Epstein Files में मोदी जी का नाम? भारत ने ‘कचरा’ बताकर खारिज किया विदेशी प्रोपगैंडा, जानें क्या है पूरा सच

Epstein Files

सोशल मीडिया के इस दौर में ‘फेक न्यूज़’ की आग कितनी तेजी से फैलती है, इसका ताज़ा उदाहरण जेफरी एपस्टीन फाइल्स (Jeffrey Epstein Files) से जुड़ा नया विवाद है। अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) द्वारा 30 जनवरी 2026 को जारी किए गए 35 लाख से अधिक पन्नों के नए दस्तावेजों के बाद भारत में राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। दरअसल, इन फाइल्स में कथित तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम का ज़िक्र होने का दावा किया गया, जिसे भारत सरकार ने पूरी तरह से ‘आधारहीन’ और ‘कचरा’ (Trashy) करार दिया है।

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Epstein Files में मोदी जी का नाम

विदेश मंत्रालय का कड़ा प्रहार: “एक अपराधी की मनगढ़ंत बातें”

भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने शनिवार, 31 जनवरी 2026 को एक आधिकारिक बयान जारी कर उन मीडिया रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया पोस्ट्स को सिरे से खारिज कर दिया, जिनमें पीएम मोदी का नाम एपस्टीन से जोड़ने की कोशिश की गई थी। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, “हमने तथाकथित एपस्टीन फाइल्स से संबंधित एक ईमेल संदेश की खबरें देखी हैं, जिसमें प्रधानमंत्री और उनकी 2017 की इज़राइल यात्रा का संदर्भ दिया गया है।”

जायसवाल ने आगे स्पष्ट किया कि जुलाई 2017 में प्रधानमंत्री की इज़राइल की आधिकारिक यात्रा एक ऐतिहासिक तथ्य है, लेकिन उसके अलावा ईमेल में किए गए अन्य सभी दावे एक सजायाफ्ता अपराधी की दिमागी उपज और ‘ट्रैश’ हैं। भारत ने इसे ‘घोर तिरस्कार’ (Utmost Contempt) के साथ खारिज कर दिया है।

क्या है ईमेल विवाद की असली सच्चाई?

अमेरिकी जांच एजेंसी द्वारा जारी दस्तावेजों में एक ईमेल सामने आया है जो 2017 का बताया जा रहा है। इस ईमेल में जेफरी एपस्टीन कथित तौर पर अपने प्रभाव का दिखावा करने के लिए ‘नेम-ड्रॉपिंग’ (बड़े नामों का इस्तेमाल) कर रहा था। विशेषज्ञों का कहना है कि एपस्टीन जैसे लोग अपनी साख बढ़ाने के लिए अक्सर वैश्विक नेताओं के नाम का दुरुपयोग करते थे।

दस्तावेजों के विश्लेषण से पता चलता है कि यह केवल एक अपराधी द्वारा की गई चर्चा थी, जिसका पीएम मोदी या भारत सरकार से कोई लेना-देना नहीं है। अमेरिकी अधिकारियों ने भी स्पष्ट किया है कि किसी फाइल में नाम होने का मतलब यह कतई नहीं है कि वह व्यक्ति किसी गलत गतिविधि में शामिल था।

Epstein Files
Epstein Files में मोदी जी का नाम

विपक्ष के सवालों पर सरकार का पलटवार

भारत में इस मुद्दे ने तब तूल पकड़ा जब विपक्षी दल कांग्रेस के नेताओं ने इसे ‘राष्ट्रीय शर्म’ बताते हुए सरकार से स्पष्टीकरण मांगा। हालांकि, भाजपा और सरकार समर्थकों ने इसे भारत की छवि खराब करने की एक अंतरराष्ट्रीय साजिश बताया है। साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, AI-जनरेटेड तस्वीरों और एडिटेड स्क्रीनशॉट्स के जरिए इस खबर को सनसनीखेज बनाने की कोशिश की गई है।

सावधान रहें फेक न्यूज़ से यह पहली बार नहीं है जब पीएम मोदी की वैश्विक छवि को निशाना बनाया गया हो। G20 और अन्य वैश्विक मंचों पर भारत की बढ़ती धाक से परेशान कुछ तत्व ऐसी अफवाहों को हवा दे रहे हैं। गूगल न्यूज़ और अन्य विश्वसनीय स्रोतों ने भी पुष्टि की है कि एपस्टीन की किसी भी ‘क्लाइंट लिस्ट’ या ‘क्राइम लिस्ट’ में किसी भी भारतीय नेता का कोई प्रमाणिक नाम नहीं है।

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Ajit Pawar Death: प्लेन क्रैश में अजित पवार का निधन! वो 10 मिनट जब बारामती में थम गईं सांसें (पूरी रिपोर्ट)

Ajit Pawar death

महाराष्ट्र की राजनीति के ‘दादा’ और उपमुख्यमंत्री अजित पवार (Ajit Pawar) अब हमारे बीच नहीं रहे। बुधवार, 28 जनवरी 2026 की सुबह आई एक खबर ने पूरे देश को झकझोर दिया। अपनी बेबाक शैली और कड़े फैसलों के लिए मशहूर अजित पवार का एक विमान दुर्घटना में निधन हो गया है। यह हादसा उनके अपने गृह क्षेत्र बारामती (Baramati) में हुआ, जहाँ वे हमेशा से जितते रहे थे।

आज हम इस रिपोर्ट में जानेंगे कि आखिर उस सुबह क्या हुआ था? उस वीवीआईपी (VVIP) प्लेन में क्या खराबी थी और कैसे महाराष्ट्र ने अपना एक कद्दावर नेता खो दिया।

आखिर कैसे हुआ हादसा?

अजित पवार मुंबई से सुबह-सुबह अपने निजी चार्टर्ड विमान से बारामती के लिए निकले थे। उन्हें वहां आगामी जिला परिषद चुनावों के लिए चार जनसभाओं को संबोधित करना था।

  • समय: सुबह करीब 8:40 से 8:48 के बीच।
  • स्थान: बारामती एयरपोर्ट, रनवे 11।
  • घटना: जैसे ही उनका Bombardier Learjet 45 विमान लैंडिंग के लिए नीचे आया, अचानक पायलट ने नियंत्रण खो दिया। विमान रनवे पर फिसलते हुए बगल में जा गिरा और उसमें जोरदार धमाका हुआ।

जिन्होने देखा उनके मुताबिक, धमाका इतना तेज था कि विमान के परखच्चे उड़ गए और वह तुरंत आग के गोले में बदल गया। किसी को भी संभलने या बाहर निकलने का मौका नहीं मिला।

Plane crash Ajit pawar
apnivani

कौन-कौन था विमान में? (No Survivors)

इस दर्दनाक हादसे में विमान में सवार सभी 5 लोगों की मौके पर ही मौत हो गई:

  • अजित पवार (उपमुख्यमंत्री, महाराष्ट्र)
  • पायलट-इन-कमांड (PIC)
  • को-पायलट (First Officer)
  • निजी सुरक्षा अधिकारी (PSO)
  • अटेंडेंट

DGCA (नागरिक उड्डयन महानिदेशालय) ने पुष्टि की है कि हादसे में कोई भी जीवित नहीं बचा है।

विमान में क्या खराबी थी?

यह सबसे बड़ा सवाल है जो हर किसी के मन में है—इतने बड़े नेता के विमान में गड़बड़ी कैसे हो सकती है? यह एक Learjet 45 जेट था, जिसे दिल्ली की कंपनी VSR Aviation ऑपरेट कर रही थी। इसका रजिस्ट्रेशन नंबर VT-SSK था। शुरुआती जाँच में सामने आया है कि लैंडिंग के दौरान कोई ‘तकनीकी खराबी’ (Technical Malfunction) आ गई थी। कुछ रिपोर्ट्स यह भी कह रही हैं कि विमान लैंडिंग के वक्त स्थिर नहीं था और रनवे पर ठीक से उतर नहीं पाया।

बड़ा सवाल: एक डिप्टी सीएम के विमान की सुरक्षा जाँच (Pre-flight check) में इतनी बड़ी चूक कैसे हुई? क्या इंजन में खराबी थी या लैंडिंग गियर में? जाँच के आदेश दे दिए गए हैं, लेकिन यह लापरवाही एक भारी कीमत वसूल कर गई।

अजित पवार : परिचय

अजित पवार सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति के अहम व्यक्ति थे।

  • जन्म: 22 जुलाई 1959 को अहमदनगर जिले के देवलाली प्रवरा में हुआ।
  • उम्र: 66 वर्ष।
  • कैरियर: वे अपने चाचा शरद पवार के कदम पर चलकर राजनीति में आए। 1991 में वे पहली बार बारामती से सांसद बने, लेकिन बाद में चाचा के लिए सीट छोड़कर राज्य की राजनीति में आ गए।
  • रिकॉर्ड: वे 7 बार बारामती से विधायक रहे और कई बार महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री का पद संभाला।

Ajit pawar

उन्हें ‘दादा’ इसलिए कहा जाता था क्योंकि वे कार्यकर्ताओं के लिए हमेशा उपलब्ध रहते थे और प्रशासन पर उनकी पकड़ बहुत मजबूत थी। सहकारी क्षेत्र (Cooperative Sector) में उनका दबदबा बेमिसाल था।

आखिरी पल और वो अधूरा सपना

हादसे से कुछ ही देर पहले उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट भी किया था, जिसमें उन्होंने देशभक्ति की बात की थी। नियति का खेल देखिए, वे अपने ही गढ़ बारामती में अपनों के बीच जा रहे थे, लेकिन वहां पहुंचने से पहले ही सफर खत्म हो गया।

उनके निधन से महाराष्ट्र की राजनीति में एक ऐसा खालीपन आएगा जिसे भरना आसान नहीं होगा। पक्ष हो या विपक्ष, आज हर कोई इस खबर से स्तब्ध है।

ApniVani की श्रद्धांजलि

अजित पवार का जाना सिर्फ एक पार्टी या परिवार का नुकसान नहीं है, यह एक आक्रामक और कार्यकुशल नेतृत्व का अंत है। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे और उनके परिवार को यह दुःख सहने की शक्ति प्रदान करे।

आपका सवाल:

क्या वीवीआईपी (VVIP) विमानों की सुरक्षा जाँच और सख्त होनी चाहिए? अपनी राय कमेंट में जरूर दें।

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बंगाल में सियासी भूचाल: भाजपा नेता के ‘सिर कलम’ वाले बयान पर मचा हड़कंप, ममता बनर्जी को कहा ‘चुड़ैल’

बंगाल

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही नेताओं की जुबान फिसलने का सिलसिला तेज हो गया है। हाल ही में दक्षिण 24 परगना से आई एक खबर ने राज्य की राजनीति में तनाव पैदा कर दिया है। भाजपा नेता संजय दास का एक वीडियो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल रहा है, जिसमें उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ ऐसी टिप्पणी की है जिसे सुनकर हर कोई हैरान है।

ममता बनर्जी

मंच से दी विवादित धमकी

यह पूरी घटना एक ‘परिवर्तन सभा’ के दौरान हुई। वायरल वीडियो में भाजपा नेता संजय दास मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को ‘बूढ़ी चुड़ैल’ कहते नजर आ रहे हैं। विवाद सिर्फ नाम तक सीमित नहीं रहा; उन्होंने उत्तेजित होकर यहाँ तक कह दिया कि उनका सिर कलम कर देना चाहिए। हैरानी की बात यह है कि जब यह बयान दिया जा रहा था, तब मंच पर पार्टी के कई अन्य बड़े चेहरे भी मौजूद थे।

TMC का पलटवार और पुलिस केस

तृणमूल कांग्रेस ने इस मुद्दे को हाथों-हाथ लिया है और भाजपा पर करारा हमला बोला है। TMC का कहना है कि यह भाजपा की असली संस्कृति है, जहाँ महिलाओं और राज्य की मुख्यमंत्री के प्रति कोई सम्मान नहीं है। पार्टी ने इसे केवल एक बयान नहीं बल्कि ‘हिंसा भड़काने की साजिश’ बताया है और संजय दास के खिलाफ पुलिस में मामला दर्ज करा दिया है।

ममता बनर्जी

चुनावी माहौल में बढ़ी तल्खी

जैसे-जैसे बंगाल चुनाव नजदीक आ रहे हैं, दोनों पार्टियों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर हिंसक होता जा रहा है। जहाँ भाजपा ‘परिवर्तन’ के नाम पर आक्रामक प्रचार कर रही है, वहीं इस तरह के विवादित बयान उसे रक्षात्मक स्थिति में डाल सकते हैं। फिलहाल भाजपा की ओर से इस पर कोई आधिकारिक सफाई नहीं आई है, लेकिन सोशल मीडिया पर जनता के बीच इस बयान को लेकर तीखी बहस छिड़ गई है।

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National Voters Day: सिर्फ 1 दिन के ‘बादशाह’ हैं आप! बंगाल की हिंसा और आपके वोट की ताकत का कड़वा सच

National Voters' Day

आज 25 जनवरी है मतलब ‘राष्ट्रीय मतदाता दिवस’ (National Voters’ Day)। सारे जगह आपको बताया जाएगा कि आप देश के मालिक हैं। टीवी पर बड़े-बड़े नेता कहेंगे कि “वोट आपका अधिकार है।” लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस उंगली पर स्याही लगवाकर आप सेल्फी पोस्ट करते हैं, उसकी असली ताकत क्या है? क्या हम वाकई लोकतंत्र के राजा हैं, या सिर्फ 5 साल में एक दिन के लिए ‘इस्तेमाल’ किए जाने वाले लोग?

आज इस विशेष रिपोर्ट में हम बात करेंगे वोट की ताकत की, उन लोगों की जो राजनीति से नफरत करते हैं, और बंगाल (Bengal) जैसे राज्यों के उस अजीब सच की जहाँ वोट देना ‘अधिकार’ नहीं, बल्कि ‘जान जोखिम’ में डालना बन गया है।

Suppressing Voters in Bengal

“मुझे राजनीति में इंटरेस्ट नहीं”—यह सबसे बड़ी बेवकूफी है

आजकल के युवाओं का सबसे कॉमन डायलॉग है— “यार, पॉलिटिक्स गंदी है, मुझे इसमें कोई इंटरेस्ट नहीं है।”

अगर आप भी ऐसा सोचते हैं, तो यह कड़वी बात सुन लीजिए: आप राजनीति में भाग लें या न लें, राजनीति आप में पूरी दिलचस्पी लेती है। जिस सड़क पर आप चलते हैं, उसका ठेका राजनीति तय करती है। जिस कॉलेज में आप पढ़ते हैं, उसकी फीस राजनीति तय करती है। आपकी गाड़ी का पेट्रोल और घर का राशन—सब कुछ राजनीति से जुड़ा है। अगर आप वोट नहीं देते, तो आपको शिकायत करने का भी कोई हक नहीं है। जब आप घर बैठते हैं, तो आप एक ‘गलत आदमी’ को चुनने में मदद कर रहे होते हैं।

प्लेटो ने कहा था— “राजनीति में भाग न लेने की सजा यह है कि आपको अपने से बुरे लोगों द्वारा शासित होना पड़ता है।”

5 साल के ‘नौकर’ और 1 दिन के ‘राजा’

हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना (Irony) यही है। जिस दिन चुनाव होता है, उस दिन बड़े से बड़ा नेता, जो 5 साल तक अपनी गाड़ी का शीशा नीचे नहीं करता, वो आपके पैरों में गिर जाता है। आपके सामने हाथ जोड़ता है, जाति-धर्म की दुहाई देता है, और दारू-मुर्गा भी बांटता है। क्यों? क्योंकि उसे पता है कि अगले 24 घंटे के लिए असली ‘बॉस’ आप हैं।

लेकिन सवाल यह है कि यह ताकत सिर्फ एक दिन क्यों?जैसे ही चुनाव खत्म होता है, वह नेता ‘राजा’ बन जाता है और जनता वापस ‘प्रजा’ बन जाती है। वोट की ताकत का यह असंतुलन हमें सोचना होगा। क्या हम सिर्फ एक दिन के मालिक हैं?

ECI chief Election commissioner -and others

बंगाल की हकीकत: जहाँ वोट देना ‘जुर्म’ बन जाता है

अब आते हैं सिक्के के दूसरे पहलू पर। हम कहते हैं “वोट देना हमारा हक है,” लेकिन क्या भारत के हर कोने में यह हक सुरक्षित है? पश्चिम बंगाल (West Bengal) के पिछले कुछ चुनावों को याद कीजिए। क्या मंजर था? वोट देने जाने वालों को डराया गया। चुनाव के बाद हिंसा (Post-Poll Violence) हुई, घर जलाए गए, और महिलाओं के साथ बदसलूकी हुई। पंचायत चुनावों में तो मतपेटियां (Ballot Boxes) तक तालाब में फेंक दी गईं।

यह कैसा लोकतंत्र है जहाँ अपनी मर्जी का बटन दबाने पर जान का खतरा हो? सिर्फ बंगाल ही नहीं, बिहार और यूपी के कई बाहुबली इलाकों में भी आज भी ‘साइलेंट कैप्चरिंग’ होती है। जब तक हर नागरिक बिना डरे वोट नहीं डाल सकता, तब तक National Voters’ Day की बधाई देना बेमानी है। प्रशासन और चुनाव आयोग (ECI) दावा करते हैं कि चुनाव निष्पक्ष हैं, लेकिन जब एक गरीब आदमी को डंडे के जोर पर वोट डालने से रोका जाता है, तो लोकतंत्र मर जाता है।

सुधार कैसे आएगा?

सिर्फ कमियां गिनाने से कुछ नहीं होगा। अगर हमें इस सिस्टम को सुधारना है, तो हमें अपनी एक दिन की ताकत को 5 साल की ताकत में बदलना होगा।

  • NOTA का सही इस्तेमाल: अगर आपको कोई कैंडिडेट पसंद नहीं है, तो घर मत बैठिए। बूथ पर जाइए और NOTA (None of the Above) दबाइए। यह नेताओं के मुंह पर तमाचा है कि “तुम में से कोई भी मेरे लायक नहीं है।”
  • सवाल पूछना सीखें: चुनाव के बाद अपने पार्षद/विधायक को सोशल मीडिया पर टैग करके सवाल पूछिए। उन्हें याद दिलाइए कि वो मालिक नहीं, सेवक हैं।
  • डर से आजादी: बंगाल हो या बिहार, गुंडागर्दी तब तक चलती है जब तक शरीफ आदमी चुप रहता है। जब पूरा मोहल्ला या पूरा गांव एक साथ खड़ा हो जाएगा, तो किसी बाहुबली की हिम्मत नहीं होगी।

अपना हक खुद मांगना सीखो

आज 25 जनवरी है। आज शपथ लीजिए कि चाहे धूप हो, बारिश हो या लंबी लाइन—अगले चुनाव में आप वोट जरूर डालेंगे। याद रखिए, आपकी उंगली पर लगी वह नीली स्याही (Ink) सिर्फ एक निशान नहीं है, वह इस देश के भ्रष्ट सिस्टम के खिलाफ आपका सबसे बड़ा हथियार है। अगर आप आज चूक गए, तो अगले 5 साल तक रोने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा।

जागो मतदाता, जागो!

आपकी राय: क्या आपको लगता है कि भारत में ‘राइट टू रिकॉल’ (Right to Recall) यानी काम न करने पर नेता को हटाने का कानून होना चाहिए? कमेंट में अपनी राय जरूर दें।

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पूर्णिया में अतिक्रमण हटाने गए CO से भिड़ी पूर्व पार्षद की बेटी, जमकर हुई हाथापाई!

Purnea co photo

पूर्णिया: बिहार के पूर्णिया जिले में अतिक्रमण हटाओ अभियान के दौरान एक ऐसा नजारा देखने को मिला जिसने सबको हैरान कर दिया। सरकारी जमीन को खाली कराने पहुँचे अंचलाधिकारी (CO) और पूर्व पार्षद की बेटी के बीच तीखी बहस देखते ही देखते हाथापाई में बदल गई। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसके बाद प्रशासन ने सख्त रुख अपनाते हुए मुकदमा दर्ज कर लिया है।

क्या है पूरा मामला?

यह पूरी घटना पूर्णिया शहर के एक व्यस्त इलाके की है। नगर निगम की टीम पुलिस बल के साथ अवैध कब्जों को हटाने पहुँची थी। जैसे ही बुलडोजर ने अपना काम शुरू किया, स्थानीय लोग विरोध करने लगे। इसी बीच पूर्व पार्षद की बेटी रानी देवी वहां पहुँच गईं और कार्रवाई का विरोध करने लगीं।

रानी देवी का आरोप था कि प्रशासन बिना किसी पूर्व सूचना के उनके घर के सामने का हिस्सा तोड़ रहा है। बातचीत के दौरान मामला इतना बढ़ गया कि रानी देवी और अंचलाधिकारी (CO) के बीच धक्का-मुक्की शुरू हो गई। देखते ही देखते दोनों के बीच हाथापाई होने लगी, जिसे देख वहां मौजूद पुलिसकर्मी और लोग दंग रह गए।

CO aur purva parshad ki beti ke bich jhadap

सरकारी काम में बाधा और FIR

CO राकेश कुमार ने आरोप लगाया कि महिला ने न सिर्फ उनके साथ बदतमीजी की, बल्कि सरकारी काम में बाधा डालते हुए उन पर हमला भी किया। इस हंगामे के कारण अतिक्रमण हटाने का काम काफी देर तक रुका रहा। घटना के बाद CO ने स्थानीय थाने में लिखित शिकायत दर्ज कराई है। पुलिस ने सरकारी कार्य में बाधा डालने और मारपीट की धाराओं के तहत पूर्व पार्षद की बेटी के खिलाफ FIR दर्ज कर ली है।

परिवार का पक्ष

दूसरी ओर, पूर्व पार्षद के परिवार का कहना है कि प्रशासन पक्षपात कर रहा है। उनका दावा है कि जिस जमीन को अतिक्रमण बताया जा रहा है, उसके कागजात उनके पास हैं। रानी देवी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि अधिकारी उनकी बात सुनने को तैयार नहीं थे और महिलाओं के साथ अभद्र व्यवहार किया गया, जिसके बचाव में उन्हें आगे आना पड़ा।

Purnea me atikarman htane ka kaam

शहर में चर्चा का विषय

पूर्णिया में इस घटना को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं। कुछ लोग इसे प्रशासन की मनमानी बता रहे हैं, तो कुछ का कहना है कि किसी को भी कानून हाथ में लेने का हक नहीं है, चाहे वह रसूखदार परिवार से ही क्यों न हो।

प्रशासन की चेतावनी

जिला प्रशासन ने साफ कर दिया है कि अतिक्रमण हटाओ अभियान रुकने वाला नहीं है। अधिकारियों का कहना है कि शहर को जाम मुक्त बनाने के लिए सड़कों के किनारे से अवैध कब्जे हटाना जरूरी है। जो भी व्यक्ति इस प्रक्रिया में बाधा डालेगा, उस पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

फिलहाल पुलिस इस मामले की बारीकी से जांच कर रही है और वायरल वीडियो के आधार पर गवाहों के बयान दर्ज किए जा रहे हैं। अब देखना यह है कि इस कानूनी लड़ाई में आगे क्या मोड़ आता है।

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बिहार सरकार का बड़ा तोहफा : ट्रैक्टर सहित 91 कृषि यंत्रों पर 90% तक की सब्सिडी, जानें आवेदन की पूरी प्रक्रिया

बिहार सरकार

बिहार कृषि यंत्रीकरण योजना 2025-26: बिहार के किसान भाइयों के लिए खेती को आधुनिक और मुनाफे का सौदा बनाने का सुनहरा मौका आ गया है। बिहार सरकार ने ‘कृषि यंत्रीकरण योजना 2025-26’ के तहत एक बहुत बड़ी घोषणा की है। इस योजना के जरिए अब छोटे से लेकर बड़े किसान तक, ट्रैक्टर और हार्वेस्टर जैसे महंगे कृषि यंत्र भारी छूट पर खरीद सकते हैं। सरकार ने इस बार कुल 91 प्रकार के यंत्रों को शामिल किया है, जिन पर 40% से लेकर 90% तक की भारी सब्सिडी दी जा रही है।

खेती में मशीनीकरण को बढ़ावा: क्यों खास है यह योजना?

बिहार कृषि विभाग का मुख्य उद्देश्य किसानों की मेहनत को कम करना और पैदावार को बढ़ाना है। अक्सर देखा जाता है कि महंगे उपकरण न होने के कारण किसान पुरानी तकनीक से खेती करते हैं, जिससे लागत बढ़ जाती है। इस योजना के आने से अब गरीब किसान भी आधुनिक मशीनों का मालिक बन सकेगा। के अनुसार, इस साल सब्सिडी का दायरा बढ़ा दिया गया है ताकि राज्य के हर कोने तक मशीनीकरण का लाभ पहुंच सके। इससे न केवल समय की बचत होगी, बल्कि फसल की बर्बादी भी कम होगी।

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91 प्रकार के यंत्रों की लिस्ट

इस योजना में केवल ट्रैक्टर ही नहीं, बल्कि खेती से जुड़े लगभग हर छोटे-बड़े यंत्र को शामिल किया गया है। में बताया गया है कि ट्रैक्टर पर जहां 40-50% तक की सब्सिडी है, वहीं फसल अवशेष प्रबंधन (जैसे स्ट्रॉ मैनेजमेंट) वाले यंत्रों पर 75% से 90% तक की छूट मिल रही है। मुख्य यंत्रों की सूची इस प्रकार है:

  • भारी यंत्र: ट्रैक्टर (20-50 HP), कम्बाइन हार्वेस्टर और स्ट्रॉ रीपर।
  • बुआई के यंत्र: सीड ड्रिल, जीरो टिलेज मशीन और पोटैटो प्लांटर।
  • निराई-गुड़ाई: पावर वीडर और ब्रश कटर।
  • अन्य: पंप सेट, स्प्रेयर मशीन और थ्रेशर।

खास बात यह है कि अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अत्यंत पिछड़ा वर्ग के किसानों को सामान्य वर्ग के मुकाबले अधिक सब्सिडी दी जा रही है।

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आवेदन के लिए जरूरी पात्रता और दस्तावेज

अगर आप बिहार के स्थायी निवासी हैं और खेती से जुड़े हैं, तो आप इस योजना का लाभ उठा सकते हैं। आवेदन करने के लिए किसान के पास ‘DBT Agriculture’ पोर्टल पर पंजीकरण होना अनिवार्य है। के मुताबिक, आवेदन के समय आपके पास निम्नलिखित दस्तावेज होने चाहिए:

  • किसान पंजीकरण संख्या (13 अंकों का)।
  • जमीन के नवीनतम कागजात (LPC या करंट रसीद)।
  • आधार कार्ड और मोबाइल नंबर (जो बैंक खाते से लिंक हो)।
  • बैंक पासबुक की फोटोकॉपी।
  • पासपोर्ट साइज फोटो।

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ऑनलाइन आवेदन कैसे करें? स्टेप-बाय-स्टेप गाइड

बिहार कृषि यंत्रीकरण योजना के लिए आवेदन प्रक्रिया पूरी तरह ऑनलाइन है। आप नीचे दिए गए स्टेप्स का पालन कर खुद भी फॉर्म भर सकते हैं:

  • सबसे पहले बिहार कृषि विभाग की आधिकारिक वेबसाइट dbtagriculture.bihar.gov.in पर जाएं।
  • वहां ‘कृषि यंत्रीकरण योजना’ के लिंक पर क्लिक करें।
  • अपना पंजीकरण नंबर डालें और लॉग-इन करें।
  • इसके बाद यंत्रों की सूची से उस मशीन का चयन करें जिसे आप खरीदना चाहते हैं।
  • मांगी गई सभी जानकारी और दस्तावेज सावधानीपूर्वक अपलोड करें और फॉर्म सबमिट करें।  के अनुसार, आवेदन जमा होने के बाद विभाग द्वारा परमिट जारी किया जाता है, जिसके बाद आप अधिकृत डीलर से सब्सिडी काट कर यंत्र खरीद सकते हैं।

बिहार कृषि यंत्रीकरण योजना 2025-26 किसानों के लिए एक जीवन बदलने वाली योजना साबित हो सकती है। आवेदन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और यह अक्टूबर 2026 तक चलेगी, लेकिन हमारा सुझाव है कि आप जल्द से जल्द आवेदन करें क्योंकि हर जिले का एक निर्धारित लक्ष्य (Target) होता है। सीट फुल होने के बाद आवेदन बंद हो सकते हैं। अधिक जानकारी के लिए आप अपने नजदीकी प्रखंड कृषि कार्यालय (BAO) से संपर्क कर सकते हैं या विभाग की हेल्पलाइन पर कॉल कर सकते हैं।

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अस्पताल में धुआं उड़ाते दिखे बाहुबली विधायक अनंत सिंह, वायरल वीडियो ने बिहार की राजनीति में मचाया हड़कंप

अनंत सिंह

बिहार की राजनीति में इन दिनों एक वीडियो ने भूचाल ला दिया है। जेल में बंद जदयू (JDU) के बाहुबली विधायक अनंत सिंह (Anant Singh) का एक वीडियो सोशल मीडिया पर जंगल की आग की तरह फैल रहा है। इस वीडियो में विधायक जी पटना के IGIMS अस्पताल में सरेआम सिगरेट पीते नजर आ रहे हैं। इस घटना के बाद विपक्ष, खासकर आरजेडी (RJD), नीतीश सरकार पर हमलावर हो गई है।

क्या है पूरा मामला?

बेउर जेल में बंद मोकामा विधायक अनंत सिंह को नियमित स्वास्थ्य जांच (Check-up) के लिए पटना के इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) लाया गया था। वायरल वीडियो में दिख रहा है कि अस्पताल परिसर के भीतर, जहां ‘नो स्मोकिंग’ का सख्त नियम होता है, वहां विधायक अनंत सिंह बेफिक्र होकर सिगरेट के कश लगा रहे हैं।

अनंत सिंह

बता दें कि अनंत सिंह हत्या के मामले में सजा काट रहे हैं, लेकिन 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में उन्होंने जेल में रहते हुए भी मोकामा सीट से 28,260 वोटों के भारी अंतर से जीत दर्ज की थी।

RJD ने उठाए गंभीर सवाल: “क्या यही है सुशासन?”

वीडियो वायरल होते ही राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने नीतीश सरकार की कानून-व्यवस्था और ‘सुशासन’ के दावों पर कड़े प्रहार किए हैं:

• प्रियंका भारती (RJD प्रवक्ता): उन्होंने वीडियो साझा करते हुए तंज कसा कि अनंत सिंह कानून और सुशासन को धुएं में उड़ा रहे हैं।

• एजाज अहमद (RJD नेता): उन्होंने सवाल किया कि “जो सरकार जीरो टॉलरेंस की बात करती है, वह अपने विधायक की इस वीआईपी (VIP) संस्कृति पर चुप क्यों है? क्या जेल के नियम सिर्फ आम जनता के लिए हैं?”

NDA और भाजपा की सफाई

मामले के तूल पकड़ने पर भाजपा प्रवक्ता कौशल कृष्ण ने इस घटना को “अस्वीकार्य और निंदनीय” बताया है। उन्होंने कहा कि अस्पताल में धूम्रपान करना नियमों का उल्लंघन है और अनंत सिंह को इसके लिए माफी मांगनी चाहिए। हालांकि, सरकार की ओर से अभी तक किसी बड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की घोषणा नहीं की गई है।

अनंत सिंह

जनता में भारी आक्रोश

सोशल मीडिया पर आम लोग इस वीडियो को लेकर काफी नाराज हैं। यूजर्स का कहना है कि एक तरफ आम आदमी पर सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान करने पर जुर्माना लगाया जाता है, वहीं दूसरी तरफ एक सजायफ्ता विधायक अस्पताल जैसी संवेदनशील जगह पर कानून की धज्जियां उड़ा रहा है।

यह पहली बार नहीं है जब अनंत सिंह सुर्खियों में हैं, लेकिन अस्पताल के भीतर सिगरेट पीने के इस कृत्य ने बिहार की जेल प्रणाली और पुलिस अभिरक्षा पर सवालिया निशान लगा दिया है। अब देखना यह है कि क्या प्रशासन इस पर कोई कड़ा संज्ञान लेता है या यह मामला भी राजनीति की भेंट चढ़ जाएगा।

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नितिन नवीन निर्विरोध बने बीजेपी के 12वें राष्ट्रीय अध्यक्ष, दिल्ली से लेकर बिहार तक जश्न

नितिन नवीन

भारतीय जनता पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में आज एक नए युग की शुरुआत हुई है। बिहार की राजनीति में अपनी धाक जमाने वाले दिग्गज नेता नितिन नवीन को आधिकारिक तौर पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का 12वां राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया गया है। दिल्ली स्थित पार्टी मुख्यालय में हुई केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक के बाद यह स्पष्ट हो गया कि इस पद के लिए नितिन नवीन के सामने कोई अन्य उम्मीदवार मैदान में नहीं था, जिसके बाद उन्हें निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिया गया।

नितिन नवीन

सर्वसम्मति से हुआ ऐतिहासिक फैसला

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए हुआ यह चुनाव पार्टी की आंतरिक एकजुटता का बड़ा संदेश माना जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा थी कि इस बार मुकाबला कड़ा हो सकता है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की रणनीतिक सहमति के बाद नितिन नवीन के नाम पर मुहर लगा दी गई। पूर्व अध्यक्ष जेपी नड्डा के कार्यकाल की समाप्ति के बाद से ही एक ऐसे चेहरे की तलाश थी जो संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूती दे सके। नितिन नवीन की निर्विरोध नियुक्ति यह दर्शाती है कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व और कार्यकर्ता उनके विजन पर पूरी तरह भरोसा करते हैं।

कौन हैं नितिन नवीन? बिहार से राष्ट्रीय फलक तक का सफर

नितिन नवीन का राजनीतिक सफर संघर्ष और सांगठनिक कौशल की मिसाल रहा है। बिहार विधानसभा में अपनी सक्रियता और युवा मोर्चा के अध्यक्ष के रूप में उनकी कार्यशैली ने उन्हें पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की नजरों में ला खड़ा किया। एक साफ-सुथरी छवि और कार्यकर्ताओं के बीच गहरी पैठ रखने वाले नवीन को बिहार में बीजेपी के विस्तार का एक मुख्य स्तंभ माना जाता है। जानकारों का कहना है कि उनकी नियुक्ति के पीछे पार्टी की ‘ईस्टर्न इंडिया’ यानी पूर्वी भारत में अपनी पकड़ को और अधिक मजबूत करने की सोची-समझी रणनीति है।

2027 लोकसभा चुनाव और आगामी चुनौतियां

नए अध्यक्ष के रूप में नितिन नवीन के सामने सबसे बड़ी चुनौती 2027 के लोकसभा चुनाव हैं। उनके कंधों पर न केवल पार्टी के सदस्यता अभियान को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी है, बल्कि विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ (INDIA) की घेराबंदी का मुकाबला करने का भी बड़ा जिम्मा है। माना जा रहा है कि उनके नेतृत्व में बीजेपी युवाओं और महिलाओं को जोड़ने के लिए नए अभियान शुरू करेगी। नितिन नवीन ने पदभार ग्रहण करने के संकेतों के साथ ही यह स्पष्ट कर दिया है कि उनकी प्राथमिकता संगठन को डिजिटल और जमीनी दोनों स्तरों पर अजेय बनाना है।

विपक्ष का वार और समर्थकों का उत्साह

नितिन नवीन के अध्यक्ष बनने की खबर फैलते ही सोशल मीडिया पर बधाई देने वालों का तांता लग गया है। जहां बीजेपी समर्थक इसे ‘युवा नेतृत्व का उदय’ बता रहे हैं, वहीं विपक्षी दलों ने इस पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया दी है। कांग्रेस और आरजेडी जैसे दलों ने इसे पार्टी के भीतर का आंतरिक फैसला बताते हुए कटाक्ष किया है। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नितिन नवीन की नियुक्ति से आगामी विधानसभा चुनावों और 2027 के महाकुंभ के लिए बीजेपी ने अपनी बिसात बिछा दी है।

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Manoj Tiwari Theft: रात के 9 बजे CCTV ने उगला वो ‘काला सच’, जिसे देख सांसद के पैरों तले जमीन खिसक गई!

