Women’s Reservation Bill 2026 Lok Sabha: 298 वोट पाकर भी संसद में क्यों गिरा मोदी सरकार का बिल? जानें 4 बड़ी बातें

Women's Reservation Bill 2026 Lok Sabha

भारतीय राजनीति में कल(17 अप्रैल 2026) एक बहुत बड़ा झटका लगा है। लोकसभा के विशेष सत्र में मोदी सरकार को विपक्ष ने एक तगड़ी पटखनी दी है। 2029 के आम चुनावों से महिलाओं को 33% आरक्षण देने और ‘परिसीमन’ (Delimitation) लागू करने के लिए लाया गया ‘संविधान संशोधन बिल’ (Constitution Amendment Bill) लोकसभा में पास नहीं हो सका और आधिकारिक रूप से गिर गया है।

जैसे ही टीवी चैनल्स पर यह ब्रेकिंग न्यूज़ चलने लगी कि “पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े, फिर भी बिल गिर गया”, पूरे देश की जनता कंफ्यूज हो गई। जब पक्ष में ज्यादा वोट पड़े, तो सरकार हार कैसे गई? ‘ApniVani’ के इस विशेष राजनीतिक विश्लेषण में आइए इस गणित और इसके पीछे की पूरी राजनीति को 4 आसान पॉइंट्स में समझते हैं।

ज्यादा वोट मिलकर भी क्यों फेल हुआ बिल? (संविधान का नियम)

सबसे बड़ा सवाल यही है कि 298 वोट (Yes) और 230 वोट (No) होने के बावजूद बिल गिरा कैसे?

दरअसल, यह कोई साधारण बिल नहीं था, बल्कि एक ‘संविधान संशोधन बिल’ (Constitutional Amendment) था। ऐसे बिल को पास करने के लिए सिर्फ ‘साधारण बहुमत’ (Simple Majority – यानी 50% से ज्यादा) काफी नहीं होता, बल्कि सदन में मौजूद और वोट करने वाले कुल सांसदों का ‘दो-तिहाई बहुमत’ (2/3rd Majority) चाहिए होता है।

आज कुल 528 सांसदों ने वोटिंग में हिस्सा लिया। 528 का दो-तिहाई हिस्सा लगभग 352 वोट होता है। चूँकि सरकार को केवल 298 वोट ही मिले (जो 352 के जादुई आंकड़े से 54 वोट कम थे), इसलिए संवैधानिक नियम के अनुसार यह बिल संसद में गिर गया।

2023 में पास हुआ था, तो अब दोबारा बिल क्यों?

आप सोच रहे होंगे कि महिला आरक्षण बिल (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) तो 2023 में ही पास हो गया था! तो फिर ये नया बिल क्या था?

असली पेंच ‘परिसीमन’ (Delimitation) का था। 2023 वाले कानून में एक शर्त थी कि यह आरक्षण अगली जनगणना और नए परिसीमन (लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ने) के बाद ही लागू होगा। सरकार यह नया संविधान संशोधन बिल इसीलिए लाई थी ताकि लोकसभा की सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 तक किया जा सके और 2029 से ही 33% महिला आरक्षण लागू हो सके। लेकिन विपक्ष ने इस ‘सीटें बढ़ाने’ वाले हिस्से पर अड़ंगा लगा दिया।

विपक्ष (INDIA गठबंधन) ने क्यों किया विरोध?

एकजुट विपक्ष (United Opposition) ने इस बिल के खिलाफ एकमुश्त होकर 230 वोट डाले। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस बिल को “राष्ट्र-विरोधी कदम” तक कह डाला और सरकार पर जादुई करतब दिखाने का तंज कसा।

Women's Reservation Bill 2026 Lok Sabha
Apni Vani

विपक्ष का मुख्य विरोध महिला आरक्षण से नहीं, बल्कि ‘परिसीमन’ से है। दक्षिण भारत के राज्यों को डर है कि नई जनगणना के आधार पर सीटें बढ़ने से उत्तर भारत (जैसे यूपी-बिहार) की सीटें बहुत ज्यादा बढ़ जाएंगी और संसद में दक्षिण का प्रतिनिधित्व (Representation) और ताकत कम हो जाएगी। इसी असहमति के कारण विपक्ष ने इसे पास नहीं होने दिया।

