भारतीय राजनीति और न्यायपालिका के इतिहास में 4 फरवरी 2026 की तारीख स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गई है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक ऐसा कदम उठाया है जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने की थी। ममता बनर्जी ने न केवल एक राजनेता के तौर पर, बल्कि एक पेशेवर वकील के रूप में सुप्रीम कोर्ट के गलियारों में कदम रखकर सबको चौंका दिया है। वह भारत की पहली ऐसी मुख्यमंत्री बन गई हैं, जिन्होंने पद पर रहते हुए खुद अपना केस लड़ने के लिए अदालत से अनुमति मांगी और दलीलें पेश कीं।

ममता बनर्जी का ‘वकील’ अवतार: 23 साल बाद काला गाउन
ममता बनर्जी केवल एक राजनेता नहीं हैं, बल्कि उनके पास जोगेश चंद्र चौधरी लॉ कॉलेज, कलकत्ता से कानून की डिग्री भी है। हालांकि, राजनीति की व्यस्तताओं के कारण उन्होंने आखिरी बार साल 2003 में वकालत की थी। लगभग 23 साल बाद, जब बंगाल के अस्तित्व और आगामी 2026 विधानसभा चुनावों की निष्पक्षता पर सवाल उठा, तो ‘दीदी’ ने खुद मोर्चा संभालने का फैसला किया।
सुप्रीम कोर्ट के कोर्ट रूम नंबर 1 में जब ममता बनर्जी काली शॉल ओढ़े दाखिल हुईं, तो वहां मौजूद वरिष्ठ वकील और जज भी उनकी इस हिम्मत को देख हैरान रह गए। उन्होंने चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच के सामने इंटरलोक्यूटरी एप्लीकेशन दाखिल की और व्यक्तिगत रूप से बहस करने की अनुमति मांगी, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।
क्या है SIR विवाद, जिसके लिए खुद कोर्ट पहुंचीं सीएम?
इस पूरी कानूनी लड़ाई की जड़ में है चुनाव आयोग का SIR (Special Intensive Revision) आदेश। ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग के 24 जून और 27 अक्टूबर 2025 के आदेशों को चुनौती दी है।
SIR (विशेष गहन समीक्षा) एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें चुनाव आयोग घर-घर जाकर मतदाता सूची का सत्यापन करता है। ममता बनर्जी का तर्क है कि 2026 के विधानसभा चुनावों के लिए 2025 की मौजूदा मतदाता सूची ही आधार होनी चाहिए। उनका आरोप है कि SIR की आड़ में लाखों गरीब, ग्रामीण और अल्पसंख्यक मतदाताओं के नाम काटे जा रहे हैं। अदालत में उन्होंने भावुक होते हुए कहा, “मैं यहां केवल एक मुख्यमंत्री के तौर पर नहीं, बल्कि उन लाखों लोगों की आवाज बनकर आई हूं जिनका वोटिंग अधिकार खतरे में है।
सियासी गलियारों में हलचल
ममता बनर्जी के इस कदम ने देशभर की राजनीति में हलचल मचा दी है। जहां तृणमूल कांग्रेस (TMC) इसे ‘संघर्ष की पराकाष्ठा’ बता रही है, वहीं विपक्षी दल इसे 2026 के चुनावों से पहले एक ‘पॉलिटिकल मास्टरस्ट्रोक’ मान रहे हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि एक सिटिंग सीएम का कोर्ट में जिरह करना संवैधानिक रूप से मान्य तो है, लेकिन यह बहुत ही दुर्लभ है। यह कदम यह संदेश देता है कि ममता बनर्जी अपनी लड़ाई के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं।

SIR का महत्व और आम जनता पर असर
चुनाव आयोग के अनुसार, SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को ‘शुद्ध’ करना है, ताकि फर्जी वोटिंग रोकी जा सके। इसमें बीएलओ (BLO) घर-घर जाकर फॉर्म 6, 7 और 8 के जरिए डेटा अपडेट करते हैं। हालांकि, बंगाल जैसे राज्य में, जहां पहचान और नागरिकता के मुद्दे हमेशा गर्म रहते हैं, वहां इस प्रक्रिया को लेकर ममता बनर्जी की चिंताएं गहरी हैं। यदि सुप्रीम कोर्ट उनकी याचिका पर SIR को रोकने का आदेश देता है, तो यह आगामी चुनावों की पूरी रूपरेखा बदल सकता है।
इतिहास के पन्नों में ममता
ममता बनर्जी का यह वकील वाला रूप यह साबित करता है कि वह चुनौतियों से डरने वाली नेता नहीं हैं। चाहे सड़क का संघर्ष हो या सुप्रीम कोर्ट की कानूनी पेचीदगियां, वह हर मोर्चे पर खुद लड़ने का माद्दा रखती हैं। यह मामला न केवल 2026 के चुनावों के भविष्य को तय करेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मिसाल पेश करेगा कि न्याय की लड़ाई कैसे लड़ी जाती है।







