बिहार में थमा लाखों पक्के घरों का निर्माण, नीतीश सरकार ने केंद्र से मांगे 3000 करोड़ रुपये; जानें क्या है पूरा मामला

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बिहार के ग्रामीण इलाकों में अपना पक्का घर बनाने का सपना देख रहे लाखों लाभार्थियों के लिए एक बड़ी खबर सामने आई है। राज्य सरकार ने प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण (PMAY-G) के तहत लंबित 3,000 करोड़ रुपये की राशि जारी करने के लिए केंद्र सरकार को पत्र लिखा है। यह मांग ऐसे समय में की गई है जब राज्य में तकनीकी कारणों से करीब 9 लाख से अधिक घरों का निर्माण कार्य अधर में लटका हुआ है।

SNA खाते का पेच और फंड में देरी

बिहार विधानसभा में एक सवाल का जवाब देते हुए राज्य के ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार ने स्वीकार किया कि ‘सिंगल नोडल अकाउंट’ (SNA) खोलने में हुई देरी के कारण केंद्र से फंड मिलने में समस्या आ रही है। दरअसल, केंद्र सरकार के नए नियमों के अनुसार, अब सभी योजनाओं का पैसा डिजिटल निगरानी के लिए SNA खाते के जरिए ही जारी किया जाना है। बिहार में अभी यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई है, जिसकी वजह से करोड़ों की राशि अटकी हुई है।

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पक्के घरों

9 लाख से ज्यादा घर अभी भी अधूरे

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2024-25 और 2025-26 के लिए बिहार को कुल 12.19 लाख आवासों का लक्ष्य मिला था। इनमें से 12.08 लाख आवासों को स्वीकृति तो दे दी गई है, लेकिन फंड की कमी के कारण

9,16,709 आवासों का निर्माण कार्य पूरा नहीं हो पाया है।

मंत्री ने बताया कि लगभग 72,492 लाभार्थियों को अभी पहली किस्त मिलना बाकी है, जबकि 3.26 लाख से अधिक लोग दूसरी किस्त का इंतजार कर रहे हैं। बिना अगली किस्त मिले, गरीब परिवारों के लिए छत डालना नामुमकिन हो गया है।

केंद्र से विशेष रियायत की मांग

राज्य सरकार ने केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान से आग्रह किया है कि जब तक SNA खाता पूरी तरह सक्रिय नहीं हो जाता, तब तक नियमों में ढील देते हुए 31 मार्च, 2026 तक की राशि पुराने माध्यम से ही जारी कर दी जाए। इससे पहले जनवरी 2026 में केंद्र ने इसी तरह की राहत देते हुए 91 करोड़ रुपये जारी किए थे, जिससे कुछ लाभार्थियों को लाभ मिला था। अब सरकार की कोशिश है कि होली और वित्तीय वर्ष की समाप्ति से पहले बाकी 3000 करोड़ रुपये भी मिल जाएं

लाभार्थियों पर क्या होगा असर?

अगर केंद्र सरकार यह फंड जारी कर देती है, तो बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में निर्माण कार्यों में तेजी आएगी। 31 मार्च की समयसीमा के भीतर आवास पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। सरकार का दावा है कि फंड मिलते ही सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों (DBT) के जरिए किस्तों का भुगतान कर दिया जाएगा, ताकि मानसून शुरू होने से पहले लोग अपने नए घरों में प्रवेश कर सकें।

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PM Modi and Nitish Kumar

प्रमुख बिंदु (Quick Facts):

मांगी गई राशि: 3,000 करोड़ रुपये।

अधूरे आवास: 9,16,709 घर।

रुकी हुई किस्तें: पहली किस्त के लिए 72,492 और दूसरी के लिए 3.26 लाख लाभार्थी लंबित।

डेडलाइन: 31 मार्च 2026 तक फंड वितरण का लक्ष्य।

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Bihar PACS Membership Campaign 2026: अब पंचायत स्तर पर मिलेंगी 25+ सरकारी सेवाएं, जानें कैसे बनें सदस्य!

