तेजस्वी यादव का ‘ऑपरेशन क्लीन’: विदेश से लौटते ही एक्शन मोड में नेता प्रतिपक्ष, क्या भितरघातियों पर गिरेगी गाज?

तेजस्वी यादव

बिहार की राजनीति में एक बार फिर गर्माहट बढ़ गई है। विदेश दौरे से वापस लौटते ही राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के कद्दावर नेता तेजस्वी यादव पूरी तरह एक्शन मोड में नजर आ रहे हैं। सियासी गलियारों में चर्चा है कि तेजस्वी अब पार्टी के भीतर उन ‘विभीषणों’ की छंटनी करने वाले हैं, जिन्होंने पिछले चुनावों में पीठ पीछे वार किया था। ‘भितरघात’ करने वाले नेताओं की एक लंबी सूची तैयार हो चुकी है, जिस पर आज अंतिम मुहर लग सकती है।

पार्टी संगठन में ‘सर्जरी’ की तैयारी: क्यों जरूरी हुआ यह फैसला?

तेजस्वी यादव का यह कदम केवल अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं है, बल्कि आगामी विधानसभा चुनावों से पहले पार्टी को पूरी तरह दुरुस्त करने की एक सोची-समझी रणनीति है। आरजेडी के शीर्ष सूत्रों का कहना है कि तेजस्वी अब पार्टी में केवल ‘क्राउड पुलर’ नेताओं को ही नहीं, बल्कि वफादार कार्यकर्ताओं को भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देना चाहते हैं।

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भीतरघातियों की लिस्ट तैयार

हालिया चुनावों के परिणामों की समीक्षा के दौरान यह बात सामने आई थी कि कई सीटों पर आरजेडी के स्थानीय नेताओं और पदाधिकारियों ने पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवारों के खिलाफ काम किया। कहीं जातीय समीकरणों को बिगड़ा गया, तो कहीं विपक्षी दलों के साथ गुप्त साठगांठ की गई। तेजस्वी यादव ने खुद इन रिपोर्ट्स का बारीकी से अध्ययन किया है।

युवाओं को तरजीह, पुराने चेहरों पर संशय

खबर है कि इस ‘क्लीनअप’ अभियान के तहत पार्टी के पुराने और निष्क्रिय पड़ चुके जिलाध्यक्षों और प्रदेश स्तर के पदाधिकारियों को बदला जा सकता है। तेजस्वी की कोशिश है कि पार्टी में ‘माई’ (MY – Muslim-Yadav) समीकरण के साथ-साथ ‘ए टू जेड’ (A to Z) वाली छवि को और मजबूती दी जाए, जिसके लिए युवा और ऊर्जावान चेहरों को आगे लाया जा रहा है।

तेजस्वी यादव का ‘विदेशी दौरा’ और बिहार की सियासत

तेजस्वी यादव पिछले कुछ दिनों से निजी यात्रा पर विदेश में थे। उनकी अनुपस्थिति में बिहार की राजनीति में कई बदलाव आए। सत्ता पक्ष ने उनकी गैर-मौजूदगी पर सवाल उठाए, लेकिन तेजस्वी ने सोशल मीडिया और अपने करीबियों के जरिए बिहार की हर छोटी-बड़ी गतिविधि पर नजर बनाए रखी।

क्या था मिशन और वापसी के मायने?

तेजस्वी की वापसी के साथ ही आरजेडी मुख्यालय में हलचल तेज हो गई है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह के साथ उनकी लंबी बैठक होने वाली है। इस बैठक का मुख्य एजेंडा उन बागियों पर कार्रवाई करना है, जिन्होंने पिछले चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवारों का समर्थन किया था।

अनुशासन समिति की रिपोर्ट और संभावित कार्रवाई

आरजेडी की अनुशासन समिति ने राज्य के विभिन्न जिलों से आई शिकायतों के आधार पर एक गोपनीय रिपोर्ट तैयार की है।

रिपोर्ट के मुख्य बिंदु:

• सीमांचल और कोसी क्षेत्र: यहां कई बड़े नेताओं पर चुनाव के दौरान निष्क्रिय रहने का आरोप है।

• मगध बेल्ट: यहां टिकट वितरण से नाराज कुछ नेताओं ने दूसरी पार्टियों की मदद की।

• सारण और तिरहुत: यहां समन्वय की कमी के कारण पार्टी को कुछ नजदीकी मुकाबलों में हार का सामना करना पड़ा।

इन रिपोर्टों के आधार पर माना जा रहा है कि आज कम से कम 20 से 25 बड़े पदाधिकारियों को उनके पदों से मुक्त किया जा सकता है। कुछ को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से भी निलंबित करने की तैयारी है।

2026 विधानसभा चुनाव का रोडमैप

बिहार में 2026 के विधानसभा चुनाव को लेकर अभी से बिसात बिछनी शुरू हो गई है। तेजस्वी यादव जानते हैं कि अगर संगठन में फूट रही, तो नीतीश कुमार और बीजेपी के गठबंधन को चुनौती देना मुश्किल होगा।

बूथ स्तर पर मजबूती

तेजस्वी यादव का जोर अब ‘बूथ जीतो, चुनाव जीतो’ के मंत्र पर है। वे चाहते हैं कि पार्टी का हर कार्यकर्ता सीधे जनता से जुड़ा हो। भितरघात करने वाले नेताओं को हटाकर वे संदेश देना चाहते हैं कि अनुशासनहीनता किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

तेजस्वी यादव

जातीय गणना और ‘A to Z’ फॉर्मूला

नीतीश सरकार द्वारा कराई गई जातीय गणना के आंकड़ों के बाद, तेजस्वी अपनी रणनीति को और धार दे रहे हैं। वे अति पिछड़ों (EBC) और दलितों को पार्टी के मुख्य ढांचे में बड़ी हिस्सेदारी देने की योजना बना रहे हैं, ताकि आरजेडी की छवि केवल एक या दो जातियों तक सीमित न रहे।

क्या आपको लगता है कि पार्टी के भीतर ‘भितरघात’ करने वाले नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाकर तेजस्वी यादव 2026 में मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँच पाएंगे? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

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लालू यादव के नाती आदित्य अब बनेंगे फौजी! सिंगापुर में लेंगे कठिन मिलिट्री ट्रेनिंग, भावुक हुईं रोहिणी आचार्य

लालू यादव

बिहार की राजनीति के सबसे कद्दावर चेहरों में से एक, लालू प्रसाद यादव के परिवार से एक बड़ी और प्रेरणादायक खबर सामने आ रही है। लालू यादव के नाती और रोहिणी आचार्य के बड़े बेटे आदित्य अब सेना की वर्दी पहनकर देश सेवा का जज्बा दिखाएंगे। आदित्य सिंगापुर में दो साल की अनिवार्य बेसिक मिलिट्री ट्रेनिंग (BMT) के लिए रवाना हो गए हैं, जिसे लेकर उनकी माँ रोहिणी आचार्य ने सोशल मीडिया पर एक दिल छू लेने वाला संदेश साझा किया है।

लालू परिवार के लिए गर्व का क्षण: रोहिणी आचार्य ने साझा की खुशी

राजद (RJD) प्रमुख लालू प्रसाद यादव के परिवार के सदस्य अक्सर अपनी राजनीतिक सक्रियता के लिए चर्चा में रहते हैं, लेकिन इस बार मौका राजनीति का नहीं, बल्कि अनुशासन और सैन्य प्रशिक्षण का है। रोहिणी आचार्य, जो अपनी मुखरता और अपने पिता के प्रति समर्पण के लिए जानी जाती हैं, उन्होंने अपने बेटे आदित्य के जीवन के इस नए पड़ाव की जानकारी सार्वजनिक की है।

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रोहिणी आचार्य का भावुक सोशल मीडिया पोस्ट