Manoj Tiwari

कहते हैं कि इंसान बाहर की दुनिया से लड़ सकता है, दुश्मनों का सामना कर सकता है, लेकिन जब वार ‘घर के अंदर’ से हो, तो बड़े-बड़े शूरवीर भी टूट जाते हैं। भोजपुरी सुपरस्टार और बीजेपी सांसद मनोज तिवारी (Manoj Tiwari) के साथ मुंबई में कुछ ऐसा ही हुआ है। उनके घर में चोरी हुई, लेकिन यह खबर पैसों के जाने की नहीं, बल्कि उस ‘भरोसे’ के कत्ल की है, जो उन्होंने अपने एक पुराने कर्मचारी पर किया था।

15 जनवरी की रात, जब पूरा शहर अपनी रफ्तार में था, मनोज तिवारी के घर की चारदीवारी के अंदर एक ऐसी साजिश का पर्दाफाश हो रहा था, जिसने पुलिस को भी हैरान कर दिया। 5 लाख 40 हजार रुपये की चोरी का इल्जाम जिस शख्स पर लगा है, वो कोई पेशेवर अपराधी नहीं, बल्कि तिवारी परिवार का ‘अपना’ माना जाने वाला सुरेंद्र कुमार है।

दिसंबर की वो पहेली: जब हवा में गायब होने लगे पैसे

यह कहानी 15 जनवरी को शुरू नहीं हुई। इसकी पटकथा पिछले साल दिसंबर (2025) में ही लिखी जा रही थी। मनोज तिवारी के मैनेजर, प्रमोद जोगेंदर पांडेय, पिछले कुछ हफ्तों से बेहद परेशान थे। घर की दराजों में रखे पैसे रहस्यमयी तरीके से गायब हो रहे थे।

कभी 10 हजार, कभी 50 हजार… देखते ही देखते 4 लाख 40 हजार रुपये गायब हो चुके थे। सबसे अजीब बात यह थी कि न तो घर का ताला टूटा था, न ही खिड़कियों से कोई छेड़छाड़ हुई थी। ऐसा लगता था जैसे कोई ‘अदृश्य साया’ घर में आता है और सफाई से हाथ साफ करके चला जाता है। शक की सुई कई लोगों पर घूमी, लेकिन बिना सबूत के किसी अपने पर उंगली उठाना मनोज तिवारी जैसे दरियादिल इंसान के लिए मुश्किल था।

आखिरकार, इस ‘चोर’ को रंगे हाथों पकड़ने के लिए एक जाल बिछाया गया। घर के अंदर चुपचाप CCTV कैमरे इंस्टॉल कर दिए गए। घर के लोगों और कर्मचारियों को शायद इसका आभास भी नहीं था कि अब उनकी हर हरकत रिकॉर्ड हो रही है।

Manoj tiwari sansad

15 जनवरी: रात 9 बजे का वो खौफनाक फुटेज

इंतजार की घड़ियां खत्म हुईं 15 जनवरी 2026 की रात को। मैनेजर प्रमोद पांडेय और सिक्योरिटी टीम की नजरें सीसीटीवी मॉनिटर पर थीं। घड़ी में रात के 9 बज रहे थे। तभी स्क्रीन पर एक हलचल हुई।

एक शख्स घर के अंदर दाखिल हुआ। उसकी चाल में कोई डर नहीं था। उसे पता था कि कौन सा दरवाजा कैसे खुलता है। जैसे ही उसका चेहरा कैमरे की रोशनी में आया, देखने वालों के होश उड़ गए। वो सुरेंद्र कुमार था—मनोज तिवारी का पूर्व कर्मचारी।

फुटेज में जो दिखा, वो रोंगटे खड़े करने वाला था। सुरेंद्र के पास घर के मेन गेट की चाबी तो थी ही, लेकिन हद तो तब हो गई जब उसने अपनी जेब से बेडरूम और कपाट (लॉकर) की भी चाबियां निकाल लीं। वो असली चाबियां नहीं थीं, वो ‘डुप्लीकेट चाबियां’ थीं।

यह दृश्य देखकर यह समझना मुश्किल नहीं था कि सुरेंद्र ने यह चोरी अचानक नहीं की। उसने महीनों पहले ही यह पूरी साजिश रच ली थी। शायद जब वह नौकरी पर था, तभी उसने चाबियों के सांचे ले लिए थे और डुप्लीकेट चाबियां बनवा ली थीं। वह बस सही मौके का इंतजार कर रहा था।

मजबूरी का नाम देकर ‘लालच’ का खेल

अक्सर जब किसी गरीब कर्मचारी पर चोरी का इल्जाम लगता है, तो समाज का एक तबका सहानुभूति रखता है। लोग सोचते हैं— “शायद कोई मजबूरी रही होगी, शायद घर में कोई बीमार होगा।”

लेकिन सुरेंद्र का यह अपराध ‘मजबूरी’ की परिभाषा में फिट नहीं बैठता। पुलिस सूत्रों की मानें तो यह ‘लालच’ (Greed) का मामला है।

सोचिए, अगर किसी को सच में पैसों की सख्त जरूरत होती, तो वह मनोज तिवारी जैसे व्यक्ति के सामने हाथ फैला सकता था। तिवारी अपनी उदारता के लिए जाने जाते हैं, वे मदद जरूर करते। लेकिन सुरेंद्र ने मांगने का नहीं, छीनने का रास्ता चुना।

उसने एक बार में सारे पैसे नहीं चुराए। वह किस्तों में चोरी करता रहा ताकि किसी को शक न हो। यह एक शातिर अपराधी का दिमाग है, मजबूर इंसान का नहीं। उसने उस थाली में छेद किया, जिसमें उसने खाया था।

Manoj tiwari

पुलिस की एंट्री और टूटा हुआ विश्वास

सच्चाई सामने आते ही मैनेजर प्रमोद पांडेय ने एक पल की भी देरी नहीं की। मामला तुरंत अंबोली पुलिस थाने (Amboli Police Station) पहुँचा। सबूत के तौर पर वो सीसीटीवी फुटेज पुलिस को सौंप दिया गया है, जिसमें सुरेंद्र की काली करतूत कैद है।

पुलिस ने आईपीसी (अब बीएनएस) की धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिया है। कुल मिलाकर 5 लाख 40 हजार रुपये की चोरी की पुष्टि हुई है। पुलिस अब सुरेंद्र की तलाश कर रही है और उससे यह उगलवाने की कोशिश करेगी कि क्या इस साजिश में घर का कोई और भेदी भी शामिल है? क्या उसने वो डुप्लीकेट चाबियां किसी और को भी दी हैं?

एक सबक हम सबके लिए

मनोज तिवारी के पैसे शायद पुलिस बरामद कर लेगी। 5 लाख रुपये उनके लिए बड़ी रकम नहीं हो सकती, लेकिन जो ‘भरोसा’ इस घटना ने तोड़ा है, उसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती।

यह घटना हम और आप जैसे आम लोगों के लिए भी एक बड़ी चेतावनी है। हम अक्सर पुराने नौकरों, ड्राइवरों या कर्मचारियों पर आंख मूंदकर भरोसा कर लेते हैं। हम घर की चाबियां मेज पर छोड़ देते हैं। लेकिन याद रखिए, इंसान की नीयत बदलते देर नहीं लगती।

अगर आपके घर से कोई कर्मचारी काम छोड़ कर जा रहा है, तो भावुक होने के बजाय व्यावहारिक बनें। घर के ताले बदल दें। क्योंकि सावधानी ही सुरक्षा है। सुरेंद्र जैसा ‘अपना’ कब ‘पराया’ हो जाए, यह सीसीटीवी लगने तक पता नहीं चलता।

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बिहार में 26 जनवरी से जमीन मापी का मेगा अभियान : विवादित-अविवादित प्लॉट्स की 14 दिनों में ऑनलाइन रिपोर्ट, राजस्व विभाग की बड़ी पहल

जमीन मापी

बिहार में 26 जनवरी से जमीन मापी का मेगा अभियान : बिहार के राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने गणतंत्र दिवस से ठीक पहले एक महत्वपूर्ण घोषणा की है। 26 जनवरी 2026 से राज्यव्यापी विशेष अभियान शुरू होगा, जिसमें विवादित और अविवादित दोनों जमीनों की मापी की जाएगी। यह कार्य 14 दिनों के अंदर पूरा कर रिपोर्ट ऑनलाइन जारी की जाएगी। यह कदम भूमि विवादों को कम करने और पारदर्शी राजस्व प्रणाली सुनिश्चित करने की दिशा में बहुत अच्छा साबित होगा।

अभियान का उद्देश्य: भूमि विवादों पर लगाम

राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के अनुसार, यह अभियान बिहार के हर जिले में एक साथ चलेगा। विवादित जमीनों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा, जहां मालिकाना हक को लेकर लंबे समय से झगड़े चल रहे हैं। अविवादित प्लॉट्स की मापी से रिकॉर्ड को अपडेट किया जाएगा, ताकि भविष्य में कोई असमंजस न रहे। विभाग के सचिव ने कहा, “यह अभियान डिजिटल इंडिया के अनुरूप है। सभी रिपोर्टें ऑनलाइन पोर्टल पर उपलब्ध होंगी, जिससे आम लोग घर बैठे जांच सकेंगे।”

जमीन मापी

अभियान की समयसीमा सख्त है—मापी का काम शुरू होते ही 14 दिनों में रिपोर्ट अपलोड हो जाएगी। इससे न केवल समय बचेगा, बल्कि भ्रष्टाचार की गुंजाइश भी कम होगी। पटना, मुजफ्फरपुर, भागलपुर जैसे जिलों में पायलट प्रोजेक्ट सफल होने के बाद इसे पूरे राज्य में विस्तार दिया जा रहा है।

कैसे होगा अभियान ?

  • प्रथम चरण (26 जनवरी से): टीमों का गठन और जमीनों की सूची तैयार।
  • द्वितीय चरण: GPS-आधारित मापी और ड्रोन सर्वे का उपयोग।
  • अंतिम चरण (14 दिनों में): रिपोर्ट ऑनलाइन जारी, आपत्ति दर्ज करने का अवसर।

विभाग ने 5000 से अधिक कर्मचारियों की टीमें तैयार की हैं। ड्रोन और सैटेलाइट इमेजरी से मापी की सटीकता बढ़ेगी।

जमीन मापी

जनता को लाभ:

किसान और भूमि मालिकों में उत्साह है। एक पटना के किसान ने बताया, “लंबे समय से जमीन विवाद में फंसे हैं। यह अभियान राहत देगा।” विशेषज्ञों का कहना है कि इससे कोर्ट केस 30% कम हो सकते हैं। सरकार ने हेल्पलाइन नंबर भी जारी किया है, जहां लोग अपनी जमीन की स्थिति चेक कर सकेंगे।

यह अभियान बिहार में भूमि सुधार की नई क्रांति लाएगा और क्या यह विवादों को हमेशा के लिए खत्म कर पाएगा? आप कमेंट्स में बता सकते है|

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तेजस्वी के ‘सिस्टम’ वाले वार पर चिराग का पलटवार, क्या EVM के बहाने हार छिपा रही RJD?

तेजस्वी

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के बाद 2026 की शुरुआत में भी सियासी पारा थमा नहीं है। एनडीए (NDA) की शानदार जीत और महागठबंधन की करारी शिकस्त के बाद अब बयानों के तीर चल रहे हैं। तेजस्वी यादव जहाँ इसे ‘लोकतंत्र की हार’ बता रहे हैं, वहीं चिराग पासवान इसे ‘अहंकार की हार’ करार दे रहे हैं।

तेजस्वी यादव का बड़ा आरोप: “मशीनरी जीती, लोकतंत्र हारा”

हाल ही में पटना एयरपोर्ट पर मीडिया से बातचीत के दौरान नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने चुनावी नतीजों पर गंभीर सवाल खड़े किए। तेजस्वी ने आरोप लगाया कि सत्ताधारी दल ने चुनाव जीतने के लिए सरकारी मशीनरी, धनबल और साजिश का सहारा लिया है।

तेजस्वी

तेजस्वी के प्रमुख आरोप:

• मशीनरी का दुरुपयोग: तेजस्वी ने कहा कि यह जनता का जनादेश नहीं, बल्कि ‘मशीनरी की जीत’ है।

• EVM और डेटा पर सवाल: उन्होंने निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा डेटा जारी करने में देरी और विसंगतियों पर भी निशाना साधा।

• 100 दिनों का अल्टीमेटम: तेजस्वी ने कहा कि वह फिलहाल 100 दिनों तक सरकार के खिलाफ कुछ नहीं बोलेंगे ताकि वे अपने वादे पूरे कर सकें, लेकिन अगर वादे पूरे नहीं हुए तो बड़ा आंदोलन होगा।

चिराग पासवान का कड़ा जवाब: “अपनी हार की जिम्मेदारी लेना सीखें”

तेजस्वी के इन आरोपों पर केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने कड़ा रुख अपनाया है। चिराग ने कहा कि जब भी विपक्ष हारता है, वह EVM और सिस्टम को दोष देने लगता है। उन्होंने तेजस्वी को सलाह दी कि वे कमरे में बंद होकर हार पर मंथन करने के बजाय जनता के बीच आएं और अपनी कमियों को स्वीकार करें।

चिराग पासवान के बयान की मुख्य बातें:

• हार की जिम्मेदारी: चिराग ने कहा, “लोकतंत्र में जनता का फैसला सर्वोपरि होता है। तेजस्वी जी को अपनी हार स्वीकार करनी चाहिए न कि प्रशासन पर दोष मढ़ना चाहिए।”

• अहंकार का अंत: चिराग के अनुसार, जनता ने आरजेडी के अहंकार को नकार दिया है और विकास के नाम पर एनडीए को चुना है।

• युवा नेतृत्व पर सवाल: चिराग ने तंज कसते हुए कहा कि 21वीं सदी के युवा नेता अगर अभी भी जातिवाद और पुरानी राजनीति करेंगे, तो जनता उन्हें ऐसे ही सबक सिखाती रहेगी।

चुनावी आंकड़े: आखिर क्यों तिलमिलाई है RJD?

2025 के अंत में आए नतीजों ने बिहार का राजनीतिक नक्शा बदल दिया है। यहाँ देखें सीटों का गणित:

  • NDA (BJP+JDU+LJP+OTHERS) – 202 – प्रचंड बहुमत .
  • महाठबंधन (RJD+INC+LEFT) – 35-40 -करारी शिकस्त .
  • अन्य (AIMIM+BSP+IND) – 5-10 – सामान्य

भाजपा 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, जबकि चिराग पासवान की पार्टी ने 19 सीटों पर जीत दर्ज कर 100% के करीब स्ट्राइक रेट रखा। तेजस्वी की राजद जो 2020 में 75 सीटों पर थी, वह घटकर मात्र 25-26 सीटों पर सिमट गई।

क्या वाकई ‘सिस्टम’ ने खेल किया या रणनीति फेल हुई?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तेजस्वी यादव का ‘सिस्टम’ पर सवाल उठाना उनके कैडर को एकजुट रखने की एक कोशिश हो सकती है, लेकिन धरातल पर कुछ अन्य कारण रहे:

• महिला वोट बैंक: एनडीए की ‘लाडली बहना’ जैसी योजनाओं ने महिलाओं को साइलेंट वोटर बना दिया।

• युवाओं का झुकाव: चिराग पासवान और भाजपा के ‘रोजगार और विकास’ के विजन ने युवाओं को आकर्षित किया।

• रणनीतिक चूक: महागठबंधन के अंदर सीटों का बंटवारा और आपसी खींचतान भी हार की बड़ी वजह बनी।

तेजस्वी

क्या बिहार में शुरू होगी नई राजनीति?

तेजस्वी और चिराग के बीच का यह वाकयुद्ध बिहार में ‘नई पीढ़ी के नेतृत्व’ की लड़ाई को दर्शाता है। जहाँ एक तरफ तेजस्वी यादव सिस्टम पर सवाल उठाकर अपनी राजनीतिक जमीन बचाने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं चिराग पासवान खुद को विकासवादी और भविष्य के नेता के रूप में स्थापित कर चुके हैं।

आने वाले 100 दिन बिहार की राजनीति के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। क्या नीतीश-बीजेपी सरकार अपने वादे पूरे कर पाएगी, या तेजस्वी के आरोपों को जनता की सहानुभूति मिलेगी?

क्या आपको लगता है कि तेजस्वी यादव का ‘सिस्टम’ पर सवाल उठाना सही है, या उन्हें अपनी हार के कारणों को खुद के भीतर तलाशना चाहिए? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।

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Owaisi Hijab Statement: ‘हिजाब वाली PM’ के सपने पर गिरिराज सिंह और संतोष सुमन का पलटवार, बिहार में छिड़ा सियासी संग्राम

हिजाब

AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के ‘हिजाब’ को लेकर दिए गए हालिया बयान ने बिहार की राजनीति में उबाल ला दिया है। ओवैसी ने महाराष्ट्र के सोलापुर में एक चुनावी सभा के दौरान कहा कि उनका सपना है कि एक दिन इस देश की प्रधानमंत्री ‘हिजाब’ पहनने वाली बेटी बने। इस बयान के बाद बिहार एनडीए (NDA) के दिग्गज नेताओं ने मोर्चा खोल दिया है और इसे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिश करार दिया है।

हिजाब

ओवैसी का बयान: संविधान की दुहाई और ‘हिजाब वाली PM’ का सपना

शुक्रवार, 10 जनवरी 2026 को सोलापुर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए असदुद्दीन ओवैसी ने भारत और पाकिस्तान के संविधान की तुलना की। उन्होंने कहा:

“पाकिस्तान का संविधान कहता है कि वहां केवल एक खास धर्म का व्यक्ति ही प्रधानमंत्री बन सकता है, लेकिन बाबा साहब अंबेडकर का संविधान हर भारतीय को यह हक देता है। मेरा सपना है कि एक दिन हिजाब पहनने वाली एक बेटी भारत की प्रधानमंत्री बने।”

ओवैसी ने यह भी कहा कि नफरत फैलाने वाली ताकतें ज्यादा दिनों तक नहीं टिकेंगी और एक दिन प्यार की जीत होगी।

गिरिराज सिंह का तीखा हमला: ‘गजवा-ए-हिंद’ की सोच नहीं होगी सफल

केंद्रीय मंत्री और बेगुसराय के सांसद गिरिराज सिंह ने शनिवार को पटना में मीडिया से बात करते हुए ओवैसी पर सीधा प्रहार किया। उन्होंने ओवैसी की इस सोच को ‘जिहादी मानसिकता’ से जोड़ा।

गिरिराज सिंह के प्रमुख आरोप:

गजवा-ए-हिंद का एजेंडा: गिरिराज सिंह ने आरोप लगाया कि ओवैसी के मन में ‘गजवा-ए-हिंद’ की कल्पना चल रही है, जिसे भारत में कभी सफल नहीं होने दिया जाएगा।

दूसरा पाकिस्तान नहीं बनेगा: उन्होंने कड़े लहजे में कहा कि कांग्रेस की तुष्टीकरण की नीतियों के कारण देश का बंटवारा एक बार हो चुका है, अब दोबारा कोई ‘पाकिस्तान’ भारत की धरती पर नहीं बनेगा।

जिन्ना का भूत: सिंह ने तंज कसते हुए कहा कि अगर किसी के अंदर ‘जिन्ना का भूत’ घुस गया है, तो उसे निकाल दिया जाएगा। भारत केवल कानून और संविधान से चलेगा, किसी शरीयत से नहीं।

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संतोष सुमन की प्रतिक्रिया: “सपने देखने पर रोक नहीं, पर देश मोदी के साथ”

बिहार सरकार के मंत्री और ‘हम’ (HAM) नेता संतोष कुमार सुमन ने भी इस मुद्दे पर अपनी राय रखी। उन्होंने ओवैसी के बयान को अनावश्यक और ध्यान भटकाने वाला बताया।

संतोष सुमन ने कहा, “लोकतंत्र में हर किसी को सपना देखने का अधिकार है, लेकिन देश की जनता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व पर भरोसा जताया है। ओवैसी केवल अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पाने के लिए इस तरह के संवेदनशील मुद्दों को हवा दे रहे हैं।” उन्होंने आगे कहा कि बिहार और देश का विकास विकासवाद से होगा, न कि हिजाब या नकाब की राजनीति से।

हिजाब

बिहार में क्यों गरमाया है यह मुद्दा?

बिहार की राजनीति में ओवैसी की पार्टी AIMIM एक महत्वपूर्ण फैक्टर बन चुकी है, खासकर सीमांचल के इलाकों (पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज, अररिया) में।

वोट बैंक की राजनीति: एनडीए नेताओं को लगता है कि ओवैसी ऐसे बयान देकर मुस्लिम वोटों को लामबंद (Consolidate) करने की कोशिश कर रहे हैं।

2026 के समीकरण: आने वाले चुनावों को देखते हुए बीजेपी और उसके सहयोगी दल ओवैसी के हर बयान पर ‘प्रखर राष्ट्रवाद’ के साथ पलटवार कर रहे हैं।

आपकी राय क्या है? क्या आपको लगता है कि इस तरह के बयानों से जनता के बुनियादी मुद्दों (शिक्षा, रोजगार) से ध्यान भटकता है? अपनी राय हमें जरूर बताएं।

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महाराष्ट्र निकाय चुनाव 2026: क्या ‘एवेंजर्स’ दिलाएंगे जीत? राजनीति में AI और सुपरहीरोज की धमाकेदार एंट्री

महाराष्ट्र

महाराष्ट्र के आगामी नगर निकाय चुनावों (BMC Elections 2026) में प्रचार का अंदाज पूरी तरह बदल गया है। अब रैलियों और पर्चों से ज्यादा शोर सोशल मीडिया पर ‘आयरन मैन’ और ‘हल्क’ जैसे सुपरहीरोज मचा रहे हैं, जो फिल्मी पर्दे से निकलकर सीधे चुनावी दंगल में उतर आए हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से बनाए गए ये वीडियो इंटरनेट पर तहलका मचा रहे हैं और वोटर्स के बीच चर्चा का मुख्य विषय बन गए हैं।

महाराष्ट्र निकाय चुनाव 2026: प्रचार का हाई-टेक अवतार

महाराष्ट्र की राजनीति हमेशा से अपने ट्विस्ट और टर्न के लिए जानी जाती है, लेकिन 15 जनवरी 2026 को होने वाले नगर निकाय चुनावों ने प्रचार के मामले में एक नई मिसाल पेश की है। मुंबई (BMC), पुणे (PMC), और नासिक जैसे बड़े शहरों में इस बार मुकाबला सिर्फ महायुति और महाविकास अघाड़ी के बीच नहीं है, बल्कि तकनीक के मोर्चे पर भी है।

हाल ही में इंस्टाग्राम और फेसबुक पर ऐसे दर्जनों वीडियो वायरल हुए हैं जिनमें एवेंजर्स (Avengers) के किरदारों को स्थानीय राजनीतिक दलों का प्रचार करते देखा जा रहा है। कहीं ‘थैनोस’ चुनावी नामांकन भरता दिख रहा है, तो कहीं ‘आयरन मैन’ मराठी में किसी खास पार्टी के लिए वोट मांग रहा है। यह AI तकनीक का वह जादू है जिसने चुनाव प्रचार को एक ‘फिल्मी एंटरटेनमेंट’ बना दिया है।

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‘एवेंजर्स’ और ‘सुपरहीरोज’ की एंट्री: वायरल वीडियो का सच

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इन वीडियोज में हॉलीवुड के मशहूर सुपरहीरोज को महाराष्ट्र के नेताओं के साथ या उनके समर्थकों के रूप में दिखाया जा रहा है। यह कंटेंट मुख्य रूप से Generative AI और Deepfake तकनीक का उपयोग करके बनाया गया है।

क्यों पसंद किए जा रहे हैं ये वीडियो?

युवा वोटर्स से जुड़ाव: पहली बार वोट देने वाले युवा (Gen Z) इन किरदारों से खुद को जोड़ पाते हैं।

क्रिएटिविटी और ह्यूमर: उबाऊ भाषणों के बजाय व्यंग्य और मनोरंजन के जरिए अपनी बात कहना लोगों को पसंद आ रहा है।

स्थानीय तड़का: हॉलीवुड किरदारों को शुद्ध मराठी या स्थानीय बोलियों में बात करते देखना कौतूहल पैदा करता है।

इन वीडियो में आयरन मैन, हल्क, थैनोस और कैप्टन अमेरिका जैसे किरदारों को पार्टी के झंडे और चुनाव चिन्ह के साथ चुनावी रैलियां करते दिखाया गया है। हालांकि, कई स्वतंत्र क्रिएटर्स का दावा है कि ये वीडियो किसी पार्टी के आधिकारिक कैंपेन का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स द्वारा ‘इंगेजमेंट’ के लिए बनाए गए हैं।

AI का चुनावी इस्तेमाल: वरदान या चुनौती?

नगर निकाय चुनावों में AI का उपयोग केवल सुपरहीरोज तक सीमित नहीं है। इस बार राजनीतिक दल डेटा एनालिटिक्स और पर्सनलाइज्ड मैसेजिंग के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रहे हैं।

AI का रणनीतिक उपयोग

कस्टमाइज्ड वॉयस कॉल्स: AI की मदद से उम्मीदवारों की आवाज में लाखों मतदाताओं को व्यक्तिगत कॉल किए जा रहे हैं।

वोटर डेटा एनालिसिस: AI एल्गोरिदम के जरिए यह समझा जा रहा है कि किस वार्ड में कौन सा मुद्दा सबसे ज्यादा प्रभावी है।

मल्टीलिंगुअल कैंपेन: एक ही वीडियो संदेश को AI टूल के जरिए विभिन्न भाषाओं और बोलियों में बदलकर प्रसारित किया जा रहा है।

आंकड़े बताते हैं कि 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद, 2026 के इन निकाय चुनावों में AI पर होने वाला खर्च करीब 30-40% तक बढ़ गया है। अकेले मुंबई (BMC) चुनावों के लिए डिजिटल कैंपेनिंग का बजट करोड़ों में पहुंच गया है।

चुनाव आयोग की सतर्कता और नैतिकता के सवाल

जहाँ एक तरफ AI ने प्रचार को मजेदार बनाया है, वहीं इसने डीपफेक (Deepfakes) और गलत सूचना (Misinformation) का खतरा भी बढ़ा दिया है। चुनाव आयोग (State Election Commission) के लिए यह एक बड़ी चुनौती है कि कैसे असली और नकली कंटेंट के बीच फर्क किया जाए।

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि सुपरहीरोज का उपयोग तो मासूम मनोरंजन लग सकता है, लेकिन अगर AI का उपयोग विपक्षी नेताओं की छवि खराब करने वाले ‘फेक वीडियो’ बनाने में किया गया, तो यह लोकतंत्र के लिए घातक हो सकता है। चुनाव आयोग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को कड़े निर्देश दिए हैं कि वे चुनावी सामग्री पर ‘AI-Generated’ लेबल लगाना अनिवार्य करें।

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2026 के निकाय चुनावों का मुख्य समीकरण

इस बार के चुनाव केवल तकनीक नहीं, बल्कि बड़े राजनीतिक गठबंधनों की अग्निपरीक्षा भी हैं:

महायुति: भाजपा, एकनाथ शिंदे की शिवसेना और अजित पवार की NCP एक साथ मजबूती से मैदान में हैं।

महाविकास अघाड़ी (MVA): उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT), शरद पवार की NCP (SP) और कांग्रेस मिलकर चुनौती दे रहे हैं।

राज ठाकरे का फैक्टर: मनसे (MNS) ने भी सोशल मीडिया और AI का भारी इस्तेमाल करते हुए अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है।

महत्वपूर्ण जानकारी:

मतदान की तारीख: 15 जनवरी, 2026

नतीजे: 16 जनवरी, 2026

कुल मतदाता (मुंबई): 1.03 करोड़ से अधिक

क्या आपको लगता है कि AI और सुपरहीरोज वाले ये वीडियो आपके मतदान के फैसले को प्रभावित कर सकते हैं? हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं!

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Kolkata ED Raid: ममता, IPAC और ‘गायब’ सबूत! 5 घंटे का हाई-वोल्टेज ड्रामा, क्या सच छिपाने पहुंची थीं दीदी?

Kolkata ED

क्या एक मुख्यमंत्री का काम जाँच एजेंसी के काम में दखल देना है? या फिर ‘रेड’ वाली जगह पर खुद जाकर बैठ जाना है? आज यानी 8 जनवरी 2026 को कोलकाता में जो हुआ, उसने भारतीय राजनीति और संघीय ढांचे (Federal Structure) को शर्मसार कर दिया है। कोलकाता में चुनावी रणनीतिकार संस्था IPAC के ऑफिस और उसके प्रमुख प्रतीक जैन (Pratik Jain) के घर पर Kolkata ED (प्रवर्तन निदेशालय) की रेड चल रही थी।

तभी कुछ ऐसा हुआ जिसकी उम्मीद किसी को नहीं थी। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद मौके पर पहुंच गईं। ED का आरोप है कि इस दौरान “सबूत मिटाए गए”, जबकि ममता इसे “साजिश” बता रही हैं। आखिर सच क्या है? आइए, इस रिपोर्ट में जानते हैं आज के इस हाई-वोल्टेज ड्रामे की पूरी कहानी।

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सुबह की रेड और शाम का बवाल: क्या हुआ आज?

मामला सुबह शुरू हुआ जब ED की टीम ने कथित वित्तीय अनियमितताओं (Financial Irregularities) को लेकर IPAC के कोलकाता स्थित दफ्तर और प्रतीक जैन के आवास पर छापेमारी शुरू की। प्रतीक जैन, तृणमूल कांग्रेस (TMC) के चुनावी अभियानों को संभालने वाले प्रमुख व्यक्ति माने जाते हैं।

  • शाम होते-होते खबर आई कि ममता बनर्जी खुद प्रतीक जैन के घर पहुंच गई हैं।
  • जैसे ही सीएम वहां पहुंचीं, उनके समर्थकों की भारी भीड़ जमा हो गई।
  • पुलिस और केंद्रीय बलों (CAPF) के बीच धक्का-मुक्की की तस्वीरें सामने आईं।
  • माहौल इतना तनावपूर्ण हो गया कि ED अधिकारियों को अपनी सुरक्षा की चिंता सताने लगी।

ED का सनसनीखेज दावा: “CM की आड़ में सबूत हटाए गए”

इस पूरे मामले में सबसे गंभीर मोड़ तब आया जब ED ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। रिपोर्ट्स (Times of India, The Hindu) के मुताबिक, ED ने आरोप लगाया है कि मुख्यमंत्री के वहां पहुंचने के बाद मची अफरा-तफरी का फायदा उठाया गया।

ED के प्रमुख आरोप:

  • भीड़ और वीवीआईपी मूवमेंट की आड़ में कुछ महत्वपूर्ण डिजिटल डिवाइस (Digital Devices) और दस्तावेज मौके से हटा दिए गए।
  • अधिकारियों को अपना काम करने से रोका गया।
  • यह सीधे तौर पर सबूत मिटाने (Tampering with Evidence) का मामला है।
  • ममता का तर्क: “यह राजनीतिक प्रतिशोध है”
  • दूसरी तरफ, ममता बनर्जी ने वही पुराना तर्क दिया है जो हर नेता फंसने पर देता है—”राजनीतिक साजिश”।

बाहर आकर उन्होंने मीडिया से कहा कि केंद्र सरकार एजेंसियों का इस्तेमाल करके विपक्ष की आवाज दबाना चाहती है। उनका कहना है कि IPAC और प्रतीक जैन को जानबूझकर परेशान किया जा रहा है क्योंकि वे TMC के लिए काम करते हैं।

लेकिन सवाल यह है कि अगर यह सिर्फ परेशान करना था, तो कोर्ट में लड़ने के बजाय सीएम को खुद रेड वाली जगह पर जाने की क्या जरूरत थी?

भारतीय राजनीति का कड़वा सच: भ्रष्टाचार करो और फिर सीनाजोरी!

अब आते हैं उस मुद्दे पर जो हर आम भारतीय के मन में चुभ रहा है। आज की घटना ने यह साबित कर दिया है कि भारत के राजनेता कानून को अपनी जेब में रखते हैं।

जरा सोचिए, अगर किसी आम आदमी के घर पुलिस या इनकम टैक्स की रेड पड़े, तो क्या कोई मुख्यमंत्री उसे बचाने उसके घर जाएगा? नहीं! तो फिर प्रतीक जैन या IPAC के लिए इतना स्पेशल ट्रीटमेंट क्यों?

हमारे नेताओं का पैटर्न देखिए:

  • पहले सत्ता में रहकर जमकर भ्रष्टाचार (Corruption) करो।
  • जब एजेंसियां जांच करें, तो उसे “लोकतंत्र पर हमला” बता दो।
  • और जब पकड़े जाने का डर हो, तो भीड़ तंत्र (Mobocracy) का सहारा लेकर सबूत गायब करवा दो।
  • क्या यह देश का संविधान है? क्या एक सीएम पद की गरिमा यह शोभा देती है कि वह एक जांच के बीच में बाधा बनें?

क्या सबूतों को बचा पाएगी ED?

फिलहाल ED ने स्थानीय कोर्ट में शिकायत दर्ज कराई है और सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित करने की मांग की है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जो नुकसान होना था, क्या वह हो चुका है?

सूत्रों का कहना है कि ED के पास बैकअप डेटा मौजूद हो सकता है, लेकिन ‘फिजिकल एविडेंस’ का गायब होना केस को कमजोर कर सकता है। यह लड़ाई अब सिर्फ कोलकाता की सड़कों पर नहीं, बल्कि कोर्ट रूम में लड़ी जाएगी।

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राजनितिक साजिशो का जाल

8 जनवरी 2026 का दिन याद रखा जाएगा, लेकिन किसी अच्छी वजह से नहीं। यह दिन हमें याद दिलाता है कि भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं। जब रक्षक ही भक्षक के बचाव में उतर आएं, तो न्याय की उम्मीद किससे की जाए?

जनता को अब यह समझना होगा कि ये “राजनीतिक साजिश” के नारे सिर्फ अपनी काली कमाई और काले कारनामों को छिपाने का एक ढाल हैं। अगर नेता ईमानदार हैं, तो उन्हें जांच से डर क्यों लगता है? और अगर डर लगता है, तो मतलब साफ है—दाल में सिर्फ कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है।

आपकी राय: क्या ममता बनर्जी का रेड के दौरान वहां जाना सही था? या यह सत्ता का दुरुपयोग है? कमेंट में अपनी बेबाक राय जरूर लिखें।

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तेजस्वी यादव का ‘ऑपरेशन क्लीन’: विदेश से लौटते ही एक्शन मोड में नेता प्रतिपक्ष, क्या भितरघातियों पर गिरेगी गाज?

तेजस्वी यादव

बिहार की राजनीति में एक बार फिर गर्माहट बढ़ गई है। विदेश दौरे से वापस लौटते ही राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के कद्दावर नेता तेजस्वी यादव पूरी तरह एक्शन मोड में नजर आ रहे हैं। सियासी गलियारों में चर्चा है कि तेजस्वी अब पार्टी के भीतर उन ‘विभीषणों’ की छंटनी करने वाले हैं, जिन्होंने पिछले चुनावों में पीठ पीछे वार किया था। ‘भितरघात’ करने वाले नेताओं की एक लंबी सूची तैयार हो चुकी है, जिस पर आज अंतिम मुहर लग सकती है।

पार्टी संगठन में ‘सर्जरी’ की तैयारी: क्यों जरूरी हुआ यह फैसला?

तेजस्वी यादव का यह कदम केवल अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं है, बल्कि आगामी विधानसभा चुनावों से पहले पार्टी को पूरी तरह दुरुस्त करने की एक सोची-समझी रणनीति है। आरजेडी के शीर्ष सूत्रों का कहना है कि तेजस्वी अब पार्टी में केवल ‘क्राउड पुलर’ नेताओं को ही नहीं, बल्कि वफादार कार्यकर्ताओं को भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देना चाहते हैं।

तेजस्वी यादव

भीतरघातियों की लिस्ट तैयार

हालिया चुनावों के परिणामों की समीक्षा के दौरान यह बात सामने आई थी कि कई सीटों पर आरजेडी के स्थानीय नेताओं और पदाधिकारियों ने पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवारों के खिलाफ काम किया। कहीं जातीय समीकरणों को बिगड़ा गया, तो कहीं विपक्षी दलों के साथ गुप्त साठगांठ की गई। तेजस्वी यादव ने खुद इन रिपोर्ट्स का बारीकी से अध्ययन किया है।

युवाओं को तरजीह, पुराने चेहरों पर संशय

खबर है कि इस ‘क्लीनअप’ अभियान के तहत पार्टी के पुराने और निष्क्रिय पड़ चुके जिलाध्यक्षों और प्रदेश स्तर के पदाधिकारियों को बदला जा सकता है। तेजस्वी की कोशिश है कि पार्टी में ‘माई’ (MY – Muslim-Yadav) समीकरण के साथ-साथ ‘ए टू जेड’ (A to Z) वाली छवि को और मजबूती दी जाए, जिसके लिए युवा और ऊर्जावान चेहरों को आगे लाया जा रहा है।

तेजस्वी यादव का ‘विदेशी दौरा’ और बिहार की सियासत

तेजस्वी यादव पिछले कुछ दिनों से निजी यात्रा पर विदेश में थे। उनकी अनुपस्थिति में बिहार की राजनीति में कई बदलाव आए। सत्ता पक्ष ने उनकी गैर-मौजूदगी पर सवाल उठाए, लेकिन तेजस्वी ने सोशल मीडिया और अपने करीबियों के जरिए बिहार की हर छोटी-बड़ी गतिविधि पर नजर बनाए रखी।

क्या था मिशन और वापसी के मायने?

