पश्चिम बंगाल की सत्ता का ताज किसके सिर सजेगा, इसका फैसला होने में अब बस कुछ ही घंटों का समय शेष है। 4 मई को होने वाली मतगणना (Counting) से पहले पूरे राज्य में सियासी पारा सातवें आसमान पर है। मैदान में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच सीधा और बेहद कड़ा मुकाबला देखा जा रहा है। अलग-अलग सर्वे और ज़मीनी रुझानों ने इस चुनाव को हाल के दशकों का सबसे रोमांचक ‘महामुकाबला’ बना दिया है।
बंगाल का रण: TMC और BJP के बीच ‘कांटे की टक्कर’
इस बार का बंगाल चुनाव केवल एक राज्य का चुनाव नहीं, बल्कि साख की लड़ाई बन चुका है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जहाँ अपने 15 साल के शासन को बरकरार रखते हुए ‘चौका’ मारने की तैयारी में हैं, वहीं बीजेपी ने ‘परिवर्तन’ के नारे के साथ पूरी ताकत झोंक दी है। ताज़ा आंकड़ों और सूत्रों के मुताबिक, राज्य की 294 सीटों में से किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत मिलते नहीं दिख रहा है। कुछ विश्लेषणों में टीएमसी को 122–141 सीटें मिलने का अनुमान है, जबकि बीजेपी 143–165 सीटों के साथ मामूली बढ़त बनाती दिख रही है। यह अंतर इतना कम है कि ‘किंगमेकर’ की भूमिका और निर्दलीयों का प्रभाव नतीजों को पलट सकता है।

किन मुद्दों ने पलटी बाजी: विकास बनाम भ्रष्टाचार
इस चुनाव में जनता के बीच कई गहरे मुद्दे हावी रहे। बीजेपी ने जहाँ संदेशखाली जैसी घटनाओं, भ्रष्टाचार और ‘सिंडिकेट राज’ को अपना मुख्य हथियार बनाया, वहीं ममता बनर्जी ने अपनी कल्याणकारी योजनाओं जैसे ‘लक्ष्मी भंडार’ और ‘कन्याश्री’ के दम पर महिला वोट बैंक को साधने की कोशिश की है। ग्रामीण बंगाल में आज भी ममता बनर्जी का जादू बरकरार दिख रहा है, लेकिन शहरी क्षेत्रों और मध्यम वर्ग के बीच बेरोजगारी और औद्योगिक विकास की कमी एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरी है। इसी ध्रुवीकरण ने मुकाबले को ‘टाइट फाइट’ में तब्दील कर दिया है।
4 मई की मतगणना: क्या कहते हैं चुनावी पंडित?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार जीत का अंतर बहुत कम रहने वाला है। अगर बीजेपी 148 के जादुई आंकड़े को पार करती है, तो यह बंगाल के इतिहास में एक युग का अंत और नई राजनीति की शुरुआत होगी। दूसरी ओर, अगर टीएमसी 140 के पार जाती है, तो यह साबित होगा कि बंगाल की जनता अभी भी ‘दीदी’ के नेतृत्व पर अटूट विश्वास रखती है। कांग्रेस और वाम दलों (Left Front) का प्रभाव इस बार भी सीमित नज़र आ रहा है, जिससे मुकाबला द्विध्रुवीय (Bipolar) हो गया है।
साइलेंट वोटर और महिला शक्ति का प्रभाव
बंगाल चुनाव में ‘साइलेंट वोटर’ हमेशा से एक पहेली रहे हैं। विशेषकर महिला मतदाताओं का झुकाव किस तरफ है, यह जीत-हार तय करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाएगा। तृणमूल कांग्रेस को उम्मीद है कि उनकी डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) योजनाएं महिलाओं को उनके पाले में रखेंगी। वहीं, बीजेपी को भरोसा है कि कानून-व्यवस्था और सुरक्षा के नाम पर महिलाएं बदलाव के लिए वोट करेंगी।

इंतज़ार है 4 मई का
फिलहाल, बंगाल की गलियों से लेकर सोशल मीडिया के गलियारों तक सिर्फ एक ही चर्चा है— ‘एबार के?’ (इस बार कौन?)। 4 मई की सुबह जब ईवीएम खुलेगी, तभी साफ होगा कि बंगाल की जनता ने ‘सोनार बांग्ला’ के सपने पर मुहर लगाई है या ‘मां-माटी-मानुष’ के भरोसे को कायम रखा है। अगले कुछ घंटे बंगाल की भावी दिशा और दशा तय करने वाले हैं।
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