Sawan 2026 Date: कल से शुरू हो रहा है सावन! जानें मांसाहार छोड़ने के ‘Scientific’ कारण और 16 सोमवार का असली सच

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कल, यानी 30 जुलाई 2026 (गुरुवार) से आस्था और पवित्रता का सबसे बड़ा महीना ‘सावन’ (Sawan) शुरू होने जा रहा है, जो 28 अगस्त तक चलेगा। पूरे देश में शिवभक्त बोल-बम के जयकारों, गंगाजल और रुद्राभिषेक के साथ इस महीने को मनाने की तैयारी कर चुके हैं। सावन आते ही घर के बड़े-बुजुर्ग सबसे पहले एक ही नियम लागू करते हैं। “एक महीने तक कोई नॉन-वेज, शराब या भारी खाना नहीं खाएगा!” ज्यादातर युवाओं को लगता है कि यह सिर्फ एक धार्मिक अंधविश्वास है।

लेकिन Apni Vani आज आपको इस नियम के पीछे का वह हैरान कर देने वाला वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक सच बताएगा, जिसे जानकर आप भी कहेंगे कि हमारे पूर्वजों का ज्ञान आज की साइंस से बहुत आगे था। इसके अलावा हम यह भी डिकोड करेंगे कि आखिर ’16 सोमवार’ का व्रत सावन से ही क्यों शुरू किया जाता है!

आयुर्वेद का गहरा विज्ञान और कमज़ोर पाचन तंत्र

हिंदू धर्म की जड़ें बहुत गहराई से विज्ञान और आयुर्वेद से जुड़ी हुई हैं। सावन का महीना ठीक उस समय आता है जब भारत में मानसून अपने चरम पर होता है। आयुर्वेद के अनुसार, इस मौसम में हमारे शरीर में प्राकृतिक रूप से एक बड़ा बदलाव होता है। लगातार बारिश और कम धूप मिलने के कारण वातावरण में वात दोष बढ़ जाता है।

इसका सीधा असर हमारी जठराग्नि पर पड़ता है, जिससे हमारा मेटाबॉलिज्म बहुत धीमा और कमज़ोर हो जाता है। नॉन-वेज यानी मांसाहारी भोजन और बहुत ज्यादा मसालेदार खाना पचने में बेहद भारी होता है। जब आपका पाचन तंत्र पहले से ही कमज़ोर हो, और आप उसे पचाने के लिए भारी नॉन-वेज दे दें, तो शरीर में जहर जमा होने लगता है, जिससे गंभीर बीमारियां हो सकती हैं।

जलजनित बीमारियां और जीवों का प्रजनन काल

बारिश के इस मौसम में पानी सबसे ज्यादा प्रदूषित होता है, जिससे डायरिया, पीलिया और टाइफाइड जैसी जलजनित बीमारियों का खतरा बहुत बढ़ जाता है। खासकर समुद्री भोजन इस मौसम में हानिकारक बैक्टीरिया का सबसे बड़ा घर बन जाता है। इसके अलावा, एक बहुत बड़ा इकोलॉजिकल कारण भी है। सावन का महीना ज़्यादातर जानवरों, मछलियों और जलीय जीवों का ‘ब्रीडिंग सीजन’ (प्रजनन काल) होता है। जीवों के पेट में उस वक्त अंडे होते हैं।

ऐसे में उनका शिकार करना न सिर्फ प्रकृति के चक्र को बिगाड़ता है, बल्कि उस समय उनके मांस का सेवन करना इंसानी शरीर के हॉर्मोन्स के लिए भी बहुत नुकसानदायक साबित होता है। यही वजह है कि हमारे पूर्वजों ने धर्म का सहारा लेकर सावन में पूरी तरह से शाकाहारी और हल्का भोजन (जैसे सूप, फल, और सब्जियां) खाने का नियम बनाया, ताकि हम खुद को डिटॉक्स कर सकें।

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क्या है ’16 सोमवार’ (Solah Somwar) का असली सच और महत्व?

अब आते हैं उस सवाल पर जो अक्सर मन में उठता है कि जब सावन के महीने में सिर्फ 4 या 5 सोमवार ही आते हैं (इस बार 2026 में 4 सावन सोमवार हैं- 3, 10, 17 और 24 अगस्त), तो फिर ’16 सोमवार’ का व्रत सावन से ही क्यों शुरू किया जाता है?

धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सोमवार का दिन विशेष रूप से भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है। ऐसी मान्यता है कि स्वयं माता पार्वती ने शिव जी को पति रूप में पाने के लिए सावन के महीने से ही कठोर तपस्या और 16 सोमवार के व्रत की शुरुआत की थी।

चूंकि सावन शिव का सबसे प्रिय महीना है और इस दौरान की गई पूजा का फल कई गुना बढ़ जाता है, इसलिए किसी भी बड़ी मनोकामना के लिए 16 सोमवार के व्रत की शुरुआत करने का सबसे शुभ समय सावन का पहला सोमवार ही माना जाता है। भक्त यहाँ से संकल्प लेते हैं और लगातार 16 हफ्तों तक इस व्रत को पूरी श्रद्धा से निभाते हैं।

Apnivani की बात

सावन सिर्फ जल चढ़ाने का महीना नहीं है; यह शरीर, मन और प्रकृति के साथ हमारे तालमेल को रीसेट करने का एक पूरा वैज्ञानिक पैकेज है। उपवास और सात्विक भोजन हमें शारीरिक रूप से मज़बूत और मानसिक रूप से शांत बनाते हैं।

अब आप बेबाक होकर बताइये: क्या आपको लगता है कि हमारी पुरानी धार्मिक परंपराओं को अगर आज के युवाओं को विज्ञान (Science) से जोड़कर समझाया जाए, तो वे इसका ज़्यादा पालन करेंगे? अपनी बेबाक राय हमें नीचे कमेंट्स में ज़रूर दें!

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History of Yoga and International Yoga Day: क्या योग सिर्फ एक कसरत है? जानिए इसका 5000 साल पुराना इतिहास और ‘योग दिवस’ शुरू होने के सबसे बड़े रहस्य

History of Yoga and International Yoga Day

आज 21 जून है और दुनिया भर के करोड़ों लोग अपनी चटाई बिछाकर एक साथ गहरी सांसें ले रहे हैं। आज का दिन भारत के लिए बेहद गर्व का दिन होता है क्योंकि ‘अंतरराष्ट्रीय योग दिवस’ हमारी ही संस्कृति की देन है। लेकिन आज की इस आधुनिक और भागदौड़ भरी जिंदगी में कई लोगों को लगता है कि योग सिर्फ शरीर को अलग-अलग दिशाओं में मोड़ने या वजन कम करने की एक साधारण सी कसरत है।

अगर आप भी ऐसा सोचते हैं, तो आज आपको अपनी यह सोच बदलनी पड़ेगी। ‘Apni Vani’ की इस विस्तृत और खास रिपोर्ट में आइए उस सफर पर चलते हैं जहां से योग की शुरुआत हुई और जानते हैं कि आखिर संयुक्त राष्ट्र को इसके लिए एक खास दिन क्यों मुकर्रर करना पड़ा।

आखिर योग क्या है और क्या यह सिर्फ एक कसरत है?

सबसे पहले इस सबसे बड़े भ्रम को तोड़ना जरूरी है कि योग जिम में की जाने वाली कोई आम एक्सरसाइज है। ‘योग’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के ‘युज’ धातु से हुई है। इसका सीधा और शाब्दिक अर्थ होता है ‘जुड़ना’ या ‘मिलन’। यह केवल शरीर की मांसपेशियों को खींचने की कला नहीं है, बल्कि यह आपकी व्यक्तिगत चेतना (आत्मा) का सार्वभौमिक चेतना (परमात्मा) के साथ मिलन है। जब आप जिम जाते हैं, तो आप केवल अपने भौतिक शरीर पर काम करते हैं।

लेकिन जब आप योग करते हैं, तो आप अपने शरीर, मन, भावनाओं और अपनी सांसों को एक साथ एक ही लय में लाते हैं। महर्षि पतंजलि ने अपने ‘योग सूत्र’ में इसे बहुत स्पष्ट रूप से बताया है कि योग मन की वृत्तियों (विचारों के शोर) को शांत करने का एक अत्यंत सूक्ष्म विज्ञान है।

