मुहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना है। कई लोग इसे सिर्फ इस्लामिक नए साल की शुरुआत मानते हैं, लेकिन हकीकत इससे कहीं अधिक गहरी है। खासकर 10 मुहर्रम, जिसे यौम-ए-आशूरा कहा जाता है, दुनिया भर में लाखों लोग हज़रत इमाम हुसैन और कर्बला के शहीदों की याद में मनाते हैं। यही वजह है कि इसे कई मुस्लिम समुदायों में शोक, सब्र और इंसाफ का प्रतीक माना जाता है।
लेकिन आज भी लोगों के मन में कई सवाल हैं। मुहर्रम की शुरुआत कैसे हुई? कर्बला में आखिर क्या हुआ था? और जब यह मातम का समय है, तो कुछ जगहों पर डीजे और ढोल क्यों बजते हैं? आइए आसान भाषा में पूरी बात समझते हैं।
मुहर्रम की शुरुआत कैसे हुई?
‘मुहर्रम’ अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है पवित्र। यह इस्लाम के चार पवित्र महीनों में से एक माना जाता है। हालांकि इसकी सबसे बड़ी पहचान 680 ईस्वी (61 हिजरी) में हुई कर्बला की घटना से जुड़ी है।
इस्लामी इतिहास के अनुसार, पैगंबर मुहम्मद के इंतकाल के बाद मुस्लिम नेतृत्व को लेकर अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियाँ बनीं। बाद में उमय्यद शासक यज़ीद प्रथम सत्ता में आया। ऐतिहासिक विवरण बताते हैं कि उसने प्रमुख मुस्लिम हस्तियों से अपने शासन के प्रति निष्ठा की मांग की, लेकिन पैगंबर मुहम्मद के नवासे इमाम हुसैन ने इसे स्वीकार नहीं किया। उनका मानना था कि न्याय और सत्य के साथ समझौता नहीं किया जा सकता।
कर्बला की घटना क्यों बनी इतिहास की सबसे बड़ी मिसाल?
इराक के कर्बला मैदान में इमाम हुसैन और उनके साथियों को रोक लिया गया। व्यापक रूप से स्वीकार किए गए ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, उनके छोटे से काफिले को कई दिनों तक कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। 10 मुहर्रम, 680 ईस्वी को हुई लड़ाई में इमाम हुसैन और उनके अधिकांश साथी शहीद हो गए।
यही घटना आगे चलकर अन्याय के खिलाफ संघर्ष, त्याग और इंसाफ की सबसे बड़ी मिसाल बन गई। आज भी लाखों लोग मुहर्रम के दौरान इसी शहादत को याद करते हैं।
मुहर्रम में मातम क्यों किया जाता है?
कर्बला की घटना के बाद इमाम हुसैन की शहादत को इस्लामी इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में गिना गया। विशेष रूप से शिया समुदाय इस दिन मजलिस आयोजित करता है, कर्बला की घटना को याद करता है और मातम के माध्यम से अपना दुख व्यक्त करता है।
वहीं सुन्नी समुदाय में भी मुहर्रम का सम्मान किया जाता है। कई लोग आशूरा के दिन रोज़ा रखते हैं और इबादत करते हैं। यानी मुहर्रम का महत्व सभी मुस्लिम समुदायों में है, लेकिन उसे मनाने के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं।
भारत में ताज़िया निकालने की परंपरा कैसे शुरू हुई?
इतिहासकारों के अनुसार, भारतीय उपमहाद्वीप में ताज़िया निकालने की परंपरा मध्यकाल में विकसित हुई। जब अधिकांश लोगों के लिए कर्बला जाना संभव नहीं था, तब इमाम हुसैन की याद में प्रतीकात्मक ताज़िया बनाए जाने लगे। समय के साथ यह परंपरा भारत के कई राज्यों में फैल गई और आज भी अनेक शहरों में ताज़िया जुलूस निकाले जाते हैं।
जब मुहर्रम शोक का समय है, तो फिर DJ और ढोल क्यों?
यह आज सबसे अधिक पूछा जाने वाला सवाल है। धार्मिक परंपराओं और कई इस्लामी विद्वानों के अनुसार, मुहर्रम का मूल उद्देश्य शोक, इबादत, आत्मचिंतन और कर्बला की शहादत को याद करना है। तेज़ संगीत, डीजे और नाच-गाने को मुहर्रम की मूल धार्मिक परंपरा का हिस्सा नहीं माना जाता।
हालांकि भारत के कुछ क्षेत्रों में स्थानीय सांस्कृतिक प्रभाव, सामाजिक बदलाव और समय के साथ जुलूसों का स्वरूप बदलता गया। इसी कारण कुछ स्थानों पर डीजे और ढोल भी देखने को मिलते हैं। लेकिन कई धार्मिक विद्वान इसे कर्बला की मूल भावना के अनुरूप नहीं मानते।

मुहर्रम से हमें क्या सीख मिलती है?
मुहर्रम केवल एक धार्मिक अवसर नहीं, बल्कि सत्य, न्याय और इंसानियत की रक्षा का संदेश भी है। इमाम हुसैन की शहादत यह सिखाती है कि परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों, अन्याय के सामने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करना चाहिए।
आज के समय में भी कर्बला का संदेश उतना ही प्रासंगिक है—सच्चाई के साथ खड़े रहना, कमजोरों की मदद करना और इंसाफ के लिए आवाज़ उठाना।
Apnivani की बात
मुहर्रम का असली संदेश शोर नहीं, बल्कि सोच है। यह महीना हमें त्याग, सब्र और इंसाफ की अहमियत समझाता है। अगर हम कर्बला की घटना को केवल एक जुलूस या परंपरा तक सीमित न रखकर उसके संदेश को समझें, तभी मुहर्रम का वास्तविक उद्देश्य पूरा होगा।