Opposition Role India: टी-शर्ट उतारकर प्रदर्शन! विपक्ष की 3 गलतियां जो देश को कर रहीं शर्मसार

Opposition Role India

लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष (Opposition) का होना बहुत जरूरी है। विपक्ष का काम सत्ताधारी पार्टी की गलतियों पर सवाल उठाना, महंगाई पर बात करना और जनता की आवाज बनना है। लेकिन एक आम हिंदुस्तानी के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या सरकार का विरोध करते-करते हमारे देश का विपक्ष खुद ‘देश का विरोध’ करने लगा है?

हाल ही में दिल्ली के भारत मंडपम में चल रहे ग्लोबल ‘इंडिया AI इम्पैक्ट समिट 2026’ में इंडियन यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने टी-शर्ट उतारकर (Shirtless) प्रदर्शन किया। इस घटना ने सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या विरोध जताने के लिए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपने ही देश की फजीहत कराना सही है? आज ‘ApniVani’ के इस विशेष विश्लेषण में हम विपक्ष की उन 3 घटनाओं पर नजर डालेंगे, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को असहज किया है।

Shirtless in Ai Summit
The Indian Express

AI समिट में ‘शर्टलेस’ प्रदर्शन: मंच अंतरराष्ट्रीय, लेकिन राजनीति लोकल

भारत मंडपम में आयोजित AI इम्पैक्ट समिट एक बड़ा ग्लोबल इवेंट था, जहां फ्रांस के राष्ट्रपति समेत दुनियाभर के दिग्गज टेक लीडर्स और राष्ट्रप्रमुख हिस्सा ले रहे थे। इसी बीच, यूथ कांग्रेस के कुछ कार्यकर्ता वहां पहुंचे और अपनी शर्ट उतारकर प्रधानमंत्री के खिलाफ नारे लगाने लगे। प्रदर्शनकारियों ने “PM is compromised” के नारे लगाए और भारत-अमेरिका ट्रेड डील का विरोध किया।
आलोचकों और सत्ता पक्ष का कहना है कि जब विदेशी मेहमान भारत की तकनीकी ताकत देखने आए हों, वहां ‘टॉपलेस’ (Topless) और ‘ब्रेनलेस’ होकर हंगामा करना देश की बदनामी कराता है। बीजेपी के कई नेताओं ने इसे ‘राष्ट्रीय शर्म’ (National Shame) करार दिया है।

Rahul Gandhi

सर्जिकल स्ट्राइक और पाकिस्तान पर बयानबाजी

यह पहली बार नहीं है जब घरेलू राजनीति के कारण देश की छवि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नुकसान पहुंचा हो। जब भी देश की सेना कोई बड़ा कदम उठाती है, तो राजनीतिक बयानबाजी शुरू हो जाती है। चाहे वह पाकिस्तान में घुसकर की गई सर्जिकल स्ट्राइक (Surgical Strike) हो या एयर स्ट्राइक, मुख्य विपक्षी दल के कुछ नेताओं ने सरकार से ‘सबूत’ मांग लिए थे।

अंतरराष्ट्रीय मंचों और पाकिस्तानी मीडिया में इसका सीधा संदेश यह गया कि भारत के अंदर ही लोग अपनी सेना के दावों पर सवाल उठा रहे हैं। सरकार को घेरने के चक्कर में ऐसे बेतुके बयान सीधे तौर पर दुश्मन देश के प्रोपेगेंडा को मजबूत करते हैं।

China and Arunachal Pradesh Dispute

चीन और अरुणाचल प्रदेश: दुनिया के सामने कमजोर पक्ष रखना

विपक्ष की भूमिका पर तीसरा बड़ा सवाल चीन (China) और सीमा विवाद (Border Dispute) को लेकर उठता है। कई बार विपक्षी नेताओं ने विदेशी मीडिया के सामने या संसद में यह दावा किया है कि चीन ने हमारी जमीन पर कब्जा कर लिया है या अरुणाचल प्रदेश में गांव बसा लिए हैं। जानकारों का मानना है कि कूटनीति (Diplomacy) का पहला नियम है कि बाहरी खतरों के खिलाफ पूरा देश एकजुट दिखना चाहिए।

