भेदभाव (Discrimination) एक अपराध है और इसे खत्म होना ही चाहिए। लेकिन क्या एक बुराई को खत्म करने के लिए दूसरी गलती करना सही है?
आज सुप्रीम कोर्ट ने UGC (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) के उन नए नियमों पर ‘स्टे’ (Stay)लगा दिया है, जो कॉलेज कैंपस में भेदभाव रोकने के लिए बनाए गए थे। सुनने में अजीब लग सकता है कि कोर्ट भेदभाव विरोधी कानून को क्यों रोकेगा? लेकिन असल वजह वह ‘असीमित शक्ति’ (Unlimited Power) है जो बिना किसी जवाबदेही के दी जा रही थी। आज के ब्लॉग में हम विश्लेषण करेंगे कि क्यों सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नियम बनाना ठीक है, लेकिन “कानून की आड़ में एकतरफा कार्रवाई” नहीं चलेगी।
वो 3 खतरनाक नियम/कमियां जिन पर कोर्ट ने लगाई रोक
सुप्रीम कोर्ट और छात्रों को मुख्य रूप से इन 3 बातों पर आपत्ति थी, जो नए ड्राफ्ट में शामिल थीं:
- सिर्फ एकतरफा शिकायत का अधिकार: नए नियमों के तहत सिर्फ आरक्षित वर्ग (SC/ST/OBC) के छात्र ही भेदभाव की शिकायत कर सकते थे। अगर किसी जनरल कैटेगरी के छात्र के साथ जाति के आधार पर बदसलूकी होती, तो उसके लिए शिकायत का कोई स्पष्ट रास्ता नहीं था।
- ‘दोषी मान लेने’ की जल्दबाजी (Presumption of Guilt): नियमों में कॉलेज प्रशासन पर दबाव था कि शिकायत मिलते ही सख्त कार्रवाई हो। इससे डर था कि बिना पूरी जांच किए, सिर्फ आरोप के आधार पर किसी प्रोफेसर या छात्र का करियर बर्बाद किया जा सकता है।
- झूठी शिकायत पर कोई सजा नहीं: सबसे बड़ी कमी यह थी कि अगर किसी ने रंजिश में आकर ‘फर्जी शिकायत’ (Fake Complaint) की, तो शिकायत करने वाले को क्या सजा मिलेगी, इसका कोई कड़ा प्रावधान नहीं था। यानी हथियार तो दे दिया, लेकिन सेफ्टी लॉक नहीं लगाया।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि यह नियम “Too Sweeping” (बहुत व्यापक) है और इसका इस्तेमाल न्याय के लिए कम और ‘बदला’ लेने के लिए ज्यादा हो सकता है।

अनलिमिटेड पावर: लोकतंत्र में कोई राजा नहीं
आपकी और हमारी सुरक्षा के लिए पुलिस है, लेकिन क्या पुलिस को यह पावर दी जा सकती है कि वह बिना सबूत किसी को भी जेल में डाल दे? नहीं। ठीक वैसे ही, UGC का यह नियम प्रशासन को अनलिमिटेड पावर दे रहा था।
चेक एंड बैलेंस (Checks and Balances): किसी भी कानून में ‘लिमिटेशन’ होनी चाहिए।
अगर किसी छात्र ने रंजिश में आकर प्रोफेसर या साथी छात्र पर झूठा आरोप लगा दिया, तो नए नियमों के तहत उसका करियर बर्बाद हो सकता था। सुप्रीम कोर्ट का संदेश साफ है— “आप एक वर्ग को बचाने के लिए दूसरे वर्ग को असुरक्षित नहीं छोड़ सकते।” न्याय का तराजू दोनों तरफ बराबर होना चाहिए।
अब वो दौर नहीं रहा (वक़्त बदल गया है)
हमें यह कड़वा सच स्वीकार करना होगा कि 2026 का भारत 1950 का भारत नहीं है। बेशक, जातिगत भेदभाव आज भी कुछ जगहों पर है और उसे कुचलना जरूरी है। लेकिन क्या हर सामान्य वर्ग (General Category) का छात्र अत्याचारी है? आज कॉलेज में पढ़ने वाला जनरल कैटेगरी का छात्र भी उसी बेंच पर बैठता है, उसी कैंटीन में खाता है।
ऐसे में, ऐसे कानून बनाना जो यह मानकर चलें कि “गलती हमेशा एक ही पक्ष की होगी”, समाज को जोड़ने के बजाय तोड़ने का काम करेगा।

असली मुद्दा: जाति या आर्थिक स्थिति?
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने फिर उस बहस को हवा दे दी है जिसे अक्सर दबा दिया जाता है। क्या अब वक्त आ गया है कि हम ‘जाति’ (Caste) से ऊपर उठकर ‘कमज़ोर’ (Weak) की मदद करें? एक गरीब जनरल छात्र और एक गरीब SC/ST छात्र—दोनों की समस्या ‘फीस’ और ‘किताबें’ हैं, जाति नहीं।
अगर UGC वाकई कैंपस का माहौल सुधारना चाहता है, तो उसे ऐसे नियम बनाने चाहिए जो Economically Backward (आर्थिक रूप से पिछड़े) छात्रों को ताकत दें, चाहे वे किसी भी धर्म या जाति के हों। सजा जाति देखकर नहीं, बल्कि गुनाह देखकर मिलनी चाहिए।
ApniVani की सोच (Final Verdict)
सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाकर यह साबित कर दिया है कि संविधान भावनाओं से नहीं, तर्कों से चलता है। नियम जरूरी हैं। सख्त नियम और भी जरूरी हैं। लेकिन वो नियम निष्पक्ष (Neutral) होने चाहिए। अगर हम किसी को ‘अनलिमिटेड पावर’ देंगे, तो कल उसका शिकार कोई बेगुनाह भी हो सकता है। यह रोक एक मौका है—UGC के लिए, ताकि वो दोबारा सोचे और ऐसा कानून लाए जो सबको सुरक्षा दे, किसी को डर नहीं।
आपकी राय: क्या आपको लगता है कि कॉलेज में झूठी शिकायतों के लिए भी सख्त सजा का प्रावधान होना चाहिए? कमेंट में अपनी राय जरूर लिखें।
