BENTELER Automotive का पुणे में बड़ा निवेश: चाकन में ली 1.36 लाख वर्ग फुट की नई जगह, अब भारत से होगा ग्लोबल एक्सपोर्ट

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भारत का ऑटोमोबाइल सेक्टर साल 2026 की शुरुआत में ही बड़े विदेशी निवेश का गवाह बन रहा है। चाकन, जिसे भारत का ‘डेट्रॉइट’ कहा जाता है, वहां जर्मन कंपनी BENTELER ने ब्लैकस्टोन (Blackstone) के स्वामित्व वाली Horizon Industrial Parks के साथ एक महत्वपूर्ण समझौता किया है। इस समझौते के तहत कंपनी ने 1.36 लाख वर्ग फुट का नया इंडस्ट्रियल स्पेस लीज पर लिया है। यह कदम कंपनी की भविष्य की योजनाओं और भारतीय बाजार के प्रति उनके भरोसे को स्पष्ट करता है।

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उत्पादन क्षमता में भारी विस्तार और इंफ्रास्ट्रक्चर

BENTELER Automotive पुणे में पहले से ही 1.28 लाख वर्ग फुट के प्लांट में अपना ऑपरेशन चला रही थी। अब इस नई जगह के जुड़ जाने से कंपनी का कुल परिचालन क्षेत्र (Total Operational Area) बढ़कर 2.64 लाख वर्ग फुट हो गया है। इस विस्तार के लिए कंपनी हर महीने लगभग 43.4 लाख रुपये का किराया देगी, जिसमें सालाना 4.7% की बढ़ोतरी का प्रावधान है। यह बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी को आधुनिक मशीनों और बड़ी असेंबली लाइन्स लगाने में मदद करेगा।

लोकल मैन्युफैक्चरिंग और ‘Torsion Beam Tubes’ का उत्पादन

इस निवेश का सबसे महत्वपूर्ण पहलू ‘लोकलाइजेशन’ यानी स्थानीय स्तर पर पुर्जों का निर्माण है। अब तक, ऑटोमोबाइल के चेसिस (Chassis) के लिए इस्तेमाल होने वाले Torsion Beam Tubes जैसे महत्वपूर्ण घटकों को विदेशों से आयात (Import) किया जाता था। लेकिन अब BENTELER इन ट्यूब्स का उत्पादन सीधे पुणे के इस नए प्लांट में करेगी। इससे न केवल विदेशी आयात पर निर्भरता कम होगी, बल्कि उत्पादन की लागत भी घटेगी, जिसका सीधा फायदा कार कंपनियों और अंततः ग्राहकों को मिल सकता है।

सप्लाई चेन और रोजगार के नए अवसर

पुणे का चाकन इलाका टाटा मोटर्स, महिंद्रा, मर्सिडीज-बेंज और फॉक्सवैगन जैसी दिग्गज कंपनियों का घर है। BENTELER की क्षमता बढ़ने से इन सभी मूल उपकरण निर्माताओं (OEMs) को पुर्जों की सप्लाई और भी तेजी से हो सकेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्तर के विस्तार से पुणे और उसके आसपास के इलाकों में सैकड़ों की संख्या में कुशल और अकुशल श्रमिकों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। यह न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देगा, बल्कि भारत की सप्लाई चेन को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाएगा।

भारत: दुनिया का उभरता हुआ एक्सपोर्ट हब

BENTELER इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर, मुकुंद गांगणे ने इस मौके पर कहा कि यह विस्तार उनकी वैश्विक रणनीति का हिस्सा है। कंपनी का लक्ष्य केवल भारतीय बाजार की मांग को पूरा करना नहीं है, बल्कि भारत को एक ‘एक्सपोर्ट बेस’ के रूप में विकसित करना है। यहाँ बने हाई-टेक चेसिस और स्ट्रक्चरल कंपोनेंट्स को दुनिया के अन्य देशों में भी भेजा जाएगा। सरकार की पीएलआई (PLI) स्कीम और बेहतर लॉजिस्टिक्स नीतियों के कारण अब विदेशी कंपनियां भारत को मैन्युफैक्चरिंग के लिए चीन के एक मजबूत विकल्प के रूप में देख रही हैं।