हजारों साल पुराना है इसका स्वर्णिम इतिहास

योग का इतिहास किसी एक या दो सदी का नहीं, बल्कि लगभग पांच हजार साल से भी ज्यादा पुराना है। भारतीय पौराणिक कथाओं और ग्रंथों के अनुसार, भगवान शिव को सबसे पहला योगी यानी ‘आदियोगी’ माना जाता है। कहते हैं कि शिव ने ही हिमालय की कांति सरोवर झील के किनारे अपने सात शिष्यों (सप्तर्षियों) को योग का यह दिव्य ज्ञान दिया था।

इसके बाद अगर हम ऐतिहासिक और पुरातात्विक सबूतों की बात करें, तो सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई में ऐसी कई मुहरें और मूर्तियां मिली हैं, जिनमें इंसान को योग और ध्यान की मुद्राओं में बैठे हुए दिखाया गया है। समय के साथ यह ज्ञान गुरु-शिष्य परंपरा के जरिए आगे बढ़ा और बाद में महर्षि पतंजलि ने इसे लिखित रूप देकर पूरी दुनिया के लिए सुलभ बना दिया।

कैसे शुरू हुआ ‘अंतरराष्ट्रीय योग दिवस’ मनाने का सफर?

अब सवाल यह उठता है कि हजारों साल पुरानी इस विधा के लिए अचानक एक ‘विश्व दिवस’ मनाने की जरूरत क्यों और कैसे महसूस हुई। इस ऐतिहासिक बदलाव की नींव सितंबर 2014 में रखी गई थी। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने ऐतिहासिक भाषण के दौरान दुनिया के सामने अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने का प्रस्ताव रखा था।

उन्होंने दुनिया को समझाया था कि योग जलवायु परिवर्तन से लड़ने और इंसानी भलाई का सबसे बड़ा हथियार बन सकता है। भारत के इस प्रस्ताव का असर इतना जादुई था कि संयुक्त राष्ट्र के 175 सदस्य देशों ने बिना किसी मतदान के इस प्रस्ताव को भारी समर्थन के साथ स्वीकार कर लिया। यह अपने आप में एक विश्व रिकॉर्ड था। इसके बाद 11 दिसंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र ने आधिकारिक तौर पर इसे वैश्विक मंजूरी दे दी।

21 जून की तारीख ही क्यों चुनी गई?

इस दिन को चुनने के पीछे भी एक बहुत बड़ा खगोलीय और आध्यात्मिक विज्ञान छिपा हुआ है। उत्तरी गोलार्ध में 21 जून साल का सबसे लंबा दिन होता है। इसे ग्रीष्म संक्रांति भी कहा जाता है। भारतीय परंपरा में संक्रांति के बाद सूर्य दक्षिणायन हो जाता है, और यह समय आध्यात्मिक सिद्धियों को प्राप्त करने और योग विद्या की शुरुआत करने के लिए सबसे ज्यादा शुभ माना जाता है। इसी प्राकृतिक और आध्यात्मिक महत्व को देखते हुए 21 जून को योग दिवस के लिए मुकर्रर किया गया था। साल 2015 में दुनिया ने अपना पहला अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया था।

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क्या इसे पूरी दुनिया मानती है या कुछ देश विरोध करते हैं?

यह एक बहुत ही दिलचस्प सवाल है। जब इसे वैश्विक स्तर पर लागू किया गया था, तब शुरुआत में कुछ धार्मिक कट्टरपंथियों और रूढ़िवादी समूहों ने इसका यह कहकर विरोध किया था कि यह हिंदू धर्म का हिस्सा है। कई लोगों ने ‘सूर्य नमस्कार’ जैसी क्रियाओं पर आपत्ति जताई थी। लेकिन सच्चाई यह है कि योग किसी भी धर्म से नहीं जुड़ा है; यह गुरुत्वाकर्षण के नियम की तरह ही एक विशुद्ध विज्ञान है। आज की तारीख में शायद ही कोई ऐसा देश हो जहां योग न किया जाता हो।

संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों में से लगभग सभी इसे किसी न किसी रूप में मनाते हैं। यहां तक कि सऊदी अरब जैसे कट्टर इस्लामिक देश ने भी हाल ही के वर्षों में योग को आधिकारिक रूप से एक ‘खेल गतिविधि’ के रूप में मान्यता दे दी है और वहां भी महिलाएं खुलेआम योग का अभ्यास कर रही हैं।

Apnivani की बात

योग भारत का वह अमूल्य उपहार है जिसने बिना किसी हथियार या युद्ध के पूरी दुनिया को अपना दीवाना बना लिया है। यह हमें सिखाता है कि शांति और स्वास्थ्य किसी बाजार में नहीं बिकते, बल्कि वे हमारे भीतर ही मौजूद हैं। आज के इस तनाव भरे और डिजिटल युग में, योग खुद से दोबारा जुड़ने का सबसे खूबसूरत रास्ता है।

अगर आपने अभी तक अपने जीवन में इसे शामिल नहीं किया है, तो आज 21 जून के इस खास दिन से बेहतर और कौन सा मौका हो सकता है? इस गहरी और ज्ञानवर्धक जानकारी को अपने सभी परिवार वालों और दोस्तों के साथ व्हाट्सएप पर जरूर शेयर करें, ताकि वे भी भारत की इस महान विरासत का असली मतलब समझ सकें।

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Shigella Outbreak Kerala: कोझिकोड में ‘शिगेलोसिस’ का कहर! 3 साल की बच्ची की मौत से मचा हड़कंप, जानिए इस जानलेवा संक्रमण की सबसे जरूरी बातें

Shigella Outbreak Kerala

भारत के खूबसूरत राज्य केरल से इन दिनों एक बेहद डराने वाली स्वास्थ्य रिपोर्ट सामने आ रही है। कोझिकोड जिले के लोग इन दिनों एक अजीब से खौफ के साये में जी रहे हैं। इस खौफ का नाम है ‘शिगेलोसिस’ (Shigellosis)। यह एक ऐसा खतरनाक और संक्रामक बैक्टीरियल संक्रमण है जिसने अचानक से दस्तक देकर पूरे इलाके की स्वास्थ्य व्यवस्था की नींद उड़ा दी है। ‘Apni Vani’ की इस विस्तृत स्वास्थ्य रिपोर्ट में आइए एक कहानी की तरह समझते हैं कि कैसे एक छोटे से गांव से उठी यह बीमारी अब पूरे राज्य के लिए अलर्ट बन गई है।

पेरुवायल गांव की त्रासदी और एक मासूम की दर्दनाक मौत

इस पूरी त्रासदी और संक्रमण का मुख्य केंद्र कोझिकोड जिले का एक छोटा सा गांव ‘पेरुवायल’ (Peruvayal) बना हुआ है। मार्च 2026 के इसी महीने में इस गांव के अंदर अचानक से एक के बाद एक लोग रहस्यमयी तरीके से बीमार पड़ने लगे। पेट दर्द और दस्त की शिकायत लेकर अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों की लाइन लग गई। देखते ही देखते स्वास्थ्य विभाग के पास शिगेलोसिस के 63 मामले सामने आ गए।

लेकिन पूरे इलाके में मातम और दहशत का असली माहौल तब छा गया, जब इस जानलेवा संक्रमण की चपेट में आकर एक 3 साल की मासूम बच्ची ने दम तोड़ दिया। इतनी कम उम्र में इस बीमारी के इतने घातक साबित होने से वहां के माता-पिता अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर बेहद डरे हुए हैं।

एक्शन में स्वास्थ्य विभाग और पानी की सघन जांच

बच्ची की दर्दनाक मौत और लगातार बढ़ते मरीजों की संख्या को देखते हुए केरल का स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन तुरंत अलर्ट मोड पर आ गया। पूरे कोझिकोड और खासकर पेरुवायल के आसपास मेडिकल सर्विलांस यानी निगरानी को बहुत ज्यादा बढ़ा दिया गया है। डॉक्टरों और जांच अधिकारियों की टीमें दिन-रात यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि आखिर इस गांव में ऐसा कौन सा दूषित कुआं या जल स्रोत है, जहां से यह जानलेवा बैक्टीरिया लोगों के घरों तक पहुंच रहा है। अस्पतालों में जीवन रक्षक दवाओं और ओआरएस (ORS) का स्टॉक बढ़ा दिया गया है।

आखिर क्या है यह जानलेवा ‘शिगेलोसिस’ संक्रमण?