तेजस्वी की वापसी के साथ ही आरजेडी मुख्यालय में हलचल तेज हो गई है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह के साथ उनकी लंबी बैठक होने वाली है। इस बैठक का मुख्य एजेंडा उन बागियों पर कार्रवाई करना है, जिन्होंने पिछले चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवारों का समर्थन किया था।

अनुशासन समिति की रिपोर्ट और संभावित कार्रवाई

आरजेडी की अनुशासन समिति ने राज्य के विभिन्न जिलों से आई शिकायतों के आधार पर एक गोपनीय रिपोर्ट तैयार की है।

रिपोर्ट के मुख्य बिंदु:

• सीमांचल और कोसी क्षेत्र: यहां कई बड़े नेताओं पर चुनाव के दौरान निष्क्रिय रहने का आरोप है।

• मगध बेल्ट: यहां टिकट वितरण से नाराज कुछ नेताओं ने दूसरी पार्टियों की मदद की।

• सारण और तिरहुत: यहां समन्वय की कमी के कारण पार्टी को कुछ नजदीकी मुकाबलों में हार का सामना करना पड़ा।

इन रिपोर्टों के आधार पर माना जा रहा है कि आज कम से कम 20 से 25 बड़े पदाधिकारियों को उनके पदों से मुक्त किया जा सकता है। कुछ को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से भी निलंबित करने की तैयारी है।

2026 विधानसभा चुनाव का रोडमैप

बिहार में 2026 के विधानसभा चुनाव को लेकर अभी से बिसात बिछनी शुरू हो गई है। तेजस्वी यादव जानते हैं कि अगर संगठन में फूट रही, तो नीतीश कुमार और बीजेपी के गठबंधन को चुनौती देना मुश्किल होगा।

बूथ स्तर पर मजबूती

तेजस्वी यादव का जोर अब ‘बूथ जीतो, चुनाव जीतो’ के मंत्र पर है। वे चाहते हैं कि पार्टी का हर कार्यकर्ता सीधे जनता से जुड़ा हो। भितरघात करने वाले नेताओं को हटाकर वे संदेश देना चाहते हैं कि अनुशासनहीनता किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

तेजस्वी यादव

जातीय गणना और ‘A to Z’ फॉर्मूला

नीतीश सरकार द्वारा कराई गई जातीय गणना के आंकड़ों के बाद, तेजस्वी अपनी रणनीति को और धार दे रहे हैं। वे अति पिछड़ों (EBC) और दलितों को पार्टी के मुख्य ढांचे में बड़ी हिस्सेदारी देने की योजना बना रहे हैं, ताकि आरजेडी की छवि केवल एक या दो जातियों तक सीमित न रहे।

क्या आपको लगता है कि पार्टी के भीतर ‘भितरघात’ करने वाले नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाकर तेजस्वी यादव 2026 में मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँच पाएंगे? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

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लालू यादव के नाती आदित्य अब बनेंगे फौजी! सिंगापुर में लेंगे कठिन मिलिट्री ट्रेनिंग, भावुक हुईं रोहिणी आचार्य

लालू यादव

बिहार की राजनीति के सबसे कद्दावर चेहरों में से एक, लालू प्रसाद यादव के परिवार से एक बड़ी और प्रेरणादायक खबर सामने आ रही है। लालू यादव के नाती और रोहिणी आचार्य के बड़े बेटे आदित्य अब सेना की वर्दी पहनकर देश सेवा का जज्बा दिखाएंगे। आदित्य सिंगापुर में दो साल की अनिवार्य बेसिक मिलिट्री ट्रेनिंग (BMT) के लिए रवाना हो गए हैं, जिसे लेकर उनकी माँ रोहिणी आचार्य ने सोशल मीडिया पर एक दिल छू लेने वाला संदेश साझा किया है।

लालू परिवार के लिए गर्व का क्षण: रोहिणी आचार्य ने साझा की खुशी

राजद (RJD) प्रमुख लालू प्रसाद यादव के परिवार के सदस्य अक्सर अपनी राजनीतिक सक्रियता के लिए चर्चा में रहते हैं, लेकिन इस बार मौका राजनीति का नहीं, बल्कि अनुशासन और सैन्य प्रशिक्षण का है। रोहिणी आचार्य, जो अपनी मुखरता और अपने पिता के प्रति समर्पण के लिए जानी जाती हैं, उन्होंने अपने बेटे आदित्य के जीवन के इस नए पड़ाव की जानकारी सार्वजनिक की है।

लालू यादव

रोहिणी आचार्य का भावुक सोशल मीडिया पोस्ट

रोहिणी ने अपने बेटे आदित्य की तस्वीर साझा करते हुए ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा कि आज उनका सीना गर्व से चौड़ा हो गया है। उन्होंने बताया कि उनके बेटे ने अपनी प्री-यूनिवर्सिटी की पढ़ाई सफलतापूर्वक पूरी कर ली है और अब वह 18 साल की उम्र में सिंगापुर की नेशनल सर्विस (National Service) के तहत मिलिट्री ट्रेनिंग का हिस्सा बनने जा रहे हैं।

रोहिणी ने अपने पोस्ट में लिखा:

“आदित्य, तुम हमेशा से बहुत बहादुर और अनुशासित रहे हो। जीवन की कठिन चुनौतियों में ही असली व्यक्तित्व का निर्माण होता है। जाओ और अपनी मेहनत से हमें गौरवान्वित करो।”

सिंगापुर में अनिवार्य नेशनल सर्विस: क्या है इसके नियम?

कई लोगों के मन में यह सवाल है कि आदित्य सिंगापुर में मिलिट्री ट्रेनिंग क्यों ले रहे हैं। दरअसल, सिंगापुर के कानून बहुत सख्त हैं और वहां रक्षा को लेकर एक विशेष व्यवस्था है जिसे ‘नेशनल सर्विस’ कहा जाता है।

1. 18 साल की उम्र और अनिवार्य सेवा

सिंगापुर के कानून के मुताबिक, प्रत्येक स्वस्थ पुरुष नागरिक और दूसरी पीढ़ी के स्थायी निवासी (Permanent Residents) के लिए 18 साल की उम्र पूरी होने पर नेशनल सर्विस करना कानूनी रूप से अनिवार्य है। आदित्य इसी श्रेणी में आते हैं क्योंकि उनका परिवार लंबे समय से सिंगापुर में रह रहा है।

2. दो साल का कठिन प्रशिक्षण

यह ट्रेनिंग मात्र कुछ हफ्तों की नहीं, बल्कि पूरे दो साल की होती है। इस दौरान युवाओं को सेना के कठोर अनुशासन में रहना पड़ता है। ट्रेनिंग की शुरुआत बेसिक मिलिट्री ट्रेनिंग (BMT) से होती है, जिसमें शारीरिक मजबूती और मानसिक दृढ़ता पर जोर दिया जाता है。

लालू यादव

मिलिट्री ट्रेनिंग के दौरान क्या सीखेंगे आदित्य?

सिंगापुर की मिलिट्री ट्रेनिंग को दुनिया की सबसे व्यवस्थित और कठिन ट्रेनिंग्स में से एक माना जाता है। आदित्य को अगले दो वर्षों में निम्नलिखित चरणों से गुजरना होगा:

• शारीरिक फिटनेस: सुबह की कठिन कसरत और लंबी पैदल यात्रा (Route Marches)।

• हथियारों का प्रशिक्षण: अत्याधुनिक हथियारों को चलाने और उनके रखरखाव की जानकारी।

• सर्वाइवल स्किल्स: विपरीत परिस्थितियों में जंगलों या कठिन इलाकों में जीवित रहने के गुर。

• टीम वर्क और लीडरशिप: समूह में काम करना और नेतृत्व की क्षमता विकसित करना।

• फील्ड क्राफ्ट: युद्ध के मैदान में रणनीति बनाना और दुश्मन का सामना करना。

BMT (बेसिक मिलिट्री ट्रेनिंग) पूरी करने के बाद, सैनिकों को उनकी योग्यता के आधार पर विभिन्न यूनिट्स जैसे कि इन्फैंट्री, नेवी, एयरफोर्स या पुलिस फोर्स में तैनात किया जाता है।

राजनीति और पारिवारिक पृष्ठभूमि का प्रभाव

लालू प्रसाद यादव के नाती होने के नाते आदित्य हमेशा से ही सुर्खियों में रहे हैं, लेकिन उन्होंने खुद को अब तक बिहार की सक्रिय राजनीति से दूर रखा है। जहां उनके मामा तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव बिहार की राजनीति की कमान संभाल रहे हैं, वहीं आदित्य ने एक सैनिक के रूप में प्रशिक्षण लेने का फैसला किया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रशिक्षण आदित्य के व्यक्तित्व में एक नया निखार लाएगा। सैन्य अनुशासन किसी भी युवा के लिए भविष्य के करियर चाहे वह राजनीति हो या बिजनेस, एक मजबूत आधार तैयार करता है। रोहिणी आचार्य ने भी हाल ही में संकेत दिए थे कि वह अपनी राजनीतिक व्यस्तताओं से इतर अपने बच्चों के भविष्य और शिक्षा पर अधिक ध्यान देना चाहती हैं।

सोशल मीडिया पर मिल रही हैं शुभकामनाएं

जैसे ही रोहिणी आचार्य का यह पोस्ट वायरल हुआ, लालू परिवार के समर्थकों और चाहने वालों ने आदित्य को बधाई देना शुरू कर दिया। लोग आदित्य के साहस की प्रशंसा कर रहे हैं कि इतनी कम उम्र में उन्होंने देश सेवा के कठिन मार्ग को चुना है। लालू प्रसाद यादव ने भी अपने नाती के इस फैसले पर खुशी जताई है और उन्हें आशीर्वाद दिया है।

लालू यादव

क्या भारत में भी होनी चाहिए ऐसी अनिवार्य सेवा?

आदित्य का सिंगापुर में मिलिट्री ट्रेनिंग लेना न केवल लालू परिवार के लिए गर्व की बात है, बल्कि यह अनुशासन और कर्तव्य के प्रति समर्पण का एक बड़ा संदेश भी देता है। एक राजनैतिक परिवार का बच्चा होने के बावजूद, सिंगापुर के सख्त नियमों का पालन करते हुए सेना में शामिल होना सादगी और नियम-निष्ठा का उदाहरण है।

आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि भारत में भी युवाओं के लिए 2 साल की अनिवार्य सैन्य सेवा (National Service) लागू की जानी चाहिए? इससे युवाओं के व्यक्तित्व पर क्या प्रभाव पड़ेगा? कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर साझा करें।

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JNU Slogans: ‘मोदी-शाह की मौत’ के नारे और उमर खालिद की बेल! 5 सच जो आपको जानने चाहिए 

JNU

क्या देश की सबसे प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में देश के प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की मौत की दुआ मांगना ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ है? कल रात (सोमवार, 5 जनवरी) JNU (जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी) एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गया। सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिल्ली दंगे के आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका (Bail Plea) खारिज करने के तुरंत बाद कैंपस में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए।

खबरों के मुताबिक, इस प्रदर्शन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ बेहद आपत्तिजनक नारे लगाए गए। यह घटना कई गंभीर सवाल खड़े करती है—क्या यह सिर्फ विरोध है या नफरत? और जब फैसला सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया है, तो गुस्सा सरकार पर क्यों?

आइए, इस ब्लॉग में इस पूरे मामले की गहराई से पड़ताल करते हैं।

JNU

कल रात JNU में क्या हुआ?

सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगे (2020) की साजिश रचने के आरोप में जेल में बंद उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया। जैसे ही यह खबर आई, JNU के वामपंथी छात्र संगठनों (Left-wing student groups) ने कैंपस में मार्च निकाला।

आरोप है कि इस दौरान “मोदी-शाह की मौत” और अन्य विवादित नारे लगाए गए। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में छात्र सुप्रीम कोर्ट के फैसले को मानने के बजाय सरकार को कोसते नजर आ रहे हैं। भाजपा नेताओं ने इसे “टुकड़े-टुकड़े गैंग” और “अर्बन नक्सल” की मानसिकता बताया है।

आरोपी के समर्थन में इतना प्यार क्यों? (Why Support the Accused?)

आपका सवाल बिल्कुल जायज है कि एक आरोपी, जिसके खिलाफ कोर्ट को सबूत मिले हैं, उसके लिए छात्र क्यों लड़ रहे हैं?

राजनीतिक चश्मा: JNU में एक बड़ा वर्ग (खासकर लेफ्ट संगठन) इन आरोपियों को ‘दंगाई’ नहीं बल्कि ‘पोलिटिकल प्रिजनर’ (राजनीतिक कैदी) मानता है। उन्हें लगता है कि सरकार अपनी विचारधारा के खिलाफ बोलने वालों को जेल में डाल रही है।

ब्रेनवॉश या विचारधारा? इसे पूरी तरह ‘पैसे देकर नारे लगवाना’ कहना शायद गलत होगा, लेकिन यह वैचारिक ब्रेनवॉश (Ideological Indoctrination) का मामला ज्यादा लगता है। यहाँ छात्रों को यह समझाया जाता है कि ‘स्टेट’ (सत्ता) हमेशा दमनकारी होती है, इसलिए हर पुलिस कार्रवाई का विरोध करना ‘क्रांति’ है।

कोर्ट का फैसला, फिर मोदी को गाली क्यों? (Govt vs Court Logic)

यह इस पूरे मामले का सबसे तार्किक (Logical) पहलू है जिसे आम लोग अक्सर मिस कर देते हैं।

सिस्टम कैसे काम करता है: पुलिस (सरकार के अधीन) गिरफ्तार करती है और सबूत पेश करती है। लेकिन जमानत देना या न देना अदालत (Judiciary) का काम है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला: कल सुप्रीम कोर्ट (जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच) ने साफ कहा कि उमर खालिद और शरजील इमाम के खिलाफ “प्रथम दृष्टया” (Prima Facie) साजिश के सबूत सही लगते हैं।

विपक्ष का खेल: विपक्षी पार्टियां और JNU के छात्र नेता यह बात जानते हैं, लेकिन वे अपने फॉलोअर्स को यह बताते हैं कि “कोर्ट सरकार के दबाव में है।” यह एक नैरेटिव (Narrative) है ताकि वे अपने वोट बैंक और समर्थकों का गुस्सा सरकार की तरफ मोड़ सकें।

हैरानी की बात है कि इसी कोर्ट ने कल 5 अन्य आरोपियों को जमानत दे दी, लेकिन उमर खालिद को नहीं। अगर कोर्ट बिका होता, तो किसी को जमानत न मिलती। यह फर्क उनके फॉलोअर्स को नहीं बताया जाता।

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JNU ही क्यों? (Why always JNU?)

JNU देश की सबसे बेहतरीन यूनिवर्सिटीज में से एक है, लेकिन यह वामपंथी राजनीति (Left Politics) का गढ़ भी है।

यहाँ छात्रों को पढ़ाई के साथ-साथ ‘एक्टिविज्म’ की घुट्टी पिलाई जाती है।

एक खास विचारधारा है जो मानती है कि भारत का मौजूदा ढांचा गलत है। इसलिए जब भी सरकार (खासकर भाजपा) कोई कदम उठाती है, तो JNU सबसे पहले विरोध करता है।

यह एक “इकोसिस्टम” बन गया है जहाँ सरकार विरोधी होना ‘बौद्धिक’ (Intellectual) होने की निशानी मानी जाती है।

मौत की दुआ मांगना: विरोध या विकृति?

लोकतंत्र में विरोध का अधिकार सबको है। आप कह सकते हैं कि “मैं सरकार की नीतियों से सहमत नहीं हूँ।”

लेकिन, “मोदी-शाह की मौत” जैसे नारे लगाना विरोध नहीं, बल्कि हेट स्पीच (Hate Speech) है। यह दर्शाता है कि विरोध अब वैचारिक लड़ाई से आगे बढ़कर व्यक्तिगत नफरत में बदल गया है। जब तर्क खत्म हो जाते हैं, तब गालियां और बददुआएं शुरू होती हैं।

JNU

क्या शिक्षा पर हावी हो रही राजनीति ?

JNU की दीवारों पर लिखे नारे और हवा में गूंजती आवाजें यह बताती हैं कि वहां शिक्षा से ज्यादा राजनीति हावी है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करना हर नागरिक का कर्तव्य है। अगर कोर्ट ने जमानत नहीं दी, तो इसका मतलब है कि कानून को सबूतों में दम दिखा है।

ऐसे में छात्रों का एक आरोपी के पक्ष में देश के नेताओं को मरने की बददुआ देना न केवल शर्मनाक है, बल्कि यह उस ‘माइंड वॉश’ की ओर इशारा करता है जहाँ सच और झूठ का फर्क मिटा दिया गया है।

आपकी इस पर क्या राय है? क्या छात्रों को कोर्ट के फैसले के खिलाफ ऐसे नारे लगाने चाहिए? कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

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लालू प्रसाद यादव को दिल्ली हाई कोर्ट से बड़ा झटका, चार्ज फ्रेमिंग पर रोक से इनकार; जानें क्या है पूरा कानूनी विवाद

लालू प्रसाद यादव

बिहार की राजनीति के दिग्गज और राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की कानूनी मुश्किलें एक बार फिर बढ़ती नजर आ रही हैं। बहुचर्चित IRCTC लैंड फॉर जॉब स्कैम और भ्रष्टाचार के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने लालू यादव को कोई भी अंतरिम राहत देने से साफ इनकार कर दिया है।

कोर्ट ने उस याचिका पर रोक लगाने से मना कर दिया है जिसमें लालू यादव ने निचली अदालत द्वारा ‘आरोप तय’ (Charge Framing) किए जाने की प्रक्रिया को चुनौती दी थी। न्यायमूर्ति की इस टिप्पणी के बाद अब राजद खेमे में हलचल तेज हो गई है, क्योंकि इसका सीधा अर्थ है कि ट्रायल कोर्ट में उनके खिलाफ मुकदमे की कार्यवाही बिना किसी रुकावट के जारी रहेगी।

क्या है दिल्ली हाई कोर्ट का ताजा फैसला?

सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान लालू प्रसाद यादव के कानूनी दल ने दिल्ली हाई कोर्ट से गुहार लगाई थी कि जब तक उच्च न्यायालय उनकी मुख्य याचिका पर विचार नहीं कर लेता, तब तक निचली अदालत (CBI Special Court) को उनके खिलाफ आरोप तय करने से रोका जाए। लालू यादव की दलील थी कि सीबीआई द्वारा पेश किए गए साक्ष्य अपर्याप्त हैं और कानूनी प्रक्रियाओं का पूरी तरह पालन नहीं किया गया है।

हालांकि, दिल्ली हाई कोर्ट ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि वह फिलहाल इस स्तर पर ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही में हस्तक्षेप नहीं करेगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) के तहत चल रहे मामलों में देरी करना न्याय के हित में नहीं है।

कोर्ट ने जांच एजेंसी CBI (Central Bureau of Investigation) को नोटिस जारी कर इस मामले पर अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। अब इस मामले की अगली सुनवाई कुछ हफ्तों बाद होगी, लेकिन तब तक ट्रायल कोर्ट को अपने आदेश सुनाने की पूरी आजादी रहेगी।

लालू प्रसाद यादव

IRCTC घोटाला: भ्रष्टाचार की पूरी कहानी और पृष्ठभूमि

यह मामला करीब दो दशक पुराना है, जो साल 2004 से 2009 के बीच का है। उस समय लालू प्रसाद यादव केंद्र की यूपीए-1 (UPA-1) सरकार में रेल मंत्री के पद पर तैनात थे। सीबीआई का आरोप है कि पद का दुरुपयोग करते हुए रेल मंत्री ने भारतीय रेलवे खानपान और पर्यटन निगम (IRCTC) के दो होटलों के रखरखाव और संचालन का ठेका निजी हाथों में सौंपा था।

1. होटलों का आवंटन और धांधली

रेलवे के पास रांची और पुरी में दो ऐतिहासिक होटल थे—BNR रांची और BNR पुरी। इन होटलों के निजीकरण की प्रक्रिया के दौरान ‘सुजाता होटल्स’ नामक कंपनी को टेंडर दिया गया। आरोप है कि टेंडर की शर्तों को इस तरह से तोड़ा-मरोड़ा गया कि कोचर बंधुओं की कंपनी ‘सुजाता होटल्स’ ही एकमात्र योग्य उम्मीदवार के रूप में सामने आए।

2. ‘जमीन के बदले ठेका’ का खेल

सीबीआई की जांच के अनुसार, इस टेंडर के बदले में लालू प्रसाद यादव के परिवार को पटना में एक बहुत ही कीमती जमीन का टुकड़ा दिया गया। यह जमीन पहले कोचर बंधुओं ने ‘लारा प्रोजेक्ट्स’ (LARA Projects LLP) नामक कंपनी को हस्तांतरित की, जिसके मालिकाना हक में राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव का नाम शामिल था। चौंकाने वाली बात यह है कि करोड़ों की यह जमीन सर्कल रेट से बहुत कम कीमत पर या लगभग मुफ्त के बराबर हस्तांतरित की गई थी।

चार्ज फ्रेमिंग क्या है और यह लालू के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, चार्ज फ्रेमिंग (आरोप तय करना) किसी भी आपराधिक मुकदमे का वह पड़ाव है जहाँ अदालत यह तय करती है कि अभियुक्त के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हैं या नहीं।

ट्रायल की शुरुआत: एक बार आरोप तय हो जाने के बाद, मुकदमे की नियमित सुनवाई (Trial) शुरू हो जाती है। इसके बाद अभियोजन पक्ष (CBI) अपने गवाहों को बुलाता है।

बचने का रास्ता बंद: लालू यादव चाहते थे कि चार्ज फ्रेमिंग पर रोक लग जाए, ताकि मामला लंबा खिंच सके। अब रोक न लगने का मतलब है कि उन्हें अदालत में हर तारीख पर पेश होना पड़ सकता है और गवाहों का सामना करना पड़ सकता है।

राजनीतिक प्रभाव: 2026 के राजनीतिक परिदृश्य में, यदि लालू यादव पर आरोप तय होते हैं, तो यह विपक्षी गठबंधन के लिए एक नैतिक चुनौती बन सकता है।

सीबीआई और ईडी की संयुक्त जांच

इस मामले की गंभीरता को देखते हुए न केवल सीबीआई, बल्कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने भी मनी लॉन्ड्रिंग के तहत जांच शुरू की थी। जांच एजेंसियों का दावा है कि यह केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं थी, बल्कि एक सुनियोजित आर्थिक अपराध था।

एजेंसियों द्वारा पेश किए गए मुख्य साक्ष्य:

हस्ताक्षर और दस्तावेज: सीबीआई ने कई ऐसे फाइल नोटिंग्स बरामद किए हैं जिन पर तत्कालीन रेल मंत्री के निर्देश स्पष्ट रूप से दर्ज हैं।

शेल कंपनियां: ईडी ने उन कंपनियों के नेटवर्क का खुलासा किया है जिनके जरिए पैसे और संपत्तियों का लेन-देन हुआ।

सरकारी गवाह: इस मामले में कुछ पूर्व रेल अधिकारियों के बयान भी महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो रहे हैं जिन्होंने दबाव में काम करने की बात स्वीकार की है।

लालू प्रसाद यादव – जमानत पर , मुख्य साजिशकर्ता और पद का दुरुपयोग |

राबड़ी देवी – जमानत पर , वित्तीय लाभ प्राप्तकर्ता

तेजस्वी यादव – जमानत पर , बेनामी संपत्ति में हिस्सेदारी

विजय कोचर – आरोपी , रिश्वत देने और टेंडर हासिल करने का आरोप

लालू यादव की दलील और बचाव पक्ष का तर्क

लालू यादव के वकील सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल और अन्य विशेषज्ञों ने कोर्ट में तर्क दिया कि यह पूरा मामला राजनीतिक द्वेष से प्रेरित है। उनका कहना है कि 15 साल पुराने मामले को केवल चुनाव और राजनीति को प्रभावित करने के लिए फिर से जीवित किया जा रहा है। बचाव पक्ष का यह भी कहना है कि होटलों का आवंटन रेलवे बोर्ड के नियमों के तहत हुआ था और इसमें लालू यादव की कोई व्यक्तिगत भूमिका नहीं थी।

हालांकि, हाई कोर्ट ने इन दलीलों को फिलहाल ‘ट्रायल का विषय’ (Subject of Trial) माना है, जिसका अर्थ है कि इन बातों पर फैसला मुकदमे की सुनवाई के दौरान होगा, न कि शुरुआती स्तर पर।

लालू प्रसाद यादव

भविष्य की चुनौतियां और कानूनी रास्ते

अब लालू प्रसाद यादव के पास सीमित विकल्प बचे हैं। वह इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं, लेकिन आमतौर पर सुप्रीम कोर्ट भी निचली अदालत के ट्रायल में तब तक हस्तक्षेप नहीं करता जब तक कि कोई गंभीर संवैधानिक खामी न हो।

ट्रायल की गति: दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट अब तेजी से आरोप तय करने की दिशा में बढ़ेगी।

स्वास्थ्य का हवाला: लालू यादव की बढ़ती उम्र और किडनी ट्रांसप्लांट के बाद की स्थिति को देखते हुए, उनका पक्ष स्वास्थ्य के आधार पर रियायत की मांग कर सकता है।

गवाहों की जिरह: आने वाले महीनों में इस केस में कई महत्वपूर्ण गवाहों की गवाही शुरू हो सकती है, जो बिहार की राजनीति में भी सुर्खियां बटोरेगी।

दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रही कानूनी लड़ाई में एक बड़ा पड़ाव है। लालू प्रसाद यादव जैसे कद्दावर नेता के लिए यह एक स्पष्ट संकेत है कि कानूनी प्रक्रिया अपनी गति से चलेगी। चार्ज फ्रेमिंग पर रोक लगाने से इनकार करना यह दर्शाता है कि अदालतें अब आर्थिक अपराधों और भ्रष्टाचार के मामलों में ‘स्थगन की राजनीति’ को स्वीकार करने के मूड में नहीं हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि सीबीआई के जवाब के बाद हाई कोर्ट का रुख क्या होता है।

क्या आपको लगता है कि दशकों पुराने भ्रष्टाचार के मामलों में अब तेजी से सुनवाई होनी चाहिए, या यह नेताओं को परेशान करने का एक जरिया मात्र है? अपनी राय हमें नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

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बिहार चुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस में ‘सर्जिकल स्ट्राइक’: 43 नेताओं पर गिरी गाज, तेजस्वी यादव ने उत्तराखंड विवाद पर खोला मोर्चा

बिहार चुनाव

बिहार चुनाव 2025 के परिणाम आने के बाद राज्य की राजनीति में भूचाल थमने का नाम नहीं ले रहा है। एक तरफ जहां महागठबंधन के भीतर हार के कारणों पर मंथन जारी है, वहीं कांग्रेस पार्टी ने अपनी आंतरिक कलह को खत्म करने के लिए ‘क्लीनिंग ऑपरेशन’ शुरू कर दिया है। दूसरी ओर, नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने उत्तराखंड से आए एक विवादित बयान पर बिहार के स्वाभिमान की लड़ाई छेड़ दी है।

कांग्रेस में बड़ा एक्शन: हार के बाद ‘घर की सफाई’ शुरू

नवंबर 2025 में हुए चुनाव में कांग्रेस के निराशाजनक प्रदर्शन के बाद पार्टी आलाकमान और प्रदेश नेतृत्व बेहद सख्त है। प्रदेश अध्यक्ष राजेश कुमार ने अनुशासनहीनता और भितरघात करने वाले नेताओं की लिस्ट तैयार कर बड़ी कार्रवाई की है।

  • 43 नेताओं पर गिरी गाज: चुनाव के दौरान पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल 43 बड़े नेताओं को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था।
  • 7 नेता निष्कासित: संतोषजनक जवाब न मिलने पर 7 कद्दावर नेताओं को पार्टी से 6 साल के लिए निष्कासित कर दिया गया है।
  • अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं: राजेश कुमार ने स्पष्ट किया है कि चुनाव में हार का मुख्य कारण पार्टी के भीतर छिपे ‘विभीषण’ थे, जिन्होंने गठबंधन धर्म का पालन नहीं किया।

बिहार चुनाव

तेजस्वी यादव का ‘न्यू ईयर संकल्प’: बिहार के स्वाभिमान की रक्षा

नए साल 2026 की शुरुआत के साथ ही राजद (RJD) नेता तेजस्वी यादव सोशल मीडिया पर बेहद आक्रामक नजर आ रहे हैं। इस बार उनके निशाने पर उत्तराखंड के एक मंत्री के पति हैं, जिन्होंने बिहार की महिलाओं के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की है।

“बिहार की आधी आबादी का अपमान कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। भाजपा और उनके सहयोगियों के मन में बिहार के प्रति जो जहर भरा है, वह अब जुबान पर आने लगा है।” — तेजस्वी यादव

विवाद क्या है?

हाल ही में उत्तराखंड की एक महिला मंत्री के पति का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें उन्होंने बिहार की महिलाओं के पहनावे और संस्कृति पर अभद्र टिप्पणी की थी। तेजस्वी यादव ने इस मुद्दे को बिहार की अस्मिता से जोड़ते हुए केंद्र सरकार और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से भी चुप्पी तोड़ने की मांग की है।

बिहार चुनाव

सोशल मीडिया पर बढ़ा तेजस्वी का दबदबा

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि तेजस्वी यादव अब डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल जनता से सीधा जुड़ने के लिए कर रहे हैं। ट्विटर (X) और फेसबुक पर उनके वीडियोज को लाखों में व्यूज मिल रहे हैं, जिससे साफ है कि वह अगले चुनाव की तैयारी अभी से शुरू कर चुके हैं।

बिहार में बदलेगा समीकरण?

कांग्रेस की आंतरिक टूट और तेजस्वी का बढ़ता आक्रामक अंदाज यह संकेत दे रहा है कि बिहार में आने वाले कुछ महीने राजनीतिक रूप से काफी गर्म रहने वाले हैं। क्या कांग्रेस इस कार्रवाई के बाद खुद को मजबूत कर पाएगी? और क्या तेजस्वी यादव का ‘बिहार अस्मिता कार्ड’ जनता के दिलों में फिर से जगह बना पाएगा?

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पटना का मीठापुर बनेगा ‘एजुकेशन हब’ : बिहार स्वास्थ्य विज्ञान और इंजीनियरिंग यूनिवर्सिटी का काम तेज, जानें क्या है खास

पटना

Patna Mithapur University Update: बिहार की राजधानी पटना का मीठापुर इलाका अब सिर्फ एक बस स्टैंड के नाम से नहीं, बल्कि राज्य के सबसे बड़े ‘एजुकेशनल हब’ के रूप में पहचाना जाएगा। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हाल ही में मीठापुर में निर्माणाधीन बिहार स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय (BUHS) और बिहार इंजीनियरिंग यूनिवर्सिटी (BEU) के भवनों का निरीक्षण किया और अधिकारियों को इसे जल्द पूरा करने के निर्देश दिए हैं।

आइए जानते हैं, इन दोनों मेगा प्रोजेक्ट्स की पूरी डिटेल और यह बिहार के छात्रों के लिए कैसे गेम-चेंजर साबित होने वाले हैं।

बिहार इंजीनियरिंग यूनिवर्सिटी (BEU)

बिहार के इंजीनियरिंग छात्रों के लिए यह कैंपस किसी वरदान से कम नहीं होगा। 27 जुलाई 2022 को स्थापित इस यूनिवर्सिटी के लिए सरकार ने मीठापुर में 5 एकड़ जमीन आवंटित की है।

  • मुख्य भवन: यह एक भव्य 4-मंजिला इमारत होगी, जिसका कुल क्षेत्रफल लगभग 1,11,732 वर्गफीट है।
  • कैंपस की सुविधाएं:
  • भूतल (Ground Floor): यहां डीन, रजिस्ट्रार के दफ्तर और एक आधुनिक कैफेटेरिया होगा।
  • प्रथम तल: कुलपति (VC) कार्यालय और मीटिंग हॉल।
  • ऊपरी मंजिलें: मूल्यांकन केंद्र, पांच बड़े अभिलेखागार (Archives) और बहुउद्देशीय हॉल।
  • गेस्ट हाउस: परिसर में 8 कमरे और 4 सुइट्स वाला एक लग्जरी गेस्ट हाउस भी बनाया जा रहा है।

पटना

बिहार स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय (BUHS):

‘सात निश्चय-2’ योजना के तहत बिहार में चिकित्सा शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए इस यूनिवर्सिटी का निर्माण किया जा रहा है।

  • विशाल क्षेत्रफल: इस प्रोजेक्ट का कुल क्षेत्रफल 27,567 वर्गमीटर है।
  • दो हिस्सों में प्रोजेक्ट:
  • मुख्य यूनिवर्सिटी भवन: इसमें प्रशासनिक ब्लॉक, आधुनिक परीक्षा कक्ष, डिस्पेंसरी और ट्रेनिंग-कम-प्लेसमेंट सेल होगा।
  • उपभवन (Annex): यहां कुलपति का आवास, यूनिवर्सिटी गेस्ट हाउस और एक बड़ा ऑडिटोरियम बनाया जा रहा है।
  • लक्ष्य: राज्य के सभी मेडिकल, पैरामेडिकल और नर्सिंग कॉलेजों का संचालन यहीं से सुचारू रूप से होगा।

मीठापुर: पटना का नया ‘नॉलेज सिटी’

मीठापुर अब केवल इन दो यूनिवर्सिटीज तक सीमित नहीं है। यहाँ पहले से ही कई बड़े संस्थान मौजूद हैं, जो इस क्षेत्र को बिहार का ‘ऑक्सफोर्ड’ बना रहे हैं:

  • चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (CNLU)
  • चंद्रगुप्त प्रबंधन संस्थान (CIMP)
  • आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय (AKU)
  • निफ्ट (NIFT) पटना
  • मौलाना मजहरूल हक अरबी-फारसी विश्वविद्यालय

विशेष आकर्षण: स्मार्ट सिटी मिशन के तहत यहां 30 करोड़ की लागत से एक कॉमन फैसिलिटी सेंटर भी बनाया जा रहा है, जहां छात्रों को एक ही छत के नीचे पढ़ाई, शॉपिंग, जिम और ‘दीदी की रसोई’ जैसी सुविधाएं मिलेंगी।

पटना

छात्रों के लिए क्या बदलेगा?

इन भवनों के तेजी से हो रहे निर्माण का सीधा फायदा बिहार के युवाओं को मिलेगा। अब हाई-लेवल तकनीकी और मेडिकल शिक्षा के लिए छात्रों को दूसरे राज्यों का रुख नहीं करना पड़ेगा। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया है कि निर्माण कार्य में गुणवत्ता (Quality) के साथ कोई समझौता नहीं होगा और समय सीमा के अंदर इसे पूरा कर लिया जाएगा।

बिहार सरकार का यह कदम राज्य के इंफ्रास्ट्रक्चर और शिक्षा व्यवस्था को एक नई ऊंचाई पर ले जाएगा। मीठापुर मेट्रो स्टेशन की कनेक्टिविटी होने से यहाँ छात्रों का आना-जाना और भी आसान हो जाएगा।

क्या आपको लगता है कि मीठापुर जल्द ही कोटा या दिल्ली के मुखर्जी नगर जैसा बड़ा एजुकेशन सेंटर बन पाएगा? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं!

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Nitish Kumar Hijab Controversy : भरे मंच पर CM ने उतरवाया लेडी डॉक्टर का नकाब? RJD से लेकर कश्मीर तक गरमाई सियासत

Nitish Kumar Hijab Controversy

Nitish Kumar Hijab Controversy : बिहार की राजनीति और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) का विवादों से चोली-दामन का साथ हो गया है. लेकिन इस बार मामला किसी राजनीतिक बयानबाजी का नहीं, बल्कि मर्यादा और सम्मान का है. पटना में आयोजित एक सरकारी कार्यक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल रहा है, जिसने न सिर्फ बिहार बल्कि पूरे देश की सियासत को गरमा दिया है.क्या है पूरा मामला? क्यों विपक्ष नीतीश कुमार पर ‘नारी शक्ति’ के अपमान का आरोप लगा रहा है? आइए जानते हैं इस विस्तृत रिपोर्ट में.

क्या है पूरा मामला?

घटना 17 दिसंबर को पटना के एसके मेमोरियल हॉल (SK Memorial Hall) में आयोजित एक कार्यक्रम की है. राज्य स्वास्थ्य समिति की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नवनियुक्त आयुष चिकित्सकों (Ayush Doctors) को नियुक्ति पत्र बांट रहे थे.

सब कुछ सामान्य चल रहा था, तभी मंच पर एक महिला डॉक्टर अपना नियुक्ति पत्र लेने पहुंचीं. महिला डॉक्टर ने अपने चेहरे पर नकाब (या फेस कवर) लगा रखा था.

Nitish Kumar Hijab Controversy

वायरल वीडियो में क्या दिखा?

वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि जैसे ही महिला डॉक्टर सीएम के पास पहुंचीं, नीतीश कुमार ने उन्हें रोका. कथित तौर पर सीएम ने महिला के चेहरे की ओर हाथ बढ़ाया और उन्हें नकाब/फेस कवर हटाने का इशारा किया या उसे हटाने की कोशिश की, ताकि वे चेहरा देख सकें या फोटो सही आ सके. महिला डॉक्टर ने असहज होते हुए अपना चेहरा खोला.

हालांकि सीएम की मंशा क्या थी, यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन सार्वजनिक मंच पर एक महिला के कपड़ों या नकाब को लेकर ऐसी हरकत ने लोगों को हैरान कर दिया है.

विपक्ष का जोरदार हमला: “यह अपमानजनक है”

जैसे ही यह वीडियो सोशल मीडिया पर आया, राजनीतिक गलियारों में तूफान आ गया. विपक्षी पार्टियों ने इसे महिला सम्मान और धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला बताया है.

  1. RJD और तेजस्वी यादव की प्रतिक्रिया

बिहार की मुख्य विपक्षी पार्टी RJD ने इस घटना को बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बताया है. पार्टी के प्रवक्ताओं का कहना है कि “एक मुख्यमंत्री को सार्वजनिक मंच पर किसी महिला के पहनावे या नकाब के साथ छेड़छाड़ करने का कोई अधिकार नहीं है. यह पद की गरिमा के खिलाफ है.”

  1. महबूबा मुफ्ती और अन्य नेताओं का गुस्सा

बात बिहार से निकलकर कश्मीर तक पहुंच गई है. पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती (Mehbooba Mufti) ने इस घटना की कड़ी निंदा की है. उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि मुस्लिम महिलाओं को अपने हिसाब से कपड़े पहनने का हक है और किसी को भी उनके नकाब को जबरन हटाने का अधिकार नहीं होना चाहिए.