पीएम मोदी और अमित शाह की अपील भी नहीं आई काम

वोटिंग से ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सदन में भावुक अपील की थी कि “भारत की आधी आबादी को उनका हक देने के लिए सभी पार्टियां एकजुट होकर इतिहास रचें।” वहीं केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी सफाई दी कि परिसीमन के बाद सीटों के बंटवारे में किसी भी राज्य का नुकसान नहीं होगा। लेकिन विपक्ष अपनी मांग पर अड़ा रहा और सरकार जरूरी दो-तिहाई आंकड़ा नहीं जुटा पाई।

ApniVani की बात

इस संविधान संशोधन बिल के गिरने के बाद, केंद्र सरकार ने ऐलान कर दिया है कि अब वह बचे हुए परिसीमन बिलों को भी फिलहाल आगे नहीं बढ़ाएगी। इसका सीधा मतलब यह है कि 2029 के चुनावों में महिलाओं को 33% आरक्षण मिलने का सपना एक बार फिर से अधर में लटक गया है। मोदी सरकार के लिए संसद में यह एक बहुत बड़ा राजनीतिक झटका है, जिसके असर आने वाले विधानसभा चुनावों में भी देखने को मिल सकते हैं।

आपकी राय: क्या आपको लगता है कि विपक्ष का इस परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े बिल को वोट आउट करना सही फैसला था? क्या राजनीतिक लड़ाई में महिलाओं का नुकसान हो रहा है? अपनी बेबाक राय नीचे कमेंट बॉक्स में या हमारे सोशल मीडिया पेज @9vaniapni पर आकर ज़रूर बताएं!

Read more

First LGBTQ MP India Menaka Guruswamy: सुप्रीम कोर्ट से संसद तक! जानिए देश की पहली LGBTQ+ सांसद की 5 बड़ी बातें

First LGBTQ MP India Menaka Guruswamy

भारतीय संसद के इतिहास में 6 अप्रैल 2026 का दिन सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया है। देश की जानी-मानी सुप्रीम कोर्ट वकील डॉ. मेनका गुरुस्वामी (Dr. Menaka Guruswamy) ने राज्यसभा के सदस्य के रूप में शपथ ली है। इसी के साथ वह भारत की पहली खुले तौर पर ‘LGBTQ+’ (क्वीर) सांसद बन गई हैं।

ममता बनर्जी की पार्टी ‘तृणमूल कांग्रेस’ (TMC) ने उन्हें पश्चिम बंगाल से अपना उम्मीदवार बनाकर उच्च सदन में भेजा है। लेकिन मेनका गुरुस्वामी आखिर हैं कौन? एक मशहूर वकील को अचानक राजनीति में क्यों लाया गया और उनके संसद पहुँचने से देश की राजनीति पर क्या पॉजिटिव और नेगेटिव असर पड़ेगा? आइए ‘ApniVani’ के इस विशेष राजनीतिक विश्लेषण में समझते हैं।

कौन हैं डॉ. मेनका गुरुस्वामी? (Who is Menaka Guruswamy?)

डॉ. मेनका गुरुस्वामी कोई आम नाम नहीं हैं। उनका जन्म 1974 में हैदराबाद में हुआ था। वह देश की उन चुनिंदा महिलाओं में से हैं जिन्होंने ‘ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी’ (Oxford University) और ‘हार्वर्ड लॉ स्कूल’ (Harvard Law School) जैसे दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों से कानून की पढ़ाई की है।

वह सुप्रीम कोर्ट की एक सीनियर एडवोकेट हैं। उनका नाम 2019 में प्रतिष्ठित ‘Time Magazine’ की दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों की लिस्ट में भी शामिल हो चुका है।

धारा 377 को खत्म कराने में रहा है सबसे बड़ा हाथ

अगर आज भारत में LGBTQ+ कम्युनिटी को सम्मान की नज़र से देखा जा रहा है, तो उसका बहुत बड़ा श्रेय मेनका गुरुस्वामी को जाता है। साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट के जिस ऐतिहासिक फैसले ने ‘धारा 377’ (Section 377) को खत्म कर भारत में समलैंगिकता (Homosexuality) को अपराध की श्रेणी से बाहर किया था, मेनका गुरुस्वामी उस केस की लीड वकील थीं। उन्होंने ही कोर्ट में दलील दी थी कि “प्यार और सहमति से बने रिश्तों को अपराध नहीं माना जा सकता।”