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बिहार के ग्रामीण विकास और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में नीतीश सरकार ने एक क्रांतिकारी कदम उठाया है। 2 जनवरी 2026 से राज्य के हर पंचायत में पैक्स (PACS) सदस्यता सह जागरूकता अभियान की शुरुआत होने जा रही है। अब पैक्स केवल खाद और बीज तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि ये गांव के “मिनी सचिवालय” और “सर्विस सेंटर” के रूप में काम करेंगे।

पैक्स अब सिर्फ एक समिति नहीं, बल्कि ‘मल्टी-सर्विस सेंटर’ है

सहकारिता मंत्री प्रमोद कुमार के अनुसार, बिहार में पैक्स को कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) के रूप में विकसित किया गया है। अब राज्य के किसान और ग्रामीण निवासी एक ही छत के नीचे 25 से अधिक डिजिटल और बैंकिंग सेवाओं का लाभ उठा सकेंगे।

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पैक्स में मिलने वाली प्रमुख 25 सेवाएं:

पैक्स अब हाई-टेक हो चुके हैं। यहाँ मिलने वाली प्रमुख सेवाओं की सूची इस प्रकार है:

• बैंकिंग सेवाएं: आधार इनेबल्ड पेमेंट सिस्टम (AePS) के जरिए पैसे निकालना और जमा करना।

• डिजिटल इंडिया सेवाएं: पैन कार्ड, आधार अपडेट, और बिजली बिल का भुगतान।

• कृषि इनपुट: खाद, उन्नत बीज और कीटनाशकों की उपलब्धता।

• जन औषधि केंद्र: सस्ती और जेनेरिक दवाओं की बिक्री (302 पैक्स को मंजूरी)।

• अन्न भंडारण: ‘विश्व की सबसे बड़ी अनाज भंडारण योजना’ के तहत गोदाम की सुविधा।

• प्रधानमंत्री किसान समृद्धि केंद्र: मिट्टी जांच और आधुनिक खेती का प्रशिक्षण।

• पेट्रोल और डीजल डीलरशिप: चुनिंदा पैक्स पर अब पेट्रोल पंप भी खुल रहे हैं।

• एलपीजी वितरण: ग्रामीण इलाकों में गैस सिलेंडर की आसान पहुंच।

• सब्जी आउटलेट: ‘तरकारी’ ब्रांड के तहत ताजी सब्जियों का विपणन।

• बीमा और पेंशन: फसल बीमा (PMFBY) और ई-श्रम पंजीकरण जैसी सुविधाएं।

2 जनवरी से सदस्यता अभियान: आप कैसे जुड़ सकते हैं?

बिहार में वर्तमान में लगभग 1.38 करोड़ पैक्स सदस्य हैं। सरकार का लक्ष्य इस संख्या को और बढ़ाना है ताकि सहकारी लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।

• योग्यता: आवेदन करने वाला व्यक्ति उसी पंचायत का स्थाई निवासी होना चाहिए।

• आयु सीमा: आवेदक की उम्र 18 वर्ष से अधिक होनी चाहिए।

• प्रक्रिया: आप ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरीकों से सदस्य बन सकते हैं। 2 जनवरी से आपके पंचायत मुख्यालय पर विशेष कैंप लगाए जाएंगे।

किसानों को क्या होगा सीधा फायदा?

• MSP पर धान खरीद: इस सीजन में अब तक 9.53 लाख मीट्रिक टन धान की खरीद की जा चुकी है, जिसका भुगतान सीधे किसानों के बैंक खाते में 48 घंटे के भीतर किया जा रहा है।

• गोल्ड लोन की सुविधा: बिहार स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक के माध्यम से अब पैक्स के जरिए गोल्ड लोन भी दिया जा रहा है।

• बिचौलियों से मुक्ति: डिजिटल होने के कारण अब खाद-बीज की कालाबाजारी पर रोक लगेगी।

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बदल रहा है ग्रामीण बिहार

पैक्स का डिजिटलीकरण और 25 सेवाओं का एकीकरण बिहार के गांवों के लिए गेम-चेंजर साबित होने वाला है। यदि आप भी एक किसान हैं या ग्रामीण क्षेत्र में रहते हैं, तो 2 जनवरी के अभियान का हिस्सा जरूर बनें और पैक्स के सदस्य बनकर इन सरकारी योजनाओं का लाभ उठाएं।

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MGNREGA का नया नाम ‘जी राम जी’? जानिए 5 बड़े बदलाव और क्यों छिड़ा है ‘गांधी vs राम’ का विवाद!