जब देश का ही विपक्ष दुनिया के सामने ऐसी बातें करता है, तो चीन इसी का फायदा उठाकर अपनी विस्तारवादी नीतियों को सही ठहराने की कोशिश करता है। घरेलू राजनीति के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा (National Security) पर ऐसे बयान देश के मनोबल को गिराते हैं।

AI Summit India

ApniVani की बात

लोकतंत्र में विपक्ष के बिना सरकार तानाशाही कर सकती है, इसलिए विपक्ष का मजबूत होना जरूरी है। विपक्ष को पूरी आजादी है कि वह बेरोजगारी, महंगाई और घरेलू मुद्दों पर सड़क से संसद तक सरकार की ईंट से ईंट बजा दे।

लेकिन जब बात AI समिट जैसे ग्लोबल इवेंट्स की हो, या सीमा पर खड़े दुश्मनों की हो, तो वहां ‘पार्टी लाइन’ से ऊपर उठकर ‘नेशन फर्स्ट’ (Nation First) की सोच होनी चाहिए। एक आम हिंदुस्तानी भी यही चाहता है कि विपक्ष तार्किक (Logical) मुद्दे उठाए, न कि केवल सुर्खियां बटोरने के लिए टी-शर्ट उतारकर देश की जग-हंसाई कराए।

आपकी राय: क्या आपको भी लगता है कि AI समिट जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर किया गया यह प्रदर्शन गलत था, या विपक्ष के पास अपनी बात रखने का यही एक तरीका बचा है? कमेंट बॉक्स में अपनी बेबाक राय जरूर लिखें।

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Mamata Banerjee’s historic move: क्या पहली सिटिंग सीएम बनेंगी सुप्रीम कोर्ट में वकील? जानें पूरा कानूनी विवाद

Mamata Banerjee's historic move

भारतीय राजनीति और न्यायपालिका के इतिहास में 4 फरवरी 2026 की तारीख स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गई है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक ऐसा कदम उठाया है जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने की थी। ममता बनर्जी ने न केवल एक राजनेता के तौर पर, बल्कि एक पेशेवर वकील के रूप में सुप्रीम कोर्ट के गलियारों में कदम रखकर सबको चौंका दिया है। वह भारत की पहली ऐसी मुख्यमंत्री बन गई हैं, जिन्होंने पद पर रहते हुए खुद अपना केस लड़ने के लिए अदालत से अनुमति मांगी और दलीलें पेश कीं।

Mamata Banerjee
Mamata Banerjee’s historic move

ममता बनर्जी का ‘वकील’ अवतार: 23 साल बाद काला गाउन

ममता बनर्जी केवल एक राजनेता नहीं हैं, बल्कि उनके पास जोगेश चंद्र चौधरी लॉ कॉलेज, कलकत्ता से कानून की डिग्री भी है। हालांकि, राजनीति की व्यस्तताओं के कारण उन्होंने आखिरी बार साल 2003 में वकालत की थी। लगभग 23 साल बाद, जब बंगाल के अस्तित्व और आगामी 2026 विधानसभा चुनावों की निष्पक्षता पर सवाल उठा, तो ‘दीदी’ ने खुद मोर्चा संभालने का फैसला किया।

सुप्रीम कोर्ट के कोर्ट रूम नंबर 1 में जब ममता बनर्जी काली शॉल ओढ़े दाखिल हुईं, तो वहां मौजूद वरिष्ठ वकील और जज भी उनकी इस हिम्मत को देख हैरान रह गए। उन्होंने चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच के सामने इंटरलोक्यूटरी एप्लीकेशन दाखिल की और व्यक्तिगत रूप से बहस करने की अनुमति मांगी, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।

क्या है SIR विवाद, जिसके लिए खुद कोर्ट पहुंचीं सीएम?

इस पूरी कानूनी लड़ाई की जड़ में है चुनाव आयोग का SIR (Special Intensive Revision) आदेश। ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग के 24 जून और 27 अक्टूबर 2025 के आदेशों को चुनौती दी है।

SIR (विशेष गहन समीक्षा) एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें चुनाव आयोग घर-घर जाकर मतदाता सूची का सत्यापन करता है। ममता बनर्जी का तर्क है कि 2026 के विधानसभा चुनावों के लिए 2025 की मौजूदा मतदाता सूची ही आधार होनी चाहिए। उनका आरोप है कि SIR की आड़ में लाखों गरीब, ग्रामीण और अल्पसंख्यक मतदाताओं के नाम काटे जा रहे हैं। अदालत में उन्होंने भावुक होते हुए कहा, “मैं यहां केवल एक मुख्यमंत्री के तौर पर नहीं, बल्कि उन लाखों लोगों की आवाज बनकर आई हूं जिनका वोटिंग अधिकार खतरे में है।

