आज 9 अगस्त 2026 है, और पूरी दुनिया ‘विश्व आदिवासी दिवस‘ (International Day of the World’s Indigenous Peoples) मना रही है। इस वर्ष संयुक्त राष्ट्र (UN) ने इस खास दिन की थीम “स्वदेशी दाइयों का सम्मान: जीवन और भलाई की सुरक्षा” (Honoring Indigenous Midwives: Safeguarding Life and Well-being) रखी है। इस अवसर पर, यह जानना बेहद जरूरी है कि आखिर आदिवासी कौन हैं, भारत में उनकी स्थिति क्या है और समाज के सर्वोच्च पदों तक उनका सफर कैसा रहा है। Apni Vani आज आपके लिए आदिवासियों के इतिहास, वर्तमान और उनके अस्तित्व का एकदम गहराई से किया गया विश्लेषण लेकर आया है।
आदिवासी कौन हैं और यह नाम कैसे पड़ा?
‘आदिवासी’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है— ‘आदि’ यानी प्रारंभ या प्राचीन काल से, और ‘वासी’ यानी रहने वाले। इसका सीधा अर्थ है किसी भौगोलिक क्षेत्र के वे मूल निवासी जो प्राचीन काल से वहाँ रह रहे हैं। भारतीय संविधान में आदिवासियों को आधिकारिक रूप से ‘अनुसूचित जनजाति’ (Scheduled Tribes या ST) के रूप में वर्गीकृत किया गया है। 2011 की जनगणना के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत में अनुसूचित जनजातियों की कुल आबादी लगभग 10.45 करोड़ थी, जो देश की कुल आबादी का 8.6 प्रतिशत है। इन समुदायों का अपना एक अलग इतिहास, विशिष्ट संस्कृति और मातृभाषाएं होती हैं।
भारत में सबसे ज्यादा आदिवासी कहाँ रहते हैं?
अगर हम कुल आबादी के आंकड़ों की बात करें, तो 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में सबसे ज्यादा आदिवासी मध्य प्रदेश में रहते हैं। मध्य प्रदेश में अनुसूचित जनजाति की आबादी 1.53 करोड़ से भी ज्यादा है, जो राज्य की एक बहुत बड़ी आबादी का हिस्सा है। मध्य प्रदेश के अलावा महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान और गुजरात में भी आदिवासियों की भारी आबादी बसती है। लेकिन, अगर प्रतिशत के हिसाब से विश्लेषण किया जाए, तो मिजोरम और लक्षद्वीप सबसे आगे हैं, जहाँ की लगभग 95 प्रतिशत आबादी आदिवासी (ST) है।
क्या आज भी बचे हैं ‘पारंपरिक और पुराने’ आदिवासी?
यह सवाल बहुत ही लाजमी है कि आज जिन आदिवासियों को हम शहरों, सरकारी नौकरियों या समाज की मुख्यधारा में देखते हैं, क्या उनसे अलग वो ‘असली और पुराने’ आदिवासी आज भी बचे हैं जो पूरी तरह से प्रकृति पर निर्भर थे? इसका सटीक जवाब है- हाँ। भारत सरकार ने ऐसे पारंपरिक आदिवासियों को ‘विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों’ की विशेष श्रेणी में रखा है। पूरे भारत के 18 राज्यों और 1 केंद्र शासित प्रदेश में आज भी 75 ऐसे पीवीटीजी (PVTG) समुदाय मौजूद हैं।
इन समुदायों की जीवनशैली आज भी कृषि-पूर्व (pre-agricultural) तकनीक पर आधारित है और ये मुख्यधारा की चकाचौंध से काफी अलग-थलग अपना शांतिपूर्ण जीवन बिताते हैं। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के सेंटिनली (Sentinelese) और जारवा (Jarawa), ओडिशा के बोंडा (Bonda), और आंध्र प्रदेश के चेंचू (Chenchu) इसके सबसे बड़े और प्रामाणिक उदाहरण हैं। ये समुदाय आज भी घने जंगलों और द्वीपों में अपनी उसी प्राचीन और पारंपरिक जीवनशैली के साथ जी रहे हैं।

सर्वोच्च पदों पर आदिवासियों का ऐतिहासिक दबदबा
एक समय था जब आदिवासियों को सिर्फ जंगलों और पिछड़ेपन से जोड़कर देखा जाता था, लेकिन आज हमारे देश की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। आज आदिवासी समुदाय के लोग देश के सर्वोच्च और सबसे ताकतवर पदों पर काबिज होकर अपनी क्षमता साबित कर रहे हैं। इसका सबसे बड़ा और ऐतिहासिक उदाहरण भारत की वर्तमान राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू हैं, जो देश के इतिहास में इस सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंचने वाली पहली आदिवासी महिला बनी हैं। इसके अलावा, प्रशासनिक सेवाओं, राजनीति, चिकित्सा और अंतरराष्ट्रीय स्तर के खेलों में भी आदिवासी युवाओं ने अपना शानदार परचम लहराया है।
Apnivani की बात
आदिवासी समुदाय सिर्फ भारत का प्राचीन इतिहास नहीं हैं, बल्कि वे हमारे पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक जीवनशैली के सबसे बड़े और सच्चे रक्षक हैं। आज आधुनिकता के साथ कदम से कदम मिलाते हुए भी उन्होंने अपनी प्राचीन जड़ों और मूल्यों को नहीं छोड़ा है। आज का यह विश्व आदिवासी दिवस हमें यह याद दिलाता है कि विकास की अंधी दौड़ में हमें इन मूल निवासियों की अमूल्य संस्कृति और उनके जल-जंगल-ज़मीन के अधिकारों का सम्मान करना कभी नहीं भूलना चाहिए।