रोहिणी ने अपने बेटे आदित्य की तस्वीर साझा करते हुए ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा कि आज उनका सीना गर्व से चौड़ा हो गया है। उन्होंने बताया कि उनके बेटे ने अपनी प्री-यूनिवर्सिटी की पढ़ाई सफलतापूर्वक पूरी कर ली है और अब वह 18 साल की उम्र में सिंगापुर की नेशनल सर्विस (National Service) के तहत मिलिट्री ट्रेनिंग का हिस्सा बनने जा रहे हैं।

रोहिणी ने अपने पोस्ट में लिखा:

“आदित्य, तुम हमेशा से बहुत बहादुर और अनुशासित रहे हो। जीवन की कठिन चुनौतियों में ही असली व्यक्तित्व का निर्माण होता है। जाओ और अपनी मेहनत से हमें गौरवान्वित करो।”

सिंगापुर में अनिवार्य नेशनल सर्विस: क्या है इसके नियम?

कई लोगों के मन में यह सवाल है कि आदित्य सिंगापुर में मिलिट्री ट्रेनिंग क्यों ले रहे हैं। दरअसल, सिंगापुर के कानून बहुत सख्त हैं और वहां रक्षा को लेकर एक विशेष व्यवस्था है जिसे ‘नेशनल सर्विस’ कहा जाता है।

1. 18 साल की उम्र और अनिवार्य सेवा

सिंगापुर के कानून के मुताबिक, प्रत्येक स्वस्थ पुरुष नागरिक और दूसरी पीढ़ी के स्थायी निवासी (Permanent Residents) के लिए 18 साल की उम्र पूरी होने पर नेशनल सर्विस करना कानूनी रूप से अनिवार्य है। आदित्य इसी श्रेणी में आते हैं क्योंकि उनका परिवार लंबे समय से सिंगापुर में रह रहा है।

2. दो साल का कठिन प्रशिक्षण

यह ट्रेनिंग मात्र कुछ हफ्तों की नहीं, बल्कि पूरे दो साल की होती है। इस दौरान युवाओं को सेना के कठोर अनुशासन में रहना पड़ता है। ट्रेनिंग की शुरुआत बेसिक मिलिट्री ट्रेनिंग (BMT) से होती है, जिसमें शारीरिक मजबूती और मानसिक दृढ़ता पर जोर दिया जाता है。

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मिलिट्री ट्रेनिंग के दौरान क्या सीखेंगे आदित्य?

सिंगापुर की मिलिट्री ट्रेनिंग को दुनिया की सबसे व्यवस्थित और कठिन ट्रेनिंग्स में से एक माना जाता है। आदित्य को अगले दो वर्षों में निम्नलिखित चरणों से गुजरना होगा:

• शारीरिक फिटनेस: सुबह की कठिन कसरत और लंबी पैदल यात्रा (Route Marches)।

• हथियारों का प्रशिक्षण: अत्याधुनिक हथियारों को चलाने और उनके रखरखाव की जानकारी।

• सर्वाइवल स्किल्स: विपरीत परिस्थितियों में जंगलों या कठिन इलाकों में जीवित रहने के गुर。

• टीम वर्क और लीडरशिप: समूह में काम करना और नेतृत्व की क्षमता विकसित करना।

• फील्ड क्राफ्ट: युद्ध के मैदान में रणनीति बनाना और दुश्मन का सामना करना。

BMT (बेसिक मिलिट्री ट्रेनिंग) पूरी करने के बाद, सैनिकों को उनकी योग्यता के आधार पर विभिन्न यूनिट्स जैसे कि इन्फैंट्री, नेवी, एयरफोर्स या पुलिस फोर्स में तैनात किया जाता है।