Nitish Kumar Hijab Controversy

सोशल मीडिया पर जनता का फूटा गुस्सा

इंटरनेट यूजर्स इस घटना पर दो धड़ों में बंट गए हैं, लेकिन बहुतायत लोग सीएम के इस व्यवहार की आलोचना कर रहे हैं.

  • आलोचकों का कहना है: “नीतीश कुमार अपनी याददाश्त और व्यवहार पर नियंत्रण खो रहे हैं. यह एक बुजुर्ग राजनेता को शोभा नहीं देता.”
  • समर्थकों का तर्क: कुछ लोगों का कहना है कि सुरक्षा कारणों या पहचान सुनिश्चित करने के लिए सीएम ने ऐसा किया होगा, इसे धार्मिक रंग नहीं देना चाहिए.

नीतीश कुमार की सेहत और व्यवहार पर उठते सवाल

यह पहली बार नहीं है जब नीतीश कुमार अपने व्यवहार के कारण चर्चा में हैं. पिछले कुछ महीनों में कई ऐसे वाकये हुए हैं—कभी पीएम मोदी के पैर छूने की कोशिश, कभी मंत्रियों के सामने अजीब हरकतें—जिन्होंने उनकी सेहत (Health Issues) को लेकर बहस छेड़ी है.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2025 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले ऐसी घटनाएं JDU और NDA गठबंधन के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती हैं. विपक्ष इसे ‘मानसिक अस्थिरता’ का मुद्दा बनाकर भुनाने की पूरी कोशिश करेगा.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जानबूझकर ऐसा किया या यह अनजाने में हुई भूल थी, यह जांच का विषय हो सकता है. लेकिन एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा सार्वजनिक रूप से किसी महिला (विशेषकर एक डॉक्टर) के साथ ऐसा व्यवहार करना निश्चित रूप से स्वीकार्य नहीं माना जा रहा है. अब देखना यह होगा कि नीतीश कुमार या उनका कार्यालय इस पर क्या सफाई देता है.

FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)

Q1: नीतीश कुमार का लेटेस्ट विवाद क्या है?

Ans: पटना में आयुष डॉक्टरों को नियुक्ति पत्र देते समय एक महिला डॉक्टर का नकाब/हिजाब हटाने के इशारे को लेकर नीतीश कुमार विवादों में हैं.

Q2: यह घटना कब और कहाँ हुई?

Ans: यह घटना 17 दिसंबर 2025 को पटना के एसके मेमोरियल हॉल में हुई.

Q3: विपक्ष ने इस पर क्या कहा?

Ans: RJD और अन्य दलों ने इसे महिला विरोधी और अपमानजनक बताया है.

अगर आपको यह रिपोर्ट निष्पक्ष और विस्तृत लगी, तो इसे अपने दोस्तों के साथ शेयर करें और बिहार की हर खबर के लिए हमारे ब्लॉग को फॉलो करें.

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MNREGA बंद? मोदी सरकार ला रही है रोजगार की नई ‘VBGRAM’ स्कीम, जानिए क्या बदलेगा गरीबों की जिंदगी में

MNREGA

क्या मनरेगा (MNREGA) का दौर खत्म होने वाला है? जी हाँ, दिल्ली के गलियारों और संसद भवन से जो खबरें आ रही हैं, वो देश के करोड़ों ग्रामीणों को चौंका सकती हैं। केंद्र सरकार रोजगार गारंटी को लेकर अब तक का सबसे बड़ा बदलाव करने जा रही है। ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकार ने लोकसभा सांसदों के बीच एक नया बिल सर्कुलेट किया है, जिसका नाम ‘VBGRAM’ बताया जा रहा है। कहा जा रहा है कि यह बिल पुराने मनरेगा कानून की जगह लेगा।

आज के इस ब्लॉग में हम जानेंगे कि आखिर यह VBGRAM क्या है, सरकार मनरेगा को क्यों बदलना चाहती है, और इसका सीधा असर आम आदमी की जेब और रोजगार पर क्या पड़ेगा।

क्या है पूरा मामला?

15 दिसंबर 2025 की सबसे बड़ी खबर यह है कि केंद्र सरकार महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MNREGA) को रिप्लेस (replace) करने की तैयारी कर रही है। सूत्रों के अनुसार, सरकार ने इसके लिए VBGRAM (संभवतः ‘विकसित भारत ग्रामीण रोजगार अभियान’ या इसी तरह का नाम) बिल का मसौदा तैयार कर लिया है और इसे लोकसभा में चर्चा के लिए सर्कुलेट भी कर दिया गया है।

MNREGA

यह कदम इसलिए भी ऐतिहासिक माना जा रहा है क्योंकि मनरेगा सालों से ग्रामीण भारत की ‘लाइफलाइन’ रहा है।

सरकार MNREGA को क्यों खत्म करना चाहती है?

आपके मन में भी सवाल होगा कि जो योजना इतने सालों से चल रही है, उसे बदलने की क्या जरूरत आन पड़ी? इसके पीछे सरकार के कुछ तर्क हो सकते हैं:

  • संपत्ति निर्माण पर जोर (Asset Creation): पुरानी मनरेगा स्कीम पर अक्सर आरोप लगते थे कि इसमें सिर्फ गड्ढे खोदे जाते हैं और भरे जाते हैं। सरकार चाहती है कि नई स्कीम (VBGRAM) के तहत ऐसा काम हो जिससे गांव में पक्की सड़क, तालाब या बिल्डिंग जैसी ठोस संपत्ति बने।
  • भ्रष्टाचार पर लगाम: मनरेगा में ‘फर्जी जॉब कार्ड’ और फंड की हेराफेरी की खबरें आती रहती थीं। नई स्कीम पूरी तरह से डिजिटल और पारदर्शी हो सकती है।
  • विकसित भारत का लक्ष्य: 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए सरकार को ‘स्किल्ड लेबर’ (कुशल मजदूर) की जरूरत है, न कि सिर्फ दिहाड़ी मजदूरों की। VBGRAM में स्किल डेवलपमेंट को भी जोड़ा जा सकता है।

VBGRAM: नई स्कीम में क्या खास हो सकता है?

हालांकि बिल की पूरी डीटेल्स अभी सार्वजनिक होनी बाकी हैं, लेकिन जानकारों का मानना है कि VBGRAM में ये बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं:

  • ज्यादा दिहाड़ी: महंगाई को देखते हुए प्रतिदिन की मजदूरी बढ़ाई जा सकती है।
  • काम के घंटे और दिन: क्या 100 दिन की गारंटी को बढ़ाकर 150 दिन किया जाएगा? इस पर सबकी नजर है।
  • किसानों को फायदा: इस स्कीम को सीधे खेती-किसानी से जोड़ने का प्लान हो सकता है, जिससे छोटे किसानों को भी मजदूरी का लाभ मिल सके।
  • हाइब्रिड मॉडल: मजदूरी के साथ-साथ मजदूरों को तकनीकी काम सिखाने का प्रावधान भी हो सकता है।

MNREGA

विपक्ष और जानकारों की राय

जैसे ही यह खबर सामने आई कि लोकसभा में बिल सर्कुलेट हुआ है, सियासी हलचल तेज हो गई है। विपक्ष का कहना है कि सरकार रोजगार गारंटी को कमजोर करने की कोशिश कर रही है। वहीं, अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अगर यह बिल सही तरीके से लागू हुआ, तो यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था (Rural Economy) के लिए ‘गेम चेंजर’ साबित होगा।

आम आदमी पर क्या असर होगा?

अगर आप या आपके परिवार का कोई सदस्य मनरेगा जॉब कार्ड धारक है, तो घबराने की जरूरत नहीं है। आमतौर पर जब कोई नई स्कीम आती है, तो पुराने लाभार्थियों को उसमें शिफ्ट किया जाता है। लेकिन यह जरूर है कि काम पाने के नियम और पैसे मिलने का तरीका बदल सकता है।

‘VBGRAM’ बिल का आना यह साफ करता है कि सरकार अब पुरानी नीतियों पर चलने के बजाय नए भारत के हिसाब से रोजगार के तरीके बदलना चाहती है। लेकिन असली परीक्षा तब होगी जब यह बिल संसद में पास होगा और जमीनी स्तर पर लागू होगा।

आपका क्या मानना है?

क्या मनरेगा को बंद करके नई स्कीम लाना सही फैसला है? या पुरानी स्कीम में ही सुधार करना चाहिए था? हमें कमेंट करके अपनी राय जरूर बताएं!

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तेज प्रताप यादव की पार्टी में बड़ा एक्शन! राष्ट्रीय प्रवक्ता संतोष रेणु निष्कासित, लगा यह गंभीर आरोप

तेज प्रताप यादव

बिहार की राजनीति में हमेशा चर्चा में रहने वाले तेज प्रताप यादव (Tej Pratap Yadav) एक बार फिर सुर्खियों में हैं। अपनी नई पार्टी ‘जनशक्ति जनता दल’ (Janshakti Janta Dal) के जरिए राजनीतिक जमीन तलाश रहे तेज प्रताप ने आज एक कड़ा फैसला लेते हुए अपनी ही पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता संतोष रेणु (Santosh Renu) को बाहर का रास्ता दिखा दिया है।

यह खबर इसलिए भी अहम है क्योंकि संतोष रेणु, तेज प्रताप के बेहद करीबी माने जाते थे। आखिर ऐसा क्या हुआ कि रातों-रात इतना बड़ा फैसला लेना पड़ा? आइए जानते हैं पूरा मामला विस्तार से।

तेज प्रताप यादव

क्यों हुई संतोष रेणु पर कार्रवाई?

पार्टी सूत्रों और आधिकारिक बयान के मुताबिक, संतोष रेणु पर भ्रष्टाचार के बेहद गंभीर आरोप लगे हैं। उन पर आरोप है कि उन्होंने पुलिस बहाली (Police Recruitment) के नाम पर कई अभ्यर्थियों से लाखों रुपये की वसूली की है।

तेज प्रताप यादव, जो अपनी नई पार्टी को ‘साफ-सुथरी छवि’ वाली पार्टी के रूप में प्रोजेक्ट कर रहे हैं, ने इस मामले को ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति के तहत लिया। जैसे ही यह मामला उनके संज्ञान में आया, उन्होंने तुरंत प्रभाव से संतोष रेणु को पद से हटाने और पार्टी से निष्कासित करने का आदेश जारी कर दिया।

आरोपों की मुख्य बातें:

• पुलिस बहाली में धांधली: संतोष रेणु पर आरोप है कि उन्होंने युवाओं को पुलिस में नौकरी दिलाने का झांसा दिया।

• पैसों का लेनदेन: पीड़ितों का दावा है कि नौकरी के बदले उनसे मोटी रकम की मांग की गई थी।

• पार्टी की छवि को नुकसान: पार्टी हाईकमान का मानना है कि ऐसे कृत्यों से संगठन की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं।

तेज प्रताप यादव का कड़ा संदेश

इस कार्रवाई के जरिए तेज प्रताप यादव ने बिहार की जनता और अपने विरोधियों को एक स्पष्ट संदेश देने की कोशिश की है। उन्होंने साफ कर दिया है कि उनकी पार्टी ‘जनशक्ति जनता दल’ में भ्रष्टाचार के लिए कोई जगह नहीं है, चाहे वह व्यक्ति कितने भी ऊंचे पद पर क्यों न हो।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आरजेडी (RJD) से अलग होने के बाद तेज प्रताप अपनी एक अलग और सख्त प्रशासक वाली छवि बनाना चाहते हैं। यह कदम उसी रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है।

तेज प्रताप यादव

संतोष रेणु का राजनीतिक भविष्य?

संतोष रेणु, जो अब तक टीवी डिबेट्स और सोशल मीडिया पर तेज प्रताप यादव का पुरजोर बचाव करते नजर आते थे, अब खुद सवालों के घेरे में हैं। पुलिस बहाली के नाम पर ठगी का आरोप न केवल उनका राजनीतिक करियर खत्म कर सकता है, बल्कि उन पर कानूनी कार्रवाई की तलवार भी लटक सकती है।

क्या संतोष रेणु इन आरोपों पर कोई सफाई देंगे? या फिर यह मामला पुलिस जांच की ओर जाएगा? यह देखना दिलचस्प होगा।

क्या इससे बिहार की राजनीति में बदलाव आएगा? कमेंट करके जरूर बताएं!

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UP Politics : पंकज चौधरी बने यूपी बीजेपी के नए अध्यक्ष, जानिए कौन हैं ये ‘कुर्मी दिग्गज’ और क्या है 2027 का मास्टरप्लान?

UP Politics

UP Politics में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने एक बड़ा दांव खेला है। लंबे इंतजार और तमाम अटकलों पर विराम लगाते हुए पार्टी ने पंकज चौधरी (Pankaj Chaudhary) को यूपी बीजेपी का नया प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया है। महराजगंज से 6 बार के सांसद और वर्तमान में केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी को कमान सौंपकर बीजेपी ने 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए अपना एजेंडा साफ कर दिया है।

आइए विस्तार से जानते हैं कि आखिर पंकज चौधरी कौन हैं, बीजेपी ने उन पर भरोसा क्यों जताया है और उनके अध्यक्ष बनने के क्या सियासी मायने हैं।

पंकज चौधरी: एक परिचय

पंकज चौधरी बीजेपी का एक ऐसा चेहरा हैं जो लो-प्रोफाइल रहकर संगठन के लिए काम करने के लिए जाने जाते हैं।

  • वर्तमान पद: केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री (भारत सरकार)।
  • संसदीय क्षेत्र: महराजगंज (Maharajganj), उत्तर प्रदेश।
  • अनुभव: वे 6 बार सांसद रह चुके हैं।
  • विरासत: वे भूपेंद्र सिंह चौधरी की जगह लेंगे, जिन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद इस्तीफे की पेशकश की थी।

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पंकज चौधरी यूपी बीजेपी के 15वें प्रदेश अध्यक्ष हैं। खास बात यह है कि वे पार्टी की कमान संभालने वाले चौथे कुर्मी नेता हैं। उनसे पहले विनय कटियार, ओम प्रकाश सिंह और स्वतंत्र देव सिंह जैसे दिग्गज कुर्मी नेता इस कुर्सी पर रह चुके हैं।

बीजेपी का ‘ओबीसी कार्ड’: कुर्मी चेहरे पर दांव क्यों?

सियासी जानकारों का मानना है कि पंकज चौधरी की ताजपोशी के पीछे बीजेपी का ‘OBC समीकरण’ है। उत्तर प्रदेश में यादवों के बाद ‘कुर्मी’ समुदाय सबसे बड़ी ओबीसी आबादी है।

2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी (SP) के ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले ने बीजेपी को खासा नुकसान पहुंचाया था। पूर्वांचल और अवध क्षेत्र में बीजेपी का वोट बैंक खिसका था। पंकज चौधरी इसी ‘डैमेज कंट्रोल’ का हिस्सा हैं।

नोट: पंकज चौधरी का प्रभाव विशेष रूप से पूर्वी उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल) में है, जहां से वे आते हैं। यह वही इलाका है जहां पिछले चुनाव में बीजेपी को सबसे ज्यादा चुनौतियों का सामना करना पड़ा था।

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पार्षद से प्रदेश अध्यक्ष तक: एक संघर्षशील सफर

पंकज चौधरी को यह जिम्मेदारी रातों-रात नहीं मिली है। उनका राजनीतिक सफर जमीन से जुड़ा हुआ है:

  • शुरुआत: 1989-91 में वे गोरखपुर नगर निगम में पार्षद (Corporator) रहे।
  • उप-महापौर: 1990-91 में वे गोरखपुर के डिप्टी मेयर बने।
  • सांसद: 1991 में वे पहली बार 10वीं लोकसभा के लिए चुने गए। उसके बाद 1996, 1998, 2004, 2014, 2019 और 2024 में लगातार जीत दर्ज करते रहे (बीच में कुछ हार को छोड़कर)।

60 वर्षीय पंकज चौधरी को संगठन और सरकार दोनों का अच्छा अनुभव है। वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के भरोसेमंद माने जाते हैं।

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मिशन 2027: पंकज चौधरी के सामने चुनौतियां

पंकज चौधरी के लिए आगे की राह आसान नहीं है। उनके कंधों पर कई बड़ी जिम्मेदारियां हैं:

  • कार्यकर्ताओं में जोश भरना: लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद सुस्त पड़े पार्टी कैडर को 2027 के लिए फिर से चार्ज करना।
  • जातीय समीकरण साधना: गैर-यादव ओबीसी वोट बैंक को बीजेपी के पाले में पूरी तरह वापस लाना।
  • उपचुनाव और संगठन: राज्य में होने वाले आगामी उपचुनावों और संगठनात्मक फेरबदल को सुचारू रूप से चलाना।

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पंकज चौधरी की नियुक्ति से साफ है कि बीजेपी अब आक्रामक मोड में आ गई है। एक तरफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (क्षत्रिय चेहरा) और दूसरी तरफ प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी (ओबीसी चेहरा)—बीजेपी ने इस ‘डबल इंजन’ के जरिए यूपी के सामाजिक समीकरणों को साधने की कोशिश की है। अब देखना दिलचस्प होगा कि ‘महाराजगंज का यह शांत सिपाही’ लखनऊ की कुर्सी से 2027 की जंग कैसे लड़ता है।

आपकी राय: क्या आपको लगता है कि पंकज चौधरी की नियुक्ति से बीजेपी को यूपी में फायदा मिलेगा? कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर लिखें!

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Land for Job Scam: सुप्रीम कोर्ट में CBI की दो टूक – ‘कोर्ट को बुलडोज नहीं कर सकते’, क्या राबड़ी देवी की मुश्किलें और बढ़ेंगी?

सुप्रीम कोर्ट

Land for Job Scam Case Update: बिहार की राजनीति और लालू परिवार के लिए आज का दिन सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में काफी गहमागहमी भरा रहा। ‘लैंड फॉर जॉब’ (नौकरी के बदले जमीन) मामले में राबड़ी देवी की याचिका पर सुनवाई के दौरान CBI ने बेहद सख्त रुख अपनाया है। केंद्रीय जांच एजेंसी ने कोर्ट में साफ़ कह दिया है कि कानूनी प्रक्रिया को “बुलडोज” नहीं किया जा सकता।

आज के इस आर्टिकल में हम जानेंगे कि आखिर कोर्ट रूम के अंदर क्या हुआ, CBI ने इतना बड़ा बयान क्यों दिया और इसका लालू यादव, राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव पर क्या असर पड़ेगा।

सुप्रीम कोर्ट में आज क्या हुआ?

मामला IRCTC और लैंड-फॉर-जॉब स्कैम (Land for Job Scam) से जुड़े केस को एक विशेष अदालत से दूसरी जगह ट्रांसफर करने या मुकदमों को एक साथ चलाने की मांग से जुड़ा था। इस पर सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता (CBI की तरफ से) और बचाव पक्ष के वकीलों के बीच तीखी बहस हुई।

सुप्रीम कोर्ट

CBI की दलील: ‘कानून का अपना रास्ता है’

जब राबड़ी देवी और अन्य आरोपियों की तरफ से यह दलील दी गई कि अलग-अलग ट्रायल चलाने से उन्हें परेशान किया जा रहा है और मामलों को एक साथ कर देना चाहिए या ट्रांसफर करना चाहिए, तो CBI ने इसका कड़ा विरोध किया।

CBI की तरफ से पेश हुए वकीलों ने जजों की बेंच के सामने तर्क दिया कि:

“आरोपी पक्ष अपनी शर्तों पर ट्रायल नहीं चलवा सकता। कोर्ट की अपनी प्रक्रिया होती है और किसी भी दलील के आधार पर कोर्ट को ‘बुलडोज’ (Bulldoze) नहीं किया जा सकता यानी दबाव में लेकर फैसले नहीं बदलवाए जा सकते।”

CBI का कहना है कि हर अपराध की प्रकृति (Nature of Crime) अलग है और जांच अभी भी कई चरणों में चल रही है, इसलिए इसे इतनी आसानी से क्लब (Club) या ट्रांसफर नहीं किया जा सकता।

राबड़ी देवी की याचिका और बचाव पक्ष का तर्क

लालू परिवार के वकीलों का कहना है कि यह मामला बहुत पुराना है और एक ही तरह के आरोपों के लिए अलग-अलग चार्जशीट और अलग-अलग ट्रायल का सामना करना उनके मुवक्किलों (Clients) के मौलिक अधिकारों का हनन है।

बचाव पक्ष की मुख्य मांगें:

• मामले में अनावश्यक देरी न की जाए।

• संबंधित मामलों को एक ही जगह सुना जाए ताकि बार-बार कोर्ट के चक्कर न लगाने पड़ें।

• राजनीतिक द्वेष के तहत कार्रवाई का आरोप।

लेकिन आज सुप्रीम कोर्ट में CBI के आक्रामक रुख ने यह साफ़ कर दिया है कि राहत मिलना इतना आसान नहीं होगा।

क्या है लैंड फॉर जॉब स्कैम?

जो पाठक इस मामले से पूरी तरह वाकिफ नहीं हैं, उनके लिए यह जानना जरुरी है:

• समय: यह मामला 2004 से 2009 के बीच का है जब लालू प्रसाद यादव केंद्र में रेल मंत्री थे।

• आरोप: आरोप है कि रेलवे में ग्रुप-डी (Group-D) की नौकरी देने के बदले में उम्मीदवारों से जमीनें (Land) लिखवाई गईं। ये जमीनें लालू यादव के परिवार के सदस्यों (राबड़ी देवी, मीसा भारती, हेमा यादव आदि) के नाम पर बहुत कम दामों में खरीदी गईं या गिफ्ट की गईं।

• CBI और ED की एंट्री: इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग की जांच ED कर रही है और आपराधिक साजिश की जांच CBI कर रही है।

अब आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनी हैं। CBI का यह कहना कि “कोर्ट को बुलडोज नहीं किया जा सकता”, यह दर्शाता है कि एजेंसी के पास पुख्ता सबूत हैं और वे किसी भी हाल में ट्रायल में ढील देने के मूड में नहीं हैं।

अगर सुप्रीम कोर्ट CBI के तर्कों से सहमत होता है, तो:

• लालू परिवार को अलग-अलग तारीखों पर कोर्ट में पेश होना पड़ेगा।

• ट्रायल लंबा चलेगा, जिससे बिहार विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

सुप्रीम कोर्ट इस पर क्या अंतिम फैसला सुनाता है, इस पर हमारी नजर बनी रहेगी।

आपकी राय: क्या आपको लगता है कि यह केवल राजनीतिक बदला है या वास्तव में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक जरुरी कार्रवाई? कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर लिखें।

सुप्रीम कोर्ट

FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)

Q1: लैंड फॉर जॉब स्कैम में मुख्य आरोपी कौन हैं?

Ans: इस मामले में लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, तेजस्वी यादव और मीसा भारती समेत कई अन्य लोग आरोपी हैं।

Q2: आज सुप्रीम कोर्ट में CBI ने क्या कहा?

Ans: CBI ने राबड़ी देवी की याचिका का विरोध करते हुए कहा कि कानूनी प्रक्रिया को दबाव में बदला नहीं जा सकता और कोर्ट को ‘बुलडोज’ नहीं किया जा सकता।

Q3: क्या तेजस्वी यादव को जेल हो सकती है?

Ans: मामला अभी कोर्ट में विचाराधीन (Sub-judice) है। फैसला आने के बाद ही कुछ कहा जा सकता है, लेकिन मुश्किलें जरूर बढ़ी हैं।

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Shivraj Patil Passed Away: पूर्व गृह मंत्री और लोकसभा स्पीकर शिवराज पाटिल का 90 वर्ष की उम्र में निधन, राजनीति के एक युग का हुआ अंत

Shivraj Patil

भारतीय राजनीति के एक कद्दावर नेता, पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री और लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष शिवराज पाटिल (Shivraj Patil) अब हमारे बीच नहीं रहे। 90 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया है। उनके जाने से भारतीय राजनीति, विशेषकर कांग्रेस पार्टी और महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है।

आज हम इस ब्लॉग में उनके जीवन, उनके राजनीतिक सफर की उपलब्धियों और उस दौर के बारे में बात करेंगे जब उन्होंने देश के सबसे महत्वपूर्ण पदों को संभाला।

राज्यसभा में दी गई भावभीनी श्रद्धांजलि

शिवराज पाटिल के निधन की खबर आते ही संसद के गलियारों में शोक की लहर दौड़ गई। संसद का शीतकालीन सत्र (Winter Session) चल रहा है, और जैसे ही यह दुखद समाचार मिला, राज्यसभा में कार्यवाही को कुछ देर के लिए रोक दिया गया।

सदन ने अपने पूर्व सहयोगी और देश के वरिष्ठ नेता को याद करते हुए दो मिनट का मौन रखा। राज्यसभा के सभापति और अन्य सांसदों ने पाटिल जी के योगदान को याद किया। उन्होंने कहा कि पाटिल जी न केवल एक राजनेता थे, बल्कि एक ऐसे व्यक्तित्व थे जिन्होंने हमेशा संसदीय मर्यादाओं का पालन किया।

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लातूर से दिल्ली तक: कैसा रहा शिवराज पाटिल का सफर?

शिवराज पाटिल का जन्म 12 अक्टूबर 1935 को हुआ था। वे महाराष्ट्र के लातूर क्षेत्र से आते थे, जिसे उन्होंने राजनीति में एक नई पहचान दी। उनका सफर एक साधारण कार्यकर्ता से लेकर देश के गृह मंत्री बनने तक बेहद प्रेरणादायक रहा है।

उनके करियर के कुछ अहम पड़ाव:

• 7 बार सांसद: वे लातूर लोकसभा सीट से लगातार 7 बार सांसद चुने गए, जो उनकी लोकप्रियता का प्रमाण था।

लोकसभा स्पीकर (1991-1996): पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकार के दौरान उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली। उनके कार्यकाल को आज भी सदन में अनुशासन और नियमों के पालन के लिए याद किया जाता है।

गृह मंत्री (2004-2008): यूपीए-1 (UPA-1) सरकार में डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में उन्हें देश का गृह मंत्री बनाया गया। यह उनके करियर का सबसे चुनौतीपूर्ण दौर था।

26/11 मुंबई हमला और वो इस्तीफा

शिवराज पाटिल के राजनीतिक करियर में 26 नवंबर 2008 का दिन एक टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। जब मुंबई पर भीषण आतंकी हमला (26/11 Mumbai Attacks) हुआ, तब वे देश के गृह मंत्री थे।

हमले के बाद सुरक्षा व्यवस्था को लेकर उन पर काफी सवाल उठाए गए थे। भारी दबाव और नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद पी. चिदंबरम को गृह मंत्री बनाया गया। हालांकि, इस घटना के बाद भी पार्टी में उनका कद कम नहीं हुआ और उन्हें बाद में पंजाब का राज्यपाल और केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ का प्रशासक बनाया गया।

अपनी अलग शैली के लिए थे मशहूर

शिवराज पाटिल अपनी बेदाग छवि और खास पहनावे के लिए जाने जाते थे। सफेद और बेदाग खादी के कपड़े, माथे पर तिलक और चेहरे पर सौम्यता उनकी पहचान थी। कहा जाता है कि वे संसद में अपनी ड्रेसिंग और शिष्टाचार को लेकर बहुत सजग रहते थे। उनके विरोधी भी उनकी मृदुभाषी (soft-spoken) शैली का सम्मान करते थे।

पीएम और अन्य नेताओं ने जताया दुख

उनके निधन पर प्रधानमंत्री, कांग्रेस अध्यक्ष और विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने गहरा दुख व्यक्त किया है। सोशल मीडिया पर #ShivrajPatil ट्रेंड कर रहा है, जहां लोग उन्हें “सज्जन राजनीतिज्ञ” (Gentleman Politician) कहकर याद कर रहे हैं।

शिवराज पाटिल का जाना उस दौर के नेताओं की समाप्ति जैसा है, जिन्होंने मूल्यों और आदर्शों की राजनीति की। भले ही उनका राजनीतिक सफर उतार-चढ़ाव भरा रहा हो, लेकिन देश की सेवा में उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा।

ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे। ॐ शांति।

Shivraj Patil

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q1: शिवराज पाटिल का निधन कब हुआ?

Ans: शिवराज पाटिल का निधन 90 वर्ष की आयु में 12 दिसंबर 2025 के आसपास हुआ।

Q2: शिवराज पाटिल किस पार्टी के नेता थे?

Ans: वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) के वरिष्ठ नेता थे।

Q3: शिवराज पाटिल ने गृह मंत्री के पद से इस्तीफा क्यों दिया था?

Ans: 2008 में मुंबई में हुए 26/11 आतंकी हमलों के बाद नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने इस्तीफा दिया था।

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नीतीश कुमार का नाम ‘वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स’ में दर्ज, 10 बार CM पद की शपथ लेकर तोड़े सारे रिकॉर्ड!

नीतीश कुमार

बिहार की राजनीति में हमेशा केंद्र बिंदु रहने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक बार फिर सबको चौंका दिया है। लेकिन इस बार वजह कोई सियासी उलटफेर नहीं, बल्कि एक अंतराष्ट्रीय सम्मान है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को ‘वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स’ (लंदन) से सम्मानित किया गया है।

यह सम्मान उन्हें किसी साधारण उपलब्धि के लिए नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक अनोखा कीर्तिमान स्थापित करने के लिए मिला है।

क्यों मिला यह खास सम्मान?

नीतीश कुमार भारत के पहले और एकमात्र ऐसे राजनेता बन गए हैं, जिन्होंने 10 बार किसी राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है। भारतीय राजनीति के इतिहास में आज तक किसी भी नेता ने इतनी बार मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं संभाली है। इसी अभूतपूर्व उपलब्धि को देखते हुए ‘वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स’ (लंदन) ने उन्हें प्रमाण पत्र (Certificate of Excellence) देकर सम्मानित किया है।

मुख्य बात: यह रिकॉर्ड सिर्फ बिहार ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक अनोखी राजनीतिक घटना है।

नीतीश कुमार

कैसे मिली यह उपलब्धि?

हाल ही में मिली जानकारी के अनुसार, वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स के अधिकारियों ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मुलाकात की और उन्हें यह प्रतिष्ठित प्रमाण पत्र सौंपा। इस प्रमाण पत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि नीतीश कुमार ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत सर्वाधिक बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने का विश्व कीर्तिमान स्थापित किया है।

नीतीश कुमार: 10 शपथों का सफर

नीतीश कुमार का यह सफर आसान नहीं रहा है। सन् 2000 में पहली बार मुख्यमंत्री बनने से लेकर 2024 तक, उन्होंने कई बार गठबंधन बदले, सरकारें गिर्इं और बनीं, लेकिन बिहार की सत्ता की धुरी उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती रही।

यहाँ एक नज़र डालते हैं उनके सफर पर:

  • उन्होंने पहली बार 2000 में शपथ ली थी (हालांकि वह सरकार सिर्फ 7 दिन चली)।
  • इसके बाद 2005, 2010, 2015, 2017, 2020, 2022 और 2024 में अलग-अलग समय पर राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार उन्होंने शपथ ली।
  • जनवरी 2024 में जब उन्होंने एनडीए (NDA) के साथ मिलकर 9वीं बार सरकार बनाई, तो वह पहले ही रिकॉर्ड बना चुके थे, लेकिन यह आंकड़ा अब 10 शपथों के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दर्ज हो गया है।

वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स (लंदन) क्या है?

वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स (WBR) एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है जो दुनिया भर में असाधारण उपलब्धियों, अद्वितीय रिकॉर्ड्स और मानव प्रयासों को प्रमाणित और सूचीबद्ध करता है। इसका मुख्यालय लंदन, यूनाइटेड किंगडम में है। जब यह संस्था किसी राजनेता को सम्मानित करती है, तो यह उस नेता के प्रभाव और लंबी राजनीतिक पारी का प्रमाण होता है।

बिहार के लिए गौरव या राजनीति का आईना?

नीतीश कुमार के समर्थकों (JDU कार्यकर्ताओं) के लिए यह गर्व का क्षण है। उनका कहना है कि “सुशासन बाबू” ने अपनी कार्यशैली और स्वीकार्यता के दम पर यह मुकाम हासिल किया है। वहीं, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 10 बार शपथ लेना यह भी दर्शाता है कि बिहार की राजनीति में पिछले दो दशकों में कितनी अस्थिरता और गठबंधन के बदलाव देखे गए हैं।

नीतीश कुमार

चाहे नजरिया जो भी हो, आंकड़ों के खेल में नीतीश कुमार अब ‘वर्ल्ड चैंपियन’ बन चुके हैं।

नीतीश कुमार का नाम ‘वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स’ में शामिल होना यह साबित करता है कि भारतीय राजनीति में उनका कद और प्रासंगिकता अभी भी बरकरार है। 10 बार शपथ लेना महज एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक चतुराई और बिहार की जनता के बीच उनकी पकड़ का सबूत है। अब देखना यह है कि यह रिकॉर्ड भविष्य में कोई और नेता तोड़ पाता है या नहीं।

क्या आप नीतीश कुमार की इस उपलब्धि को बिहार के लिए गर्व की बात मानते हैं? कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर लिखें!

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बिहार विधानसभा स्पीकर: डॉ. प्रेम कुमार बने निर्विरोध अध्यक्ष, जानिए उनके सियासी सफर और बिहार की राजनीति पर असर

बिहार विधानसभा

बिहार की राजनीति में आज का दिन एक नई शुरुआत लेकर आया है। बिहार विधानसभा को अपना नया स्पीकर (अध्यक्ष) मिल गया है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के कद्दावर नेता और गया टाउन से लगातार 8 बार के विधायक, डॉ. प्रेम कुमार को सर्वसम्मति से बिहार विधानसभा का नया स्पीकर चुन लिया गया है। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, सभी ने एक सुर में उनके नाम पर मुहर लगाई है।आइए जानते हैं इस खबर की पूरी जानकारी, डॉ. प्रेम कुमार का राजनीतिक सफर और इस फैसले के पीछे के सियासी मायने।

विधानसभा में आज क्या हुआ?

  • आज बिहार विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान स्पीकर पद के लिए चुनाव की प्रक्रिया शुरू हुई। यह प्रक्रिया बिहार के लोकतांत्रिक मूल्यों की एक खूबसूरत तस्वीर पेश कर गई।
  • सर्वसम्मति से चयन: सदन में डॉ. प्रेम कुमार के नाम का प्रस्ताव रखा गया, जिसे सभी सदस्यों ने ध्वनि मत (Voice Vote) से पारित कर दिया। कोई वोटिंग नहीं हुई, जो उनके कद और स्वीकार्यता को दर्शाता है।
  • सीएम और तेजस्वी ने दिखाया सम्मान: परंपरा के अनुसार, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव, दोनों मिलकर नए स्पीकर को सम्मानपूर्वक उनके आसन (Chair) तक लेकर गए।
  • नए स्पीकर का वादा: पदभार ग्रहण करने के बाद डॉ. प्रेम कुमार ने कहा कि वे “निष्पक्ष” होकर सदन चलाएंगे और हर विधायक की आवाज को बराबर महत्व देंगे, चाहे वह सत्ता पक्ष का हो या विपक्ष का।
  • बिहार विधानसभा

कौन हैं डॉ. प्रेम कुमार?

  • अगर आप बिहार की राजनीति को समझते हैं, तो डॉ. प्रेम कुमार किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। उनके करियर पर एक नज़र:
  • गया का अभेद किला: प्रेम कुमार 1990 से लगातार गया टाउन (शहरी) सीट से जीतते आ रहे हैं। वे अब तक 8 बार विधायक बन चुके हैं।
  • मंत्री पद का अनुभव: वे बिहार सरकार में कृषि मंत्री और पीएचई (PHE) मंत्री जैसे महत्वपूर्ण विभागों को संभाल चुके हैं।
  • अति-पिछड़ा चेहरा: वे अति-पिछड़ा वर्ग (EBC – चंद्रवंशी समाज) से आते हैं, जो बिहार के वोट बैंक में एक बड़ा हिस्सा रखता है।
  • शिक्षा: वे पढ़ाई-लिखाई में भी आगे हैं और उनके पास पीएचडी (PhD) की डिग्री है, इसीलिए उन्हें ‘डॉक्टर’ प्रेम कुमार कहा जाता है।

बीजेपी ने प्रेम कुमार को ही क्यों चुना?

इस फैसले के पीछे एनडीए (NDA) की गहरी रणनीति दिखाई देती है:

  • जातीय समीकरण (Caste Arithmetic): बिहार में EBC वोट बैंक बहुत मायने रखता है। प्रेम कुमार को स्पीकर बनाकर बीजेपी ने चंद्रवंशी और अति-पिछड़ा समाज को एक बड़ा संदेश दिया है।
  • वरिष्ठता (Seniority): सदन चलाने के लिए अनुभव की ज़रूरत होती है। 35 साल का विधायकी अनुभव होने के कारण वे नियम-कानून के अच्छे जानकार हैं।
  • विवादरहित छवि: प्रेम कुमार की छवि एक शांत और गंभीर नेता की रही है, जिसे विपक्ष भी सम्मान देता है। यही वजह है कि आरजेडी (RJD) ने भी उनका विरोध नहीं किया।

अब आगे क्या ?