सियासी गलियारों में हलचल

ममता बनर्जी के इस कदम ने देशभर की राजनीति में हलचल मचा दी है। जहां तृणमूल कांग्रेस (TMC) इसे ‘संघर्ष की पराकाष्ठा’ बता रही है, वहीं विपक्षी दल इसे 2026 के चुनावों से पहले एक ‘पॉलिटिकल मास्टरस्ट्रोक’ मान रहे हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि एक सिटिंग सीएम का कोर्ट में जिरह करना संवैधानिक रूप से मान्य तो है, लेकिन यह बहुत ही दुर्लभ है। यह कदम यह संदेश देता है कि ममता बनर्जी अपनी लड़ाई के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं।

Mamata Banerjee
Mamata Banerjee’s historic move

SIR का महत्व और आम जनता पर असर

चुनाव आयोग के अनुसार, SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को ‘शुद्ध’ करना है, ताकि फर्जी वोटिंग रोकी जा सके। इसमें बीएलओ (BLO) घर-घर जाकर फॉर्म 6, 7 और 8 के जरिए डेटा अपडेट करते हैं। हालांकि, बंगाल जैसे राज्य में, जहां पहचान और नागरिकता के मुद्दे हमेशा गर्म रहते हैं, वहां इस प्रक्रिया को लेकर ममता बनर्जी की चिंताएं गहरी हैं। यदि सुप्रीम कोर्ट उनकी याचिका पर SIR को रोकने का आदेश देता है, तो यह आगामी चुनावों की पूरी रूपरेखा बदल सकता है।

इतिहास के पन्नों में ममता

ममता बनर्जी का यह वकील वाला रूप यह साबित करता है कि वह चुनौतियों से डरने वाली नेता नहीं हैं। चाहे सड़क का संघर्ष हो या सुप्रीम कोर्ट की कानूनी पेचीदगियां, वह हर मोर्चे पर खुद लड़ने का माद्दा रखती हैं। यह मामला न केवल 2026 के चुनावों के भविष्य को तय करेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मिसाल पेश करेगा कि न्याय की लड़ाई कैसे लड़ी जाती है।

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National Voters Day: सिर्फ 1 दिन के ‘बादशाह’ हैं आप! बंगाल की हिंसा और आपके वोट की ताकत का कड़वा सच

National Voters' Day

आज 25 जनवरी है मतलब ‘राष्ट्रीय मतदाता दिवस’ (National Voters’ Day)। सारे जगह आपको बताया जाएगा कि आप देश के मालिक हैं। टीवी पर बड़े-बड़े नेता कहेंगे कि “वोट आपका अधिकार है।” लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस उंगली पर स्याही लगवाकर आप सेल्फी पोस्ट करते हैं, उसकी असली ताकत क्या है? क्या हम वाकई लोकतंत्र के राजा हैं, या सिर्फ 5 साल में एक दिन के लिए ‘इस्तेमाल’ किए जाने वाले लोग?

आज इस विशेष रिपोर्ट में हम बात करेंगे वोट की ताकत की, उन लोगों की जो राजनीति से नफरत करते हैं, और बंगाल (Bengal) जैसे राज्यों के उस अजीब सच की जहाँ वोट देना ‘अधिकार’ नहीं, बल्कि ‘जान जोखिम’ में डालना बन गया है।

Suppressing Voters in Bengal

“मुझे राजनीति में इंटरेस्ट नहीं”—यह सबसे बड़ी बेवकूफी है

आजकल के युवाओं का सबसे कॉमन डायलॉग है— “यार, पॉलिटिक्स गंदी है, मुझे इसमें कोई इंटरेस्ट नहीं है।”

अगर आप भी ऐसा सोचते हैं, तो यह कड़वी बात सुन लीजिए: आप राजनीति में भाग लें या न लें, राजनीति आप में पूरी दिलचस्पी लेती है। जिस सड़क पर आप चलते हैं, उसका ठेका राजनीति तय करती है। जिस कॉलेज में आप पढ़ते हैं, उसकी फीस राजनीति तय करती है। आपकी गाड़ी का पेट्रोल और घर का राशन—सब कुछ राजनीति से जुड़ा है। अगर आप वोट नहीं देते, तो आपको शिकायत करने का भी कोई हक नहीं है। जब आप घर बैठते हैं, तो आप एक ‘गलत आदमी’ को चुनने में मदद कर रहे होते हैं।