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क्या ‘मनरेगा’ (MGNREGA) अब इतिहास बनने वाला है? क्या महात्मा गांधी का नाम हटाकर अब रोजगार गारंटी योजना में ‘राम’ का नाम जोड़ा जा रहा है? सोशल मीडिया और न्यूज़ में ये खबरें आग की तरह फैल रही हैं कि मोदी सरकार मनरेगा का नाम बदलकर ‘जी राम जी’ (G RAM G) कर रही है। यह खबर पूरी तरह गलत नहीं है, लेकिन इसमें एक गहरा पेंच है। सरकार एक नया बिल ला रही है— VB-G RAM G, जो पुरानी मनरेगा जगह लेगा।

लेकिन सवाल यह है कि क्या विकास के लिए नाम बदलना ज़रूरी है? और क्या एक सरकारी योजना में ऐसा नाम रखना जो किसी खास धर्म की याद दिलाए, हमारे सेक्युलर ढांचे (Secularism) के लिए सही है? आइए, इस रिपोर्ट में गहराई से जानते हैं।

क्या है असली खबर? (The Real News)

सबसे पहले फैक्ट चेक करते हैं। सरकार ने ‘मनरेगा’ (Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act) को खत्म करके उसकी जगह एक नया कानून लाने का प्रस्ताव रखा है।

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इस नए बिल का पूरा नाम है:

“Viksit Bharat – Guarantee for Rozgar and Ajeevika Mission (Gramin)”

इसका शॉर्ट फॉर्म या एक्रोनिम बन रहा है— VB-G RAM G।

हिंदी मीडिया और विपक्ष इसे ही ‘जी राम जी’ (G RAM G) कहकर बुला रहा है। तकनीकी रूप से इसका मतलब ‘ग्रामीण’ (Gramin) से हो सकता है, लेकिन इसका उच्चारण (Pronunciation) जानबूझकर ऐसा रखा गया है जो ‘जय राम जी’ जैसा सुनाई दे। यही विवाद की असली जड़ है।

नई योजना में क्या बदलेगा? (5 Key Changes)

सरकार का तर्क है कि यह सिर्फ नाम बदलना नहीं, बल्कि योजना का ‘अपग्रेड’ है। नए VB-G RAM G बिल में ये बड़े बदलाव प्रस्तावित हैं:

  • रोजगार के दिन बढ़े: मनरेगा में 100 दिन की गारंटी थी, नई योजना में इसे बढ़ाकर 125 दिन करने का प्रस्ताव है। यह मजदूरों के लिए अच्छी खबर है।
  • फंडिंग का नया गणित: पहले मजदूरी का 100% पैसा केंद्र सरकार देती थी। अब इसे 60:40 के अनुपात में बांटा जाएगा (60% केंद्र, 40% राज्य)। इससे गरीब राज्यों पर बोझ बढ़ सकता है।
  • खेती के समय ‘नो वर्क’: जब खेती का पीक सीजन (बुवाई/कटाई) होगा, तब इस योजना के तहत 60 दिनों तक काम बंद रखा जाएगा, ताकि किसानों को मजदूरों की कमी न हो।
  • फोकस एरिया: अब गड्ढे खोदने के बजाय 4 चीजों पर फोकस होगा— जल संरक्षण, ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर, आजीविका और आपदा प्रबंधन।
  • गांधी का नाम गायब: सबसे बड़ा बदलाव यह है कि योजना के टाइटल से ‘महात्मा गांधी’ का नाम हटा दिया गया है।

3. विवाद क्यों? ‘गांधी’ गए और ‘राम’ आए?

