंचाए।

असली मालिक: हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (Hindu Succession Act) के तहत, अगर कोई वसीयत (Will) नहीं बनी है, तो संपत्ति ‘Class-I Heirs’ में बराबर बंटेगी।

* Class-I Heirs कौन हैं?: इसमें व्यक्ति की मां, पत्नी और बच्चे शामिल होते हैं।

सरल उदाहरण: मान लीजिए किसी व्यक्ति के PF खाते में 10 लाख रुपये हैं और उसने अपनी पत्नी को नॉमिनी बनाया है। उसकी मृत्यु के बाद, भले ही चेक पत्नी के नाम पर आए, लेकिन कानूनन उसे उस पैसे में से अपनी सास (मृतक की मां) को उनका हिस्सा देना होगा।

3. यह फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?

भारतीय समाज में अक्सर देखा गया है कि बेटे की मृत्यु के बाद बहुएं या ससुराल वाले बुजुर्ग माता-पिता को बेसहारा छोड़ देते हैं। पेंशन या पीएफ का सारा पैसा पत्नी को मिल जाता है और माता-पिता खाली हाथ रह जाते हैं।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन बुजुर्ग माताओं के लिए एक सुरक्षा कवच है। यह सुनिश्चित करता है कि बुढ़ापे में बेटे के न रहने पर भी मां को आर्थिक तंगी का सामना न करना पड़े।

4. अब आपको क्या करना चाहिए?

इस फैसले के बाद कुछ बातें जिनका आपको ध्यान रखना चाहिए:

नॉमिनेशन चेक करें: अपने पीएफ और बैंक खातों में देखें कि आपने किसे नॉमिनी बनाया है।

वसीयत (Will) जरूर बनाएं: अगर आप चाहते हैं कि आपके बाद आपकी संपत्ति को लेकर परिवार में झगड़ा न हो, तो एक स्पष्ट ‘वसीयत’ बनाना सबसे अच्छा है। वसीयत में आप लिख सकते हैं कि किसको कितना हिस्सा मिले।

परिवार को जानकारी दें: अपने घर के सदस्यों को इन नियमों के बारे में बताएं ताकि भविष्य में कोई विवाद न हो।

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FAQ: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

Q1: अगर मैंने सिर्फ पत्नी को नॉमिनी बनाया है, तो क्या मां क्लेम कर सकती है?

– हाँ, बिल्कुल। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, मां कानूनी वारिस (Legal Heir) है और वह कोर्ट के जरिए अपना हिस्सा मांग सकती है।

Q2: क्या यह नियम प्राइवेट और सरकारी दोनों कर्मचारियों पर लागू है?

– हाँ, यह उत्तराधिकार का सामान्य कानून है जो जमा पूंजी (PF/Gratuity आदि) पर लागू होता है।

Q3: अगर पिता जीवित हैं, तो क्या उन्हें भी हिस्सा मिलेगा?

– हिंदू कानून के तहत पिता ‘Class-II Heir’ में आते हैं। अगर मां, पत्नी और बच्चे (Class-I) मौजूद हैं, तो पहला हक उनका होता है। लेकिन वसीयत बनाकर पिता को भी हिस्सा दिया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला समाज में संतुलन लाने वाला है। यह याद दिलाता है कि पत्नी जीवनसाथी है, लेकिन मां वह है जिसने जन्म दिया है। कानून की नजर में दोनों का स्थान महत्वपूर्ण है।

अगर आपको यह जानकारी काम की लगी हो, तो इसे अपने दोस्तों और परिवार के साथ जरूर Share करें। जागरूक बनें, सुरक्षित रहें!

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