राजनीति और पारिवारिक पृष्ठभूमि का प्रभाव

लालू प्रसाद यादव के नाती होने के नाते आदित्य हमेशा से ही सुर्खियों में रहे हैं, लेकिन उन्होंने खुद को अब तक बिहार की सक्रिय राजनीति से दूर रखा है। जहां उनके मामा तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव बिहार की राजनीति की कमान संभाल रहे हैं, वहीं आदित्य ने एक सैनिक के रूप में प्रशिक्षण लेने का फैसला किया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रशिक्षण आदित्य के व्यक्तित्व में एक नया निखार लाएगा। सैन्य अनुशासन किसी भी युवा के लिए भविष्य के करियर चाहे वह राजनीति हो या बिजनेस, एक मजबूत आधार तैयार करता है। रोहिणी आचार्य ने भी हाल ही में संकेत दिए थे कि वह अपनी राजनीतिक व्यस्तताओं से इतर अपने बच्चों के भविष्य और शिक्षा पर अधिक ध्यान देना चाहती हैं।

सोशल मीडिया पर मिल रही हैं शुभकामनाएं

जैसे ही रोहिणी आचार्य का यह पोस्ट वायरल हुआ, लालू परिवार के समर्थकों और चाहने वालों ने आदित्य को बधाई देना शुरू कर दिया। लोग आदित्य के साहस की प्रशंसा कर रहे हैं कि इतनी कम उम्र में उन्होंने देश सेवा के कठिन मार्ग को चुना है। लालू प्रसाद यादव ने भी अपने नाती के इस फैसले पर खुशी जताई है और उन्हें आशीर्वाद दिया है।

लालू यादव

क्या भारत में भी होनी चाहिए ऐसी अनिवार्य सेवा?

आदित्य का सिंगापुर में मिलिट्री ट्रेनिंग लेना न केवल लालू परिवार के लिए गर्व की बात है, बल्कि यह अनुशासन और कर्तव्य के प्रति समर्पण का एक बड़ा संदेश भी देता है। एक राजनैतिक परिवार का बच्चा होने के बावजूद, सिंगापुर के सख्त नियमों का पालन करते हुए सेना में शामिल होना सादगी और नियम-निष्ठा का उदाहरण है।

आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि भारत में भी युवाओं के लिए 2 साल की अनिवार्य सैन्य सेवा (National Service) लागू की जानी चाहिए? इससे युवाओं के व्यक्तित्व पर क्या प्रभाव पड़ेगा? कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर साझा करें।

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लालू प्रसाद यादव को दिल्ली हाई कोर्ट से बड़ा झटका, चार्ज फ्रेमिंग पर रोक से इनकार; जानें क्या है पूरा कानूनी विवाद

लालू प्रसाद यादव

बिहार की राजनीति के दिग्गज और राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की कानूनी मुश्किलें एक बार फिर बढ़ती नजर आ रही हैं। बहुचर्चित IRCTC लैंड फॉर जॉब स्कैम और भ्रष्टाचार के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने लालू यादव को कोई भी अंतरिम राहत देने से साफ इनकार कर दिया है।

कोर्ट ने उस याचिका पर रोक लगाने से मना कर दिया है जिसमें लालू यादव ने निचली अदालत द्वारा ‘आरोप तय’ (Charge Framing) किए जाने की प्रक्रिया को चुनौती दी थी। न्यायमूर्ति की इस टिप्पणी के बाद अब राजद खेमे में हलचल तेज हो गई है, क्योंकि इसका सीधा अर्थ है कि ट्रायल कोर्ट में उनके खिलाफ मुकदमे की कार्यवाही बिना किसी रुकावट के जारी रहेगी।

क्या है दिल्ली हाई कोर्ट का ताजा फैसला?

सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान लालू प्रसाद यादव के कानूनी दल ने दिल्ली हाई कोर्ट से गुहार लगाई थी कि जब तक उच्च न्यायालय उनकी मुख्य याचिका पर विचार नहीं कर लेता, तब तक निचली अदालत (CBI Special Court) को उनके खिलाफ आरोप तय करने से रोका जाए। लालू यादव की दलील थी कि सीबीआई द्वारा पेश किए गए साक्ष्य अपर्याप्त हैं और कानूनी प्रक्रियाओं का पूरी तरह पालन नहीं किया गया है।

