कल्पना कीजिए कि आपके घर का कोई सदस्य गंभीर रूप से बीमार है और उसे तुरंत एक अच्छी सर्जरी की जरूरत है। आप उसे अस्पताल लेकर जाते हैं। लेकिन क्या आप अपना या अपने परिवार का इलाज किसी ऐसे डॉक्टर से करवाना चाहेंगे, जिसने अपनी मेडिकल प्रवेश परीक्षा (NEET PG) में 800 में से सिर्फ 9 नंबर हासिल किए हों?
यह कोई मज़ाक या किसी फिल्म की कहानी नहीं है, बल्कि हमारे देश के एजुकेशन और हेल्थकेयर सिस्टम का एक कड़वा सच है। हाल ही में NEET PG की काउंसलिंग में कुछ ऐसे हैरान करने वाले आंकड़े सामने आए हैं, जहां सिंगल डिजिट या ‘जीरो परसेंटाइल’ लाने वाले उम्मीदवारों को भी एमडी/एमएस (MD/MS) करने के लिए एडमिशन मिल गया है।
आज ‘ApniVani’ पर हम किसी जाति या वर्ग का विरोध नहीं कर रहे हैं, बल्कि ‘काबिलियत’ और देश के मेडिकल सिस्टम का पक्ष रख रहे हैं। आइए इस पूरे सिस्टम का ‘डीप एनालिसिस’ करते हैं और जानते हैं कि आखिर आम आदमी के मन में कौन से 3 बड़े सवाल उठ रहे हैं।

9 नंबर का सच: एक आम छात्र के सपनों की हत्या
मेडिकल की पढ़ाई (NEET PG) कोई आसान खेल नहीं है। इसका पेपर 800 नंबर का होता है। अगर कोई छात्र बिना सवाल पढ़े सिर्फ ‘तुक्का’ भी मार दे, तो शायद उसके 9 से ज्यादा नंबर आ जाएं।
एक तरफ वह सामान्य वर्ग या मिडिल क्लास का छात्र है, जो 400 से 500 नंबर लाने के बाद भी डिप्रेशन में है क्योंकि उसे कोई सरकारी सीट नहीं मिली। दूसरी तरफ एक ऐसा उम्मीदवार है, जिसे आरक्षण व्यवस्था के तहत इतने कम नंबरों पर भी मेडिकल कॉलेज में एंट्री मिल गई। यह सिर्फ ‘मेरिट’ (Merit) का मर्डर नहीं है, बल्कि उन मरीजों की जान के साथ भी सीधा खिलवाड़ है, जिनका इलाज भविष्य में ये डॉक्टर करेंगे। जब डॉक्टर ही काबिल नहीं होगा, तो मरीज कैसे बचेगा?

क्या असली जरूरतमंदों तक पहुंच रहा है फायदा?
आरक्षण (Reservation) का मूल उद्देश्य उन लोगों को समाज में आगे लाना था, जो पीढ़ियों से पिछड़े हुए हैं और जिन्हें पढ़ने का मौका नहीं मिला। सामाजिक न्याय के लिए यह जरूरी भी है। लेकिन आज जमीनी हकीकत बिल्कुल उल्टी हो चुकी है।
गांव में बैठा एक गरीब, जो सच में सुविधाओं से वंचित है, उसे आज भी नहीं पता कि NEET परीक्षा कैसे पास करनी है। वहीं दूसरी तरफ, जो लोग पहले से ही साधन संपन्न हैं, जिनके माता-पिता बड़े पदों पर हैं या जो आर्थिक रूप से मजबूत हैं (क्रीमी लेयर), वे पीढ़ियों तक इस कोटे का फायदा उठा रहे हैं। जब तक जरूरतमंद और अमीर के बीच यह फर्क खत्म नहीं होगा, तब तक इस व्यवस्था का असली फायदा उस आखिरी इंसान तक कभी नहीं पहुंचेगा।

नेताओं और सिस्टम से आम आदमी के 3 सीधे सवाल!
जब भी आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ या ‘क्वालिफाइंग मार्क्स’ की बात उठती है, तो देश में राजनीति शुरू हो जाती है। वोट बैंक खिसकने के डर से राजनेता इसका आंख मूंदकर समर्थन करते हैं। लेकिन आज देश का आम आदमी इन नेताओं से 3 कड़वे सवाल पूछना चाहता है:
- पहला सवाल – नेताओं का इलाज कौन करता है?: “नेता जी! आप मंच से जिस व्यवस्था का महिमामंडन करते हैं, क्या आप छाती ठोक कर यह कह सकते हैं कि कल को आपके दिल की सर्जरी या आपके परिवार का इलाज वो 9 नंबर वाला डॉक्टर करेगा?” हम सब जानते हैं कि नेता अपना इलाज विदेशों में या देश के टॉप प्राइवेट अस्पतालों के ‘बेस्ट मेरिट’ वाले डॉक्टरों से करवाते हैं, लेकिन आम जनता को इसी सिस्टम के भरोसे छोड़ देते हैं।
- दूसरा सवाल – मेडिकल में ‘न्यूनतम कट-ऑफ’ क्यों नहीं?: क्लर्क या चपरासी की नौकरी के लिए भी एक पासिंग मार्क्स (Passing Marks) तय होते हैं। तो फिर इंसानों की जान बचाने वाले मेडिकल प्रोफेशन में जीरो या 9 नंबर पर एडमिशन की छूट क्यों? क्या यहाँ एक ‘बेसिक कट-ऑफ’ तय नहीं होनी चाहिए?
- तीसरा सवाल – गरीब को फायदा कब मिलेगा?: जो सच में पिछड़ा है, उसे मजबूत करने के लिए स्कूल लेवल पर फ्री कोचिंग और किताबें क्यों नहीं दी जातीं? सिर्फ कट-ऑफ कम कर देने से क्या देश को अच्छे और होनहार डॉक्टर मिल पाएंगे?

ApniVani की बात: समीक्षा का समय आ गया है
कोई भी समझदार इंसान आरक्षण के खिलाफ नहीं है। लेकिन जब बात मेडिकल और हेल्थकेयर की आती है, तो वहां सिस्टम को एक बड़े ‘अपडेट’ की जरूरत है।
9 नंबर पर एडमिशन यह साबित करता है कि हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि आरक्षण का लाभ समाज के सबसे गरीब और पिछड़े व्यक्ति को मिले। साथ ही, देश के सरकारी अस्पतालों को काबिल डॉक्टर मिलें, न कि सिर्फ डिग्रियों वाले रोबोट। सरकार को वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर इस नियम की समीक्षा करनी ही होगी।
आपकी राय: क्या आपको लगता है कि मेडिकल जैसे संवेदनशील क्षेत्र में एडमिशन के लिए एक बेसिक पासिंग मार्क्स (न्यूनतम कट-ऑफ) होना अनिवार्य कर देना चाहिए? कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर दें!