TMC ने उन्हें राज्यसभा का टिकट क्यों दिया? (राजनीतिक मायने)

ममता बनर्जी ने मेनका गुरुस्वामी को राज्यसभा भेजकर एक बहुत बड़ा ‘मास्टरस्ट्रोक’ खेला है।

पहला, TMC संसद में ऐसे तेज़-तर्रार वकीलों को खड़ा करना चाहती है जो संविधान और कानून के मुद्दे पर सत्ता पक्ष (सरकार) को जोरदार तरीके से घेर सकें।

दूसरा, इस फैसले से TMC ने खुद को एक बेहद ‘प्रोग्रेसिव’ (Progressive) और आधुनिक सोच वाली पार्टी के रूप में प्रोजेक्ट किया है, जो समाज के हाशिए पर खड़े वर्गों को मुख्यधारा में ला रही है।

First LGBTQ MP India Menaka Guruswamy
Apni Vani

इस फैसले का ‘पॉजिटिव’ (Positive) असर क्या होगा?

मेनका गुरुस्वामी का संसद पहुँचना कई मायनों में बहुत सकारात्मक (Positive) है:

  • असली प्रतिनिधित्व (True Representation): अब तक LGBTQ+ कम्युनिटी की आवाज़ संसद में उठाने वाला कोई अपना नहीं था। अब उनके हक और अधिकारों पर सीधा कानून बनाने में एक अनुभवी वकील की भूमिका होगी।
  • संविधान की रक्षा: एक संवैधानिक विशेषज्ञ होने के नाते, वह संसद में पास होने वाले नए कानूनों की बारीकी से समीक्षा कर सकेंगी ताकि किसी भी नागरिक के मौलिक अधिकारों का हनन न हो।
  • युवाओं को प्रेरणा: यह उन लाखों युवाओं के लिए एक बहुत बड़ी जीत है जो अपनी ‘आइडेंटिटी’ (Identity) को लेकर डरे रहते हैं।

चुनौतियां और ‘नेगेटिव’ (Negative) पहलू क्या हो सकते हैं?

राजनीति का मैदान कोर्टरूम से बहुत अलग और कठोर होता है:

  • रूढ़िवादी ताकतों का विरोध: भारतीय समाज और राजनीति आज भी काफी हद तक पारंपरिक (Traditional) है। उन्हें कट्टरपंथी और रूढ़िवादी राजनीतिक दलों या नेताओं के निजी हमलों का सामना करना पड़ सकता है।
  • पहचान तक सीमित रहने का खतरा: सबसे बड़ा डर यह है कि कहीं मीडिया और विरोधी नेता उन्हें सिर्फ एक ‘LGBTQ+ सांसद’ के टैग तक ही सीमित न कर दें, जबकि वह एक इंटरनेशनल लेवल की वकील हैं।
  • जमीनी राजनीति से दूरी: चूँकि वह एक एलीट (Elite) बैकग्राउंड से आती हैं, इसलिए आम जनता की बुनियादी समस्याओं (सड़क, पानी, रोज़गार) से कनेक्ट करना उनके लिए एक बड़ी चुनौती होगी।

ApniVani की बात

डॉ. मेनका गुरुस्वामी का राज्यसभा में जाना सिर्फ एक राजनीतिक खबर नहीं, बल्कि बदलते हुए ‘नए भारत’ की एक बेहद खूबसूरत तस्वीर है। यह साबित करता है कि अगर आपके पास काबिलियत है, तो समाज की कोई भी दीवार आपको देश के सर्वोच्च सदन तक पहुँचने से नहीं रोक सकती। राजनीति में उनका यह नया सफर कैसा रहेगा, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन उन्होंने जो इतिहास रचना था, वो रच दिया है!