हालांकि, दिल्ली हाई कोर्ट ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि वह फिलहाल इस स्तर पर ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही में हस्तक्षेप नहीं करेगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) के तहत चल रहे मामलों में देरी करना न्याय के हित में नहीं है।

कोर्ट ने जांच एजेंसी CBI (Central Bureau of Investigation) को नोटिस जारी कर इस मामले पर अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। अब इस मामले की अगली सुनवाई कुछ हफ्तों बाद होगी, लेकिन तब तक ट्रायल कोर्ट को अपने आदेश सुनाने की पूरी आजादी रहेगी।

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IRCTC घोटाला: भ्रष्टाचार की पूरी कहानी और पृष्ठभूमि

यह मामला करीब दो दशक पुराना है, जो साल 2004 से 2009 के बीच का है। उस समय लालू प्रसाद यादव केंद्र की यूपीए-1 (UPA-1) सरकार में रेल मंत्री के पद पर तैनात थे। सीबीआई का आरोप है कि पद का दुरुपयोग करते हुए रेल मंत्री ने भारतीय रेलवे खानपान और पर्यटन निगम (IRCTC) के दो होटलों के रखरखाव और संचालन का ठेका निजी हाथों में सौंपा था।

1. होटलों का आवंटन और धांधली

रेलवे के पास रांची और पुरी में दो ऐतिहासिक होटल थे—BNR रांची और BNR पुरी। इन होटलों के निजीकरण की प्रक्रिया के दौरान ‘सुजाता होटल्स’ नामक कंपनी को टेंडर दिया गया। आरोप है कि टेंडर की शर्तों को इस तरह से तोड़ा-मरोड़ा गया कि कोचर बंधुओं की कंपनी ‘सुजाता होटल्स’ ही एकमात्र योग्य उम्मीदवार के रूप में सामने आए।

2. ‘जमीन के बदले ठेका’ का खेल

सीबीआई की जांच के अनुसार, इस टेंडर के बदले में लालू प्रसाद यादव के परिवार को पटना में एक बहुत ही कीमती जमीन का टुकड़ा दिया गया। यह जमीन पहले कोचर बंधुओं ने ‘लारा प्रोजेक्ट्स’ (LARA Projects LLP) नामक कंपनी को हस्तांतरित की, जिसके मालिकाना हक में राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव का नाम शामिल था। चौंकाने वाली बात यह है कि करोड़ों की यह जमीन सर्कल रेट से बहुत कम कीमत पर या लगभग मुफ्त के बराबर हस्तांतरित की गई थी।

चार्ज फ्रेमिंग क्या है और यह लालू के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, चार्ज फ्रेमिंग (आरोप तय करना) किसी भी आपराधिक मुकदमे का वह पड़ाव है जहाँ अदालत यह तय करती है कि अभियुक्त के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हैं या नहीं।

ट्रायल की शुरुआत: एक बार आरोप तय हो जाने के बाद, मुकदमे की नियमित सुनवाई (Trial) शुरू हो जाती है। इसके बाद अभियोजन पक्ष (CBI) अपने गवाहों को बुलाता है।

बचने का रास्ता बंद: लालू यादव चाहते थे कि चार्ज फ्रेमिंग पर रोक लग जाए, ताकि मामला लंबा खिंच सके। अब रोक न लगने का मतलब है कि उन्हें अदालत में हर तारीख पर पेश होना पड़ सकता है और गवाहों का सामना करना पड़ सकता है।

राजनीतिक प्रभाव: 2026 के राजनीतिक परिदृश्य में, यदि लालू यादव पर आरोप तय होते हैं, तो यह विपक्षी गठबंधन के लिए एक नैतिक चुनौती बन सकता है।

सीबीआई और ईडी की संयुक्त जांच

इस मामले की गंभीरता को देखते हुए न केवल सीबीआई, बल्कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने भी मनी लॉन्ड्रिंग के तहत जांच शुरू की थी। जांच एजेंसियों का दावा है कि यह केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं थी, बल्कि एक सुनियोजित आर्थिक अपराध था।

