क्या ग्रीनलैंड पर कब्जा करेगा अमेरिका? व्हाइट हाउस के ‘मिलिट्री विकल्प’ वाले बयान से दुनिया हैरान

ग्रीनलैंड

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर दुनिया के सबसे बड़े द्वीप ग्रीनलैंड को खरीदने की अपनी पुरानी इच्छा जताकर वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है। इस बार व्हाइट हाउस का रुख पहले से कहीं अधिक आक्रामक नजर आ रहा है।

मुख्य बिंदु:

सैन्य विकल्प का जिक्र: व्हाइट हाउस के प्रवक्ता ने कहा है कि ग्रीनलैंड अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है और इसे हासिल करने के लिए ‘मिलिट्री विकल्प’ समेत सभी रास्तों पर विचार किया जा सकता है।

क्यों है नजर? ग्रीनलैंड में भारी मात्रा में रेयर अर्थ मेटल्स, यूरेनियम और कच्चे तेल के भंडार हैं। साथ ही, यह रूस और चीन को आर्कटिक क्षेत्र में घेरने के लिए सबसे सटीक जगह है।

डेनमार्क का जवाब: डेनमार्क और ग्रीनलैंड की सरकार ने ट्रंप के इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज करते हुए इसे “बेतुका” बताया है। उन्होंने साफ कहा कि “ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है।”

बढ़ता विवाद: विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का यह बयान यूरोप और अमेरिका के रिश्तों में बड़ी दरार पैदा कर सकता है।

ग्रीनलैंड

डोनाल्ड ट्रंप की “अमेरिका फर्स्ट” नीति के तहत ग्रीनलैंड को हासिल करना उनकी सबसे बड़ी विरासत (Legacy) हो सकती है। लेकिन लोकतंत्र के इस दौर में किसी स्वायत्त क्षेत्र को खरीदना उतना आसान नहीं है जितना कि 1867 में अलास्का को रूस से खरीदना था। डेनमार्क का कड़ा विरोध और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की आलोचना ट्रंप के लिए बड़ी बाधा बन सकती है।

व्हाइट हाउस का ‘सैन्य विकल्प’ वाला बयान आने वाले समय में एक बड़े वैश्विक विवाद की नींव रख सकता है। क्या अमेरिका वास्तव में अपनी शक्ति के बल पर दुनिया का नक्शा बदलने की कोशिश करेगा, या यह केवल बातचीत की मेज पर डेनमार्क को झुकाने की एक चाल है?

आपको क्या लगता है, क्या आधुनिक युग में किसी देश या द्वीप को पैसे के दम पर खरीदना नैतिक रूप से सही है? क्या भारत जैसे देशों को इस बढ़ते आर्कटिक तनाव पर चिंता करनी चाहिए? अपनी राय नीचे कमेंट में बताएं।

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