आपकी राय: क्या आपको लगता है कि देश की संसद में हर वर्ग और कम्युनिटी का इस तरह का प्रतिनिधित्व होना ज़रूरी है? डॉ. मेनका गुरुस्वामी के सांसद बनने पर आपकी क्या बेबाक राय है? नीचे कमेंट्स में या हमारे इंस्टाग्राम पेज @9vaniapni पर आकर जरूर साझा करें!

Read more

Raghav Chadha AAP News: पार्टी से ‘निकाले’ जाने का पूरा सच! क्या BJP या Congress में होंगे शामिल? जानिए 5 बड़ी बातें

Raghav Chadha AAP News

भारतीय राजनीति में इन दिनों आम आदमी पार्टी (AAP) के अंदर मची उथल-पुथल सबसे बड़ी खबर बनी हुई है। सोशल मीडिया से लेकर न्यूज़ चैनलों तक अफ़वाहें उड़ रही हैं कि पार्टी के सबसे युवा और चर्चित चेहरे राघव चड्ढा (Raghav Chadha) को AAP से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है और वो जल्द ही बीजेपी या कांग्रेस का दामन थाम सकते हैं।

लेकिन राजनीति में जो दिखता है, वो अक्सर पूरा सच नहीं होता। आज के इस विस्तृत न्यूज़ ब्लॉग में हम आपको बताएंगे कि आखिर आम आदमी पार्टी के अंदर पर्दे के पीछे क्या खेल चल रहा है और राघव चड्ढा के खिलाफ हुए इस कड़े एक्शन की असली हकीकत क्या है।

पार्टी से नहीं, बल्कि ‘इस’ अहम पद से हुई है छुट्टी

सबसे पहले यह बहुत बड़ी गलतफहमी दूर कर लीजिए कि AAP ने राघव चड्ढा को पार्टी से बर्खास्त कर दिया है। असल में, पार्टी ने उन्हें राज्यसभा में ‘उपनेता’ (Deputy Leader) के पद से हटाया है।

हाल ही में पार्टी ने राज्यसभा सचिवालय को एक आधिकारिक पत्र भेजा, जिसमें स्पष्ट किया गया कि अब उपनेता की कुर्सी पर राघव चड्ढा की जगह पंजाब से ही सांसद ‘अशोक मित्तल’ बैठेंगे। इतना ही नहीं, पार्टी ने यह भी साफ कर दिया है कि राज्यसभा में बोलने के लिए तय समय अब राघव को नहीं दिया जाएगा। इसके बाद राघव ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो डालकर सीधा तंज कसा— “मुझे चुप कराया गया है, हराया नहीं गया है।”

केजरीवाल के ‘चहेते’ से इतनी दूरी क्यों? (विवाद की असली वजहें)

राघव चड्ढा किसी समय अरविंद केजरीवाल की आंखों के सबसे बड़े तारे हुआ करते थे। फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि पार्टी ने उनके पर कतर दिए? इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है उनका ‘मुश्किल वक्त में साथ न देना’।

जब दिल्ली शराब नीति केस में अरविंद केजरीवाल को गिरफ्तार किया गया था, तब राघव चड्ढा भारत में नहीं थे। वह अपनी आंखों के इलाज का हवाला देकर महीनों तक लंदन में रहे। पार्टी हाईकमान को उनका यह रवैया बिल्कुल रास नहीं आया कि जब पार्टी सबसे बड़े संकट में थी, तब उनका सबसे मुखर नेता विदेश में बैठा था।

Raghav Chadha AAP News
Apni Vani

संजय सिंह के साथ ‘पॉवर गेम’ की टकराहट

AAP के अंदरूनी सूत्रों का यह भी दावा है कि जब अक्टूबर 2023 में संजय सिंह जेल में थे, तब राघव चड्ढा ने राज्यसभा में खुद को पार्टी का ‘सुप्रीमो’ नेता घोषित करवाने के लिए पर्दे के पीछे से काफी जोड़-तोड़ की थी। अब जब संजय सिंह बाहर हैं और पार्टी में उनका कद फिर से मजबूत हो गया है, तो इसे राघव चड्ढा के उस पॉवर गेम का पलटवार माना जा रहा है।

क्या BJP में शामिल होंगे राघव चड्ढा?

