क्या जन गण मन ही है हमारा राष्ट्रगीत? वन्दे मातरम् के हुए 150 वर्ष पूरे!हो रहा है महामहोत्सव का आयोजन? भारत का प्रतिष्ठित राष्ट्रगीत वन्दे मातरम् आज 150 वां वर्ष पूरा कर रहा है — यह समय सिर्फ एक गीत का नहीं, बल्कि हमारे स्वतंत्रता-संग्राम, राष्ट्रीय एकता और संस्कृति की अदम्य आवाज़ का महोत्सव है।
रचना और प्रारंभिक यात्रा
इस गीत को Bankim Chandra Chatterjee ने 9 नवंबर 1875 को बंगदर्शन नामक साहित्यिक पत्रिका में प्रकाशित किया था। बाद में यह गीत उनकी प्रसिद्ध कृति Anandamath (1882) में शामिल हुआ। गीत का अर्थ है: “माँ भूमि, मैं तुझे प्रणाम करता हूँ” (“Mother, I bow to Thee”)।
स्वतंत्रता-संग्राम में महत्व
इस गीत ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ आवाज उठाने में एक प्रेरक भूमिका निभाई। Rabindranath Tagore ने इसे 1896 में Indian National Congress के अधिवेशन में प्रथम सार्वजनिक रूप से गाया। 1905 में “Bande Mataram” संप्रदाय की स्थापना हुई और यह गीत जन-आन्दोलन में एक नारा बन गया।
आज की प्रासंगिकता & उत्सव
24 जनवरी 1950 को, Dr. Rajendra Prasad की अध्यक्षता में रूपरेखा बनी कि ‘जना गण मन’ (Nation Anthem) के साथ ‘वन्दे मातरम्’ को समान सम्मान मिलेगा। देशभर में 7 नवंबर 2024 से 7 नवंबर 2026 तक इस गीत के वर्ष-भर महोत्सव का आयोजन किया गया है।

समारोहों में समावेश हैं: उद्घाटन कार्यक्रम, विशेष डाक टिकट और सिक्का जारी करना, विद्यालयों-कॉलेजों-सांस्कृतिक संस्थानों में सामूहिक गान-प्रदर्शनी-वाद-विवाद।
क्यों आज भी मायने रखता है?
‘वन्दे मातरम्’ सिर्फ आधिकारिक गीत नहीं — यह एक भाव-जागृति है, जिसने विविधता-भरे भारत को एक सूत्र में बाँधा। यह गीत हमें याद दिलाता है कि मां-भूमि का सम्मान, बलिदान, एकता और राष्ट्रीय गर्व कितने महत्वपूर्ण हैं। आज की पीढ़ी-के लिए — यह प्रेरणा है कि हम सिर्फ भूतकाल के ही नहीं, भविष्य के भी निर्माणकर्ता हैं।
‘वन्दे मातरम्’ — यह केवल शब्द-अनुच्छेद नहीं, बल्कि हमारी आत्मा, इतिहास और आने वाले कल का मंत्र है। 150 साल बाद भी ये शब्द हमें जोड़ते हैं, गर्व से भरते हैं और अगली पीढ़ी को स्वाभिमान-और-जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाते हैं।
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