प्लेटो ने कहा था— “राजनीति में भाग न लेने की सजा यह है कि आपको अपने से बुरे लोगों द्वारा शासित होना पड़ता है।”

5 साल के ‘नौकर’ और 1 दिन के ‘राजा’

हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना (Irony) यही है। जिस दिन चुनाव होता है, उस दिन बड़े से बड़ा नेता, जो 5 साल तक अपनी गाड़ी का शीशा नीचे नहीं करता, वो आपके पैरों में गिर जाता है। आपके सामने हाथ जोड़ता है, जाति-धर्म की दुहाई देता है, और दारू-मुर्गा भी बांटता है। क्यों? क्योंकि उसे पता है कि अगले 24 घंटे के लिए असली ‘बॉस’ आप हैं।

लेकिन सवाल यह है कि यह ताकत सिर्फ एक दिन क्यों?जैसे ही चुनाव खत्म होता है, वह नेता ‘राजा’ बन जाता है और जनता वापस ‘प्रजा’ बन जाती है। वोट की ताकत का यह असंतुलन हमें सोचना होगा। क्या हम सिर्फ एक दिन के मालिक हैं?

ECI chief Election commissioner -and others

बंगाल की हकीकत: जहाँ वोट देना ‘जुर्म’ बन जाता है

अब आते हैं सिक्के के दूसरे पहलू पर। हम कहते हैं “वोट देना हमारा हक है,” लेकिन क्या भारत के हर कोने में यह हक सुरक्षित है? पश्चिम बंगाल (West Bengal) के पिछले कुछ चुनावों को याद कीजिए। क्या मंजर था? वोट देने जाने वालों को डराया गया। चुनाव के बाद हिंसा (Post-Poll Violence) हुई, घर जलाए गए, और महिलाओं के साथ बदसलूकी हुई। पंचायत चुनावों में तो मतपेटियां (Ballot Boxes) तक तालाब में फेंक दी गईं।

यह कैसा लोकतंत्र है जहाँ अपनी मर्जी का बटन दबाने पर जान का खतरा हो? सिर्फ बंगाल ही नहीं, बिहार और यूपी के कई बाहुबली इलाकों में भी आज भी ‘साइलेंट कैप्चरिंग’ होती है। जब तक हर नागरिक बिना डरे वोट नहीं डाल सकता, तब तक National Voters’ Day की बधाई देना बेमानी है। प्रशासन और चुनाव आयोग (ECI) दावा करते हैं कि चुनाव निष्पक्ष हैं, लेकिन जब एक गरीब आदमी को डंडे के जोर पर वोट डालने से रोका जाता है, तो लोकतंत्र मर जाता है।

सुधार कैसे आएगा?

सिर्फ कमियां गिनाने से कुछ नहीं होगा। अगर हमें इस सिस्टम को सुधारना है, तो हमें अपनी एक दिन की ताकत को 5 साल की ताकत में बदलना होगा।

  • NOTA का सही इस्तेमाल: अगर आपको कोई कैंडिडेट पसंद नहीं है, तो घर मत बैठिए। बूथ पर जाइए और NOTA (None of the Above) दबाइए। यह नेताओं के मुंह पर तमाचा है कि “तुम में से कोई भी मेरे लायक नहीं है।”
  • सवाल पूछना सीखें: चुनाव के बाद अपने पार्षद/विधायक को सोशल मीडिया पर टैग करके सवाल पूछिए। उन्हें याद दिलाइए कि वो मालिक नहीं, सेवक हैं।
  • डर से आजादी: बंगाल हो या बिहार, गुंडागर्दी तब तक चलती है जब तक शरीफ आदमी चुप रहता है। जब पूरा मोहल्ला या पूरा गांव एक साथ खड़ा हो जाएगा, तो किसी बाहुबली की हिम्मत नहीं होगी।

अपना हक खुद मांगना सीखो

आज 25 जनवरी है। आज शपथ लीजिए कि चाहे धूप हो, बारिश हो या लंबी लाइन—अगले चुनाव में आप वोट जरूर डालेंगे। याद रखिए, आपकी उंगली पर लगी वह नीली स्याही (Ink) सिर्फ एक निशान नहीं है, वह इस देश के भ्रष्ट सिस्टम के खिलाफ आपका सबसे बड़ा हथियार है। अगर आप आज चूक गए, तो अगले 5 साल तक रोने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा।

जागो मतदाता, जागो!