नए स्पीकर के आने से उम्मीद है कि विधानसभा का सत्र शांति से चलेगा। बिहार में अभी कई महत्वपूर्ण बिल और बजट पर चर्चा होनी है। ऐसे में डॉ. प्रेम कुमार की भूमिका एक “अंपायर” के तौर पर बहुत अहम होगी।

डॉ. प्रेम कुमार का स्पीकर बनना बिहार की राजनीति में स्थिरता का संकेत है। एक अनुभवी नेता के हाथ में कमान होने से सदन की गरिमा और बढ़ेगी।

बिहार विधानसभा

FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)

प्रश्न 1: बिहार विधानसभा के नए स्पीकर कौन हैं?

उत्तर: बीजेपी के वरिष्ठ नेता और गया से विधायक डॉ. प्रेम कुमार नए स्पीकर बने हैं।

प्रश्न 2: डॉ. प्रेम कुमार किस पार्टी से हैं?

उत्तर: वे भारतीय जनता पार्टी (BJP) से संबंध रखते हैं।

प्रश्न3: क्या स्पीकर के चुनाव में वोटिंग हुई थी?

उत्तर: नहीं, उनका चुनाव निर्विरोध (Unanimous) तरीके से हुआ है। विपक्ष ने भी उनका समर्थन किया।

आपकी क्या राय है?

क्या डॉ. प्रेम कुमार बिहार विधानसभा को बेहतर तरीके से चला पाएंगे? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं।

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संसद परिसर में ‘कुत्ता’ और छिड़ी महाबहस: क्या रेणुका चौधरी ने तोड़ी मर्यादा या यह है ‘पेट लव’? जानिये पूरा सच 

संसद

भारतीय संसद, जिसे लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता है, अक्सर तीखी राजनीतिक बहसों, शोर-शराबे और गंभीर विधेयकों पर चर्चा के लिए खबरों में रहती है। लेकिन, पिछले कुछ दिनों से संसद भवन की चर्चा एक बिल्कुल अलग और अनोखे कारण से हो रही है। यह कारण कोई राजनेता नहीं, बल्कि एक चार पैरों वाला ‘मेहमान’ है।

जी हाँ, हम बात कर रहे हैं कांग्रेस की वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री रेणुका चौधरी के पालतू कुत्ते की, जिसकी संसद परिसर में मौजूदगी ने एक नई राष्ट्रीय बहस को जन्म दे दिया है। एक तरफ जहाँ पशु प्रेमी इसे सामान्य बात मान रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ संसदीय मर्यादा और सुरक्षा के सवाल भी उठाए जा रहे हैं।

आखिर एक कुत्ते के संसद परिसर में आने पर इतना बवाल क्यों है? क्या हैं नियम और क्यों बंटी हुई है जनता की राय? आइए, इस विस्तृत रिपोर्ट में जानते हैं इस पूरे मामले की गहराई।

संसद

पूरा मामला क्या है?

हाल ही में, संसद के सत्र के दौरान कांग्रेस नेता रेणुका चौधरी को अपनी गाड़ी में अपने पालतू कुत्ते के साथ संसद भवन परिसर में आते देखा गया। जैसे ही उनकी गाड़ी मीडिया के कैमरों के सामने रुकी, लोगों का ध्यान पिछली सीट पर बैठे या खिड़की से झांकते उनके कुत्ते पर गया।

देखते ही देखते ये तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए। अमूमन संसद के गेट पर कड़ी सुरक्षा होती है और केवल सांसदों, कर्मचारियों और मान्यता प्राप्त पत्रकारों को ही प्रवेश मिलता है। ऐसे में, एक वीआईपी गाड़ी में कुत्ते की मौजूदगी ने सभी का ध्यान खींचा और यह चर्चा का विषय बन गया।

क्यों छिड़ी बहस? दो तरफा हुई जनता की राय

रेणुका चौधरी और उनके ‘बेजुबान साथी’ के वीडियो सामने आते ही देश में एक बहस छिड़ गई। यह बहस मुख्य रूप से दो तर्कों के बीच है: ‘संसदीय मर्यादा’ बनाम ‘पशु प्रेम’।

1. विरोध में तर्क: मर्यादा और सुरक्षा का सवाल

  • एक बड़ा वर्ग इस बात से नाखुश है। उनके तर्क कुछ इस प्रकार हैं:
  • संसदीय गरिमा: आलोचकों का कहना है कि संसद देश की सर्वोच्च विधायी संस्था है। यह कोई पार्क या पिकनिक स्पॉट नहीं है। यहाँ जानवरों को लाना इस गरिमामयी स्थान की गंभीरता को कम करता है।
  • ध्यान भटकना (Distraction): संसद में देश के ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए। जब ऐसी घटनाएं होती हैं, तो मुख्य मुद्दों से मीडिया और जनता का ध्यान भटक जाता है।
  • सुरक्षा प्रोटोकॉल: संसद एक अति-संवेदनशील सुरक्षा क्षेत्र (High Security Zone) है। अगर सांसदों को अपने पालतू जानवर लाने की छूट दी गई, तो यह सुरक्षाकर्मियों के लिए एक नई चुनौती बन सकता है। सवाल यह भी है कि यह छूट कहाँ तक जाएगी?

2. समर्थन में तर्क: पेट्स भी हैं परिवार का हिस्सा

  • दूसरी ओर, पशु प्रेमी और रेणुका चौधरी के समर्थक इसे एक सामान्य घटना मान रहे हैं:
  • पारिवारिक सदस्य: आज के दौर में लोग अपने पालतू जानवरों को परिवार का हिस्सा मानते हैं। अगर कुत्ता सिर्फ गाड़ी में है और किसी को नुकसान नहीं पहुँचा रहा, तो इसमें क्या बुराई है?
  • भावनात्मक सहारा (Emotional Support): कई लोग तर्क देते हैं कि राजनेताओं पर बहुत तनाव होता है, और उनके पालतू जानवर उनके लिए भावनात्मक सहारे का काम करते हैं।
  • आधुनिक सोच: समर्थकों का कहना है कि हमें पुरानी सोच से बाहर निकलना चाहिए। दुनिया भर में कई दफ्तरों में ‘पेट-फ्रेंडली’ माहौल बनाया जा रहा है।

क्या कहते हैं संसद के नियम?

संसद

यह जानना बेहद जरूरी है कि नियम क्या कहते हैं।

  • तकनीकी रूप से, संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के चैंबर के भीतर किसी भी जानवर को ले जाना सख्त मना है। यह संसदीय शिष्टाचार और नियमों का स्पष्ट उल्लंघन है।
  • हालाँकि, विवाद ‘संसद परिसर’ (Parliament Premises) का है, जिसमें पार्किंग क्षेत्र और बाहरी हिस्से शामिल हैं। नियमों के अनुसार, सांसदों की गाड़ियों को परिसर में प्रवेश की अनुमति होती है। आमतौर पर सुरक्षाकर्मी वीआईपी गाड़ियों की उस तरह तलाशी नहीं लेते, जैसी आम आगंतुकों की होती है।
  • रेणुका चौधरी का कुत्ता संसद के अंदर नहीं, बल्कि उनकी गाड़ी में परिसर तक आया था। यह एक ‘ग्रे एरिया’ (अस्पष्ट क्षेत्र) है जहाँ नियम पूरी तरह साफ नहीं हैं कि क्या सांसद अपनी निजी गाड़ी में जानवर ला सकते हैं या नहीं। इसी अस्पष्टता के कारण बहस ने तूल पकड़ा है।

रेणुका चौधरी का पक्ष

रेणुका चौधरी अपने बेबाक अंदाज के लिए जानी जाती हैं। वह पहले भी अपने कुत्ते के साथ सार्वजनिक जगहों पर देखी गई हैं और वह एक जानी-मानी पशु प्रेमी हैं। उनका मानना है कि जानवर उनके परिवार का हिस्सा हैं और जब तक वे किसी कार्यवाही में बाधा नहीं डाल रहे हैं, इसे मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए।

निष्कर्ष: मर्यादा और आधुनिकता के बीच संतुलन

  • यह घटना सिर्फ एक कुत्ते के संसद पहुँचने की नहीं है, बल्कि यह बदलती सामाजिक मान्यताओं और स्थापित प्रोटोकॉल के बीच के टकराव को दर्शाती है। जहाँ एक तरफ संसद की गंभीरता और सुरक्षा सर्वोपरि है, वहीं दूसरी तरफ जानवरों के प्रति बढ़ता प्रेम और उन्हें परिवार मानने की भावना भी प्रबल है।
  • शायद यह समय है कि संसद की सुरक्षा समितियां इस ‘ग्रे एरिया’ पर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करें ताकि भविष्य में ऐसे विवादों से बचा जा सके और संसद का कीमती समय देश के जरूरी मुद्दों पर लग सके।

आपकी राय मायने रखती है!

क्या आपको लगता है कि सांसदों को अपने पालतू जानवरों को संसद परिसर (गाड़ी में ही सही) में लाने की अनुमति होनी चाहिए? या यह संसद की मर्यादा के खिलाफ है? अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें।

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बड़ी खबर: अब ‘सेवातीर्थ’ के नाम से जाना जाएगा PMO कॉम्प्लेक्स, जानिए प्रधानमंत्री आवास के इस नए बदलाव के पीछे की पूरी कहानी

सेवातीर्थ

देश की राजधानी दिल्ली के सत्ता के गलियारों से आज एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक खबर सामने आई है। भारत के प्रधानमंत्री के आवास और कार्यालय से जुड़ा एक ऐसा बदलाव हुआ है जो केवल नाम का नहीं, बल्कि एक ‘विचारधारा’ का है। जी हाँ, प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) कॉम्प्लेक्स अब अपने पुराने नाम से नहीं, बल्कि ‘सेवातीर्थ’ (Sevatirth) के नाम से जाना जाएगा। यह फैसला अचानक क्यों लिया गया? ‘सेवातीर्थ’ नाम ही क्यों चुना गया? और इसका आम जनता और लोकतंत्र के लिए क्या सन्देश है? आज के इस आर्टिकल में हम इन सभी सवालों के जवाब विस्तार से जानेंगे…|

क्या है पूरा मामला?

ताज़ा जानकारी के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोक कल्याण मार्ग स्थित आवास और कार्यालय परिसर (PMO Complex) को अब आधिकारिक रूप से ‘सेवातीर्थ’ नाम दिया गया है।

आपको याद होगा कि पीएम मोदी का आवास 7, लोक कल्याण मार्ग पर स्थित है (जिसे पहले रेस कोर्स रोड कहा जाता था)। अब इस पूरे परिसर की पहचान ‘शक्ति के केंद्र’ (Power Center) के रूप में नहीं, बल्कि ‘सेवा के स्थान’ के रूप में स्थापित करने की कोशिश की गई है।

सेवातीर्थ

‘सेवातीर्थ’ ही क्यों? जानिए इसके पीछे की खास वजह-

इस नाम को चुनने के पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वह सोच है, जिसका जिक्र वो अक्सर अपने भाषणों में करते हैं।

  • प्रधान सेवक की भावना: पीएम मोदी ने 2014 में सत्ता संभालते ही कहा था कि वो देश के ‘प्रधानमंत्री’ नहीं बल्कि ‘प्रधान सेवक’ हैं। ‘सेवातीर्थ’ नाम उसी ‘सेवा भाव’ को दर्शाता है।
  • सत्ता नहीं, सेवा महत्वपूर्ण: सरकार का मानना है कि प्रधानमंत्री का कार्यालय केवल फाइलों और फैसलों की जगह नहीं है, बल्कि यह वह पवित्र स्थान (तीर्थ) है जहाँ से देश की 140 करोड़ जनता की सेवा की जाती है।
  • औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति: यह बदलाव उस कड़ी का हिस्सा है जिसके तहत राजपथ को ‘कर्तव्य पथ’ और रेस कोर्स रोड को ‘लोक कल्याण मार्ग’ बनाया गया था। मकसद साफ़ है—अंग्रेजों के ज़माने की ‘हुकूमत’ वाली फीलिंग को खत्म करके भारतीय संस्कृति की ‘सेवा’ वाली फीलिंग लाना।
  • महत्वपूर्ण बात: ‘तीर्थ’ शब्द का अर्थ होता है एक पवित्र स्थान। यानी, अब देश के सर्वोच्च कार्यालय को एक पवित्र सेवा स्थल का दर्जा दिया गया है।

पहले भी बदले जा चुके हैं कई नाम

यह पहली बार नहीं है जब मोदी सरकार ने लुटियंस दिल्ली (Lutyens’ Delhi) में प्रतीकात्मक बदलाव किए हैं। अगर हम पिछले कुछ सालों पर नज़र डालें तो एक पैटर्न दिखाई देता है:

  • रेस कोर्स रोड (RCR): इसे बदलकर ‘लोक कल्याण मार्ग’ किया गया, ताकि यह जनता के कल्याण को समर्पित लगे।
  • राजपथ (Rajpath): इसे ‘कर्तव्य पथ’ का नाम दिया गया, जो शासक (राजा) की जगह कर्तव्य (Duty) पर जोर देता है।
  • अब PMO कॉम्प्लेक्स: जिसे अब ‘सेवातीर्थ’ बनाकर इसे सेवा का सर्वोच्च स्थान बताया गया है।
  • सेवातीर्थ

सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रिया

  • जैसे ही यह खबर सामने आई, सोशल मीडिया पर #Sevatirth ट्रेंड करने लगा है।
  • कुछ लोग इसे भारतीय संस्कृति की वापसी बता रहे हैं।
  • वहीं, कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह केवल नाम बदलना नहीं है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों को यह याद दिलाएगा कि लोकतंत्र में सबसे ऊपर ‘जनता’ है और नेता केवल ‘सेवक’ हैं।

दोस्तों, नाम में क्या रखा है? शेक्सपियर ने भले ही यह कहा हो, लेकिन राजनीति और राष्ट्र निर्माण में ‘नाम’ और ‘प्रतीक’ बहुत मायने रखते हैं। ‘सेवातीर्थ’ नाम का उद्देश्य यह संदेश देना है कि भारत का लोकतंत्र अब शासकों का नहीं, बल्कि सेवकों का है।

प्रधानमंत्री कार्यालय का यह नया नाम आपको कैसा लगा? क्या आपको लगता है कि इस तरह के बदलावों से देश की कार्यशैली (Work culture) में फर्क पड़ता है?

अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं!

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संसद के शीतकालीन सत्र का आगाज: अडानी और संभल हिंसा पर विपक्ष का ‘हल्ला बोल’, पहले ही दिन मकर द्वार पर जोरदार प्रदर्शन – जानिए अंदर की पूरी खबर

संसद

देश की राजधानी दिल्ली में आज (2 दिसंबर) से संसद का शीतकालीन सत्र शुरू हो गया है, लेकिन उम्मीद के मुताबिक सत्र का पहला ही दिन बेहद हंगामेदार रहा। ठंड के मौसम में भी दिल्ली का सियासी पारा सातवें आसमान पर है।

विपक्ष ने पहले से ही संकेत दे दिए थे कि वे सरकार को आसानी से काम नहीं करने देंगे, और आज सुबह संसद भवन के ‘मकर द्वार’ पर जो नजारा दिखा, उसने यह साबित भी कर दिया। अडानी मामले और संभल हिंसा जैसे गंभीर मुद्दों पर विपक्ष और सरकार आमने-सामने है। आइए विस्तार से जानते हैं कि आज संसद में क्या हुआ, विपक्ष की क्या मांगें हैं और सरकार की क्या रणनीति है।

संसद

मकर द्वार पर विपक्ष का शक्ति प्रदर्शन

  • सत्र शुरू होने से ठीक पहले, संसद भवन का मुख्य प्रवेश द्वार कहे जाने वाले ‘मकर द्वार’ पर विपक्षी गठबंधन (INDIA Alliance) के सांसदों ने जोरदार प्रदर्शन किया।
  • कौन-कौन था शामिल? कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी समेत कई बड़े विपक्षी नेता हाथों में तख्तियां लेकर सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते नजर आए।
  • क्या थे नारे? सांसदों ने “संविधान बचाओ”, “अडानी मामले की जेपीसी (JPC) जांच कराओ” और “संभल हिंसा पर जवाब दो” जैसे नारे लगाए।
  • माहौल: विपक्ष के तेवर देखकर साफ है कि वे इस सत्र में सरकार को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ेंगे |

किन मुद्दों पर मचा है घमासान?

इस बार का शीतकालीन सत्र सरकार के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगा। विपक्ष ने अपनी ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के लिए मुख्य रूप से दो बड़े मुद्दे चुने हैं:

1. अडानी समूह विवाद

हाल ही में अडानी समूह पर लगे नए आरोपों (रिश्वतखोरी और धोखाधड़ी के अमेरिकी आरोप) ने भारतीय राजनीति में भूचाल ला दिया है।

विपक्ष की मांग: कांग्रेस और अन्य दलों की मांग है कि इस पूरे मामले की JPC (संयुक्त संसदीय समिति) से जांच कराई जाए और संसद में इस पर विस्तृत चर्चा हो। विपक्ष का आरोप है कि सरकार इस मुद्दे पर चर्चा से भाग रही है।

2. संभल हिंसा

उत्तर प्रदेश के संभल में हाल ही में हुई हिंसा और तनाव का मुद्दा भी संसद में गूंज रहा है। विपक्ष ने इसे कानून व्यवस्था की विफलता बताया है और गृह मंत्रालय से जवाब मांगा है। सपा (SP) और कांग्रेस के सांसदों ने आरोप लगाया है कि प्रशासन ने वहां स्थिति को सही से नहीं संभाला।

प्रधानमंत्री मोदी ने क्या कहा?

परंपरा के अनुसार, सत्र शुरू होने से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मीडिया को संबोधित किया। उन्होंने विपक्ष से सहयोग की अपील की।

पीएम मोदी ने कहा, “संसद का समय देश के लिए बहुत कीमती है। हम हर विषय पर चर्चा के लिए तैयार हैं, लेकिन चर्चा नियमों के तहत होनी चाहिए। विपक्ष को संसद की कार्यवाही में बाधा डालने के बजाय स्वस्थ बहस करनी चाहिए।”

सरकार का प्रयास है कि इस सत्र में वक्फ संशोधन बिल (Waqf Amendment Bill) और ‘वन नेशन वन इलेक्शन’ जैसे महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा आगे बढ़ाई जाए।

संसद

क्यों खास है यह शीतकालीन सत्र?

यह सत्र 2 दिसंबर से शुरू होकर 20 दिसंबर तक चलने की संभावना है। इस छोटे से सत्र में सरकार के पास कई पेंडिंग बिल पास कराने की चुनौती है, वहीं विपक्ष के पास हालिया विधानसभा चुनावों के नतीजों के बाद खुद को साबित करने का मौका है।

महंगाई, मणिपुर के हालात और बांग्लादेश में हिंदुओं की सुरक्षा जैसे मुद्दे भी इस सत्र में गाहे-बगाहे उठने की पूरी संभावना है।

आज के घटनाक्रम से यह साफ हो गया है कि संसद का यह शीतकालीन सत्र ‘शीतल’ तो बिल्कुल नहीं रहने वाला। अडानी और संभल जैसे मुद्दों पर रस्साकशी जारी रहेगी। अब देखना यह होगा कि क्या सरकार विपक्ष के भारी विरोध के बीच अपने महत्वपूर्ण बिल पास करा पाती है या फिर यह पूरा सत्र हंगामे की भेंट चढ़ जाएगा।

सवाल: क्या आपको लगता है कि संसद में हंगामे की वजह से जनता के असली मुद्दे (महंगाई, बेरोजगारी) पीछे छूट जाते हैं? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें।

FAQ: पाठकों के सवाल

Q1: संसद का शीतकालीन सत्र कब तक चलेगा?

A. यह सत्र आज (2 दिसंबर) से शुरू होकर 20 दिसंबर 2025 तक चलने की उम्मीद है।

Q2: मकर द्वार क्या है?

A. मकर द्वार नए संसद भवन का एक प्रमुख प्रवेश द्वार है, जिसका इस्तेमाल अक्सर सांसद और वीवीआईपी (VVIP) करते हैं। इसका नाम पौराणिक जीव ‘मकर’ पर रखा गया है।

Q3: विपक्ष अडानी मामले पर JPC की मांग क्यों कर रहा है?

A. विपक्ष का मानना है कि सामान्य जांच एजेंसियां निष्पक्ष जांच नहीं कर पा रही हैं, इसलिए सभी पार्टियों के सांसदों वाली कमेटी (JPC) से इसकी जांच होनी चाहिए।

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पुतिन का ‘पावर गेम’: भारत दौरे पर दुनिया की नज़र, क्या होंगे बड़े समझौते? (Putin India Visit 2025)

पुतिन

यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद पहली बार, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (Vladimir Putin) भारत की धरती पर कदम रखने जा रहे हैं। आधिकारिक घोषणा के अनुसार, पुतिन 4 और 5 दिसंबर 2025 को भारत के दो दिवसीय दौरे पर रहेंगे। यह सिर्फ एक कूटनीतिक मुलाकात नहीं, बल्कि बदलती दुनिया में भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) का सबसे बड़ा सबूत है।

पूरी दुनिया की निगाहें इस 23वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन (India-Russia Annual Summit) पर टिकी हैं। जहाँ एक तरफ पश्चिमी देश प्रतिबंधों (Sanctions) का दबाव बना रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ पीएम मोदी और राष्ट्रपति पुतिन अपनी पुरानी दोस्ती को नए आयाम देने की तैयारी में हैं।

पुतिन

दौरे का पूरा शेड्यूल

• तारीख: 4-5 दिसंबर 2025

•स्थान: नई दिल्ली

• मुख्य एजेंडा: रक्षा, ऊर्जा, व्यापार और कनेक्टिविटी।

•विशेष: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू रूसी राष्ट्रपति के सम्मान में एक विशेष राजकीय भोज (State Banquet) की मेजबानी करेंगी।

इस दौरे से क्या उम्मीदें हैं?

इस हाई-प्रोफाइल विजिट के दौरान कई अहम समझौतों पर मुहर लग सकती है। यहाँ मुख्य बिंदु दिए गए हैं:

1. रक्षा क्षेत्र: S-400 और ‘सुखोई’ पर बात

भारत अपनी सुरक्षा जरूरतों के लिए रूस पर काफी हद तक निर्भर है। सूत्रों के मुताबिक, दोनों नेताओं के बीच S-400 मिसाइल सिस्टम की बची हुई डिलीवरी को जल्द पूरा करने पर चर्चा होगी। इसके अलावा, Sukhoi-57 (Su-57) फाइटर जेट्स के सह-विकास (Co-development) और भारत में ही स्पेयर पार्ट्स के निर्माण पर भी बड़ी डील हो सकती है।

2. ऊर्जा सुरक्षा: सस्ता तेल और परमाणु ऊर्जा

पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद, भारत ने रूस से कच्चा तेल खरीदना जारी रखा है। इस मुलाकात में तेल की सप्लाई को दीर्घकालिक (Long-term) बनाने और भुगतान के लिए ‘रुपया-रूबल’ (Rupee-Ruble) मैकेनिज्म को और मजबूत करने पर जोर दिया जाएगा। साथ ही, तमिलनाडु के कुडनकुलम परमाणु संयंत्र की नई यूनिट्स पर भी चर्चा संभव है।

3. व्यापार: $100 बिलियन का लक्ष्य

दोनों देशों ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 बिलियन डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखा है। फिलहाल व्यापार संतुलन रूस के पक्ष में है, इसलिए भारत अपने निर्यात (खासकर कृषि और फार्मा) को बढ़ाने की मांग करेगा।

4. भू-राजनीति (Geopolitics): यूक्रेन युद्ध

यह पुतिन का युद्ध के बाद पहला भारत दौरा है, इसलिए यूक्रेन मुद्दे पर चर्चा अनिवार्य है। पीएम मोदी ने हमेशा “बातचीत और कूटनीति” की वकालत की है। उम्मीद है कि भारत एक बार फिर शांति स्थापना के लिए मध्यस्थता की पेशकश कर सकता है।

पुतिन

दुनिया की नज़र क्यों है?

यह दौरा अमेरिका और पश्चिमी देशों के लिए एक कड़वा घूंट हो सकता है। अमेरिका ने कई बार भारत को रूस से दूरी बनाने की सलाह दी है। लेकिन भारत ने साफ कर दिया है कि वह अपने राष्ट्रहित (National Interest) को सर्वोपरि रखेगा। यह मुलाकात यह संदेश देगी कि भारत किसी भी गुट का हिस्सा नहीं है, बल्कि वह एक स्वतंत्र ग्लोबल पावर है।

व्लादिमीर पुतिन का यह दौरा भारत-रूस संबंधों के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ साबित होगा। क्या भारत पश्चिमी दबाव को संभालते हुए रूस के साथ अपनी दोस्ती को और गहरा कर पाएगा? यह 5 दिसंबर को होने वाले समझौतों से साफ हो जाएगा।

आपका क्या विचार है? क्या भारत को रूस के साथ अपने संबंध और मजबूत करने चाहिए या पश्चिम की बात माननी चाहिए? कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर लिखें!

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पटना वाले ध्यान दें! आज से 5 दिनों तक विधानसभा के पास जाने से पहले पढ़ लें ये खबर, धारा 163 लागू

विधानसभा

क्या आप आज पटना की सड़कों पर निकलने वाले हैं? या आपका काम सचिवालय (Secretariat) या विधानसभा के आसपास है? अगर हाँ, तो यह खबर आपके लिए बहुत जरूरी है। पटना प्रशासन ने आज से शहर के एक खास हिस्से में “हाई अलर्ट” जैसा माहौल कर दिया है।

बिहार विधानसभा का शीतकालीन सत्र आज (1 दिसंबर) से शुरू हो गया है। इसी को देखते हुए पटना जिला प्रशासन ने सुरक्षा का घेरा सख्त कर दिया है। आइए, आसान शब्दों में जानते हैं कि आखिर कौन से नियम बदले हैं और आपको किन बातों का ध्यान रखना है।

1. क्या है पूरा मामला?

आज यानी 1 दिसंबर से 5 दिसंबर 2025 तक बिहार विधानसभा का शीतकालीन सत्र (Winter Session) चलेगा। चूंकि नई सरकार का गठन हुआ है और प्रोटेम स्पीकर शपथ दिला रहे हैं, इसलिए राजनीतिक गहमागहमी बहुत ज्यादा है।

विपक्ष के हंगामे और किसी भी तरह के धरने-प्रदर्शन की आशंका को देखते हुए, पटना सदर के अनुमंडल दंडाधिकारी (SDM) ने विधानसभा परिसर के आसपास धारा 163 (पूर्व में धारा 144) लागू कर दी है।

जरूरी नोट : आपको याद होगा जिसे हम पहले धारा 144 (निषेधाज्ञा) कहते थे, अब नए कानून (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता – BNSS) के तहत उसे धारा 163 कहा जाता है। नियम वही हैं, बस नाम नया है।

2. इन चीजों पर रहेगी सख्त पाबंदी

प्रशासन ने साफ़ कह दिया है कि विधानसभा के आसपास परिंदा भी पर नहीं मार सकेगा। अगर आप उस इलाके में जा रहे हैं, तो इन बातों का ध्यान रखें:

  • नो प्रोटेस्ट ज़ोन: विधानसभा के गेट या आसपास आप किसी भी तरह का धरना, प्रदर्शन, जुलूस या घेराव नहीं कर सकते।
  • भीड़ पर रोक: 5 या उससे अधिक लोग एक जगह पर इकट्ठा नहीं हो सकते।
  • हथियार ले जाना मना: किसी भी तरह का आग्नेय शस्त्र (Firearms), लाठी-डंडा, ईंट-पत्थर या कोई भी घातक हथियार लेकर चलना सख्त मना है।
  • लाउडस्पीकर: बिना अनुमति के लाउडस्पीकर बजाने पर भी पाबंदी रहेगी।

3. कौन सा इलाका है ‘प्रतिबंधित क्षेत्र’? (Restricted Areas)

यह जानना सबसे ज्यादा जरुरी है कि आखिर धारा 163 कहाँ-कहाँ लागू है। प्रशासन ने इन चौहद्दियों (Boundaries) को मार्क किया है:

  • उत्तर (North): बेली रोड से लेकर शहीद स्मारक तक।
  • दक्षिण (South): आर ब्लॉक गोलंबर से लेकर जीपीओ गोलंबर तक।
  • पूरब (East): पुरानी सचिवालय का पूर्वी गेट।
  • पश्चिम (West): विधानसभा का मुख्य गेट और पश्चिमी इलाका।

सरल शब्दों में कहें तो, सचिवालय, विधानसभा और आर-ब्लॉक के आसपास के पूरे इलाके में यह नियम लागू रहेगा।

4. यह फैसला क्यों लिया गया?

इस बार का सत्र बहुत छोटा (सिर्फ 5 दिन) लेकिन बहुत हंगामेदार होने वाला है।

  • शपथ ग्रहण: नवनिर्वाचित विधायक शपथ ले रहे हैं।
  • स्पीकर चुनाव: कल (2 दिसंबर) विधानसभा स्पीकर का चुनाव होना है।
  • विपक्ष का तेवर: कांग्रेस और वामदल ‘वोट चोरी’ और ईवीएम के मुद्दे पर प्रदर्शन करने की तैयारी में हैं।

ऐसे में कानून व्यवस्था न बिगड़े, इसलिए प्रशासन ने पहले ही कमर कस ली है। अगर आपको इन इलाकों में कोई जरुरी काम नहीं है, तो अगले 5 दिनों तक यहाँ जाने से बचें या ट्रैफिक डायवर्जन का ध्यान रखें। नियम तोड़ने पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है। एक जिम्मेदार नागरिक बनें और प्रशासन का सहयोग करें। पटना की हर छोटी-बड़ी खबर सबसे पहले जानने के लिए हमारे ब्लॉग को फॉलो करें!

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बिहार की राजनीति में फिर उबाल! कांग्रेस का ‘वोट चोरी’ पर बड़ा हल्ला बोल, पटना में बनी ये 3 बड़ी रणनीतियां

बिहार की राजनीति

बिहार की राजनीति में फिर उबाल ,विधानसभा चुनाव भले ही खत्म हो गए हों, लेकिन सियासी पारा अभी भी सातवें आसमान पर है। जो खामोशी छाई थी, वो आज यानी 1 दिसंबर को पटना में टूटती नजर आ रही है। बिहार कांग्रेस ने आज एक अहम बैठक बुलाई है, और खबरों की मानें तो मुद्दा सिर्फ हार-जीत का नहीं, बल्कि ‘वोट चोरी’ का है।

अगर आप सोच रहे हैं कि आज पटना में कांग्रेस मुख्यालय में क्या खिचड़ी पकी है और इसका आने वाले दिनों में क्या असर होगा, तो यहाँ हम आपको इस बैठक की हर एक बारीक डिटेल (Inside Story) बहुत ही आसान शब्दों में बता रहे हैं।

1. आखिर आज पटना में क्या हुआ? (The Main Event)

बिहार कांग्रेस ने आज (1 दिसंबर) पटना में अपने सभी बड़े नेताओं, जिलाध्यक्षों और पदाधिकारियों को तलब किया। मकसद साफ़ था— एनडीए (NDA) सरकार को घेरना।

पार्टी के अंदर खाने से खबर आ रही है कि कांग्रेस इस बार चुप बैठने के मूड में नहीं है। बैठक का मुख्य केंद्र बिंदु “कथित वोट चोरी” है। कांग्रेस नेताओं का मानना है कि जनादेश (Mandate) उनके पक्ष में था, लेकिन परिणामों में गड़बड़ी की गई है। इसी को आधार बनाकर आज की बैठक में सड़क से लेकर सदन तक आंदोलन की रूपरेखा तैयार की गई है।

बिहार की राजनीति

2. बैठक के 3 मुख्य एजेंडे (Key Agenda)

आज की इस हाई-प्रोफाइल मीटिंग में मुख्य रूप से तीन बातों पर फोकस किया गया:

  • ईवीएम (EVM) पर सवाल: बैठक में जिलाध्यक्षों के साथ मिलकर उन सीटों की समीक्षा की गई जहाँ हार का अंतर बहुत कम था। पार्टी का आरोप है कि ईवीएम में संदिग्ध गड़बड़ी हुई है। नेता अब इस बात पर मंथन कर रहे हैं कि इसे जनता के बीच सबूत के तौर पर कैसे पेश किया जाए।
  • 14 दिसंबर की ‘दिल्ली चलो’ हुंकार: सिर्फ पटना ही नहीं, लड़ाई को दिल्ली तक ले जाने की तैयारी है। बैठक में 14 दिसंबर को दिल्ली में होने वाली विशाल रैली के लिए भीड़ जुटाने और कार्यकर्ताओं को चार्ज करने की रणनीति बनाई गई। कांग्रेस इसे शक्ति प्रदर्शन के तौर पर देख रही है।
  • संगठन में कसावट: हार के बाद मायूस हो चुके कार्यकर्ताओं में फिर से जान फूंकने के लिए पदाधिकारियों को नए टास्क दिए गए हैं।

3. चुनाव आयोग ने आरोपों की हवा निकाली (The Counter View)

  • जहाँ एक तरफ कांग्रेस ‘वोट चोरी’ का शोर मचा रही है, वहीं चुनाव आयोग (Election Commission) का पक्ष बिल्कुल अलग और स्पष्ट है। एक निष्पक्ष रिपोर्टिंग के लिए यह जानना भी आपके लिए जरुरी है।
  • आयोग ने कांग्रेस और विपक्ष के इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। आयोग का कहना है कि:
  • “विपक्ष अपने आरोपों को साबित करने में नाकाम रहा है। इतना ही नहीं, चुनाव नतीजों के बाद ईवीएम की जांच या पुनर्मतदान (Re-polling) के लिए किसी भी तरह का कोई औपचारिक आवेदन (Application) तक नहीं दिया गया था।”
  • यानी आयोग की नजर में यह मामला पूरी तरह साफ है और गड़बड़ी के आरोप बेबुनियाद हैं।
  • बिहार की राजनीति

आगे क्या होगा?

आज की बैठक से एक बात तो साफ है कि बिहार कांग्रेस हार को आसानी से पचाने वाली नहीं है। 1 दिसंबर की यह बैठक एक ‘वार्म-अप’ की तरह है। अब देखना दिलचस्प होगा कि 14 दिसंबर की दिल्ली रैली में बिहार से कितनी आवाज उठती है।

क्या कांग्रेस ‘वोट चोरी’ के मुद्दे को जनता के दिलों में उतार पाएगी, या फिर चुनाव आयोग की दलीलों के आगे यह मुद्दा ठंडे बस्ते में चला जाएगा? यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि बिहार की राजनीति में अभी शांति नहीं होने वाली।

आपकी राय क्या है?

क्या आपको लगता है कि वाकई चुनाव में कोई गड़बड़ी हुई थी या यह विपक्ष की हताशा है? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें।

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बिहार के  कृषि मंत्री का बड़ा फैसला : मोन्था चक्रवात से प्रभावित किसानों को मिलेगा मुआवजा

कृषि मंत्री

बिहार में नए कृषि मंत्री रामकृपाल यादव ने पदभार संभालते ही किसानों के लिए बड़ी राहत की घोषणा की है। अक्टूबर में आए मोन्था चक्रवात और उसके बाद हुई भारी बारिश व बाढ़ से 12 जिलों में फसलों को भारी नुकसान हुआ था। कई जगह धान की कटाई रुक गई और रबी फसल की बुआई भी प्रभावित हुई। ऐसे में सरकार ने कृषि इनपुट सब्सिडी के रूप में किसानों को मुआवजा देने का फैसला लिया है।

मंत्री ने कहा कि नुकसान का सर्वे तेजी से हो रहा है और सर्वे पूरा होते ही पात्र किसानों के बैंक खाते में सीधे राशि भेजी जाएगी। किसानों को राहत जल्द उपलब्ध हो, इसके लिए विभाग युद्धस्तर पर काम कर रहा है।

मोन्था चक्रवात से बिहार में हुई भारी तबाही

अक्टूबर में आए मोन्था तूफान ने बिहार के कई हिस्सों में बेमौसम तेज बारिश और तेज हवाएं लाई थीं। इसकी वजह से धान की फसल जमीन पर गिर गई, खेतों में पानी भर गया और कटाई लगभग रुक गई। किसानों का मेहनत और निवेश दोनों डूब गए।

कृषि मंत्री

इस चक्रवात से:

  • 39 प्रखंडों की 397 पंचायतें प्रभावित हुईं
  • धान और सब्जी फसलों को सबसे ज्यादा नुकसान
  • बुआई में देरी से अगली फसल पर भी खतरा

कई किसानों ने बीज और खाद के लिए कर्ज लिया था, लेकिन नुकसान के बाद उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर हो गई।

कितना मिलेगा मुआवजा? – भूमि के प्रकार के आधार पर किसानों को यह मुआवजा दिया जाएगा। अधिकतम 2 हेक्टेयर तक राशि मिल सकेगी:

जमीन का प्रकार मुआवजा राशि

  • असिंचित (बारानी भूमि) ₹8,500 प्रति हेक्टेयर
  • सिंचित भूमि ₹17,000 प्रति हेक्टेयर
  • बहु-फसलीय भूमि (गन्ना सहित) ₹22,500 प्रति हेक्टेयर

किन जिलों में मिलेगा लाभ

बेगूसराय, पूर्वी चंपारण, कैमूर, मधुबनी, किशनगंज, गया, भोजपुर, मधेपुरा, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, शिवहर और सुपौल इन 12 जिलों के किसान इसका लाभ ले सकेंगे।

कृषि मंत्री

रजिस्ट्रेशन कैसे और कब तक

पात्र किसानों को 2 दिसंबर तक ऑनलाइन आवेदन करना होगा: dbtagriculture.bihar.gov.in पर रजिस्ट्रेशन उपलब्ध है।

फॉर्म भरने के बाद राशि सीधे बैंक खाते में DBT (डायरेक्ट बैंक ट्रांसफर) के माध्यम से भेजी जाएगी।

मंत्री का बयान — किसानों के साथ खड़ी है सरकार

रामकृपाल यादव ने कहा : “मैं खुद किसान का बेटा हूं। किसानों के संकट को समझता हूं। इस आपदा से किसी किसान को अकेला महसूस नहीं होने देंगे। बीज, खाद, पानी और बिजली की उपलब्धता पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।”

उन्होंने कहा कि सरकार का लक्ष्य है कि किसानों की आय दोगुनी हो और योजनाएं समय पर जमीन पर उतरें।

क्यों महत्वपूर्ण है यह कदम

  • आपदा से टूटे किसानों को त्वरित आर्थिक सहायता
  • खेत में घायल फसलों को संभालने और अगली बुआई की तैयारी में मदद
  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती

यह फैसला बिहार सरकार की नई कैबिनेट के पहले बड़े निर्णयों में शामिल है।

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बिहार की सियासत में भूचाल: राबड़ी देवी को सरकारी आवास खाली करने का आदेश

राबड़ी देवी

बिहार की राजनीति इस समय बेहद गर्म है। पूर्व मुख्यमंत्री और RJD नेता राबड़ी देवी को उनका सरकारी आवास 10, सर्कुलर रोड खाली करने का आदेश मिलते ही राज्य में सियासी तूफ़ान खड़ा हो गया है। नीतीश कुमार की अगुवाई वाली नई एनडीए सरकार के इस फैसले को राजद कैंप राजनीति से प्रेरित कार्रवाई बता रहा है, जबकि सरकार का कहना है कि यह सिर्फ एक “प्रशासनिक प्रक्रिया” है।

आखिर आदेश क्या है?