जैसे ही राघव को पद से हटाया गया, भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इस राजनीतिक मौके को हाथों-हाथ लिया। दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष ने सीधा तंज कसते हुए कहा कि राघव चड्ढा ने अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व से खुद को अलग कर लिया है।

वहीं, AAP के नेताओं का आरोप है कि बीजेपी जानबूझकर राघव चड्ढा को प्रमोट कर रही है क्योंकि राघव संसद में सरकार के खिलाफ अब कड़े मुद्दे नहीं उठा रहे थे। हालांकि, अभी तक राघव चड्ढा या बीजेपी की तरफ से उनके पार्टी में शामिल होने को लेकर कोई भी आधिकारिक बयान नहीं आया है।

कांग्रेस (Congress) का इस पूरे विवाद पर क्या रुख है?

कांग्रेस भी इस राजनीतिक खींचतान पर गिद्ध जैसी नज़र बनाए हुए है। पंजाब कांग्रेस के बड़े नेताओं का दावा है कि राघव का पार्टी से मोहभंग लंदन ट्रिप के समय ही हो गया था और अब यह पूरी तरह स्पष्ट है कि वह आम आदमी पार्टी से अंदरूनी तौर पर अलग हो चुके हैं। बीजेपी और कांग्रेस, दोनों ही इस स्थिति का फायदा उठाना चाहते हैं, लेकिन राघव फिलहाल खामोशी से सही वक्त का इंतज़ार कर रहे हैं।

ApniVani की बात

स्वाति मालीवाल के बाद राघव चड्ढा दूसरे ऐसे बड़े नेता बन गए हैं, जिनके और AAP हाईकमान के बीच की दरार दुनिया के सामने आ गई है। फिलहाल, राघव चड्ढा आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद बने रहेंगे। लेकिन राजनीति में कोई भी स्थिति स्थायी नहीं होती। अगर आने वाले समय में AAP और राघव के बीच रिश्ते नहीं सुधरते हैं, तो पंजाब और दिल्ली की राजनीति कोई बहुत बड़ा मोड़ ले सकती है।

आपकी राय: आम आदमी पार्टी का राघव चड्ढा को पद से हटाना आपके हिसाब से सही फैसला है या गलत? क्या आपको लगता है कि राघव चड्ढा जल्द ही ‘कमल’ या ‘हाथ’ का साथ पकड़ लेंगे? अपनी बेबाक राजनीतिक राय नीचे कमेंट्स में या हमारे इंस्टाग्राम पेज @9vaniapni पर आकर जरूर साझा करें!

Read more

Nitin Nabin Resignation: 20 साल बाद बांकीपुर से विदाई! जानिए नितिन नवीन के विधायक पद से इस्तीफे की 4 बड़ी इनसाइड स्टोरी

Nitin Nabin Resignation

बिहार की राजनीति में आज (30 मार्च 2026) का दिन बेहद हलचल भरा रहा है। पटना की सबसे वीआईपी सीट ‘बांकीपुर’ (Bankipur) से लगातार 5 बार चुनाव जीतते आ रहे दिग्गज नेता और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने आज विधायक पद से अपना इस्तीफा दे दिया है।

लगातार 20 सालों तक इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले नेता का इस तरह अचानक विधानसभा छोड़ना कई लोगों को हैरान कर रहा है। कल तक उनके इस्तीफे पर जो सस्पेंस बना हुआ था, वो आज टूट गया है। आज ‘ApniVani’ के इस विशेष राजनीतिक विश्लेषण में आइए जानते हैं कि आखिर उन्होंने यह इस्तीफा क्यों दिया और इसके पीछे का पूरा गणित क्या है।

इस्तीफे की असली वजह क्या है? (संवैधानिक नियम)

नितिन नवीन के इस्तीफे के पीछे कोई राजनीतिक नाराजगी या विवाद नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह से एक ‘संवैधानिक मजबूरी’ और उनके प्रमोशन का हिस्सा है।