आपकी राय: क्या आपको लगता है कि भारत में ‘राइट टू रिकॉल’ (Right to Recall) यानी काम न करने पर नेता को हटाने का कानून होना चाहिए? कमेंट में अपनी राय जरूर दें।

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MGNREGA का नया नाम ‘जी राम जी’? जानिए 5 बड़े बदलाव और क्यों छिड़ा है ‘गांधी vs राम’ का विवाद!

MGNREGA

क्या ‘मनरेगा’ (MGNREGA) अब इतिहास बनने वाला है? क्या महात्मा गांधी का नाम हटाकर अब रोजगार गारंटी योजना में ‘राम’ का नाम जोड़ा जा रहा है? सोशल मीडिया और न्यूज़ में ये खबरें आग की तरह फैल रही हैं कि मोदी सरकार मनरेगा का नाम बदलकर ‘जी राम जी’ (G RAM G) कर रही है। यह खबर पूरी तरह गलत नहीं है, लेकिन इसमें एक गहरा पेंच है। सरकार एक नया बिल ला रही है— VB-G RAM G, जो पुरानी मनरेगा जगह लेगा।

लेकिन सवाल यह है कि क्या विकास के लिए नाम बदलना ज़रूरी है? और क्या एक सरकारी योजना में ऐसा नाम रखना जो किसी खास धर्म की याद दिलाए, हमारे सेक्युलर ढांचे (Secularism) के लिए सही है? आइए, इस रिपोर्ट में गहराई से जानते हैं।

क्या है असली खबर? (The Real News)

सबसे पहले फैक्ट चेक करते हैं। सरकार ने ‘मनरेगा’ (Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act) को खत्म करके उसकी जगह एक नया कानून लाने का प्रस्ताव रखा है।

MGNREGA

इस नए बिल का पूरा नाम है:

“Viksit Bharat – Guarantee for Rozgar and Ajeevika Mission (Gramin)”

इसका शॉर्ट फॉर्म या एक्रोनिम बन रहा है— VB-G RAM G।

हिंदी मीडिया और विपक्ष इसे ही ‘जी राम जी’ (G RAM G) कहकर बुला रहा है। तकनीकी रूप से इसका मतलब ‘ग्रामीण’ (Gramin) से हो सकता है, लेकिन इसका उच्चारण (Pronunciation) जानबूझकर ऐसा रखा गया है जो ‘जय राम जी’ जैसा सुनाई दे। यही विवाद की असली जड़ है।

नई योजना में क्या बदलेगा? (5 Key Changes)

सरकार का तर्क है कि यह सिर्फ नाम बदलना नहीं, बल्कि योजना का ‘अपग्रेड’ है। नए VB-G RAM G बिल में ये बड़े बदलाव प्रस्तावित हैं:

  • रोजगार के दिन बढ़े: मनरेगा में 100 दिन की गारंटी थी, नई योजना में इसे बढ़ाकर 125 दिन करने का प्रस्ताव है। यह मजदूरों के लिए अच्छी खबर है।
  • फंडिंग का नया गणित: पहले मजदूरी का 100% पैसा केंद्र सरकार देती थी। अब इसे 60:40 के अनुपात में बांटा जाएगा (60% केंद्र, 40% राज्य)। इससे गरीब राज्यों पर बोझ बढ़ सकता है।
  • खेती के समय ‘नो वर्क’: जब खेती का पीक सीजन (बुवाई/कटाई) होगा, तब इस योजना के तहत 60 दिनों तक काम बंद रखा जाएगा, ताकि किसानों को मजदूरों की कमी न हो।
  • फोकस एरिया: अब गड्ढे खोदने के बजाय 4 चीजों पर फोकस होगा— जल संरक्षण, ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर, आजीविका और आपदा प्रबंधन।
  • गांधी का नाम गायब: सबसे बड़ा बदलाव यह है कि योजना के टाइटल से ‘महात्मा गांधी’ का नाम हटा दिया गया है।

3. विवाद क्यों? ‘गांधी’ गए और ‘राम’ आए?

