UP Government Ad Expenditure: ‘ब्रांड योगी’ पर खर्च हुए 6811 करोड़ रुपये! 1 दिन का प्रचार खर्च पीएम मोदी से भी ज्यादा!

UP Government Ad Expenditure

भारत की राजनीति में अक्सर यह बहस होती है कि सरकारें जनता के टैक्स का पैसा विकास कार्यों पर ज्यादा खर्च करती हैं या अपने खुद के प्रचार-प्रसार पर। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार को लेकर अब एक ऐसा भारी-भरकम आंकड़ा सामने आया है, जिसने देश भर के राजनीतिक और आर्थिक जानकारों को हैरान कर दिया है। राज्य सरकार के अपने बजटीय दस्तावेजों और न्यूज़लॉन्ड्री (Newslaundry) की ताज़ा रिपोर्ट से यह साफ हो गया है कि पिछले 8 सालों में यूपी सरकार ने विज्ञापनों पर पानी की तरह पैसा बहाया है। Apni Vani आज आपके लिए इस पूरे सरकारी खजाने और ‘ब्रांड योगी’ के पीछे छिपे पैसों का एकदम गहराई से किया गया विश्लेषण लेकर आया है।

8 सालों में 6811 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड तोड़ खर्च

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने साल 2017 में सत्ता में आने के बाद से अब तक अपने प्रचार-प्रसार पर कुल 6,811.94 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। अगर 140182.jpg फाइल में दिए गए ग्राफ और यूपी बजट के आधिकारिक आंकड़ों का गहराई से विश्लेषण करें, तो पता चलता है कि सरकार हर दिन औसतन 2.32 करोड़ रुपये सिर्फ अपने विज्ञापनों पर खर्च कर रही है। यह कोई अनुमानित आंकड़ा नहीं है, बल्कि वित्त वर्ष 2017-18 से लेकर 2024-25 तक के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के खर्चों का आधिकारिक ब्यौरा है। जनता का यह पैसा अखबारों, टेलीविजन चैनलों, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और बड़े-बड़े होर्डिंग्स पर सरकार की छवि चमकाने के लिए लगाया गया है।

ब्रांड योगी बनाम ब्रांड मोदी: विज्ञापन में कौन आगे?

इस रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला पहलू केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार के विज्ञापन खर्च की सीधी तुलना है। जब हम इन आंकड़ों को राष्ट्रीय स्तर पर देखते हैं, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि चमकाने वाले विज्ञापन बजट भी योगी सरकार के सामने छोटे नज़र आते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र की मोदी सरकार ने पिछले 11 सालों में विज्ञापनों पर करीब 6,000 करोड़ रुपये खर्च किए हैं, जो हर दिन का लगभग 1.5 करोड़ रुपये बैठता है। वहीं दूसरी तरफ, सिर्फ एक राज्य (उत्तर प्रदेश) की सरकार हर दिन 2.32 करोड़ रुपये विज्ञापनों पर फूंक रही है। यानी ‘ब्रांड योगी’ को बनाए रखने का दैनिक खर्च ‘ब्रांड मोदी’ से काफी ज्यादा है।

कोरोना के बाद अचानक बढ़ा बजट का ग्राफ

साल दर साल इस खर्च के बढ़ने का पैटर्न भी काफी दिलचस्प है। योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के पहले साल (2017-18) में प्रचार पर 294.86 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। इसके बाद 2018-19 में 330 करोड़ और 2019-20 में 481.67 करोड़ रुपये खर्च किए गए। कोरोना महामारी वाले साल 2020-21 में यह आंकड़ा थोड़ा गिरकर 392.88 करोड़ रुपये रहा। लेकिन असली खेल इसके बाद शुरू हुआ। 2021-22 में यह खर्च सीधे 1134.31 करोड़ रुपये पहुंच गया और चुनाव वाले वर्ष 2022-23 में इसने 1420.03 करोड़ रुपये का उच्चतम स्तर छू लिया। इसके बाद 2023-24 में 1366.34 करोड़ और ताज़ा बजट 2024-25 में 1391.18 करोड़ रुपये खर्च किए गए।

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आखिर यह पैसा जा कहां रहा है और महामारी में क्या हुआ?

सरकारी दस्तावेजों के विश्लेषण से पता चलता है कि कुल खर्च का लगभग 83 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा सिर्फ ‘विज्ञापन तथा दृश्य प्रचार’ (Advertising and Visual Publicity) पर खर्च हुआ है। आरटीआई (RTI) से मिली जानकारी के मुताबिक, जब पूरा देश कोरोना महामारी की दूसरी लहर से जूझ रहा था और ऑक्सीजन की भारी कमी थी, तब भी विज्ञापन बजट का एक बड़ा हिस्सा सरकारी योजनाओं के प्रचार पर खर्च किया गया था। अप्रैल 2020 से मार्च 2021 के बीच टीवी न्यूज़ चैनलों पर दिए गए 160 करोड़ रुपये के विज्ञापनों में से सिर्फ 4 प्रतिशत पैसा ही कोविड जागरूकता पर खर्च किया गया था। बाकी का 71 प्रतिशत पैसा ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे अभियानों के प्रचार में लगा दिया गया।

जनता के टैक्स का क्या हो रहा है?

लोकतंत्र में सरकार के काम को जनता तक पहुंचाना जरूरी है, लेकिन जब प्रचार का बजट हजारों करोड़ों में पहुंच जाए, तो यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या वाकई इतने भारी-भरकम विज्ञापनों की जरूरत है?

अब आप बेबाक होकर बताइये: क्या टैक्सपेयर्स के पैसे का हर दिन 2.32 करोड़ रुपये सिर्फ विज्ञापनों पर खर्च करना जायज है, या इस पैसे को राज्य के स्वास्थ्य और शिक्षा तंत्र को सुधारने में लगाया जाना चाहिए? अपनी बेबाक राय हमें नीचे कमेंट्स में ज़रूर दें!

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