भवन निर्माण विभाग ने आधिकारिक पत्र जारी कर राबड़ी देवी को कहा है कि वे पूर्व मुख्यमंत्री कोटे से मिले सरकारी आवास 10, सर्कुलर रोड को खाली करें।अब उन्हें नेता प्रतिपक्ष के पद के आधार पर नया सरकारी आवास 39, हार्डिंग रोड आवंटित किया गया है।पत्र में साफ लिखा गया है कि नए आवास के मिलते ही पुराने आवास को खाली करना जरूरी है।

10 सर्कुलर रोड की राजनीति पिछले करीब 20 साल से यह बंगला सिर्फ घर नहीं, बल्कि RJD की राजनीति का nerve center रहा है। टिकट बंटवारे, गठबंधन की रणनीति, बड़े राजनीतिक फैसलों से लेकर मीडिया ब्रीफिंग तक—सब कुछ यहीं से होता था। लालू परिवार का राजनीतिक इतिहास और संघर्ष की कई कहानियाँ इसी पते से जुड़ी हैं।

इसलिए इस आवास को खाली कराने का फैसला भावनात्मक और राजनीतिक दोनों रूपों में बेहद संवेदनशील माना जा रहा है। राजद की नाराज़गी और भावनात्मक प्रतिक्रिया आदेश सामने आने के बाद लालू परिवार और राजद नेताओं ने इस कार्रवाई को राजनीतिक प्रतिशोध बताया है।

रोहिणी आचार्या ने सोशल मीडिया पर लिखा — “घर से निकालना आसान है, लेकिन जनता के दिल से निकाल पाना मुश्किल।”

तेजप्रताप यादव ने इसे संबंधों में दरार बताकर कहा — “सीएम बनने के बाद छोटे भाई ने बड़े भाई पर पहला वार बंगले पर किया।” राजद नेताओं का आरोप है कि यह फैसला बदले की भावना से लिया गया है, न कि नियमों के आधार पर।

राबड़ी देवी

तेजस्वी–तेजप्रताप पर भी असर?

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव और पूर्व मंत्री तेजप्रताप यादव को भी अपने आवास खाली करने का नोटिस मिल सकता है, हालांकि इस पर अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं है। 2017 में तेजस्वी यादव को भी सरकारी बंगला छोड़ना पड़ा था, जब हाईकोर्ट ने अतिरिक्त सुविधाएं वापस लेने का आदेश दिया था।

सरकार का पक्ष

एनडीए सरकार का कहना है:

यह मात्र नई आवास नीति के तहत पुनर्वितरण की प्रक्रिया है।पूर्व मुख्यमंत्रियों के पुराने आवास वापस लिए जा रहे हैं और पद के आधार पर नए आवास दिए जा रहे हैं।राबड़ी देवी अब नेता प्रतिपक्ष हैं, इसलिए उन्हें उसी कोटे का आवास दिया गया है।

क्या है राजनीतिक संदेश?

राबड़ी देवी

राजनीतिक विश्लेषकों की राय:

  • यह सिर्फ आवास खाली कराने का मामला नहीं, बल्कि नीतीश–लालू दूरी और भाजपा की मजबूत स्थिति का संकेत है।
  • एनडीए सरकार यह संदेश देना चाहती है कि नियम सब पर बराबर लागू होंगे।
  • यह मुद्दा आने वाले दिनों में बड़ा राजनीतिक हथियार बन सकता है, खासकर 2025 के चुनावी मौसम में।
  • आगे क्या?

राजद इस मुद्दे को जनता के बीच राजनीतिक बदले की कार्रवाई के रूप में भुनाने की तैयारी में है, जबकि सत्ता पक्ष इसे पारदर्शी प्रशासनिक फैसला बताता रहेगा।ऐसे में 10 सर्कुलर रोड का विवाद आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति का हॉट टॉपिक बना रह सकता है।

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इमरान खान की हत्या ,क्या पाकिस्तान छिपा रहा है कोई बड़ा सच?

इमरान खान

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री और राजनीतिक शख्सियत, इमरान खान को लेकर हाल-फिलहाल एक सनसनीखेज दावा सोशल मीडिया और कई प्लेटफार्मों पर फैला — कि उन्हें  फर्जी या गुप्त तरीके से उनकी जेल (Adiala Jail, रावलपिंडी) में “हत्या” कर दी गई है। इस दावे ने कुछ ही समय में राजनीतिक हलचल बढ़ा दी। इस पोस्ट में हम देखेंगे कि यह दावा कैसे शुरू हुआ, किन बिंदुओं पर खारिज हुआ, और आज स्थिति क्या है।

दावा — क्या कहा गया?

अफगानिस्तान रक्षा मंत्रालय (या इसके नाम से दिखने वाले किसी सूत्र) ने कथित “सूत्रों” के हवाले से कहा कि इमरान खान की जेल में हत्या कर दी गई है — और कहा गया कि यह हत्या करीब 17 दिन पहले हुई थी।

इमरान खान

इस दावे के साथ एक पोस्ट (कभी “अधिकारिक” जैसा दिखने वाला) भी सोशल मीडिया पर वायरल हुई, जिसने स्थिति को और संवेदनशील बना दिया। इसके बाद, कई समर्थकों और सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने इस खबर को बिना पुष्टि के साझा करना शुरू कर दिया, जिससे भ्रामक स्थिति बन गई।

पाकिस्तान का जवाब

पाकिस्तान सरकार और जेल प्रशासन ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह दावा “झूठा” और “बेबुनियाद” है। इमरान खान सुरक्षित हैं और उनकी हिरासत में किसी प्रकार की हत्या या हमला नहीं हुआ है।  इस दावे की पुष्टि करने वाला न तो कोई विश्वसनीय वीडियो है, न फोटो, न ही मीडिया रिपोर्ट — क्योंकि कोई पुष्टि नहीं हुई है।

पहले भी इसी तरह की झूठी मौत-अफवाहें फैल चुकी हैं: मई 2025 में सोशल मीडिया पर ‘इमरान खान की मौत’ और ‘पीटा गया’ जैसी खबरें वायरल हुई थीं। लेकिन फैक्ट-चेक में पाया गया कि उसमें इस्तेमाल हुई वीडियो 2013 की थी — रेंटल पोर्टल या किसी पुराने रैली के दौरान का।

इमरान खान

परिवार, समर्थक, और सामाजिक प्रतिक्रियाएं

अफवाह फैलने के बाद, इमरान खान की सिस्टर्स — जैसे कि समर्थक — जेल के बाहर मिलने की मांग कर रही थीं। बताया गया कि उन्हें कई हफ्तों से मिलने की अनुमति नहीं दी गई थी, जिससे नाराज़गी थी। (आपके विवरण के अनुसार)

समर्थकों ने जेल के बाहर प्रदर्शन किया, और सरकार से स्वास्थ्य अपडेट, पारदर्शिता और मिलने की अनुमति की मांग उठाई। हालांकि, अब तक ऐसा कोई पुख्ता सबूत सामने नहीं आया कि इन प्रदर्शनों की वजह से जेल प्रशासन ने किसी प्रकार की मृत्यु या हिंसा स्वीकार की हो।

इस तरह की अफवाहें राजनीतिक तनाव बढ़ाने का काम कर रही हैं: सार्वजनिक भय, गलत सूचना, और साजिश की भावना — जो देश में सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता को जन्म दे सकती हैं।

वर्तमान स्थिति

किसी भी विश्वसनीय मीडिया रिपोर्ट, स्वतंत्र मानवाधिकार संस्था या जेल विज़िट का हवाला नहीं मिला है, जो यह साबित करे कि इमरान खान की मौत हुई है। पहले भी फैले झूठे संदेशों, पुराने वीडियो और फर्जी दस्तावेजों — जैसे “प्रेस रिलीज” — को कई फैक्ट-चेकिंग एजेंसियों (जैसे कि WebQoof, NewsChecker, आदि) ने “फर्जी” घोषित किया है।  इसलिए, फिलहाल यह कहना कि “इमरान खान की मौत हो चुकी है” — पूरी तरह अविश्वसनीय और गैर-पुष्ट है।

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France–India Defence Boost – Safran ने भारत में LEAP Engine Facility लॉन्च की, एविएशन में आया ऐतिहासिक मोड़

France–India Defence Boost

France–India Defence Boost : भारत–फ्रांस रक्षा साझेदारी को आज एक नई मजबूती मिली, जब Safran के चेयरमैन ओलिवियर एंड्रियस ने देश की पहली “LEAP Engine Maintenance Facility” का औपचारिक उद्घाटन किया। यह सेंटर भारत में जेट इंजन रिपेयर, ओवरहॉल और हाई-टेक सपोर्ट को घरेलू स्तर पर उपलब्ध कराने की दिशा में ऐतिहासिक कदम है।

समारोह में भारत सरकार के रक्षा सचिव, HAL, DRDO, Air India, और Indian Air Force के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे—जो इस प्रोजेक्ट की रणनीतिक अहमियत दिखाता है।

भारत को क्या मिलेगा?—टेक्नोलॉजी, टैलेंट और तेज एविएशन इकोनॉमी

नया मेंटेनेंस हब Safran–HAL–Air India–DRDO के संयुक्त सहयोग से विकसित किया गया है। यह LEAP engine (CFM International) — जो Air India, Indigo और Vistara की आधुनिक फ्लीट में इस्तेमाल होता है — उसकी सर्विसिंग अब भारत में ही होगी।

इससे भारत को कई बड़े फायदे मिलेंगे:

  • कम डाउनटाइम: इंजनों की रिपेयरिंग के लिए विदेश भेजने की जरूरत नहीं
  • हजारों रोजगार: हाई-टेक एविएशन स्किल्स में नई नौकरियां
  • मेक इन इंडिया को बढ़ावा: डिफेंस–एयरोस्पेस सप्लाई चेन मजबूत
  • लोकल टेक्निकल एक्सपर्टीज: डिजिटल मॉनिटरिंग और पार्ट मैन्युफैक्चरिंग में बढ़त

France–India Defence Boost

भारत–फ्रांस रक्षा रिश्ता: एक और नई ऊंचाई

उद्घाटन के दौरान Safran चेयरमैन एंड्रियस ने कहा— “यह सुविधा भारत–फ्रांस रक्षा और टेक्नोलॉजी सहयोग का ऐतिहासिक विस्तार है।” इस फैसिलिटी का प्रभाव सिर्फ एयरलाइंस में नहीं दिखेगा, बल्कि राफेल सपोर्ट सिस्टम, हेलीकॉप्टर इंजन डिवीजन, जेट इंजन पार्ट्स इंडस्ट्री, भविष्य के मिलिट्री–एविएशन प्रोजेक्ट्स में भी नई गति आएगी।

भारत सरकार ने Safran और HAL के सहयोग की सराहना करते हुए कहा कि यह साझेदारी भारत को वैश्विक एविएशन हब बनाने की दिशा में एक निर्णायक कदम है।

भारत की आत्मनिर्भर एविएशन टेक्नोलॉजी की ओर बड़ी छलांग

नई LEAP Engine Facility से यह साफ है कि भारत न सिर्फ रक्षा के क्षेत्र में बल्कि सिविल एविएशन टेक्नोलॉजी में भी तेजी से आत्मनिर्भर हो रहा है। यह साझेदारी आने वाले वर्षों में भारत–फ्रांस को दुनिया की सबसे मजबूत एयरोस्पेस पार्टनरशिप में बदल देगी।

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कैबिनेट मीटिंग में सपनों की बारिश—हक़ीक़त में कितना होगा?

कैबिनेट मीटिंग

बिहार में नई सरकार की पहली कैबिनेट मीटिंग में ऐसे बड़े फैसले लिए गए हैं, जिनसे आने वाले वर्षों में राज्य का पूरा विकास मॉडल बदल सकता है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में कुल 10 अहम एजेंडों पर मुहर लगी। इनमें AI मिशन, 25 नई चीनी मिलों की मंजूरी, और 11 नए टाउनशिप का निर्माण सबसे बड़े फैसले हैं। इन कदमों को बिहार को तकनीक, उद्योग और शहरी विकास के नए दौर में ले जाने वाली ऐतिहासिक पहल माना जा रहा है।

बिहार बनेगा टेक्नोलॉजी पावर — AI मिशन को हरी झंडी-

कैबिनेट ने “बिहार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मिशन” बनाने की मंजूरी दे दी है। इस मिशन का लक्ष्य है कि अगले कुछ वर्षों में बिहार को एक टेक हब बनाया जाए, जहां शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और प्रशासनिक सेवाओं में AI का इस्तेमाल बढ़ाया जाएगा।

कैबिनेट मीटिंग

AI में रिसर्च के लिए सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बनाए जाएंगे

प्रतिभाशाली युवाओं के लिए AI फेलोशिप प्रोग्राम शुरू होगा, रोजगार देने वाली तकनीकी कंपनियों को बिहार में निवेश के लिए प्रोत्साहन दिया जाएगा, सरकार का दावा है कि यह मिशन आने वाले समय में लाखों युवाओं के लिए नई नौकरी और स्टार्टअप के अवसर खोलेगा।

25 नई चीनी मिलें — किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा कदम-

बैठक में बंद पड़ी 9 चीनी मिलों को फिर से चालू करने और कुल 25 नई चीनी मिलों की स्थापना को मंजूरी दी गई। इस फैसले से न सिर्फ गन्ना किसानों को राहत मिलेगी बल्कि ग्रामीण इलाकों में बड़ी संख्या में रोजगार भी पैदा होंगे। मिलों को पुनर्जीवित करने के लिए उच्च-स्तरीय कमेटी बनाई गई|

6 महीने में कमेटी अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपेगी.

गन्ना उत्पादन वाले जिलों में आर्थिक गतिविधियां तेज होंगी, यह फैसला उन किसानों के लिए खास है जो लंबे समय से चीनी मिलें बंद होने की वजह से उत्पन्न परेशानी झेल रहे थे।

कैबिनेट मीटिंग

11 नए टाउनशिप — शहरों की बदल जाएगी सूरत-

शहरी विकास को लेकर भी कैबिनेट ने बड़ा निर्णय लिया है। बिहार के 11 प्रमुख शहरों में सैटेलाइट और ग्रीनफील्ड टाउनशिप बसाने का फैसला लिया गया है।

  • ये टाउनशिप दिल्ली-NCR और गुजरात मॉडल पर विकसित किए जाएंगे
  • लैंड पूलिंग मॉडल लागू किया जाएगा
  • बेहतर सड़क, ट्रांसपोर्ट, अस्पताल, पानी और बिजली जैसी सुविधाएं विकसित होंगी

इन टाउनशिप को पटना, सोनपुर, सीतामढ़ी सहित प्रमंडलीय मुख्यालयों में बनाया जाएगा। सरकार का मानना है कि इससे शहरों में भीड़भाड़ कम होगी और नई आधुनिक बसाहट तैयार होगी।

कुल 10 बड़े फैसले — विकास को नई दिशा

पहली कैबिनेट बैठक में कुल 10 प्रस्तावों को मंजूरी दी गई, जिनका लक्ष्य है—

  • बिहार को तकनीकी रूप से मजबूत बनाना
  • उद्योगों में निवेश बढ़ाना
  • कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को स्थिर करना
  • युवाओं के लिए रोजगार पैदा करना
  • शहरों को आधुनिक बनाना

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India’s New CJI Takes Charge: Justice Surya Kant का शपथग्रहण बना Global Judicial Moment!”

CJI

Historic Oath Ceremony — 7 देशों के Chief Justices पहली बार CJI एक मंच पर 24 नवंबर 2025 को राष्ट्रपति भवन के दरबार हॉल में भारतीय लोकतंत्र का एक ऐतिहासिक अध्याय लिखा गया, जब Justice Surya Kant ने भारत के 53वें Chief Justice of India के रूप में शपथ ली। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें संविधान की शपथ दिलाई।

इस समारोह की विशेषता यह रही कि—

  • भारत के इतिहास में पहली बार 7 देशों के मुख्य न्यायाधीश (भूटान, केन्या, श्रीलंका, नीदरलैंड्स, ब्राज़ील, नेपाल और मॉरीशस) इस अवसर के साक्षी बने।
  • सुप्रीम कोर्ट के सभी जज, पूर्व CJIs, वरिष्ठ अधिवक्ता, संवैधानिक विशेषज्ञ और Justice Surya Kant का परिवार मौजूद रहा।
  • यह आयोजन भारत की global judicial diplomacy और बढ़ते अंतरराष्ट्रीय सम्मान का नया संकेत माना गया।

न्यायिक सुधार, तकनीक और पारदर्शिता — Justice Surya Kant की प्राथमिकताएँ

CJI

शपथ ग्रहण के बाद Justice Surya Kant ने कहा—

“न्याय व्यवस्था का लक्ष्य भय नहीं, भरोसा है। हर नागरिक को आसान, तेज और सुलभ न्याय मिलना चाहिए।”

उनके एजेंडा की मुख्य बातें:

•Pendency Reduction: लंबित मामलों को तेज़ी से निपटाना

•ADR & Mediation: मुक़दमों के बाहर विवाद समाधान को बढ़ावा

•Digital Judiciary: AI-assisted listing, e-courts 2.0, virtual hearings

•Judicial Sensitivity: ग्रामीण भारत तक न्याय की पहुँच और पीड़ित-केंद्रित न्याय

•Transparency: प्रक्रिया में खुलापन और institutional accountability

उनका कार्यकाल फरवरी 2027 तक रहेगा, जो कई बड़े संवैधानिक और सामाजिक मामलों के लिए निर्णायक माना जा रहा है। देश की उम्मीदें — “नया CJI, नया Judicial Era” उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और कानून मंत्री ने सोशल मीडिया पर उन्हें शुभकामनाएँ देते हुए न्यायपालिका में समरसता, तकनीकी सुधार और तेज़ न्याय की अपेक्षाएँ व्यक्त कीं।

सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन और युवा वकीलों में उत्साह है कि उनके नेतृत्व में—

•कोर्ट अधिक tech-friendly बनेगा

•केस मैनेजमेंट तेज़ होगा

•और न्याय जनता के और करीब आएगा

देशभर की कानूनी बिरादरी मानती है कि न्यायमूर्ति सूर्यकांत भारत की न्यायिक प्रणाली में स्थिरता, संवेदनशीलता और सुशासन का नया अध्याय जोड़ेंगे।

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G-20 शिखर सम्मेलन में PM मोदी ने दिखाई भारत की मजबूत वैश्विक नेतृत्व क्षमता

G-20 शिखर

Summary (bullets points में)

  • PM मोदी दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में आयोजित G-20 शिखर सम्मेलन 2025 में शामिल हुए, जहाँ उनका भव्य स्वागत किया गया।
  • सम्मेलन की थीम “एकजुटता, समानता और स्थिरता” रही, जिसमें जलवायु, आर्थिक सहयोग और ग्लोबल साउथ पर प्रमुख चर्चा हुई।
  • PM मोदी ने विकासशील देशों की चुनौतियों, हरित ऊर्जा, कर्ज संकट और समावेशी विकास पर भारत का मजबूत पक्ष रखा।
  • युवाओं के लिए ‘नेल्सन मंडेला बे टारगेट’ और महिलाओं के लिए नौकरी व वेतन अंतर कम करने जैसे बड़े फैसले लिए गए।
  • PM मोदी ने अफ्रीका के विकास को महत्वपूर्ण बताते हुए ‘अफ्रीका स्किल्स मल्टीप्लायर इनिशिएटिव’ को समर्थन दिया।
  • उन्होंने कई वैश्विक नेताओं से द्विपक्षीय मुलाकातें कीं, जिससे भारत के रणनीतिक और आर्थिक रिश्तों को नई मजबूती मिली।
  • G-20 शिखर

PM मोदी की दक्षिण अफ्रीका यात्रा-

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन दिनों दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग दौरे पर हैं, जहाँ वे 21 से 23 नवंबर तक हो रहे G-20 शिखर सम्मेलन 2025 में हिस्सा ले रहे हैं। यह सम्मेलन इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि इसे पहली बार अफ्रीकी धरती पर आयोजित किया जा रहा है। PM मोदी की मौजूदगी ने इस आयोजन पर दुनिया का खास ध्यान खींचा है। उनके आगमन पर दक्षिण अफ्रीका ने भव्य और पारंपरिक तरीके से स्वागत किया, जिसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर खूब वायरल हैं।

सम्मेलन की थीम और मुख्य मुद्दे-

इस वर्ष G-20 शिखर सम्मेलन की थीम “एकजुटता, समानता और स्थिरता” रखी गई है। सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन, हरित ऊर्जा में निवेश, वैश्विक अर्थव्यवस्था को मजबूत करने, ग्लोबल साउथ के विकास, और महत्वपूर्ण खनिज संसाधनों के बेहतर उपयोग जैसे विषयों पर व्यापक चर्चा हुई। PM मोदी ने इन सभी मुद्दों पर भारत का दृष्टिकोण रखते हुए कहा कि दुनिया को आगे ले जाने के लिए आपसी सहयोग, समावेशी विकास और पारदर्शिता की जरूरत है। उन्होंने ग्लोबल साउथ के राष्ट्रों पर बढ़ते आर्थिक दबाव और कर्ज संकट पर भी गंभीर चिंता जताई।

ग्लोबल साउथ की आवाज बने PM मोदी-

प्रधानमंत्री मोदी ने सम्मेलन में विकासशील देशों के हितों की मजबूती से वकालत की। उन्होंने कहा कि ग्लोबल साउथ की चुनौतियों को वैश्विक प्राथमिकता बनाया जाना चाहिए। PM मोदी ने अफ्रीकी देशों के विकास और कौशल प्रशिक्षण को भविष्य की जरूरत बताते हुए “अफ्रीका स्किल्स मल्टीप्लायर इनिशिएटिव” का जोरदार समर्थन किया। इस पहल के तहत अगले दस वर्षों में अफ्रीका में 10 लाख प्रशिक्षित ट्रेनर्स तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है, जिससे महाद्वीप की युवा आबादी को नई दिशा मिलेगी।

G-20 शिखर

सम्मेलन में हुई बड़ी और ऐतिहासिक घोषणाएँ-

इस G-20 शिखर सम्मेलन में कई ऐसे फैसले लिए गए, जिनका असर आने वाले वर्षों में दुनिया के सामाजिक और आर्थिक ढांचे पर पड़ेगा।

सबसे पहले युवाओं के लिए ‘नेल्सन मंडेला बे टारगेट’ अपनाया गया, जिसके तहत शिक्षा, रोजगार और प्रशिक्षण से वंचित युवाओं की संख्या को बड़े पैमाने पर कम करने के प्रयास किए जाएंगे।दूसरा बड़ा फैसला महिलाओं की आर्थिक भागीदारी को लेकर आया। सदस्यों ने 2030 तक “पुरुषों और महिलाओं के रोजगार में अंतर को 25%” तक कम करने का लक्ष्य रखा। साथ ही 2035 तक जेंडर वेज गैप, यानी वेतन समानता की दिशा में 15% अंतर कम करने और महिलाओं के खिलाफ हिंसा को समाप्त करने का संकल्प लिया गया।अमेरिका की अनुपस्थिति के बावजूद सभी देशों ने सम्मेलन की संयुक्त घोषणा को मंजूरी दी, जिसे विशेषज्ञ कूटनीतिक सफलता मानते हैं।

द्विपक्षीय मुलाकातें और रणनीतिक साझेदारी-

इस यात्रा के दौरान PM मोदी ने कई विश्व नेताओं से मुलाकातें कीं, जिनमें ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज विशेष रूप से शामिल रहे। इन बैठकों में रक्षा सहयोग, समुद्री सुरक्षा, व्यापार, निवेश और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सामरिक संतुलन जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच संबंध भी इस यात्रा के बाद और अधिक मजबूत हुए हैं।

भारत की वैश्विक छवि और मजबूत-

PM मोदी के नेतृत्व और भारत की सकारात्मक भूमिका ने इस G-20 शिखर सम्मेलन में देश की वैश्विक छवि को और सुदृढ़ किया है। भारत को न सिर्फ एक उभरती अर्थव्यवस्था के रूप में, बल्कि एक समाधान देने वाले, स्थिर और जिम्मेदार राष्ट्र के रूप में भी देखा जा रहा है।अफ्रीकी देशों में कौशल विकास, जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए ठोस प्रयास और ग्लोबल साउथ के लिए आवाज उठाना भारत के बढ़ते अंतरराष्ट्रीय प्रभाव का बड़ा संकेत है।

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अवैध विदेशियों पर CM योगी ने चलाया बड़ा अभियान, जानिए क्या है पूरी बात

CM योगी

सारांश (Bullet Points में)

  • उत्तर प्रदेश के CM योगी आदित्यनाथ ने अवैध विदेशियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर कार्रवाई के निर्देश दिए।
  • सभी जिलों में अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों की पहचान करने का आदेश जारी।
  • पुलिस व प्रशासन घर-घर सत्यापन और दस्तावेज़ों की कड़ी जांच करेंगे।
  • प्रत्येक जिले में अस्थायी डिटेंशन सेंटर बनाए जाएंगे, जहां सत्यापन पूरा होने तक विदेशियों को रखा जाएगा।
  • फिंगरप्रिंट और बायोमेट्रिक डेटा लेकर एक केंद्रीकृत डेटाबेस तैयार किया जाएगा।
  • जांच के बाद अवैध पाए गए लोगों को कानूनी प्रक्रिया के तहत मूल देश वापस भेजा जाएगा।
  • सरकार ने कहा कि अभियान में किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
  • सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को मजबूत बनाना इस अभियान का मुख्य उद्देश्य है।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राज्य में अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों के खिलाफ व्यापक कार्रवाई शुरू करने के सख्त निर्देश दिए हैं। सरकार का कहना है कि यह कदम कानून-व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने के लिए बेहद जरूरी है।

CM योगी

अवैध विदेशियों की पहचान के लिए बड़े स्तर पर जांच

मुख्यमंत्री ने सभी जिलाधिकारियों और पुलिस अधिकारियों को आदेश दिया है कि वे अपने-अपने जिलों में अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों की पहचान करें। इसके लिए घर-घर सत्यापन, किरायेदारों की जांच, दस्तावेज़ों की पड़ताल और संदिग्ध व्यक्तियों पर कड़ी निगरानी रखी जाएगी। जिन लोगों के पास मान्य वीज़ा, पासपोर्ट या अन्य पहचान दस्तावेज़ नहीं होंगे, उन्हें तुरंत सूचीबद्ध किया जाएगा।

हर जिले में बनेगा अस्थायी डिटेंशन सेंटर

सरकार ने निर्देश दिया है कि प्रदेश के 75 जिलों में अस्थायी डिटेंशन सेंटर बनाए जाएँ। यहां पहचाने गए अवैध विदेशियों को दस्तावेज़ों के सत्यापन पूरा होने तक रखा जाएगा। इन सेंटरों में सुरक्षा व्यवस्था, भोजन और मूलभूत सुविधाओं की व्यवस्था भी की जाएगी ताकि प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे।

CM योगी

फिंगरप्रिंट व रिकॉर्डिंग से बनेगा केंद्रीकृत डेटाबेस-पहचान किए गए अवैध विदेशियों के फिंगरप्रिंट और बायोमेट्रिक डेटा एक केंद्रीकृत राज्य स्तर के डेटाबेस में सुरक्षित रखे जाएंगे।इससे भविष्य में उनकी आवाजाही पर निगरानी रखने में मदद मिलेगी और दोबारा गलत जानकारी देकर दाख़िल होने की कोशिश को रोका जा सकेगा।

सख्त कानूनी कार्रवाई और देश वापसी की प्रक्रिया

जांच पूरी होने पर जिन विदेशियों को अवैध रूप से रह रहा पाया जाएगा, उन्हें कानूनी प्रक्रिया के तहत उनके मूल देश वापस भेजा जाएगा। सरकार ने स्पष्ट किया है कि इस अभियान में किसी तरह की कोताही बिल्कुल बर्दाश्त नहीं की जाएगी। सीएम योगी का मानना है कि अवैध रूप से रह रहे लोग सुरक्षा के लिए खतरा बन सकते हैं और आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने का जोखिम भी बढ़ता है।

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बिहार में नई सरकार का बड़ा फैसला जानिए किसे मिला कौन-सा विभाग

बिहार

बिहार में नई एनडीए सरकार के शपथ ग्रहण के बाद मंत्रालयों का बँटवारा आधिकारिक रूप से जारी कर दिया गया है। इस बार सबसे बड़ा और चौंकाने वाला फैसला रहा—उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को गृह मंत्रालय (Home Department) की कमान देना। लगभग 20 साल में यह पहली बार है जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गृह विभाग अपने पास नहीं रखा। गृह मंत्रालय राज्य की कानून-व्यवस्था, पुलिस प्रशासन, खुफिया विभाग और आंतरिक सुरक्षा का सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावशाली विभाग माना जाता है, जिसे अब सम्राट चौधरी संभालेंगे। राजनीतिक तौर पर इसे भाजपा के लिए भी बड़ी जीत समझा जा रहा है।

बिहार

कैबिनेट में किसे मिला कौन-सा विभाग — पूरी सूची-

उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी

गृह मंत्रालय (Home Department)

(कानून-व्यवस्था, पुलिस, सुरक्षा और आंतरिक प्रशासन की जिम्मेदारी)

1. विजय कुमार सिन्हा (उपमुख्यमंत्री)

बिहार

भूमि एवं राजस्व विभाग

खान एवं भू-तत्त्व विभाग

2. मंगल पांडे

स्वास्थ्य विभाग

विधि विभाग

3. दिलीप जयसवाल

उद्योग विभाग

4. नितिन नवीन

पथ निर्माण विभाग

नगर विकास एवं आवास विभाग

5. रामकूपाल यादव

कृषि विभाग

6. संजय टाइगर

बिहार

श्रम संसाधन विभाग

7. अरुण शंकर प्रसाद

पर्यटन विभाग

कला, संस्कृति एवं युवा विभाग

8. सुरेन्द्र मेहता

पशु एवं मत्स्य संसाधन विभाग

9. नारायण प्रसाद

आपदा प्रबंधन विभाग

10. रमा निषाद

पिछड़ा वर्ग एवं अति पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग

11. लखेन्द्र पासवान

अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति कल्याण विभाग

12. श्रेयसी सिंह

सूचना प्रौद्योगिकी विभाग (आईटी विभाग)

खेल विभाग

बिहार

13. प्रमोद चंद्रवंशी

सहकारिता विभाग

पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग

सरकार के फैसले का संकेत: सुरक्षा और विकास पर बड़ा फोकस-

राज्य सरकार ने जिन विभागों का बँटवारा किया है, उससे ये साफ दिखाई देता है कि आने वाले समय में कानून-व्यवस्था, बुनियादी ढाँचा, स्वास्थ्य सेवाएँ, पर्यटन, आईटी और कृषि सुधार सरकार की प्राथमिकता में रहेंगे।गृह मंत्रालय उपमुख्यमंत्री को सौंपे जाने से यह भी संकेत मिलता है कि सरकार अपराध नियंत्रण और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सख्त रुख अपनाने के मूड में है।

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बंगाल में SIR पर सियासी तूफ़ान: ममता बनर्जी ने CEC को लिखा कड़ा पत्र

ममता बनर्जी

बंगाल में SIR पर सियासी तूफ़ान: ममता बनर्जी ने CEC को लिखा कड़ा पत्र, बोलीं

(Bullet Points)

  • •पश्चिम बंगाल में SIR (Special Intensive Revision) प्रक्रिया पर बड़ा विवाद खड़ा।
  • •मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने CEC को पत्र लिखकर इसे “अराजक, खतरनाक और अनियोजित” कहा।
  • •BLOs पर “मानवीय सीमा से अधिक” काम का दबाव होने का आरोप।
  • •ममता ने दावा किया—SIR के दबाव की वजह से कुछ अधिकारियों की मौत भी हुई।
  • •प्रक्रिया को “तुरंत रोकने” और नई समय-सीमा व पूरी प्रणाली के पुनर्मूल्यांकन की मांग।
  • •बीजेपी का पलटवार—TMC इसलिए परेशान क्योंकि फर्जी मतदाता हटेंगे।
  • •चुनाव आयोग ने कहा—गलती करने वाले अधिकारियों पर होगी कार्रवाई।

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची की Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को एक विस्तृत पत्र लिखकर इस प्रक्रिया को “अव्यवस्थित, अमानवीय और बेहद खतरनाक” बताया है। उन्होंने मांग की है कि इस अभियान को तुरंत रोका जाए और पूरी प्रणाली व समय-सीमा की पुनः समीक्षा की जाए।

ममता बनर्जी

SIR प्रक्रिया आखिर है क्या?

चुनाव आयोग देशभर में समय-समय पर मतदाता सूची की सफाई और अपडेटिंग के लिए Special Intensive Revision (SIR) करता है।

इसमें BLO (Booth Level Officers) घर-घर जाकर —

मतदाताओं का सत्यापन.

मृत/डुप्लीकेट नाम हटाना.

नए मतदाता जोड़ना.

गलत जानकारी सुधारना जैसे काम करते हैं।

बंगाल में यह प्रक्रिया राज्यव्यापी स्तर पर एक साथ चल रही है, जिससे विवाद बढ़ गया है।

ममता बनर्जी ने क्या कहा?

अपने तीन पन्नों के पत्र में ममता बनर्जी ने कई गंभीर आरोप लगाए—

BLOs पर असहनीय दबाव

उन्होंने कहा कि BLOs से “मानवीय सीमा से परे” काम करवाया जा रहा है।कई अधिकारी दिन-रात काम कर रहे हैं, उन्हें छुट्टी भी नहीं मिल रही।

प्रशिक्षण व प्रबंधन बेहद कमजोर

CM के अनुसार:

अधिकारियों को पर्याप्त ट्रेनिंग नहीं मिली

न योजना थी, न सिस्टम सब कुछ बिना पूर्व तैयारी के शुरू कर दिया गया

अधिकारियों की मौतों के लिए जिम्मेदार SIR का दबाव

ममता बनर्जी

सबसे गंभीर आरोप—

ममता बनर्जी ने दावा किया कि SIR के दबाव और मानसिक तनाव के कारण कई अधिकारियों की मौत हुई और कुछ ने आत्महत्या तक कर ली।

एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता की मौत का भी उन्होंने जिक्र किया।

प्रक्रिया को तुरंत रोकने की मांग

उन्होंने साफ लिखा:

“यह प्रक्रिया अराजक, खतरनाक और अनियोजित है। कृपया इसे तुरंत रोका जाए।”

BJP का पलटवार

बीजेपी ने ममता के आरोपों को प्रोपेगेंडा बताया और कहा —

TMC इसलिए घबरा रही है क्योंकि SIR से फर्जी वोटर हटेंगे| इससे उनका वोट बैंक प्रभावित हो सकता है|BJP ने प्रक्रिया को पारदर्शी और लोकतांत्रिक बताया

चुनाव आयोग क्या कह रहा है?