एजेंसियों द्वारा पेश किए गए मुख्य साक्ष्य:

हस्ताक्षर और दस्तावेज: सीबीआई ने कई ऐसे फाइल नोटिंग्स बरामद किए हैं जिन पर तत्कालीन रेल मंत्री के निर्देश स्पष्ट रूप से दर्ज हैं।

शेल कंपनियां: ईडी ने उन कंपनियों के नेटवर्क का खुलासा किया है जिनके जरिए पैसे और संपत्तियों का लेन-देन हुआ।

सरकारी गवाह: इस मामले में कुछ पूर्व रेल अधिकारियों के बयान भी महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो रहे हैं जिन्होंने दबाव में काम करने की बात स्वीकार की है।

लालू प्रसाद यादव – जमानत पर , मुख्य साजिशकर्ता और पद का दुरुपयोग |

राबड़ी देवी – जमानत पर , वित्तीय लाभ प्राप्तकर्ता

तेजस्वी यादव – जमानत पर , बेनामी संपत्ति में हिस्सेदारी

विजय कोचर – आरोपी , रिश्वत देने और टेंडर हासिल करने का आरोप

लालू यादव की दलील और बचाव पक्ष का तर्क

लालू यादव के वकील सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल और अन्य विशेषज्ञों ने कोर्ट में तर्क दिया कि यह पूरा मामला राजनीतिक द्वेष से प्रेरित है। उनका कहना है कि 15 साल पुराने मामले को केवल चुनाव और राजनीति को प्रभावित करने के लिए फिर से जीवित किया जा रहा है। बचाव पक्ष का यह भी कहना है कि होटलों का आवंटन रेलवे बोर्ड के नियमों के तहत हुआ था और इसमें लालू यादव की कोई व्यक्तिगत भूमिका नहीं थी।

हालांकि, हाई कोर्ट ने इन दलीलों को फिलहाल ‘ट्रायल का विषय’ (Subject of Trial) माना है, जिसका अर्थ है कि इन बातों पर फैसला मुकदमे की सुनवाई के दौरान होगा, न कि शुरुआती स्तर पर।

लालू प्रसाद यादव

भविष्य की चुनौतियां और कानूनी रास्ते

अब लालू प्रसाद यादव के पास सीमित विकल्प बचे हैं। वह इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं, लेकिन आमतौर पर सुप्रीम कोर्ट भी निचली अदालत के ट्रायल में तब तक हस्तक्षेप नहीं करता जब तक कि कोई गंभीर संवैधानिक खामी न हो।

ट्रायल की गति: दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट अब तेजी से आरोप तय करने की दिशा में बढ़ेगी।

स्वास्थ्य का हवाला: लालू यादव की बढ़ती उम्र और किडनी ट्रांसप्लांट के बाद की स्थिति को देखते हुए, उनका पक्ष स्वास्थ्य के आधार पर रियायत की मांग कर सकता है।

गवाहों की जिरह: आने वाले महीनों में इस केस में कई महत्वपूर्ण गवाहों की गवाही शुरू हो सकती है, जो बिहार की राजनीति में भी सुर्खियां बटोरेगी।

दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रही कानूनी लड़ाई में एक बड़ा पड़ाव है। लालू प्रसाद यादव जैसे कद्दावर नेता के लिए यह एक स्पष्ट संकेत है कि कानूनी प्रक्रिया अपनी गति से चलेगी। चार्ज फ्रेमिंग पर रोक लगाने से इनकार करना यह दर्शाता है कि अदालतें अब आर्थिक अपराधों और भ्रष्टाचार के मामलों में ‘स्थगन की राजनीति’ को स्वीकार करने के मूड में नहीं हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि सीबीआई के जवाब के बाद हाई कोर्ट का रुख क्या होता है।

क्या आपको लगता है कि दशकों पुराने भ्रष्टाचार के मामलों में अब तेजी से सुनवाई होनी चाहिए, या यह नेताओं को परेशान करने का एक जरिया मात्र है? अपनी राय हमें नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

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