दरअसल, 16 मार्च 2026 को नितिन नवीन बिहार से निर्विरोध राज्यसभा सांसद (Rajya Sabha MP) चुने गए हैं। संविधान के ‘Prohibition of Simultaneous Membership Rules, 1950’ (अनुच्छेद 101/190) के तहत, कोई भी व्यक्ति एक ही समय में विधानसभा (MLA) और संसद (MP) दोनों का सदस्य नहीं रह सकता। सांसद चुने जाने के 14 दिनों के भीतर उन्हें किसी एक सदन से इस्तीफा देना अनिवार्य था। आज (30 मार्च) इस 14 दिन की डेडलाइन का आखिरी दिन था, इसलिए उन्होंने अपनी विधायकी छोड़ दी।

रविवार का ‘हाई-वोल्टेज’ ड्रामा: स्पीकर करते रहे इंतज़ार

इस इस्तीफे में एक जबरदस्त सस्पेंस भी देखने को मिला। विधानसभा सचिवालय की तरफ से आधिकारिक मैसेज जारी हुआ था कि नितिन नवीन रविवार सुबह 8:40 बजे स्पीकर प्रेम कुमार को अपना इस्तीफा सौंपेंगे।

रविवार को छुट्टी के दिन भी खास तौर पर विधानसभा का कार्यालय खोला गया और स्पीकर इंतज़ार करते रहे। लेकिन नितिन नवीन अचानक असम के चुनावी दौरे पर रवाना हो गए। इसके बाद कई तरह की अफ़वाहें उड़ने लगीं। हालांकि, आज (सोमवार) को बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने स्पीकर को नितिन नवीन का इस्तीफा सौंप दिया, जिसे तुरंत मंजूर कर लिया गया।

बांकीपुर की जनता के नाम भावुक चिट्ठी: 20 साल का सफर

इस्तीफे के साथ ही नितिन नवीन ने सोशल मीडिया (X) पर बांकीपुर की जनता और कार्यकर्ताओं के नाम एक बेहद भावुक खत लिखा।

उन्होंने लिखा, “आज मैं बांकीपुर क्षेत्र के विधायक पद से इस्तीफा दे रहा हूँ। मेरे स्वर्गीय पिता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा जी द्वारा सींचे गए इस क्षेत्र को मैंने पिछले 20 सालों से अपना परिवार माना है। यहाँ की जनता ने मुझे लगातार 5 बार अपना आशीर्वाद दिया।” उन्होंने भरोसा दिलाया कि पार्टी ने उन्हें जो नई और बड़ी ज़िम्मेदारी (राज्यसभा) दी है, उसके ज़रिए वे बिहार और बांकीपुर के विकास के लिए हमेशा समर्पित रहेंगे।

Nitin Nabin Resignation

सीएम नीतीश कुमार भी छोड़ेंगे MLC का पद

सिर्फ नितिन नवीन ही नहीं, बल्कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) भी आज राज्य विधान परिषद (MLC) के पद से इस्तीफा देने वाले हैं। नीतीश कुमार भी 16 मार्च को राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए हैं। जेडीयू (JDU) सुप्रीमो के इस्तीफे की चिट्ठी उनकी तरफ से संजय गांधी द्वारा सौंपी जा रही है। यह बिहार के इतिहास में एक दुर्लभ मौका है जब सीएम और सबसे बड़ी सहयोगी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष, दोनों एक साथ राज्यसभा का रुख कर रहे हैं।

ApniVani की बात

नितिन नवीन का बांकीपुर सीट छोड़ना सिर्फ एक विधायक का इस्तीफा नहीं है, बल्कि बिहार बीजेपी के लिए ‘जनरेशन शिफ्ट’ (पीढ़ीगत बदलाव) का संकेत है। अब वह राष्ट्रीय राजनीति (संसद) में बिहार की एक मज़बूत आवाज़ बनेंगे। बांकीपुर सीट खाली होने के बाद अब पटना की राजनीति में यह देखना दिलचस्प होगा कि आगामी उपचुनाव में यह वीआईपी सीट किसके खाते में जाती है।

आपकी राय: बांकीपुर के विधायक के रूप में नितिन नवीन का 20 साल का कार्यकाल आपको कैसा लगा? आपको क्या लगता है, अब इस सीट से किस नए चेहरे को मौका मिलना चाहिए? अपनी बेबाक राय नीचे कमेंट्स में या हमारे इंस्टाग्राम पेज @9vaniapni पर आकर जरूर साझा करें!

Read more