चुनाव आयोग ने अभी ममता के पत्र पर आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है,

लेकिन संकेत दिए हैं कि—

SIR में कोई गलती हुई तो अधिकारी जवाबदेह होंगे.प्रक्रिया का उद्देश्य सिर्फ़ सटीक और साफ मतदाता सूची तैयार करना है

बंगाल की राजनीति में बढ़ा तनाव

SIR ने विरोधियों और सत्ता पक्ष के बीच तनाव बढ़ा दिया है।मुद्दा अब प्रशासनिक नहीं, बल्कि चुनावी राजनीति का केंद्र बन चुका है।

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बिहार कैबिनेट में LJP(RV) की एंट्री, चिराग पासवान बोले- ‘पापा का सपना पूरा हुआ, यह एक बड़ी जीत है’

LJP

बिहार की राजनीति में गुरुवार का दिन लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के लिए एक ऐतिहासिक पल लेकर आया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले मंत्रिमंडल में LJP(RV) के दो विधायकों को शामिल किया गया। इस मौके पर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने इसे अपने दिवंगत पिता राम विलास पासवान के सपने का साकार होना बताते हुए एक ‘बड़ी जीत’ करार दिया।

पिता को याद कर भावुक हुए चिराग

केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने इस मंत्रिमंडल विस्तार पर खुशी जाहिर करते हुए कहा, “यह हमारी पार्टी के लिए एक बहुत बड़ी जीत है। मेरे पिता, स्वर्गीय राम विलास पासवान जी का हमेशा से यह सपना था कि हमारी पार्टी बिहार सरकार में एक मजबूत भागीदार बने और राज्य के विकास में योगदान दे। आज उनके सपने को पूरा होते देख मुझे गर्व महसूस हो रहा है।” उन्होंने इस अवसर के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का भी आभार व्यक्त किया।

LJP

LJP(RV) कोटे से दो नए मंत्री

राजभवन में आयोजित एक सादे समारोह में राज्यपाल ने LJP(RV) के दोनों विधायकों को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। इस शपथ ग्रहण समारोह में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, उपमुख्यमंत्री और NDA के कई वरिष्ठ नेता मौजूद थे। LJP(RV) के शामिल होने से बिहार में NDA गठबंधन को और मजबूती मिली है।

राजनीतिक महत्व

यह कैबिनेट विस्तार बिहार में NDA गठबंधन के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। 2020 के विधानसभा चुनाव में चिराग पासवान ने नीतीश कुमार के नेतृत्व के खिलाफ चुनाव लड़ा था, जिसके बाद JDU और LJP के रिश्तों में खटास आ गई थी। हालांकि, हाल के लोकसभा चुनावों में शानदार प्रदर्शन के बाद चिराग पासवान का कद बढ़ा और अब राज्य सरकार में उनकी पार्टी की सीधी भागीदारी से गठबंधन पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हुआ है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस कदम से चिराग पासवान ने खुद को बिहार में अपने पिता की राजनीतिक विरासत के असली उत्तराधिकारी के रूप में मजबूती से स्थापित कर लिया है। यह न केवल पार्टी कार्यकर्ताओं के मनोबल को बढ़ाएगा, बल्कि राज्य में LJP(RV) की पकड़ को भी और मजबूती देगा।

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Nitish Kumar To Take Oath As CM For The 10th Time, NDA का पावर शो अब शुरू

Nitish Kumar

पटना का ऐतिहासिक गांधी मैदान आज राजनीतिक शक्ति का सबसे बड़ा केंद्र बनने जा रहा है, क्योंकि मुख्यमंत्री Nitish Kumar रिकॉर्ड 10वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले हैं। शपथग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, 13 से अधिक राज्यों के मुख्यमंत्री, NDA घटक दलों के प्रमुख और हजारों समर्थक मौजूद रहेंगे।

राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान नीतीश कुमार को शपथ दिलाएँगे, और इसके साथ ही 18–20 मंत्रियों की नई कैबिनेट भी अस्तित्व में आएगी।

नई सरकार, नया संतुलन—NDA की रणनीति अब लागू होगी

NDA नेतृत्व आज ही सीट बंटवारे, डिप्टी सीएम की भूमिकाओं और अनुभवी–युवा चेहरों के संतुलन को सार्वजनिक करेगा। नई सरकार कानून व्यवस्था, रोज़गार, शिक्षा सुधार, महिला सुरक्षा और इंफ़्रास्ट्रक्चर जैसे बड़े एजेंडों पर काम शुरू करने की घोषणा करेगी।

पूरे बिहार में टीवी, OTT और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर इस आयोजन का लाइव प्रसारण होगा। विपक्ष पहले से ही “जनादेश की नैतिकता” पर सवाल उठा रहा है, जबकि NDA समर्थक इसे “स्थिरता + विकास युग की नई शुरुआत” बता रहे हैं।

Nitish Kumar

शपथ के बाद क्या बदलने वाला है?

नई सरकार के गठन के तुरंत बाद पहला कदम प्रशासनिक फेरबदल, कानून व्यवस्था की मॉनिटरिंग और बड़े विकास प्रोजेक्ट्स की समीक्षा होगा। शिक्षण संस्थानों, मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर, कृषि-नीति और सड़क नेटवर्क के लिए अगले 90 दिनों का रोडमैप पेश किया जाएगा।

सूत्रों के अनुसार, नई कैबिनेट उद्योग निवेश, IT पार्क, महिला स्किल डेवलपमेंट, और स्मार्ट-विलेज मॉडल पर प्राथमिक काम शुरू करेगी ताकि अगले दो साल में राज्य की रैंकिंग बड़े बदलाव देख सके।

जनता की उम्मीदें—क्या यह कार्यकाल बिहार की दिशा बदलेगा?

बिहार के लोग इस सरकार से पिछले वर्षों की कमियों को सुधारने, युवा रोज़गार को प्राथमिकता देने, और जमीन पर विकास को महसूस कराने की उम्मीद कर रहे हैं।

सवाल यह है—क्या नीतीश कुमार का यह 10वाँ कार्यकाल वास्तव में ‘स्थिरता + सुशासन’ का नया अध्याय लिख पाएगा? क्या NDA की यह टीम बिहार की राजनीतिक गर्माहट को ठंडा कर पाएगी?

आज के बाद बिहार की राजनीतिक कहानी एक नई दिशा पकड़ने वाली है—और पूरा देश देख रहा है कि यह कदम आने वाले वर्षों को कैसे आकार देगा।

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Bihar Political Storm 2025: विधानसभा भंग, नई सरकार की शपथ कल, बिहार में नई सरकार की उल्टी गिनती शुरू

Political Storm

बिहार की सियासत में बड़ी Political Storm तब मची जब 19 नवंबर को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक ने 17वीं विधानसभा भंग करने का प्रस्ताव पारित कर दिया। तुरंत बाद नीतीश कुमार ने अपना इस्तीफा राज्यपाल को सौंप दिया और राज्यपाल ने इसे स्वीकार भी कर लिया।

अब NDA, जिसकी चुनाव में निर्णायक जीत हुई है, नई सरकार गठन की तैयारियों में तेज़ी से जुट चुका है। सभी घटक दलों की संयुक्त बैठक में नए मंत्रियों, विभागों और सत्ता-साझेदारी पर लंबी चर्चा हुई।

20 नवंबर: गांधी मैदान में होगा भव्य शपथग्रहण

पटना का गांधी मैदान 20 नवंबर को एक ऐतिहासिक दृश्य का गवाह बनेगा, जहां नीतीश कुमार लगातार 10वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। सुबह 11:30 बजे होने वाले समारोह में 22–23 मंत्रियों की टीम भी शपथ लेगी—जिसमें JDU–BJP का बराबर प्रतिनिधित्व, साथ ही लोजपा, हम और अन्य NDA के सहयोगी दलों के चेहरे शामिल होंगे।

Political Storm

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह और देश के 13 से अधिक राज्यों के मुख्यमंत्री बतौर प्रमुख अतिथि इस समारोह में मौजूद रहेंगे। सुरक्षा के मद्देनज़र गांधी मैदान को शपथ तक आम जनता के लिए पूरी तरह बंद कर दिया गया है।

नई विधानसभा का पहला सत्र—फ्लोर टेस्ट से लेकर बजट तक की तैयारी

शपथ के 10–15 दिनों के भीतर बिहार विधानसभा का पहला सत्र बुलाया जाएगा। इसमें नई सरकार की प्राथमिकताएँ, विभागवार चर्चा, फ्लोर टेस्ट, नए स्पीकर का चुनाव और बजट सत्र की रूपरेखा तय की जाएगी। अनुमान है कि दिसंबर के पहले सप्ताह में सदन की कार्यवाही शुरू हो जाएगी।

नई नीति-घोषणाओं के साथ सरकार विकास, कानून व्यवस्था और वेलफेयर योजनाओं पर अपनी दिशा स्पष्ट करेगी।

जनता की उम्मीदें vs विपक्ष के सवाल

जहाँ NDA इस बदलाव को जनादेश का सम्मान और विकासवाद की वापसी बता रहा है, वहीं विपक्ष सत्ता-समीकरण और विधानसभा भंग के फैसले पर सवाल खड़े कर रहा है।

उधर जनता नई सरकार से स्थिरता, तेज़ विकास, रोजगार, सुरक्षा और प्रशासनिक पारदर्शिता की उम्मीद लिए बैठी है। बिहार अब एक नए राजनीतिक अध्याय की ओर बढ़ रहा है—और सबकी नजरें 20 नवंबर के शपथग्रहण पर टिकी हैं।

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Youngest Village Leader of India:22 वर्षीय इंजीनियर साक्षी रावत  ने लिखी बदलाव की नई कहानी!

Leader

इंजीनियरिंग कैंपस से सीधे पंचायत की कुर्सी—22 की उम्र में इतिहास रच दिया उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल के कुई गांव में पंचायत चुनाव ने इस बार ऐतिहासिक पल देखा। सिर्फ 22 साल की बीटेक ग्रेजुएट साक्षी रावत को ग्रामीणों ने भारी मतों से ग्राम प्रधान चुनकर सबसे कम उम्र की महिला नेता बना दिया। देहरादून से इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद जहाँ बाकी युवा कॉर्पोरेट जॉब की ओर बढ़ते हैं,

वहीं साक्षी ने अपने गांव की दिशा बदलने का फैसला किया। ग्रामीणों का कहना है—“हमने उनकी पढ़ाई, सोच और साफ नीयत में बदलाव की उम्मीद देखी।”

गाँव की तालियों के बीच पहला भाषण—

Leader

महिलाएं, किसान और बच्चे फोकस में जीत के बाद साक्षी रावत ने पंचायत भवन में अपने पहले संबोधन में कहा— “गाँव की महिलाओं, बच्चों, किसानों और युवाओं को आगे बढ़ाना मेरी प्राथमिकता है—हम भी स्मार्ट और आत्मनिर्भर ग्राम बन सकते हैं।”

गाँव की बुजुर्ग महिलाएं, युवा और बच्चे सभी उन्हें ‘नई पीढ़ी की नेता’ कह रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी उनकी जीत वायरल हो गई—लोगों ने उन्हें ‘Mountain Girl Rising’, ‘Tech-Leader Sarpanch’ जैसे नामों से सराहा।

ई-गवर्नेंस, डिजिटल सेंटर और LED गाँव—साक्षी की आधुनिक प्लानिंग ने उम्मीद जगाई साक्षी सिर्फ पारंपरिक विकास नहीं बल्कि आधुनिक टेक्नोलॉजी को गाँव में लाना चाहती हैं।

उनके प्लान में शामिल हैं—

  • डिजिटल शिकायत और फीडबैक सिस्टम
  • LED स्ट्रीट लाइट प्रोजेक्ट
  • महिलाओं के लिए मजबूत सेल्फ-हेल्प समूह
  • गाँव में डिजिटल लर्निंग सेंटर
  • युवाओं के लिए खेती आधारित स्टार्टअप मॉडल
  • बच्चों के लिए “स्मार्ट लाइब्रेरी” और टेक-स्किल प्रोग्राम

गाँव के लोग कह रहे हैं—“ये सिर्फ नेता नहीं, टेक्नोलॉजी वाली नई सोच की मिसाल है।” सिर्फ चुनाव नहीं—ग्रामीण भारत में बदलाव की शुरूआत साक्षी रावत की जीत सिर्फ एक पंचायत की जीत नहीं, बल्कि उस संदेश की जीत है कि— “शिक्षा + तकनीक + साहस = ग्रामीण भारत की नई ताकत।”

उनकी कहानी हर युवा, खासकर हर बेटी के लिए प्रेरणा है कि बदलाव की शुरुआत गाँव से भी की जा सकती है—और दिल से की गई शुरुआत दुनिया बदल सकती है।

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नीतीश कुमार का इस्तीफा😱—लेकिन 20 नवंबर को सीएम……:-Bihar Political Earthquake:

नीतीश कुमार

बिहार की राजनीति एक बार फिर बड़े भूचाल का सामना कर रही है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सोमवार को अपने पूरे मंत्रिपरिषद के साथ राज्यपाल को अचानक इस्तीफा सौंप दिया, साथ ही विधानसभा भंग करने की भी सिफारिश कर दी। इस कदम ने न सिर्फ राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी, बल्कि यह सवाल भी खड़ा कर दिया—आखिर इस “पॉलिटिकल रीसेट” की जरूरत क्यों पड़ी?

नया पावर इक्वेशन:

NDA के साथ वापसी, साझा सत्ता का फॉर्मूला तैयार सूत्रों के मुताबिक, नीतीश कुमार एक बार फिर NDA के सपोर्ट से मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे हैं। BJP–JDU के बीच 50-50 सत्ता साझेदारी पर सहमति बन चुकी है और लोजपा, HAM समेत अन्य घटक दलों को भी नई सरकार में जगह मिलने की संभावना है।
20 नवंबर को पटना के गांधी मैदान में होने वाला भव्य शपथ ग्रहण समारोह राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियाँ बनाएगा—जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कई बड़े नेता शामिल होंगे।

नीतीश कुमार

10वीं बार CM—नीतीश का नया रिकॉर्ड और सत्ता का संकेत

नीतीश कुमार अपने राजनीतिक करियर में 10वीं बार मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने जा रहे हैं—जो उन्हें बिहार की राजनीति का सबसे स्थिर और प्रभावशाली चेहरा साबित करता है। नई कैबिनेट में इस बार युवा चेहरों और अनुभवी नेताओं का मिश्रण देखने को मिल सकता है, ताकि प्रशासनिक गति और विकास एजेंडा दोनों मजबूत किया जा सके।

विपक्ष का वार बनाम NDA का जवाब

जहाँ विपक्ष इसे “कुर्सी बचाने की राजनीति” बता रहा है, वहीं समर्थकों का दावा है—
“स्थिरता, सुशासन और गठबंधन धर्म के लिए यह रीसेट जरूरी था।”
बिहार के लोग अब यह देखना चाहते हैं कि नई सरकार अगले पाँच साल का रोडमैप कितनी मजबूती से तय करती है।

जनता की नज़रें विकास पर

नई सरकार की चुनौती साफ है—
रोजगार, शिक्षा, अपराध नियंत्रण, बाढ़ प्रबंधन और बुनियादी ढांचे जैसे बड़े मुद्दों पर ठोस काम।
20 नवंबर के बाद बिहार की दबंग राजनीति में एक नया अध्याय शुरू होने जा रहा है—क्या यह अध्याय उम्मीदों को सच करेगा, या फिर सिर्फ समीकरणों का खेल बनेगा?

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बिहार में RJD की नवनिर्वाचित विधायक-बैठक: तेजस्वी यादव को विधायक दल का नेता चुना गया

बिहार

17 नवंबर 2025 — बिहार की सियासत में आज RJD (राष्ट्रीय जनता दल) ने एक अहम मोड़ लिया है। सोमवार को पटना स्थित तेजस्वी यादव के सरकारी आवास (पोलो रोड) पर हुई सांसदों और नवनिर्वाचित विधायकों की समीक्षा बैठक में, तेजस्वी यादव को सर्वसम्मति से RJD विधायक दल का नेता चुना गया। इस फैसले के साथ ही वह बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभाने की दिशा में अग्रसर हो गए हैं।

बैठक का माहौल और उपस्थित लोग

बैठक में RJD के शीर्ष नेता मौजूद थे — जिनमें पार्टी के संरक्षक लालू प्रसाद यादव, पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी, सांसद मीसा भारती, जगदानंद सिंह और मंगनीराम मंडल जैसे वरिष्ठ नेता शामिल थे। इस प्रकार की व्यापक भागीदारी इस बात का संकेत देती है कि RJD अपने भविष्य की रणनीति को बेहद गंभीरता से ले रही है और तेजस्वी यादव पर भरोसा बरकरार रखना चाहती है।

चुनावी हार की समीक्षा

बैठक में RJD ने हाल ही में संपन्न हुए बिहार विधानसभा चुनाव में अपने निराशाजनक प्रदर्शन का गहराई से मंथन किया। पार्टी ने 143 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन सिर्फ 25 सीटें ही जीतीं। इस हार के कारणों पर चर्चा करते हुए, नेताओं ने यह माना कि RJD चुनावी संदेश को लोगों तक ठीक तरह से नहीं पहुंचा पाई।

विशेष रूप से, पार्टी के अंदर मतदान रणनीति, प्रचार की गहराई और मिशन-मैसेजिंग पर सवाल उठे। कुछ स्रोतों के मुताबिक, EVM की गड़बड़ी, चुनाव आयोग की भूमिका और सीमांचल क्षेत्र में अन्य पार्टियों की बढ़ती ताकत को भी जिम्मेदार माना गया है।

बिहार

नेता प्रतिपक्ष की स्थिति पुख्ता

तेजस्वी यादव के विधायक दल के नेता चुने जाने के साथ ही, वह बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभाने के लिए पूरी तरह योग्य बन गए हैं। चूंकि बिहार विधानसभा में कुल 243 सीटें हैं, और किसी दल को नेता प्रतिपक्ष का दर्जा पाने के लिए कम-से-कम 10% यानी लगभग 25 सीटें चाहिए होती हैं, तो RJD का 25 विधायकों के बतौर पहुंच बनाना खास महत्व रखता है। नेता प्रतिपक्ष बनने पर तेजस्वी को विधान सभा में अहम भूमिका मिलेगी — वह सरकार को घेरने, उसकी नीतियों पर आपत्तियाँ उठाने और जनता-विरोधी कदमों की आलोचना करने का संवैधानिक दायित्व निभाएंगे।

आगे की राह और रणनीति

बैठक में सिर्फ हार का आकलन ही नहीं किया गया, बल्कि आगामी राजनीतिक रणनीति को भी आकार देने की पहल की गई है। Outlook की रिपोर्ट के अनुसार, तेजस्वी यादव ने MLAs (जीते हुए विधायकों) से एकजुटता बनाए रखने की अपील की है। उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं को यह संदेश दिया है कि अब RJD को एक जिम्मेदार, रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाने की आवश्यकता है — न कि सिर्फ हार का रोना रोने की।साथ ही, कुछ रिपोर्ट्स यह भी कह रही हैं कि RJD चुनावी नतीजों पर अदालत में चुनौती देने की तैयारी कर रही है, खासकर उन आरोपों के संबंध में कि चुनाव में अनियमितताएँ हुई थीं।

इस कदम का मतलब साफ है: RJD सिर्फ भीतर-मंथन में ही नहीं फँसी है, बल्कि अगली लड़ाई की तैयारी भी शुरू कर चुकी है।

राजनीतिक मायने और असर

तेजस्वी यादव को फिर से विधायक दल का नेता बनाने का निर्णय यह दर्शाता है कि RJD ने उनपर अपना पुल-फिर से लगाया है, भले ही चुनाव में बड़ी निराशा रही हो।लालू प्रसाद यादव और अन्य वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी इस बात की पुष्टि करती है कि परिवार और शीर्ष नेतृत्व ने तेजस्वी की पकड़ को मजबूत किया है।

इसका अर्थ यह भी है कि RJD भविष्य में कांग्रेस और अन्य गठबंधन सहयोगियों के साथ अपनी भूमिका को फिर से खड़ा करने की योजना बना रही है।विपक्ष में मजबूत उपस्थिति के साथ, RJD अब सरकार की नीतियों को चुनौती देने, जनहित के मुद्दों को उठाने और संभावित अगली चुनावी रणनीति बनाने में मध्यवर्ती भूमिका निभा सकती है।

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ढाका में बड़ा सियासी धमाका : पूर्व PM शेख हसीना मानवता के खिलाफ अपराधों में दोषी, देशभर में बढ़ा तनाव

शेख हसीना

बांग्लादेश की राजनीति में शनिवार को बड़ा बदलाव देखने को मिला, जब एक विशेष अदालत ने देश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को मानवता के खिलाफ अपराधों का दोषी करार दिया। यह फैसला पिछले साल हुए छात्र आंदोलन पर हुई हिंसक कार्रवाई से जुड़ा है, जिसमें बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी मारे गए थे।

कई महीनों तक चली सुनवाई के बाद आया यह फैसला ढाका के माहौल को और ज्यादा तनावपूर्ण बना रहा है। राजधानी और आसपास के इलाकों में पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती बढ़ा दी गई है।

क्या हैं बड़े आरोप?

अदालत ने शेख हसीना को पाँच गंभीर आरोपों में दोषी पाया:

  • छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ घातक कार्रवाई की साजिश रचना.
  • निहत्थे छात्रों पर हेलीकॉप्टर और ड्रोन से फायरिंग करवाने का आदेश
  • छात्र नेता अबू सईद की हत्या
  • सबूत मिटाने के लिए मृतकों के शव जलाने के निर्देश.
  • प्रदर्शनकारियों की सुनियोजित हत्या.

शेख हसीना अगस्त 2024 से भारत के नई दिल्ली में निर्वासन में रह रही हैं। उनकी अनुपस्थिति में ही पूरा मुकदमा चला और फैसला सुनाया गया। उन्होंने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों से इनकार किया है।

शेख हसीना

सरकार ने पहले ही बढ़ा दी थी सुरक्षा

फैसले की संवेदनशीलता को देखते हुए, मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने :

  • अदालत परिसर के बाहर सशस्त्र गार्ड तैनात किए
  • ढाका में दंगा पुलिस और रैपिड एक्शन बल की मौजूदगी बढ़ाई.
  • भीड़ नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा घेरे बनाए.
  • इंटरनेट और सोशल मीडिया गतिविधियों पर कड़ी निगरानी शुरू की.

सरकार का कहना है कि किसी भी हाल में कानून-व्यवस्था बिगड़ने नहीं दी जाएगी।

आवामी लीग का जोरदार विरोध.

फैसले के बाद हसीना की पार्टी आवामी लीग ने इसे राजनीतिक साजिश बताया है और पूरे देश में विरोध प्रदर्शन, हड़ताल, ढाका बंद की घोषणा कर दी है। पार्टी के नेताओं का आरोप है कि यूनुस सरकार “राजनीतिक बदले” की कार्रवाई कर रही है।

कुछ नेताओं ने यह भी दावा किया है कि नई सरकार के शासन में हिंदू समुदाय खतरे में है — हालांकि अंतरिम सरकार ने इन बयानों को गलत और भड़काऊ बताया है।

हसीना के बेटे की धमकी: चुनाव नहीं होने देंगे

पूर्व PM की अनुपस्थिति के बीच, उनके बेटे सजीब वाजेद जॉय ने सबसे कड़ा बयान देते हुए कहा:

“अगर हमारी पार्टी पर लगा प्रतिबंध नहीं हटाया गया, तो हम फरवरी में होने वाले राष्ट्रीय चुनाव को रुकवा देंगे। हमारे समर्थक सड़कों पर उतरेंगे।”

उनके इस बयान से देश में तनाव और बढ़ गया है और कई जिलों में आवामी लीग कार्यकर्ता प्रदर्शन कर रहे हैं।

आगे क्या हो सकता है?

शेख हसीना बांग्लादेश की सबसे ताकतवर नेताओं में मानी जाती हैं। ऐसे में:

  • फैसला देश की राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकता है.
  • आवामी लीग के प्रदर्शन उग्र रूप ले सकते हैं
  • चुनाव प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है.
  • अंतरिम सरकार को कानून-व्यवस्था संभालने में बड़ी चुनौती आ सकती है.
  • विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले कुछ दिन बांग्लादेश के लिए बेहद महत्वपूर्ण होंगे।

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14,000 Crore घोटाला? — Bihar Election 2025 में PK का सबसे बड़ा दावा  क्या है पूरा विवाद?

PK

बिहार चुनाव 2025 के बीच जन सुराज प्रमुख प्रशांत किशोर (PK) ने NDA सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि वर्ल्ड बैंक से आए करीब ₹14,000 करोड़ के विकास फंड को सरकार ने चुनावी फायदा लेने के लिए इस्तेमाल किया।

जन सुराज प्रवक्ता पवन वर्मा ने दावा किया कि ‘मुख्यमंत्री महिला रोज़गार योजना’ के नाम पर 1.25 करोड़ महिलाओं के खातों में ₹10,000–₹10,000 ट्रांसफर किए गए — और इनमें वर्ल्ड बैंक की राशि का “अनुचित उपयोग” हुआ।

ट्रांज़ैक्शन की टाइमिंग पर सबसे बड़ा सवाल

जन सुराज का आरोप है कि आचार संहिता लागू होने से मात्र 1 घंटे पहले यह पैसा ट्रांसफर किया गया।जून से चुनाव घोषणा के बीच कुल ₹40,000 करोड़ तरह-तरह की स्कीमों में “डोले और फ्रीबीज” के रूप में बांटे गए।बिहार पर ₹4 लाख करोड़ का कर्ज पहले से है, और ब्याज का बोझ तेज़ी से बढ़ रहा है।3.75 करोड़ महिलाओं में से केवल 1.25 करोड़ को ही पैसा मिला, जिससे “असमान वितरण” का मुद्दा उठा।

PK

PK का आरोप: “सरकार ने चुनावी लाभ के लिए फंड डायवर्जन किया और इसे विकास योजना का नाम दे दिया।”

सियासी टकराव — विपक्ष बनाम सरकार

नतीजों की गणना से पहले यह बयान आग की तरह फैल गया।विपक्ष ने इसे ‘इलेक्शन फ्रीबी स्कैम’ कहते हुए जांच की मांग की।PK ने कहा: “यही लोकतंत्र का असली सवाल है — क्या सरकारी फंड चुनावी हथियार बन गया है?”वहीं NDA नेता चिराग पासवान और अन्य ने आरोपों को “बे-बुनियाद, राजनीति से प्रेरित और हताश कोशिश” बताया।सियासी मैदान में यह विवाद अब सबसे गर्म मुद्दा बन चुका है — मीडिया, सोशल प्लेटफॉर्म और जनसभाओं में इसे लेकर लगातार चर्चा तेज़ है।

जनता के मन में उठा बड़ा प्रश्न

क्या वर्ल्ड बैंक का पैसा चुनावी लाभ के लिए इस्तेमाल हुआ?या क्या यह सिर्फ चुनावी बयानबाज़ी है?

बिहार में अब पारदर्शिता, फ्रीबी कल्चर, कर्ज संकट और सत्ता की जवाबदेही — सब पर नई बहस छिड़ चुकी है।

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लालू परिवार में बड़ा झटका : चुनाव हार के बाद रोहिणी आचार्य ने राजनीति और परिवार दोनों से रिश्ता तोड़ा ,जानिए रोहिणी आचार्य ने क्या कहा

रोहिणी

बिहार चुनाव 2025 में मिली करारी हार के बाद लालू प्रसाद यादव के परिवार में बड़ा राजनीतिक तूफान उठ खड़ा हुआ है। लालू यादव की छोटी बेटी और तेजस्वी यादव की बहन रोहिणी आचार्य ने अचानक राजनीति छोड़ने का ऐलान कर दिया है। इतना ही नहीं—उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि वह परिवार से भी नाता तोड़ रही हैं।

उनके इस फैसले ने RJD खेमे में अफरा-तफरी मचा दी है। पार्टी पहले ही चुनावी हार से उबर नहीं पाई थी, और अब परिवार के भीतर टूट ने पूरे राजनीतिक माहौल को गर्म कर दिया है।

क्या कहा रोहिणी आचार्य ने?

रोहिणी आचार्य ने सोशल मीडिया पर एक भावुक पोस्ट लिखते हुए कहा:

  • वह राजनीति से पूरी तरह दूरी बना रही हैं
  • यह उनका निजी फैसला है .
  • वह परिवार से भी दूरी बनाना चाहती हैं ताकि उन पर कोई दबाव न पड़े.
  • चुनावी हार ने उन्हें अंदर से तोड़ दिया है और वह अब शांत जीवन चाहती हैं

उनकी पोस्ट पढ़कर समर्थक भी हैरान रह गए। लंबे समय से RJD का मजबूत चेहरा मानी जाने वाली रोहिणी अक्सर सोशल मीडिया पर पार्टी और परिवार के समर्थन में खुलकर आवाज उठाती रही हैं।

रोहिणी

RJD में बढ़ी टेंशन

रोहिणी के इस बयान के बाद RJD में माहौल और तनावपूर्ण हो गया है। पार्टी के कई वरिष्ठ नेता इस मुद्दे पर बोलने से बच रहे हैं। माना जा रहा है कि RJD में अंदरूनी खींचतान काफी समय से चल रही थी, और चुनावी हार के बाद यह कलह और गहरी हो गई।

अब सवाल उठने लगे हैं:

  • क्या लालू परिवार में फूट बढ़ रही है?
  • तेजस्वी यादव की नेतृत्व क्षमता पर सवाल?
  • क्या यह RJD की भविष्य की राजनीति को प्रभावित करेगा?

परिवार की प्रतिक्रिया का इंतज़ार

लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। पार्टी के भीतर चर्चा है कि वे रोहिणी आचार्य को मनाने की कोशिश कर सकते हैं, क्योंकि परिवार का कोई सदस्य सार्वजनिक रूप से इस तरह रिश्ता तोड़े, यह RJD के लिए बड़ा झटका है।

क्यों है यह फैसला इतना बड़ा?

रोहिणी को लालू परिवार में हमेशा एक मजबूत और बेबाक चेहरा माना जाता है। उन्होंने अपने पिता के लिए किडनी तक दान की थी और राजनीतिक मुद्दों पर अक्सर सबसे मुखर रहती थीं। ऐसे में उनका राजनीति छोड़ना और परिवार से दूरी बनाना बेहद गंभीर कदम माना जा रहा है।

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बीजेपी में बड़ा झटका: पूर्व केंद्रीय मंत्री आरके सिंह 6 साल के लिए निष्कासित, सिंह ने कहा कि ये पार्टी…

आरके सिंह

भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने शनिवार को बड़ी कार्रवाई करते हुए अपने वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री आरके सिंह को पार्टी से 6 साल के लिए निष्कासित कर दिया। इसके कुछ घंटे बाद ही आरके सिंह ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया। इस घटनाक्रम ने बिहार की राजनीति में हलचल मचा दी है, क्योंकि सिंह पिछले कई महीनों से पार्टी नेतृत्व और सरकार पर खुलकर सवाल उठा रहे थे।

क्यों हुई कार्रवाई? क्या थे आरोप?

बीजेपी ने आरके सिंह पर पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया था। पार्टी के अनुशासन समिति ने उन्हें कारण बताओ नोटिस भेजा था, जिसमें उनसे उनके हालिया बयानों पर जवाब मांगा गया था।

आरके सिंह पर मुख्य आरोप:

1. भ्रष्टाचार पर सरकार पर खुली आलोचना

सिंह ने बिहार में एक बड़े पावर प्रोजेक्ट को लेकर गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। उनका दावा था कि भागलपुर में अडानी ग्रुप को दिए गए बिजली प्रोजेक्ट में 62,000 करोड़ रुपये का घोटाला है। पूर्व ऊर्जा मंत्री होने के कारण उनके आरोपों ने बिहार और केंद्र में एनडीए सरकार को असहज कर दिया था।

2. चुनाव के वक्त पार्टी के खिलाफ बयानबाजी

उन्होंने कई बार खुलकर कहा कि बीजेपी “अपराधियों को टिकट दे रही है”। इतना ही नहीं, उन्होंने मतदाताओं से यह तक कह दिया था कि अगर साफ-सुथरा उम्मीदवार न मिले तो NOTA दबा देना।

3. चुनाव आयोग और कानून व्यवस्था पर हमले

चुनाव के दौरान आरके सिंह ने चुनाव आयोग पर भी पक्षपात और आचार संहिता के उल्लंघन का आरोप लगाया था। बीजेपी नेतृत्व का मानना था कि ऐसे बयान सीधे तौर पर पार्टी की छवि को नुकसान पहुँचा रहे थे।

आरके सिंह

आरके सिंह की प्रतिक्रिया : “मैंने अपराधियों के खिलाफ आवाज उठाई, क्या ये गलत है?”

पार्टी से निष्कासन के बाद आरके सिंह ने कहा कि उन्हें भेजे गए नोटिस में “पार्टी विरोधी गतिविधि” का कोई स्पष्ट उदाहरण नहीं दिया गया था।उन्होंने अपना इस्तीफा बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा को भेजते हुए कहा: “मैंने सिर्फ अपराधियों को टिकट देने का विरोध किया। अगर यह पार्टी विरोधी है, तो फिर मैं ऐसी पार्टी में नहीं रह सकता।”

“मैं भ्रष्टाचार के खिलाफ बोल रहा था, यह देश के हित में था।” उनके तेवरों से साफ है कि वे कार्रवाई से नाराज़ हैं और भविष्य में किसी नई राजनीतिक दिशा के संकेत भी दे रहे हैं।

कौन हैं आरके सिंह?

  1. 1975 बैच के पूर्व IAS अधिकारी.
  2. भारत के गृह सचिव रहे.
  3. 2013 में BJP में शामिल हुए.
  4. 2014 और 2019 में आरा से सांसद चुने गए.
  5. मोदी सरकार में ऊर्जा और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री रहे.
  6. 2024 लोकसभा चुनाव में आरा सीट हार गए.

आरके Singh को पार्टी के अनुभवी और कड़े प्रशासक नेताओं में गिना जाता था।

राजनीति में हलचल तेज, कई सवाल खड़े

बीजेपी के लिए यह कार्रवाई ऐसे समय में हुई है जब बिहार में पार्टी पहले से ही आंतरिक विवादों में घिरी है। आरके सिंह जैसे बड़े चेहरे को हटाने के बाद अब यह सवाल उठ रहा है कि:

  • कया बीजेपी में असंतोष बढ़ रहा है?
  • क्या पार्टी भविष्य में और कड़े अनुशासनात्मक कदम उठाने वाली है?
  • आरके सिंह किस राजनीतिक दिशा में जाएंगे?

आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति में और हलचल देखने को मिल सकती है।

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जान लीजिए योजना की ये सच्चाई : PM Kisan Samman Nidhi -कहीं छूट ना जाए मौका…..

PM Kisan Samman Nidhi

PM Kisan Samman Nidhi योजना को छोटे और सीमांत किसानों की आमदनी स्थिर करने के लिए शुरू किया गया था—जहाँ हर साल ₹6,000 की राशि तीन किस्तों में सीधे DBT से किसानों के खाते में पहुंचती है। अगस्त 2025 में सरकार ने 20वीं किस्त जारी की, जिसमें 9.7 करोड़ किसानों को ₹20,500 करोड़ का भुगतान हुआ।अब नज़रें टिकी हैं 21वीं किस्त पर, जिसकी उम्मीद नवंबर के मध्य से दिसंबर–फरवरी के भुगतान चक्र में है। लेकिन ज़रूरी शर्तें—eKYC, आधार लिंकिंग, बैंक डिटेल अपडेट—पूरी नहीं होंगी, तो किस्त अटक सकती है।

कौन-से किसान होंगे लाभार्थी?

योजना का फायदा केवल उन्हीं किसानों को मिलता है जिनके पास खुद की दर्ज जमीन है और परिवार (पति-पत्नी, अविवाहित बच्चे) के नाम से कृषि रिकॉर्ड साफ अपडेट है। लेकिन—आयकर दाता, बड़े ज़मीनदार, सरकारी नौकरी/पेंशनधारी, विधायक-सांसद, और एनआरआई इस योजना के लिए पात्र ही नहीं हैं। योजना की एक खास बात यह भी है कि जिस किसान का डाटा सही है, उसकी किस्त बिना आवेदन के ही हर तिमाही खाते में आ जाती है।

PM Kisan Samman Nidhi

जमीनी हकीकत: राहत है… पर सवाल भी बहुत

PM-Kisan ने लाखों परिवारों को बीज, खाद, और बुवाई जैसे खर्चों में सीधा सहारा दिया है। कई रिपोर्टों में यह साफ है कि इससे छोटे किसानों की नकद ज़रूरतें काफी हद तक पूरी होती हैं और ग्रामीण बाज़ारों में भी आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ती हैं।

लेकिन दूसरी तरफ समस्याएँ भी हैं—

  • कई राज्यों में पात्रता-सत्यापन धीमा है।कुछ जगह गलत डाटा की वजह से अपात्र लोगों को किस्त,असली किसान को पैसा मिलने में देरी,और eKYC–आधार अपडेट न होने के कारण लाखों खाते “रोक” की स्थिति भी बन जाती है।

किसानों के लिए राहत… लेकिन सुधार की ज़रूरत

PM-KISAN छोटे किसानों के लिए एक स्थिर आर्थिक सहारा जरूर साबित हुई है, लेकिन अंतिम किसान तक पारदर्शी और तेज़ भुगतान पहुँचाना अभी भी चुनौती है।

सवाल वही है—

  • क्या 6,000 रुपये असली खेती की लागत का हल हैं, या सिर्फ शुरुआत?
  • क्या सरकार अगले फेज में राशि बढ़ाने या व्यवस्थाओं को और आसान बनाने पर काम करेगी?