अब आपके मन में यह सवाल जरूर आ रहा होगा कि आखिर यह ‘शिगेलोसिस’ है क्या जिसने इतनी तबाही मचा रखी है। मेडिकल विज्ञान की भाषा में समझें तो यह ‘शिगेला’ नाम के बैक्टीरिया से होने वाला आंतों का एक बेहद गंभीर संक्रमण है। यह बैक्टीरिया इतना ज्यादा खतरनाक और आसानी से फैलने वाला है कि इसकी बहुत ही मामूली सी मात्रा (सिर्फ 10 से 100 बैक्टीरिया) भी किसी अच्छे-भले स्वस्थ इंसान को बिस्तर पर गिरा सकती है। यह अदृश्य दुश्मन मुख्य रूप से गंदे और दूषित पानी या फिर बाहर के अनहाइजीनिक भोजन के जरिए इंसानों के पेट में पहुंचता है और वहां तेजी से अपनी संख्या बढ़ाने लगता है।

संक्रमण के वो खतरनाक लक्षण जिन्हें पहचानना है जरूरी

इस बीमारी के लक्षण इतने स्पष्ट और तकलीफदेह होते हैं कि इन्हें नजरअंदाज करना जान पर भारी पड़ सकता है। संक्रमण के शरीर में प्रवेश करने के एक या दो दिन बाद ही मरीज को सबसे पहले खूनी दस्त शुरू हो जाते हैं, जो इसका सबसे बड़ा और खतरनाक संकेत है। इसके साथ ही मरीज का शरीर तेज बुखार से तपने लगता है और उसे ठंड के साथ कंपकंपी महसूस होती है। पेट में भयंकर दर्द, मरोड़ और लगातार उल्टी होने से शरीर पूरी तरह टूट जाता है। खासकर छोटे बच्चों और बुजुर्गों में यह सारे लक्षण इतनी तेजी से शरीर का पानी सुखा देते हैं कि भयंकर डिहाइड्रेशन पैदा हो जाता है, जो अंततः जानलेवा साबित होता है।

Shigella Outbreak Kerala
Credit – Ei Samay

बचाव का सिर्फ एक ही मंत्र

इतनी खतरनाक बीमारी होने के बावजूद, थोड़ी सी सतर्कता और साफ-सफाई से इस जानलेवा बैक्टीरिया को अपने घर में घुसने से रोका जा सकता है। चूंकि यह गंदगी और दूषित पानी से फैलता है, इसलिए सबसे जरूरी है कि आप और आपका परिवार केवल अच्छी तरह उबला हुआ या फिल्टर किया हुआ साफ पानी ही पिएं। शौच के बाद, बच्चों का डायपर बदलने के बाद और खाना बनाने या खाने से पहले अपने हाथों को साबुन से अच्छी तरह धोने की आदत डालें।

बाहर के खुले और सड़क किनारे बिकने वाले खाने से पूरी तरह बचें और घर का बना ताजा व गर्म भोजन ही करें। सब्जियों और फलों को भी पकाने या खाने से पहले साफ पानी से धोना बहुत जरूरी है।

Apnivani की बात

केरल के कोझिकोड का यह संकट हम सभी के लिए एक बहुत बड़ी और स्पष्ट चेतावनी है कि जलजनित बीमारियों को मौसम के बदलाव के समय कभी हल्के में नहीं लेना चाहिए। अगर आपके घर में किसी को भी लगातार दस्त, पेट दर्द या तेज बुखार की शिकायत हो, तो घरेलू नुस्खों में अपना कीमती समय बर्बाद करने के बजाय तुरंत किसी अच्छे डॉक्टर के पास जाएं। आपकी थोड़ी सी जागरूकता और साफ-सफाई आपके परिवार की जान बचा सकती है।

इस जरूरी हेल्थ अलर्ट को अपने परिवार और दोस्तों के व्हाट्सएप ग्रुप्स में तुरंत शेयर करें ताकि सभी इस नए संक्रमण को लेकर जागरूक हो सकें!

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