सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता, कहा – संसद में महिलाओं की मौजूदगी लगातार घट रही है

सुप्रीम कोर्ट

देश की सर्वोच्च अदालत ने संसद में महिलाओं की घटती भागीदारी पर गंभीर चिंता जताई है। सुप्रीम कोर्ट की दो-न्यायाधीशों वाली बेंच, जिसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना कर रही थीं, ने सुनवाई के दौरान कहा कि महिलाओं को भारत का “सबसे बड़ा अल्पसंख्यक” कहा जा सकता है, क्योंकि उनकी उपस्थिति संसद में लगातार घट रही है।

जस्टिस नागरत्ना, जो वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट की एकमात्र महिला न्यायाधीश हैं, ने सख्त शब्दों में कहा, “जब महिलाएं देश की आधी आबादी हैं, तो उन्हें संसद में प्रतिनिधित्व देने के लिए सिर्फ आरक्षण का इंतज़ार क्यों किया जाए? बिना आरक्षण के भी राजनीतिक दल महिलाओं को टिकट क्यों नहीं देते?”

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उन्होंने यह भी कहा कि संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी केवल “संख्यात्मक प्रतिनिधित्व” का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह भारत के लोकतंत्र की गुणवत्ता और संतुलन से जुड़ा हुआ प्रश्न है।

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी उस समय आई है जब देश में महिला आरक्षण विधेयक (जिसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम कहा जाता है) के लागू होने की प्रक्रिया अभी प्रारंभिक चरण में है। संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी फिलहाल 15% से भी कम है, जबकि स्थानीय निकायों में यह संख्या कहीं अधिक है।

विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी राजनीतिक दलों पर दबाव बनाएगी कि वे स्वेच्छा से महिला उम्मीदवारों की संख्या बढ़ाएं, ताकि संसद में महिलाओं की आवाज़ और मज़बूत हो सके। यह टिप्पणी न केवल न्यायिक चेतावनी है, बल्कि भारतीय राजनीति में लैंगिक समानता की दिशा में एक अहम संदेश भी मानी जा रही है।

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