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BENTELER द्वारा किया गया यह निवेश भारतीय ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री के सुनहरे भविष्य का संकेत है। जब एक प्रमुख जर्मन कंपनी अपनी क्षमता को रातों-रात दोगुना करती है, तो यह वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती विश्वसनीयता को साबित करता है। यह कदम न केवल तकनीक के हस्तांतरण (Technology Transfer) में मदद करेगा, बल्कि भारत को 2030 तक दुनिया का सबसे बड़ा ऑटो हब बनाने के सपने को भी करीब लाएगा।

क्या आपको लगता है कि पुणे और तमिलनाडु जैसे राज्यों में बढ़ता विदेशी निवेश भारत को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाएगा? अपने विचार हमारे साथ साझा करें।

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देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन का ट्रायल शुरू, प्रदूषण मुक्त सफर का नया अध्याय

हाइड्रोजन ट्रेन

भारतीय रेलवे ने आज परिवहन के क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत कर दी है। देश की पहली हाइड्रोजन-ट्रेन (Hydrogen-Powered Train) का ट्रायल रन सफलतापूर्वक शुरू हो गया है, जो भारत को वैश्विक स्तर पर ‘ग्रीन एनर्जी लीडर’ बनाने की दिशा में सबसे बड़ा कदम है। यह ट्रेन न केवल शोर-शराबे से मुक्त होगी, बल्कि धुएं की जगह केवल पानी की वाष्प (Water Vapor) छोड़ेगी, जिससे पर्यावरण संरक्षण को एक नई गति मिलेगी।

हाइड्रोजन ट्रेन क्या है और यह कैसे काम करती है?

हाइड्रोजन ट्रेन, जिसे अक्सर ‘हाइड्रेल’ (Hydrail) कहा जाता है, पारंपरिक डीजल इंजनों से पूरी तरह अलग होती है। जहां डीजल इंजन कार्बन डाइऑक्साइड और हानिकारक गैसें उत्सर्जित करते हैं, वहीं हाइड्रोजन ट्रेनें फ्यूल सेल (Fuel Cell) तकनीक का उपयोग करती हैं।

हाइड्रोजन ट्रेन

तकनीक और कार्यप्रणाली

इन ट्रेनों के ऊपर या विशेष कोच में हाइड्रोजन टैंक लगे होते हैं। जब ऑक्सीजन और हाइड्रोजन का रासायनिक मिलन होता है, तो उससे बिजली पैदा होती है। इसी बिजली से ट्रेन की मोटर चलती है। इस पूरी प्रक्रिया का एकमात्र ‘बाय-प्रोडक्ट’ शुद्ध पानी और भाप होता है।

‘ग्रीन हाइड्रोजन’ की भूमिका

भारत सरकार का लक्ष्य केवल हाइड्रोजन ट्रेन चलाना नहीं, बल्कि इसे ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ से संचालित करना है। ग्रीन हाइड्रोजन वह है जिसे सौर ऊर्जा या पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों (Renewable Energy) का उपयोग करके पानी के इलेक्ट्रोलिसिस से बनाया जाता है।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह ट्रायल?

भारतीय रेलवे दुनिया का सबसे बड़ा बिजली से चलने वाला नेटवर्क बनने की राह पर है, लेकिन अभी भी कई दुर्गम और पहाड़ी इलाकों में डीजल इंजन का प्रयोग होता है। हाइड्रोजन ट्रेन उन क्षेत्रों के लिए एक गेम-चेंजर साबित होगी।

नेट जीरो उत्सर्जन (Net Zero Carbon Emission): भारत ने 2070 तक नेट जीरो का लक्ष्य रखा है, जबकि भारतीय रेलवे ने खुद को 2030 तक ‘नेट जीरो कार्बन उत्सर्जक’ बनाने का संकल्प लिया है।

डीजल पर निर्भरता में कमी: वर्तमान में रेलवे डीजल पर सालाना हजारों करोड़ रुपये खर्च करता है। हाइड्रोजन तकनीक के विस्तार से विदेशी तेल आयात पर निर्भरता कम होगी।

ध्वनि प्रदूषण से मुक्ति: ये ट्रेनें बहुत शांत होती हैं, जिससे यात्रियों को एक प्रीमियम और आरामदायक अनुभव मिलता है।

ट्रायल रन और रूट्स की विस्तृत जानकारी

रेल मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, शुरुआती ट्रायल रन हरियाणा के जींद-सोनीपत सेक्शन पर केंद्रित हैं। यह रूट लगभग 89 किलोमीटर लंबा है, जहां बुनियादी ढांचे और हाइड्रोजन फिलिंग स्टेशन का काम पहले ही पूरा किया जा चुका है।

