Waqf Board land history and facts: देश का तीसरा सबसे बड़ा जमींदार, कैसे है अन्य धर्मों से 4 मायनों में अलग?

Waqf Board land history and facts

अगर आपसे पूछा जाए कि भारत में रक्षा मंत्रालय और भारतीय रेलवे के बाद सबसे ज्यादा जमीन किसके पास है, तो शायद आप किसी बड़े उद्योगपति का नाम लें। लेकिन सच यह है कि देश का तीसरा सबसे बड़ा जमींदार ‘वक्फ बोर्ड’ (Waqf Board) है। केंद्र सरकार के अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, पूरे भारत में वक्फ बोर्ड के पास लगभग 8.7 लाख संपत्तियां हैं, जो 9.4 लाख एकड़ से ज्यादा जमीन पर फैली हुई हैं। इनकी अनुमानित कीमत 1.2 लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा है।

लेकिन आज पूरा देश पूछ रहा है कि आखिर इस संस्था के पास इतनी असीमित ताकत कैसे आई? पुरानी और सरकारी जमीनों पर यह अचानक दावा कैसे कर लेता है? और सबसे बड़ा सवाल—जब भारत में सिख, ईसाई, बौद्ध और जैन भी अल्पसंख्यक हैं, तो सिर्फ एक धर्म के पास ऐसा ताकतवर ‘लैंड होल्डिंग’ कानून क्यों है? Apni Vani आज इन सभी सवालों का एकदम गहराई से और तथ्यात्मक विश्लेषण कर रहा है।

कब और क्यों बना वक्फ बोर्ड?

इस्लाम में ‘वक्फ’ (Waqf) का मतलब है किसी संपत्ति को अल्लाह के नाम पर दान कर देना, ताकि उसका इस्तेमाल धार्मिक या चैरिटी के कामों (जैसे मस्जिद, कब्रिस्तान या अनाथालय) के लिए हो सके। भारत में इसे कानूनी ढांचा देने के लिए सबसे पहले ‘वक्फ एक्ट 1954’ लाया गया था। इसका मकसद केवल दान की गई संपत्तियों का सही प्रबंधन करना था। लेकिन असली खेल और विवाद शुरू हुआ साल 1995 में। तत्कालीन सरकार ने ‘वक्फ एक्ट 1995’ (Waqf Act 1995) पारित किया, जिसने इस बोर्ड को असीमित और बेहद खौफनाक कानूनी शक्तियां दे दीं।

असीमित ताकत और विवादित ‘सेक्शन 40’ का सच

वक्फ बोर्ड को 1995 के कानून, और विशेषकर 2013 में हुए संशोधनों के बाद जो सबसे खतरनाक ताकत मिली, वह थी ‘सेक्शन 40’ (Section 40)। इस सेक्शन के तहत, अगर वक्फ बोर्ड को यह “भरोसा हो जाए” (Reason to believe) कि कोई भी संपत्ति वक्फ की है, तो वह उस पर अपना दावा ठोक सकता है।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस दावे के खिलाफ आप किसी आम सिविल कोर्ट या हाई कोर्ट में नहीं जा सकते। आपको ‘वक्फ ट्रिब्यूनल’ (Waqf Tribunal) के सामने ही अपनी बेगुनाही और अपनी जमीन के कागज साबित करने होते हैं, जिसमें ज्यादातर सदस्य उसी समुदाय के होते हैं। इसी मनमानी शक्ति के कारण हाल के वर्षों में कई सरकारी जमीनों, पुरानी इमारतों और यहाँ तक कि किसानों के गांवों पर भी वक्फ ने अपना दावा ठोक दिया, जिससे भारी आक्रोश पैदा हुआ।

देश के लिए योगदान ‘शून्य’ क्यों माना जाता है?

9.4 लाख एकड़ की विशाल जमीन और 1.2 लाख करोड़ की संपत्ति होने के बावजूद, वक्फ बोर्ड से देश की अर्थव्यवस्था या विकास को होने वाला सीधा फायदा लगभग शून्य (Nil) माना जाता है। इसकी 70% से ज्यादा संपत्तियां या तो कब्रिस्तान हैं, मस्जिदें हैं, या फिर उन पर अतिक्रमण हो चुका है। इतने बड़े संसाधनों के बावजूद, बोर्ड की सालाना कमाई बेहद मामूली है और इसके भीतर भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन के अनगिनत मामले सामने आ चुके हैं।

अल्पसंख्यक और हिंदू मंदिरों के साथ एक कड़वी तुलना

अब आते हैं उस सबसे बड़े सवाल पर कि क्या देश को सच में ऐसे बोर्ड की जरूरत है? भारत में ईसाई, बौद्ध, सिख और जैन भी अल्पसंख्यक हैं। लेकिन उनके धार्मिक या चैरिटी ट्रस्ट आम ‘सोसाइटी या ट्रस्ट एक्ट’ (Indian Trusts Act) के तहत चलते हैं। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) जैसे मजबूत संगठन भी अपने संपत्तियों का प्रबंधन करते हैं, लेकिन उन्हें किसी दूसरे की जमीन को महज़ ‘भरोसे’ के आधार पर छीन लेने की वैधानिक शक्ति नहीं मिली है।

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वहीं अगर हम बहुसंख्यक हिंदुओं की बात करें, तो स्थिति बिल्कुल विपरीत है। हिंदू मंदिरों और उनके खजाने को ‘हिंदू रिलिजियस एंड चैरिटेबल एंडोमेंट्स’ (HRCE) जैसे कानूनों के जरिए सीधा राज्य सरकारों ने अपने नियंत्रण में लिया हुआ है। मंदिरों का पैसा सरकारी ऑडिट से गुजरता है और अक्सर सड़कों, स्कूलों या अन्य सार्वजनिक कल्याण के कामों में खर्च किया जाता है। जबकि वक्फ बोर्ड को स्वायत्तता (Autonomy) हासिल है और उसका खजाना केवल उसी समुदाय के भीतर इस्तेमाल होता है। यह दोहरा मापदंड ही आज देश में सबसे बड़ी बहस का कारण बन चुका है।

Apnivani की बात

वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा करना एक लोकतांत्रिक देश का कर्तव्य हो सकता है, लेकिन किसी एक संस्था को न्यायपालिका और आम नागरिक के अधिकारों से ऊपर की शक्तियां देना किसी भी हाल में जायज नहीं ठहराया जा सकता।

अब आप बेबाक होकर बताइये: क्या वक्फ बोर्ड के पर कतरने वाला नया वक्फ संशोधन बिल (Waqf Amendment Bill) सही है, या सरकार को हिंदू मंदिरों को भी सरकारी नियंत्रण से पूरी तरह मुक्त कर देना चाहिए? अपनी बेबाक राय नीचे कमेंट्स में ज़रूर दें!

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