आजकल हम जब भी सुपरमार्केट जाते हैं, तो हमारी नज़र सीधा पैकेट के सामने वाले हिस्से पर पड़ती है। ‘ज़ीरो शुगर’, ‘हर्बल’, ‘नेचुरल’ और ‘विटामिन से भरपूर’ जैसे भारी-भरकम शब्द देखकर हम तुरंत वह सामान अपनी टोकरी में डाल लेते हैं। लेकिन क्या आपने कभी उस पैकेट को पलटकर उसके पीछे लिखे छोटे-छोटे अक्षरों (Ingredients) को पढ़ने की कोशिश की है?
अगर नहीं, तो आप अनजाने में अपने और अपने परिवार के शरीर में धीमा ज़हर घोल रहे हैं। Apni Vani आज आपके लिए एक ऐसा गहरा विश्लेषण लेकर आया है, जो आपके रोज़मर्रा के इस्तेमाल की चीज़ों—जैसे टूथपेस्ट, फेसवॉश, कुकिंग ऑयल और बच्चों की फेवरेट मैगी का पूरा कच्चा चिट्ठा खोलकर रख देगा।
सामने का झूठ और पीछे का सच: असली खेल लेबल का
मार्केटिंग का सबसे बड़ा उसूल यह है कि पैकेट का सामने वाला हिस्सा आपको सामान बेचने के लिए होता है, और पीछे वाला हिस्सा सच्चाई बताने के लिए। ‘फूड फार्मर’ (रेवंत हिमात्सिंग्का) और ‘फिट ट्यूबर’ (विवेक मित्तल) जैसे मशहूर हेल्थ इन्फ्लुएंसर्स ने पिछले कुछ समय में इस ‘बैक लेबल’ की सच्चाई को बड़ी बेबाकी से सामने रखा है। उनका सीधा कहना है कि कंपनियां कानून से बचने के लिए पीछे तो सब सच लिख देती हैं, लेकिन उन्हें पता होता है कि 90 प्रतिशत भारतीय ग्राहक कभी उसे पलटकर नहीं पढ़ेंगे। इसी अज्ञानता का फायदा उठाकर हमें सस्ते और घटिया केमिकल्स बेचे जा रहे हैं।
टूथपेस्ट और फेसवॉश का झाग या ‘SLS’ का ज़हर?
सुबह उठते ही हम सबसे पहले जिस टूथपेस्ट या फेसवॉश का इस्तेमाल करते हैं, क्या आप जानते हैं कि उनमें इतना झाग कैसे आता है? इसके पीछे ‘सरफेक्टेंट्स’ (Surfactants) का हाथ होता है, जिनमें सबसे आम है ‘सोडियम लॉरिल सल्फेट’ (SLS)। फिट ट्यूबर ने अपने कई वीडियोज़ में इस पर गहरी रिसर्च शेयर की है। एसएलएस असल में एक इंडस्ट्रियल केमिकल है जो कपड़े धोने के डिटर्जेंट और फर्श साफ करने वाले क्लीनर में इस्तेमाल होता है। यह केमिकल लंबे समय तक इस्तेमाल करने पर हमारी त्वचा से उसका प्राकृतिक तेल पूरी तरह छीन लेता है, जिससे त्वचा रूखी और बेजान हो जाती है। टूथपेस्ट में मौजूद यही एसएलएस हमारे मुंह के छालों का एक बहुत बड़ा कारण बनता है।
पाम ऑयल (Palm Oil) का खेल: विदेशों में अलग, भारत में अलग
पैकेटबंद खाने (Packaged Food) की दुनिया का सबसे कड़वा सच पाम ऑयल (ताड़ का तेल) है। अगर आप किसी मल्टीनेशनल कंपनी का चिप्स या बिस्कुट अमेरिका या यूरोप में खरीदेंगे, तो उसमें आपको सूरजमुखी या ऑलिव ऑयल मिलेगा। लेकिन वही कंपनी जब भारत में अपना प्रोडक्ट बेचती है, तो वह सबसे सस्ते और घटिया माने जाने वाले ‘पाम ऑयल’ का इस्तेमाल करती है। पाम ऑयल में सैचुरेटेड फैट की मात्रा बहुत अधिक होती है, जो सीधा हमारे दिल की नसों में ब्लॉकेज पैदा करता है। इसके अलावा, स्वाद बढ़ाने के नाम पर इन पैकेट्स में चीनी को अलग-अलग नामों (जैसे माल्टोडेक्सट्रिन, कॉर्न सिरप) से भर-भर कर डाला जाता है।
जेम्स के रंग और मैगी का स्वाद: जो बाहर बैन, वो भारत में पास!
बच्चों की सबसे पसंदीदा रंग-बिरंगी चॉकलेट ‘जेम्स’ (Gems) और अलग-अलग तरह के फलों वाले जैम (Jam) का सच और भी डरावना है। फूड फार्मर ने अपनी रिसर्च में खुलासा किया है कि इन उत्पादों को चमकीला बनाने के लिए टारट्राज़िन (Tartrazine), कारमोइसिन (Carmoisine) और सनसेट येलो (Sunset Yellow) जैसे सिंथेटिक फूड कलर्स का धड़ल्ले से इस्तेमाल होता है।

हैरान करने वाली बात यह है कि ये रंग बच्चों में हाइपरएक्टिविटी और अन्य गंभीर बीमारियां पैदा करते हैं, जिस कारण यूरोप और कई पश्चिमी देशों में या तो ये रंग पूरी तरह बैन हैं या फिर वहां इनके पैकेट पर एक सख्त चेतावनी लिखनी पड़ती है। लेकिन भारत में बिना किसी चेतावनी के इन्हें बेचा जा रहा है। वहीं अगर हम मैगी की बात करें, तो रोज़ाना बच्चों को खिलाए जाने वाले इस नूडल्स में भारी मात्रा में रिफाइंड मैदा, जरूरत से ज्यादा सोडियम और स्वाद बढ़ाने वाले केमिकल्स होते हैं, जिनका लंबे समय तक सेवन आंतों और ब्लड प्रेशर के लिए बेहद खतरनाक है।
खुद को कैसे बचाएं? बस ये एक नियम अपनाएं
इस पूरे सिस्टम की खामियों को रातों-रात नहीं बदला जा सकता, लेकिन हम अपनी आदतों को ज़रूर बदल सकते हैं। आज से ही एक नियम बना लें कि कोई भी सामान खरीदने से पहले पैकेट को पलटकर उसके ‘Ingredients’ को ज़रूर पढ़ें। अगर सामग्री की लिस्ट में आपको पाम ऑयल, एसएलएस, पैराबेंस, या ऐसे केमिकल नाम दिखें जिन्हें आप पढ़ तक नहीं पा रहे हैं, तो उस सामान को वापस शेल्फ पर रख दें।
अब आप बेबाक होकर बताइये: क्या भारत सरकार (FSSAI) को भी यूरोपीय देशों की तरह पैकेटबंद खानों और कॉस्मेटिक्स पर इन खतरनाक केमिकल्स के खिलाफ कड़े नियम और स्पष्ट ‘चेतावनी लेबल’ लागू नहीं करने चाहिए? अपनी बेबाक राय हमें नीचे कमेंट्स में ज़रूर दें!