H3: पहले चरण में शामिल होने वाले रूट

सरकार की योजना ‘हेरिटेज रूट्स’ पर सबसे पहले इन ट्रेनों को उतारने की है ताकि प्राकृतिक सुंदरता वाले क्षेत्रों में प्रदूषण कम हो:

• कालका-शिमला रेलवे (हिमाचल प्रदेश)

• दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे (पश्चिम बंगाल)

• नीलगिरी माउंटेन रेलवे (तमिलनाडु)

• माथेरान हिल रेलवे (महाराष्ट्र)

आँकड़े और निवेश

रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रत्येक हाइड्रोजन ट्रेन की लागत लगभग 80 करोड़ रुपये आती है, जबकि ग्राउंड इंफ्रास्ट्रक्चर (जैसे हाइड्रोजन प्लांट) के लिए प्रति रूट 70 करोड़ रुपये का अतिरिक्त निवेश आवश्यक है। ‘हाइड्रोजन फॉर हेरिटेज’ योजना के तहत रेलवे ने कुल 35 ऐसी ट्रेनों के निर्माण का खाका तैयार किया है।

वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति

हाइड्रोजन ट्रेन चलाने वाला भारत दुनिया का तीसरा और एशिया का दूसरा देश बनने की राह पर है। जर्मनी ने 2022 में दुनिया की पहली हाइड्रोजन संचालित यात्री ट्रेन शुरू की थी, जिसके बाद चीन ने भी इस तकनीक को अपनाया। भारत अब इस एलीट क्लब में शामिल होकर अपनी स्वदेशी तकनीक ‘वंदे भारत’ की तरह ही ‘वंदे मेट्रो’ (हाइड्रोजन संस्करण) को पेश कर रहा है।

चुनौतियां और भविष्य की राह

इतनी बड़ी सफलता के बावजूद, कुछ चुनौतियां अभी भी बरकरार हैं:

• लागत: हाइड्रोजन का उत्पादन अभी भी बिजली या डीजल की तुलना में महंगा है।

• भंडारण (Storage): हाइड्रोजन एक अत्यधिक ज्वलनशील गैस है, इसलिए इसके भंडारण और परिवहन के लिए उच्चतम सुरक्षा मानकों की आवश्यकता होती है।

• रिफ्यूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर: पूरे देश में हाइड्रोजन स्टेशन बनाना एक जटिल और समय लेने वाली प्रक्रिया है।

हालांकि, नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के तहत जिस तरह से निवेश बढ़ रहा है, विशेषज्ञों का मानना है कि अगले 5-10 वर्षों में इसकी लागत में भारी कमी आएगी।

हाइड्रोजन ट्रेन

यात्रियों के अनुभव में क्या बदलेगा?

एक आम यात्री के लिए हाइड्रोजन ट्रेन का सफर किसी बुलेट ट्रेन या वंदे भारत जैसा ही आधुनिक होगा। इन ट्रेनों में:

• पूरी तरह से वातानुकूलित कोच होंगे।

• ऑटोमैटिक दरवाजे और जीपीएस आधारित सूचना प्रणाली होगी।

• इंजन का शोर न होने के कारण यात्रा बहुत सुकून भरी होगी।

भारतीय रेलवे द्वारा हाइड्रोजन ट्रेन का ट्रायल शुरू करना केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वच्छ पर्यावरण का वादा है। ‘मेक इन इंडिया’ के तहत इन ट्रेनों का निर्माण भारत की इंजीनियरिंग क्षमता को दर्शाता है। यदि यह ट्रायल सफल रहता है, तो भारत के परिवहन इतिहास में यह सबसे बड़ा क्रांतिकारी बदलाव साबित होगा।

यह कदम न केवल ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ लड़ाई में भारत की स्थिति मजबूत करेगा, बल्कि देश के टूरिज्म सेक्टर, खासकर पहाड़ी इलाकों में पर्यटन को एक नई और ‘ग्रीन’ पहचान देगा।

आप क्या सोचते हैं? क्या हाइड्रोजन ट्रेनें भविष्य में पूरी तरह से डीजल और बिजली इंजनों की जगह ले पाएंगी? अपनी राय हमें कमेंट में जरूर बताएं।

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