  • विपक्ष और आलोचक इस पर कड़ा सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि महात्मा गांधी ग्रामीण भारत और स्वावलंबन के प्रतीक थे। उनका नाम हटाना सिर्फ एक राजनीतिक कदम नहीं, बल्कि विचारधारा की लड़ाई है।
  • दूसरी तरफ, ‘G RAM G’ नाम का चुनाव संयोग नहीं लगता। भारत एक धर्मनिरपेक्ष (Secular) देश है। सरकारी योजनाओं के नाम ऐसे होने चाहिए जो हर धर्म और समुदाय के व्यक्ति को अपना लगें।
  • जब योजना का पैसा हर टैक्सपेयर (हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई) से आता है, तो नाम में ऐसा धार्मिक संकेत (Subtle Religious Hint) क्यों?
  • क्या ‘विकास’ के लिए किसी भगवान के नाम का सहारा लेना ज़रूरी है? आलोचकों का मानना है कि यह सेक्युलरिज्म को कमजोर करने की कोशिश है।

विकास ज़रूरी है या नाम बदलना? (The Big Question)

हमारा सबसे बड़ा सवाल यही है— हर जगह नाम बदलने की इतनी जल्दी क्यों है?

पिछले कुछ सालों में हमने शहरों, स्टेशनों और अब योजनाओं के नाम बदलते देखे हैं। सरकार का तर्क होता है ‘औपनिवेशिक मानसिकता’ (Colonial Mindset) को हटाना। लेकिन मनरेगा तो 2005 में बनी भारतीय योजना थी, इसमें गुलामी का कौन सा अंश था?

  • असली मुद्दे: मनरेगा में मजदूरों को समय पर पैसा नहीं मिलता, फंड की कमी रहती है और भ्रष्टाचार होता है।
  • ज़रूरत क्या थी: ज़रूरत थी सिस्टम को सुधारने की, मजदूरी बढ़ाने की और डिजिटल पेमेंट्स को आसान बनाने की।
  • हो क्या रहा है: पूरी एनर्जी ‘री-ब्रांडिंग’ (Rebranding) में खर्च हो रही है।

अगर हम काम पर फोकस करें, तो योजना का नाम ‘क ख ग’ भी हो, तो भी जनता खुश रहेगी। लेकिन अगर काम न हो, तो ‘स्वर्ग योजना’ नाम रखने से भी पेट नहीं भरेगा।

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क्या यह राजनीति है? (Political Angle)

इसे राजनीति से अलग करके देखना मुश्किल है। ‘जी राम जी’ जैसा नाम चुनाव और भावनाओं को ध्यान में रखकर बनाया गया लगता है।

  • ब्रांडिंग: मौजूदा सरकार हर चीज़ को ‘विकसित भारत’ और अपनी विचारधारा से जोड़ना चाहती है।
  • इतिहास मिटाना: आलोचकों का कहना है कि यह पुरानी सरकारों (विशेषकर कांग्रेस और गांधी परिवार) की विरासत को मिटाने का एक और प्रयास है।

लेकिन इस चक्कर में हम एक खतरनाक ट्रेंड सेट कर रहे हैं। अगर कल को दूसरी सरकार आई और उसने फिर नाम बदला, तो क्या देश का पैसा सिर्फ बोर्ड पेंट करने में ही खर्च होता रहेगा?

योजना में सुधार लेकिन?

VB-G RAM G बिल में 125 दिन रोजगार जैसे अच्छे कदम ज़रूर हैं, जिनका स्वागत होना चाहिए। लेकिन ‘महात्मा गांधी’ का नाम हटाना और ‘G RAM G’ जैसा विवादास्पद नाम रखना एक गैर-ज़रूरी कदम लगता है।

विकास का धर्म से कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए। सड़क, पानी और रोजगार का कोई धर्म नहीं होता। बेहतर होता कि सरकार इस ‘नेम-गेम’ (Name Game) में पड़ने के बजाय सिर्फ ‘work-game’ पर फोकस करती।

आपकी राय:

क्या आपको लगता है कि मनरेगा का नाम बदलना सही फैसला है? या हमें नाम के बजाय काम पर ध्यान देना चाहिए? कमेंट में अपनी राय ज़रूर लिखें! 👇

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