  • विपक्ष और आलोचक इस पर कड़ा सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि महात्मा गांधी ग्रामीण भारत और स्वावलंबन के प्रतीक थे। उनका नाम हटाना सिर्फ एक राजनीतिक कदम नहीं, बल्कि विचारधारा की लड़ाई है।
  • दूसरी तरफ, ‘G RAM G’ नाम का चुनाव संयोग नहीं लगता। भारत एक धर्मनिरपेक्ष (Secular) देश है। सरकारी योजनाओं के नाम ऐसे होने चाहिए जो हर धर्म और समुदाय के व्यक्ति को अपना लगें।
  • जब योजना का पैसा हर टैक्सपेयर (हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई) से आता है, तो नाम में ऐसा धार्मिक संकेत (Subtle Religious Hint) क्यों?
  • क्या ‘विकास’ के लिए किसी भगवान के नाम का सहारा लेना ज़रूरी है? आलोचकों का मानना है कि यह सेक्युलरिज्म को कमजोर करने की कोशिश है।

विकास ज़रूरी है या नाम बदलना? (The Big Question)

हमारा सबसे बड़ा सवाल यही है— हर जगह नाम बदलने की इतनी जल्दी क्यों है?

पिछले कुछ सालों में हमने शहरों, स्टेशनों और अब योजनाओं के नाम बदलते देखे हैं। सरकार का तर्क होता है ‘औपनिवेशिक मानसिकता’ (Colonial Mindset) को हटाना। लेकिन मनरेगा तो 2005 में बनी भारतीय योजना थी, इसमें गुलामी का कौन सा अंश था?

  • असली मुद्दे: मनरेगा में मजदूरों को समय पर पैसा नहीं मिलता, फंड की कमी रहती है और भ्रष्टाचार होता है।
  • ज़रूरत क्या थी: ज़रूरत थी सिस्टम को सुधारने की, मजदूरी बढ़ाने की और डिजिटल पेमेंट्स को आसान बनाने की।
  • हो क्या रहा है: पूरी एनर्जी ‘री-ब्रांडिंग’ (Rebranding) में खर्च हो रही है।

अगर हम काम पर फोकस करें, तो योजना का नाम ‘क ख ग’ भी हो, तो भी जनता खुश रहेगी। लेकिन अगर काम न हो, तो ‘स्वर्ग योजना’ नाम रखने से भी पेट नहीं भरेगा।

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क्या यह राजनीति है? (Political Angle)

इसे राजनीति से अलग करके देखना मुश्किल है। ‘जी राम जी’ जैसा नाम चुनाव और भावनाओं को ध्यान में रखकर बनाया गया लगता है।

  • ब्रांडिंग: मौजूदा सरकार हर चीज़ को ‘विकसित भारत’ और अपनी विचारधारा से जोड़ना चाहती है।
  • इतिहास मिटाना: आलोचकों का कहना है कि यह पुरानी सरकारों (विशेषकर कांग्रेस और गांधी परिवार) की विरासत को मिटाने का एक और प्रयास है।

लेकिन इस चक्कर में हम एक खतरनाक ट्रेंड सेट कर रहे हैं। अगर कल को दूसरी सरकार आई और उसने फिर नाम बदला, तो क्या देश का पैसा सिर्फ बोर्ड पेंट करने में ही खर्च होता रहेगा?

योजना में सुधार लेकिन?

VB-G RAM G बिल में 125 दिन रोजगार जैसे अच्छे कदम ज़रूर हैं, जिनका स्वागत होना चाहिए। लेकिन ‘महात्मा गांधी’ का नाम हटाना और ‘G RAM G’ जैसा विवादास्पद नाम रखना एक गैर-ज़रूरी कदम लगता है।

विकास का धर्म से कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए। सड़क, पानी और रोजगार का कोई धर्म नहीं होता। बेहतर होता कि सरकार इस ‘नेम-गेम’ (Name Game) में पड़ने के बजाय सिर्फ ‘work-game’ पर फोकस करती।

आपकी राय:

क्या आपको लगता है कि मनरेगा का नाम बदलना सही फैसला है? या हमें नाम के बजाय काम पर ध्यान देना चाहिए? कमेंट में अपनी राय ज़रूर लिखें! 👇

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