अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार ने एक अहम फैसला लिया है जो इस राज्य और देश के भविष्य में एक बड़ा बदलाव लाएगा।आइए जानते हैं क्या है वो फैसला,ऐसी क्या जरूरत आन पड़ी इस फैसले की और इसका भविष्य में क्या होगा प्रभाव!
शुरुआत: कब और क्यों बदलाव की मांग उठी?
लंबे वक्त से यह सवाल उठता रहा है कि क्या अपराध से जुड़ी प्रक्रियाएँ—जैसे एफआईआर, अरेस्ट मेमो, पुलिस स्टेशनों के बोर्ड—व्यक्ति की जाति दर्ज कर के उसे एक तरह का टैग देती हैं? सामाजिक कार्यकर्ताओं ने decades से यह तर्क रखा कि जाति का उल्लेख बहुसंख्यक ठहराव और भेदभाव का उपकरण बन गया है।
16 सितंबर 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐसा ही मामला सुना, जिसमें पुलिस रिकॉर्ड में “Mali, Thakur, Brahmin आदि” जातियों का उल्लेख था और न्यायालय ने इसे दूरगामी किया। कोर्ट ने कहा कि यह परंपरा संवैधानिक नैतिकता के खिलाफ है और “जातिगत महिमामंडन” राष्ट्रीय एकता को नुकसान पहुंचाता है।

आदेश क्या है और कैसे लागू होगा?
अपना आदेश जारी करते हुए अदालत ने निर्देश दिए कि अब से :
- एफआईआर, अरेस्ट मेमो, सीज़र मेमो आदि पुलिस दस्तावेजों में जाति का कॉलम हटा दिया जाए
- पुलिस स्टेशनों के नोटिस बोर्ड, सार्वजनिक रिकॉर्ड और पुलिस पोर्टल से जाति संबंधी खंड मिटाए जाएँ
- CCTNS (Crime & Criminal Tracking Network System) जैसे ऑनलाइन प्लेटफार्मों से जाति कॉलम हटाया जाए
- वाहन स्टिकीर्स / स्लोगन जो जातिगत पहचान बताते हों, उन्हें हटाया जाए और उल्लंघन पर Motor Vehicle Act के तहत जुर्माना हो
- सार्वजनिक साइनबोर्ड या क्षेत्र नामों में जाति आधारित शब्दों को हटाना अनिवार्य होगा
- रैलियाँ और सभाएं जो जातिगत वाक्यांशों पर आधारित हों, उन्हें पूर्णतः प्रतिबंधित किया जाए
- सोशल मीडिया पर जाति-प्रचार और घृणा फैलाने वाले कंटेंट की मॉनिटरिंग और कार्रवाई होगी
- एक ही अपवाद होगा: SC/ST अधिनियम जैसे मामलों में जहाँ जाति का उल्लेख अनिवार्य रूप से कानूनी है
- उत्तर प्रदेश सरकार ने इस आदेश का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए 10-बिंदु नीति जारी की है, जिसमें माता-पिता का नाम दर्ज करना और जाति कॉलम को खाली छोड़ देना शामिल है।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएँ
यह कदम देशभर में चर्चा का केंद्र बन गया। सरकार कह रही है कि इससे सामाजिक समरसता और न्याय को बल मिलेगा। वहीं विपक्ष और सामाजिक संगठनों ने तर्क दिया कि सिर्फ दस्तावेज बदलना काफी नहीं—मन-स्थिति और जाति भावना को तोड़ने की ज़रूरत है। SP प्रमुख Akhilesh Yadav ने इसे “5,000 वर्षों की भेदभाव की चुनौती” कहा और पूछा कि क्या यह सिर्फ symbolic बदलाव है या जमीन पर असर दिखेगा।
नए युग की शुरुआत या अधूरा बदलाव?
उत्तर प्रदेश यह पहला राज्य बन गया है जो पुलिस रिकॉर्ड से लेकर सार्वजनिक बोर्ड तक जातिसूचक पहचान को हटाने की पहल कर रहा है। यह सिर्फ प्रशासनिक परिवर्तन नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना की दिशा में एक कदम है—एक ऐसा प्रयास कि व्यक्ति की पहचान केवल उसके कर्म, विचार और संविधानिक सम्मान से हो, न कि जन्मजात जाति से।
लेकिन असली परीक्षा होगी—क्या ये आदेश दफ़्तरों से निकल कर गांवों, शहरों और रोज़मर्रा की ज़िंदगी में उतर सकेगा? क्या लोग आज भी नाम से जाति पूछना बंद कर देंगे? बदलाव केवल काग़जों तक सीमित न रहे, यह सुनिश्चित करना अब सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है।
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