किसानों की उम्मीदें ऊँची हैं—अब बारी सिस्टम की है कि वे इन उम्मीदों पर कितना खरा उतरता है।

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कितने मंत्री किसके? JDU-BJP जल्द तय करेंगे नई सरकार का फॉर्मूला |“जाने पूरी खबर”

सरकार

बिहार सरकार एनडीए की ऐतिहासिक जीत के बाद अब सरकार गठन की तैयारियाँ तेज़ हो गई हैं। नए मंत्रिमंडल के स्वरूप और नेतृत्व पर सहमति बनाने के लिए JDU और BJP के शीर्ष नेताओं के बीच दिल्ली और पटना में लगातार बैठकें हो रही हैं। सरकार दोनों दल चाहते हैं कि शपथ ग्रहण से पहले हर मुद्दे पर स्पष्ट और मजबूत फार्मूले पर मुहर लग जाए।

मंत्रिमंडल बंटवारे पर गहन चर्चा

चुनाव में 243 में से 202 सीटें जीतने के बाद एनडीए अब एक बड़े और संतुलित मंत्रिमंडल की तैयारी में है। सूत्रों के अनुसार 6 विधायक = 1 मंत्री का फॉर्मूला इस बार भी लागू हो सकता है। इसी आधार पर संभावित मंत्रियों का बंटवारा इस तरह दिख रहा है:

  • BJP – 16 मंत्री
  • JDU – 15 मंत्री
  • लोजपा (आर) – 3 मंत्री
  • HAM – 1 मंत्री
  • रालोमो (उपेंद्र कुशवाहा) – 1 मंत्री

पूर्व कैबिनेट में JDU के पास गृह, ग्रामीण विकास और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विभाग थे। इस बार बदलाव की संभावना है। पार्टी के अंदर भी नए चेहरों को शामिल करने पर चर्चा चल रही है। उमेश कुशवाहा, श्याम रजक और कई नए विजयी विधायक मंत्री पद की दौड़ में सबसे आगे माने जा रहे हैं।

सरकार

नेतृत्व पर तस्वीर बिल्कुल साफ हालाँकि सीटों के हिसाब से BJP 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी है, जबकि JDU को 85 सीटें मिली हैं, लेकिन दोनों दलों ने एक सुर में यह साफ कर दिया है कि नीतीश कुमार ही बिहार के मुख्यमंत्री होंगे। JDU ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया पर भी इसे दोहराया है, जबकि BJP की ओर से धर्मेंद्र प्रधान और प्रदेश नेतृत्व ने कहा कि— “एनडीए एकजुट है। नीतीश कुमार ही हमारे नेता और बिहार के सीएम होंगे।”

इस बयान ने उन सभी कयासों पर विराम लगा दिया है, जिनमें कहा जा रहा था कि बीजेपी बड़ी पार्टी होने के नाते नेतृत्व बदलना चाहेगी।

सरकार गठन की टाइमलाइन तय करने पर चर्चा

दिल्ली में केंद्रीय नेतृत्व के साथ हुई बैठक में शपथ ग्रहण समारोह की संभावित तारीख, मंत्रियों की सूची और विभागों के वितरण पर शुरुआती सुझाव साझा किए गए। पटना में बैठक में इन सुझावों को और परिष्कृत किया जा रहा है। माना जा रहा है कि अगले 2–3 दिनों में अंतिम सूची बनकर तैयार हो जाएगी। एनडीए नेतृत्व चाहता है कि इस बार सरकार गठन में जातीय संतुलन, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और युवा चेहरों को प्राथमिकता दी जाए।

पटना और दिल्ली में जश्न का माहौल

एनडीए की प्रचंड जीत के बाद दोनों दलों के दफ्तरों में जश्न जारी है। मिठाइयाँ बाँटी जा रही हैं, ढोल-नगाड़े बज रहे हैं और कार्यकर्ता “नीतीश कुमार जिंदाबाद” और “मोदी-नीतीश सरकार” के नारे लगा रहे हैं। दिल्ली में BJP कार्यालय पर मौजूद एक समर्थक का बयान काफी चर्चा में है:

“Nitish ji and Modi ji built Bihar over the last 20 years. जनता फिर से RJD को मौका देने के मूड में नहीं थी।”

सरकार

आगे क्या?

  • जल्द ही एनडीए विधायक दल की बैठक बुलाई जाएगी |
  • नीतीश कुमार को औपचारिक रूप से नेता चुना जाएगा |
  • उसके बाद राज्यपाल के सामने नई सरकार गठन का दावा पेश किया जाएगा |
  • मंत्रिमंडल की सूची अंतिम रूप से जारी कर दी जाएगी |

कुल मिलाकर, दिल्ली से पटना तक बैठकों का यह दौर एनडीए की मजबूती को दर्शाता है। दोनों दलों की कोशिश है कि 2025 की यह सरकार न सिर्फ राजनीतिक रूप से संतुलित बने, बल्कि बिहार के लिए स्थिर और सक्षम भी साबित हो।

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बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों पर नेताओं की बयानबाज़ी तेज — कौन क्या बोला? पढ़िए पूरी रिपोर्ट

बिहार विधानसभा चुनाव 2025

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों ने पूरे राज्य की राजनीतिक हवा बदल दी है। एनडीए ने रिकॉर्ड बहुमत के साथ शानदार जीत दर्ज की है, वहीं महागठबंधन को करारी हार का सामना करना पड़ा। नतीजों के बाद सत्ताधारी और विपक्षी दोनों खेमों के नेताओं ने अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं दीं। आइए जानते हैं किस नेता ने क्या कहा।

एनडीए नेताओं की बड़ी प्रतिक्रियाएं

नीतीश कुमार – “यह जनता का विश्वास और गठबंधन की एकजुटता की जीत” नतीजों के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि बिहार की जनता ने एनडीए के काम और विजन को भरपूर समर्थन दिया है। उन्होंने इस जीत का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, एनडीए के सभी सहयोगियों और बिहार की जनता को दिया।

नीतीश कुमार ने कहा : ” हम सबकी एकजुट मेहनत और बिहार की जनता के विश्वास की जीत है। अब बिहार और तेज़ी से विकास करेगा।”

बिहार विधानसभा चुनाव 2025

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी – “यह सुशासन और विकास की जीत”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस ऐतिहासिक जीत को “विकास, सुशासन और सामाजिक न्याय” की जीत बताया।

उन्होंने ‘MY’ फॉर्मूले का जिक्र करते हुए कहा: “महिला (Women) और यूथ (Youth) — यही नया ‘MY’ समीकरण है जिसने बिहार में नई दिशा तय की है।” उन्होंने यह भी कहा कि बिहार की जनता ने जाति और भ्रम के नैरेटिव को खारिज करते हुए विकास की राजनीति को चुना।

चिराग पासवान – “विपक्ष का नैरेटिव पूरी तरह ध्वस्त”

लोजपा (रामविलास) अध्यक्ष चिराग पासवान ने कहा कि बिहार की जनता ने हर उस भ्रम को तोड़ दिया जिसे विपक्ष ने फैलाने की कोशिश की थी।

उन्होंने कहा: “बिहार के लोगों ने साबित कर दिया कि वे विकास और स्थिरता के साथ हैं।”

बिहार विधानसभा चुनाव 2025

रवि किशन – “जंगलराज को जनता ने फिर से खारिज किया”

भाजपा सांसद रवि किशन ने तीखा हमला करते हुए कहा कि जनता ने एक बार फिर “जंगलराज” को खारिज कर दिया है।

उनके अनुसार: “बिहार की जनता ने संस्कृति, सुरक्षा और विकास के लिए वोट किया है।”

देवेंद्र फडणवीस – “झूठे नैरेटिव से चुनाव नहीं जीते जाते”

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि लोकतंत्र में झूठ और अफवाहों पर टिकी राजनीति ज्‍यादा दिन नहीं चल सकती।

उन्होंने कहा : “इस चुनाव ने साबित किया कि जनता केवल काम और सच्चाई को देखती है।”

विपक्ष की प्रतिक्रियाएं

तेजस्वी यादव – “जनादेश का सम्मान करता हूं, लेकिन कई जगह गंभीर गड़बड़ियां हुईं” भारी हार के बावजूद राजद नेता तेजस्वी यादव ने अपनी राघोपुर सीट जीत ली।

नतीजों के बाद उन्होंने कहा : “मैं बिहार की जनता के फैसले का सम्मान करता हूं। लेकिन कई सीटों पर गिनती और बूथ प्रबंधन को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। हमारी टीम इन मामलों की जांच करेगी।”

उन्होंने यह भी कहा : “महागठबंधन का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा, लेकिन हम लड़ाई जारी रखेंगे। युवाओं और गरीबों की आवाज़ हम और मजबूती से उठाएँगे।” तेजस्वी ने एग्जिट पोल को “भ्रामक” बताया था, लेकिन नतीजों ने उनके दावों को झटका दिया।

वारिस पठान – “सेक्युलर वोटों के बंटवारे ने नुकसान किया”

AIMIM नेता वारिस पठान ने राजद पर हमला करते हुए कहा कि अगर महागठबंधन ने छोटे दलों से सहयोग किया होता तो कई सीटों का नतीजा अलग होता।

उन्होंने कहा : “सेक्युलर वोटों के बंटवारे से ही एनडीए को फायदा मिला।”

RJD नेता सुनील सिंह पर विवाद

आरजेडी नेता सुनील सिंह के द्वारा वोट गिनती में धांधली के आरोप लगाते हुए दिए बयान पर चुनाव आयोग ने कठोर रुख अपनाया है और उनके खिलाफ भड़काऊ बयान का मामला दर्ज किया गया है। यह विपक्ष पर बनी दबाव की स्थिति को और बढ़ाता है।

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Bihar Election Results 2025 LIVE : आज किसकी होगी ‘ताजपोशी’? – Final Verdict आने में कुछ ही पल

Bihar Election

Bihar Election 2025 का आज सबसे बड़ा दिन है—Result Day। पटना, गया, भागलपुर, पूर्णिया से लेकर सीमांचल तक सभी जिलों में मतगणना केंद्रों पर सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम हैं। सुबह से ही राजनीतिक दलों के दफ्तरों में हलचल तेज हो गई है—कहीं जश्न की तैयारी, तो कहीं बेचैनी और अनुमानों की बारिश। टीवी स्टूडियोज, सोशल मीडिया और मोबाइल स्क्रीन पर हर सेकंड लोगों की नज़रें टिकी हुई हैं।

कौन बनाएगा सरकार?

243 सीटों के दो चरणों में हुए रिकॉर्ड मतदान के बाद अब असली परीक्षा आज है। NDA, महागठबंधन, जन स्वराज, और कई क्षेत्रीय दलों के बीच मुकाबला इस बार बेहद कड़ा रहा। बेरोज़गारी, शिक्षा, महिला सुरक्षा, किसान मुद्दे और जातीय समीकरण—इन सभी का जवाब आज जनता के फैसले में छिपा है। अब सवाल सिर्फ एक—क्या बिहार बदलाव की तरफ जाएगा या भरोसेमंद चेहरे को दोबारा मौका मिलेगा?

Bihar Election

Exit Poll बनाम Ground Reality — क्या उलटफेर तय है?

एक्ज़िट पोल ने कई संभावनाएँ जगाईं, लेकिन बिहार की राजनीति में उलटफेर आम बात है। राजनीतिक विशेषज्ञ भी मान रहे हैं कि इस बार मुकाबला किसी भी तरफ पलट सकता है। अगला मुख्यमंत्री कौन होगा? क्या नई राजनीतिक ताकतें उभरेंगी? या फिर पारंपरिक समीकरण फिर से वापसी करेंगे?—यह सब कुछ आने वाले कुछ घंटों में साफ हो जाएगा।

लोकतंत्र का जश्न

आज का दिन सिर्फ नतीजों का नहीं, बल्कि लोकतंत्र के जश्न का है। बिहार के भविष्य की नई लकीर, नई नीतियाँ और नई दिशा—सब कुछ जनता की मुहर तय करेगी। अब बस काउंटिंग के हर राउंड का इंतज़ार है, क्योंकि The Final Verdict आने ही वाला है।

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बिहार एग्जिट पोल 2025 का रिजल्ट आया सामने : बन गई इस पार्टी की सरकार, जानिए पूरी खबर

एग्जिट पोल

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के दूसरे और आखिरी चरण का मतदान 11 नवंबर को पूरा होने के बाद अब सबकी नज़र एग्जिट पोल के नतीजों पर है। चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों के अनुसार, सभी एजेंसियां अपने एग्जिट पोल के आंकड़े 11 नवंबर की शाम 6:30 बजे के बाद ही जारी कर सकती थीं। इसके बाद सोमवार रात से लेकर 12 नवंबर की सुबह तक कई प्रमुख सर्वे एजेंसियों ने अपने अनुमान जारी किए हैं।

इस बार एग्जिट पोल्स में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता में वापसी करते हुए दिखाया गया है। वहीं, महागठबंधन (RJD, कांग्रेस आदि) पिछड़ता हुआ नजर आ रहा है। बिहार की कुल 243 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 122 है, और ज्यादातर सर्वेक्षणों में NDA को 130 से 209 सीटों तक मिलने का अनुमान लगाया गया है।

कौन-कौन सी एजेंसियां जारी कर रही हैं एग्जिट पोल?

बिहार चुनाव 2025 के एग्जिट पोल्स जारी करने वाली प्रमुख एजेंसियों में शामिल हैं:

  • Axis My India
  • Today’s Chanakya
  • CVoter
  • Jan Ki Baat
  • P-Marq
  • IPSOS
  • Matrize
  • People’s Pulse

इनमें से Axis My India और Today’s Chanakya जैसी प्रतिष्ठित एजेंसियों ने अपने विस्तृत विश्लेषण 12 नवंबर को सुबह जारी करने का ऐलान किया था। जबकि बाकी एजेंसियों ने 11 नवंबर की रात से ही अपने अनुमान पेश कर दिए थे।

एग्जिट पोल

अब तक क्या कहते हैं आंकड़े

अधिकांश एग्जिट पोल्स में NDA को भारी बढ़त दिखाई जा रही है:

  1. Matrize: NDA को 130–209 सीटें
  2. P-Marq: NDA को 167 सीटें, महागठबंधन को 70–102 सीटें
  3. DV Research: NDA को 137–152 सीटें
  4. Jan Ki Baat: NDA को 160 से अधिक सीटों की संभावना

वहीं, महागठबंधन को ज्यादातर सर्वेक्षणों में 70 से 100 सीटों के बीच दिखाया गया है। प्रशांत किशोर की पार्टी जनसुराज का प्रदर्शन बेहद कमजोर बताया गया है।

मतदान और मतगणना की तारीखें

बिहार में दो चरणों में मतदान हुआ —

  • पहला चरण: 6 नवंबर 2025
  • दूसरा चरण: 11 नवंबर 2025

दूसरे चरण में लगभग 67% मतदान दर्ज किया गया, जो पिछले चुनावों की तुलना में थोड़ा अधिक है। वोटों की गिनती 14 नवंबर को होगी, और उसी दिन अंतिम नतीजे घोषित किए जाएंगे।

एग्जिट पोल हैं अनुमान, नतीजे नहीं

विशेषज्ञों के अनुसार, एग्जिट पोल केवल मतदान के बाद मतदाताओं के रुझान पर आधारित अनुमान होते हैं। ये नतीजों की गारंटी नहीं देते। बिहार जैसे राज्यों में कई बार एग्जिट पोल गलत साबित हुए हैं, इसलिए अंतिम फैसला 14 नवंबर को मतगणना के बाद ही तय होगा।

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Bihar Election 2025 : Phase 2 Voting खत्म, कौन बनेगा अगला Game-Changer?

Bihar Election 2025

Bihar Election 2025 के दूसरे और अंतिम चरण में 11 नवंबर 2025 को कुल 20 जिलों में 122 विधानसभा सीटों पर मतदान हुआ। इस चरण में लगभग 1,302 उम्मीदवार मैदान में थे और पूरे राज्य भर में सुरक्षा-साहायता के बीच मतदान सम्पन्न कराए गए।

कहां हुआ मतदान और क्या रहा माहौल?

इस चरण में सीमांचल, मिथिलांचल, मगध और अंग क्षेत्रों के जिलों—जैसे Seemanchal, गया, भागलपुर, कटिहार, पूर्णिया, अररिया, किशनगंज—आदि पर केंद्रित मतदान हुआ। सुरक्षा-उपायों के तहत पोलिंग बूथों पर पैरामिलिट्री फोर्स, सीसीटीवी कैमरे और बम निरोधक दस्ते मौजूद रहे। मतदान सुबह 7 बजे शुरू हुआ और शाम 5 बजे तक चलता रहा।

परिणाम की तारीख और आगे क्या?

मतगणना का दिन तय हो चुका है—14 नवंबर 2025 को मतों की गिनती और ऐलान होगा। अब पूरे बिहार की निगाहें इस फैसले पर टिकी हैं—क्या सत्ताधारी गठबंधन आगे बढ़ेगा या विपक्ष में बदलाव दिखेगा?

Bihar Election 2025

अगले 24-48 घंटों में राजनीतिक भविष्य तय हो सकता है—क्या आपने अपनी पसंद की रणनीति तैयार कर ली है?

चर्चा के केंद्र में सवाल

मतदान ने एक बार फिर उन सवालों को हवा दी हैं जो बिहार के चुनाव-चक्र पर लंबे समय से चल रहे हैं: क्या विकास और रोजगार जैसे मुद्दे जाति-सिमित राजनीति से ऊपर उठेंगे?क्या युवा, महिला और किसान-वर्ग की आवाज़ अब निर्णायक बनेगी?क्या शांतिपूर्ण लोकतंत्र और पारदर्शिता के लिए सिर्फ मतदान करना काफी होगा या उसके बाद ज़िम्मेदारी बनती है?

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RJD की रैली में उतरने लगा Deputy CM Samrat Chaudhary का हेलीकॉप्टर, मचा हड़कंप! जानिए फिर क्या हुआ

हेलीकॉप्टर

बिहार विधानसभा चुनाव के बीच एक हैरान करने वाली घटना सामने आई है। उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का हेलीकॉप्टर सोमवार को भागलपुर के कहलगांव में गलती से राष्ट्रीय जनता दल (RJD) की चुनावी रैली में उतरने लगा। जैसे ही लोगों ने हेलीकॉप्टर को रैली स्थल के ऊपर मंडराते देखा, वहां अफरातफरी और जश्न दोनों का माहौल बन गया।

दरअसल, सम्राट चौधरी एनडीए प्रत्याशी के पक्ष में प्रचार के लिए कहलगांव पहुंचे थे। लेकिन उनके पायलट ने गलती से RJD उम्मीदवार रजनीश यादव की रैली को ही एनडीए की सभा समझ लिया। उसी समय मंच पर भोजपुरी स्टार और राजद उम्मीदवार खेसारी लाल यादव भाषण देने की तैयारी में थे।

रैली में गूंजे RJD के नारे, फिर पलटा हेलीकॉप्टर

हेलीकॉप्टर

जैसे ही हेलीकॉप्टर नीचे उतरने लगा, राजद समर्थक खुशी से झूम उठे। कई लोग पार्टी के झंडे लहराने लगे और “लालू यादव ज़िंदाबाद” और “खेसारी लाल यादव जिंदाबाद” के नारे लगाने लगे। लेकिन तभी पायलट को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने तुरंत हेलीकॉप्टर को वापस हवा में उठा लिया और सही स्थान की ओर बढ़ गया। रैली स्थल पर मौजूद भीड़ हैरान रह गई — कुछ लोगों ने इसे “फिल्मी सीन” जैसा बताया।

वीडियो हुआ वायरल, सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़

घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया। वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि हेलीकॉप्टर मंच के पास उतरने ही वाला था, तभी अचानक वापस ऊपर चला जाता है। लोगों ने इस पर मज़ेदार कमेंट्स किए — किसी ने लिखा “RJD में भी BJP की एंट्री हो गई!”, तो किसी ने कहा “ऑपरेशन लोटस की शुरुआत हवाई रास्ते से”।

RJD ने लगाया आरोप, BJP ने बताया तकनीकी गलती

राजद नेताओं ने इसे “राजनीतिक साजिश” बताते हुए कहा कि यह उनके स्टार प्रचारक खेसारी लाल यादव की रैली को बाधित करने का प्रयास था। वहीं भाजपा की ओर से सफाई आई कि यह सिर्फ तकनीकी भूल थी — पायलट को रैली स्थल की सही पहचान नहीं हो पाई।

खेसारी लाल यादव की रैली में थोड़ी देर

हेलीकॉप्टर

इस घटना के कारण खेसारी लाल यादव के हेलीकॉप्टर को उतरने में थोड़ी देर हुई। हालांकि, कुछ मिनट बाद उनका हेलीकॉप्टर सुरक्षित उतरा और उन्होंने मंच से कहा — “सम्राट जी हमारे मंच पर नहीं आए, वरना स्वागत हम खुले दिल से करते!”

कहलगांव में गरम हुआ चुनावी माहौल

इस अजीबोगरीब वाकये ने कहलगांव के चुनावी माहौल में नई गर्मी भर दी है। दोनों दलों के समर्थकों के बीच सोशल मीडिया पर खूब मीम्स, ट्वीट और बहसें चल रही हैं।

घटना की मुख्य बातें

  • घटना स्थान: कहलगांव, भागलपुर (बिहार)
  • समय: सोमवार, 11 नवंबर 2025
  • हेलीकॉप्टर में थे: बिहार के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी (भाजपा)
  • जहां उतरने लगे: RJD उम्मीदवार रजनीश यादव की रैली (खेसारी लाल यादव मौजूद)
  • वजह: पायलट की लोकेशन पहचान में गलती
  • नतीजा: अफरातफरी, हंसी-मज़ाक और वायरल वीडियो

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सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता, कहा – संसद में महिलाओं की मौजूदगी लगातार घट रही है

सुप्रीम कोर्ट

देश की सर्वोच्च अदालत ने संसद में महिलाओं की घटती भागीदारी पर गंभीर चिंता जताई है। सुप्रीम कोर्ट की दो-न्यायाधीशों वाली बेंच, जिसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना कर रही थीं, ने सुनवाई के दौरान कहा कि महिलाओं को भारत का “सबसे बड़ा अल्पसंख्यक” कहा जा सकता है, क्योंकि उनकी उपस्थिति संसद में लगातार घट रही है।

जस्टिस नागरत्ना, जो वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट की एकमात्र महिला न्यायाधीश हैं, ने सख्त शब्दों में कहा, “जब महिलाएं देश की आधी आबादी हैं, तो उन्हें संसद में प्रतिनिधित्व देने के लिए सिर्फ आरक्षण का इंतज़ार क्यों किया जाए? बिना आरक्षण के भी राजनीतिक दल महिलाओं को टिकट क्यों नहीं देते?”

सुप्रीम कोर्ट

उन्होंने यह भी कहा कि संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी केवल “संख्यात्मक प्रतिनिधित्व” का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह भारत के लोकतंत्र की गुणवत्ता और संतुलन से जुड़ा हुआ प्रश्न है।

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी उस समय आई है जब देश में महिला आरक्षण विधेयक (जिसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम कहा जाता है) के लागू होने की प्रक्रिया अभी प्रारंभिक चरण में है। संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी फिलहाल 15% से भी कम है, जबकि स्थानीय निकायों में यह संख्या कहीं अधिक है।

विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी राजनीतिक दलों पर दबाव बनाएगी कि वे स्वेच्छा से महिला उम्मीदवारों की संख्या बढ़ाएं, ताकि संसद में महिलाओं की आवाज़ और मज़बूत हो सके। यह टिप्पणी न केवल न्यायिक चेतावनी है, बल्कि भारतीय राजनीति में लैंगिक समानता की दिशा में एक अहम संदेश भी मानी जा रही है।

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राजस्थान सरकार के फैसले का मुसलमानों ने किया विरोध, वजह जान आप भी चौक जाएंगे

राजस्थान सरकार

राजस्थान सरकार ने राज्य के सभी सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और मदरसों में ‘वंदे मातरम’ का रोजाना गायन अनिवार्य कर दिया है। शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने कहा कि यह कदम छात्रों में देशभक्ति, अनुशासन और राष्ट्रीय एकता की भावना को मजबूत करेगा।

देशभक्ति वर्ष की घोषणा

सरकार ने बताया कि ‘वंदे मातरम’ की 150वीं वर्षगांठ को खास बनाने के लिए पूरे साल को “देशभक्ति वर्ष” के रूप में मनाया जाएगा। इस दौरान सभी सरकारी संस्थानों में विशेष देशभक्ति कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे।

आदेश न मानने पर होगी कार्रवाई

शिक्षा मंत्री का स्पष्ट कहना है कि जो भी संस्थान इसे लागू नहीं करेगा, उसके खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई की जाएगी। सरकार का दावा है कि यह निर्णय किसी धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि राष्ट्र के सम्मान से जुड़ा है।

मुस्लिम संगठनों का कड़ा विरोध

इस फैसले पर कई मुस्लिम संगठनों ने आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि राष्ट्रगीत के कुछ हिस्से उनके धार्मिक सिद्धांतों के खिलाफ हैं और इसे अनिवार्य बनाना धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला है। वक्फ बोर्ड के पूर्व चेयरमैन खानू खान बुधवाली ने कहा कि सरकार असली मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है।

राजनीतिक विवाद भी बढ़ा

विपक्षी दल कांग्रेस ने इस फैसले को भाजपा की “राजनीतिक चाल” बताया है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि ‘वंदे मातरम’ हमेशा से राष्ट्र के गौरव का प्रतीक रहा है, लेकिन इसे जबरन लागू करना सही नहीं है।

सरकार का बचाव: फैसला राष्ट्रहित में राजस्थान सरकार का कहना है कि यह कदम पूरी तरह राष्ट्रहित में है। सरकार के अनुसार, यह आदेश न किसी धर्म के खिलाफ है, न किसी समुदाय को निशाना बनाता है—बल्कि देशभक्ति को मजबूत करने का प्रयास है।

सोशल मीडिया पर गर्म हुई बहस

सरकारी फैसले के बाद सोशल मीडिया पर तेज़ बहस छिड़ गई है। एक पक्ष इसे देशभक्ति की पहल बता रहा है, जबकि दूसरे पक्ष ने इसे धार्मिक दखलअंदाजी कहा है।

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बिहार में बन गई इस पार्टी की सरकार, जानने के लिए पढ़ें पूरी खबर

बिहार

बिहार में सत्ता की जंग शुरू हो चुकी है। पहले चरण के मतदान ने सूबे के राजनीतिक तापमान को और भी गरम कर दिया है। कुल 121 विधानसभा सीटों पर वोटिंग पूरी हो गई है, और इस बार जनता ने पहले से कहीं ज्यादा जोश दिखाया — करीब 64.66% मतदान हुआ है, जो बिहार के चुनावी इतिहास में एक नया रिकॉर्ड माना जा रहा है।

जनता का जोश, रिकॉर्ड वोटिंग

राज्य के 18 जिलों में सुबह 7 बजे से शाम 5 बजे तक मतदान चला। चुनाव आयोग के मुताबिक, शाम तक 60.13% वोटिंग दर्ज हुई थी, जो बाद में बढ़कर 64% से अधिक हो गई। सबसे ज्यादा वोटिंग बेगूसराय जिले में (67.32%) और सबसे कम शेखपुरा में (52.36%) दर्ज हुई। ग्रामीण इलाकों में महिलाओं और युवाओं की लंबी कतारें साफ बता रही थीं कि जनता इस बार बदलाव के मूड में है।

बड़ा मुकाबला: NDA बनाम महागठबंधन

इस चुनाव में मुख्य लड़ाई दो गठबंधनों के बीच मानी जा रही है —

एक ओर हैं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA), जिसमें BJP और JDU प्रमुख दल हैं।

दूसरी ओर हैं तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाला महागठबंधन (RJD + कांग्रेस + वाम दल), जो सत्ता वापसी के लिए पूरा जोर लगा रहा है।

इसके अलावा, चुनावी मैदान में एक नया चेहरा भी है — प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी, जिसने कई सीटों पर मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है। जन सुराज पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ रही है, लेकिन उसका प्रभाव कई क्षेत्रों में देखा जा रहा है।

दिग्गजों की किस्मत EVM में बंद

पहले चरण की वोटिंग में कई बड़े नेताओं का भाग्य अब EVM में बंद हो चुका है।

इनमें शामिल हैं —

  • तेजस्वी यादव (राघोपुर)
  • तेज प्रताप यादव (महुआ)
  • सम्राट चौधरी (तारापुर)
  • मंगल पांडे (भोजपुर)

इन सभी सीटों पर वोटरों ने उत्साह से मतदान किया, और अब 14 नवंबर को ही पता चलेगा कि जनता ने किसे चुना है।

मुद्दे जो तय करेंगे बिहार की दिशा

इस बार के चुनाव में जनता के मन में कई सवाल हैं —

  • रोजगार और शिक्षा की स्थिति
  • महंगाई और कृषि संकट
  • बुनियादी सुविधाएँ, खासकर स्वास्थ्य और सड़कें

साथ ही युवाओं का एक बड़ा वर्ग नई राजनीति और नए विकल्पों की तलाश में है। यही वजह है कि इस बार मुकाबला सिर्फ सत्ता का नहीं, बल्कि सोच और दिशा का भी है।

आगे क्या?

अब सभी की निगाहें 11 नवंबर पर टिकी हैं, जब दूसरे और अंतिम चरण की वोटिंग होगी। उसके बाद 14 नवंबर को वोटों की गिनती होगी और बिहार का नया राजनीतिक चेहरा सामने आएगा।

राजनीतिक गलियारों में चर्चाएँ तेज हैं — क्या नीतीश कुमार फिर से सत्ता में लौटेंगे, या तेजस्वी यादव का “बदलाव” नारा जनता को रास आएगा?

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बिहार में जल्द खत्म हो सकती है शराबबंदी, जानिए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को क्या कहा

शराबबंदी

बिहार में शराबबंदी कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने साफ कहा कि शराबबंदी लागू करना अलग बात है, लेकिन इसे लागू करने का तरीका और इसके परिणाम दोनों ही गंभीर चिंता का विषय हैं।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि बिहार में 2016 से लागू शराबबंदी कानून ने न्यायपालिका, पुलिस और जनता – सभी पर भारी बोझ डाल दिया है। कोर्ट ने टिप्पणी की, “यह कानून जितना नियंत्रण के लिए बनाया गया था, उतना ही अब परेशानी का कारण बन गया है।”

सुप्रीम कोर्ट ने उठाए बड़े सवाल

कोर्ट ने बिहार सरकार से कई अहम सवाल पूछे:

  • क्या आपके पास कोई ठोस डेटा है जो दिखाता हो कि शराबबंदी लागू होने के बाद शराब की खपत में कमी आई है?
  • क्या अधिकारी किसी के घर में आधी रात को घुसकर तलाशी ले सकते हैं या सांस विश्लेषक (Breath Analyser) टेस्ट के लिए मजबूर कर सकते हैं?
  • क्या नकदी जब्त करने का प्रावधान न्यायसंगत है?

अदालत ने इसे अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) के तहत गंभीर मामला बताया और कहा कि यह लोगों की निजी स्वतंत्रता से जुड़ा सवाल है।

शराबबंदी

अदालतों पर बढ़ रहा बोझ

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस कानून की वजह से पटना हाईकोर्ट में मुकदमों की बाढ़ आ गई है। 2022 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमणा ने भी इस पर चिंता जताई थी कि बिहार में जजों का ज़्यादातर समय शराबबंदी से जुड़े जमानत मामलों में ही चला जाता है।

अब सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को आदेश दिया है कि वह 2016 से अब तक दर्ज हुए केसों का पूरा डेटा अदालत में पेश करे, ताकि पता लगाया जा सके कि इस कानून का वास्तविक प्रभाव क्या रहा है।

पुलिसिया कार्रवाई और अधिकारों पर सवाल

हाल में पटना हाईकोर्ट ने केवल सांस विश्लेषक रिपोर्ट के आधार पर गिरफ्तारी को अवैध ठहराया था, जिसे बिहार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। अब सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा है कि वह बताए कि ऐसे प्रावधान संविधान के अनुरूप कैसे हैं।

क्या वाकई शराबबंदी सफल हुई?

कोर्ट ने यह भी कहा कि शराबबंदी की मंशा अच्छी थी, लेकिन उसका परिणाम ज़मीनी हकीकत से मेल नहीं खा रहा। राज्य में अवैध शराब व्यापार, पुलिसिया भ्रष्टाचार और फर्जी गिरफ्तारी जैसे मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है।

शराबबंदी

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 9 साल बाद भी इस कानून का कोई ठोस फायदा नज़र नहीं आता। कुछ रिपोर्ट्स तो यह भी कहती हैं कि शराबबंदी के नाम पर समानांतर अवैध नेटवर्क पनप गया है।

सियासत भी गरमाई

यह मुद्दा अब पूरी तरह राजनीतिक बहस का केंद्र बन चुका है। विपक्ष ने नीतीश कुमार सरकार पर हमला बोलते हुए कहा है कि “शराबबंदी कानून ने न तो समाज को सुधारा और न ही अपराध कम किया।”

वहीं जेडीयू का कहना है कि “कानून की भावना सामाजिक सुधार की है, इसमें सुधार किया जा सकता है, हटाया नहीं जा सकता।”

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Modi vs Akhilesh in Bihar : रैलियों की जंग से गरमाया चुनावी मैदान, सियासी पारा चढ़ा विकास बनाम हुंकार की टक्कर

रैलियों

बिहार विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नज़दीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे सियासी पारा तेजी से चढ़ता जा रहा है। मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने राज्य में अलग-अलग चुनावी रैलियों को संबोधित किया, जिससे एनडीए और ‘इंडिया’ गठबंधन के बीच सीधा मुकाबला और दिलचस्प हो गया है।

प्रधानमंत्री मोदी ने सहरसा और कटिहार में बड़ी सभाएं कर एनडीए उम्मीदवारों के समर्थन में जनता से वोट की अपील की। उन्होंने बिहार में विकास योजनाओं का जिक्र करते हुए महागठबंधन पर ‘जंगलराज’ और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। पीएम मोदी का रोड शो पटना में जबरदस्त भीड़ खींच चुका है, जिससे 14 विधानसभा सीटों पर असर की उम्मीद जताई जा रही है। एनडीए की ओर से मोदी के अलावा अमित शाह और राजनाथ सिंह भी 25-25 रैलियां करेंगे।

Narendra Modi

वहीं, अखिलेश यादव ने छपरा में भोजपुरी अभिनेता खेसारी लाल यादव के साथ मंच साझा कर ‘इंडिया’ गठबंधन के समर्थन में हुंकार भरी। उन्होंने कहा कि अगर तेजस्वी यादव के नेतृत्व में सरकार बनी, तो बीजेपी को “बिहार से पलायन” करना पड़ेगा। सपा प्रमुख का फोकस राजद के MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण को अपने PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले से जोड़ने पर है, ताकि विपक्षी गठबंधन की सामाजिक पकड़ मजबूत हो सके।

Akhilesh Yadav

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि दोनों गठबंधनों की रैलियों से चुनावी मैदान पूरी तरह गरम हो चुका है। 6 और 11 नवंबर को दो चरणों में मतदान होगा, और उससे पहले नेताओं की रैलियां और रोड शो वोटरों को लुभाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। बिहार में अब चुनावी जंग अपने शिखर पर है।

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बिहार की सियासत में भूचाल : ‘छोटे सरकार’ अनंत सिंह गिरफ्तार, मोकामा हत्याकांड से हिली JDU की जमीन

अनंत सिंह

बिहार की राजनीति में उस वक्त हड़कंप मच गया जब शनिवार देर रात पटना पुलिस ने मोकामा से JDU के बाहुबली प्रत्याशी अनंत सिंह को गिरफ्तार कर लिया। ‘छोटे सरकार’ के नाम से मशहूर अनंत सिंह की यह गिरफ्तारी दुलारचंद यादव हत्याकांड के सिलसिले में की गई है। चुनाव के बीच हुई इस हाई-प्रोफाइल गिरफ्तारी ने मोकामा समेत पूरे बिहार का सियासी पारा चढ़ा दिया है।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला मोकामा के टाल इलाके में हुई एक हिंसक झड़प से जुड़ा है। उस दिन JDU प्रत्याशी अनंत सिंह और जनसुराज पार्टी के उम्मीदवार के समर्थकों के बीच टकराव हो गया था। इसी झड़प के दौरान जनसुराज पार्टी के समर्थक, 75 वर्षीय दुलारचंद यादव की मौत हो गई। मृतक के पोते ने अनंत सिंह, उनके दो भतीजों समेत पांच लोगों के खिलाफ FIR दर्ज कराई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि दुलारचंद यादव को पहले गोली मारी गई और फिर गाड़ी से कुचलकर उनकी हत्या कर दी गई।

आधी रात को पुलिस का एक्शन

FIR दर्ज होने के बाद भी अनंत सिंह खुलेआम चुनाव प्रचार कर रहे थे, जिसे लेकर सवाल उठ रहे थे। शनिवार देर रात पटना के SSP कार्तिकेय शर्मा के नेतृत्व में एक पुलिस टीम ने कार्रवाई की।

अनंत सिंह

रात करीब 11 बजे : SSP कार्तिकेय शर्मा बाढ़ के कारगिल मार्केट पहुंचे, जहां अनंत सिंह अपने समर्थकों के साथ मौजूद थे।

थोड़ी देर बाद : शुरुआती पूछताछ के बाद पुलिस ने अनंत सिंह को हिरासत में ले लिया।

रात देर तक : पटना के DM और SSP ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अनंत सिंह की गिरफ्तारी की पुष्टि की।

पुलिस ने अनंत सिंह के साथ उनके दो सहयोगियों — मणिकांत ठाकुर और रंजीत राम — को भी गिरफ्तार किया है।

पुलिस और सियासत का पक्ष

पटना के SSP कार्तिकेय शर्मा ने बताया कि घटनास्थल पर मिले सबूतों, गवाहों के बयानों और शुरुआती जांच के आधार पर अनंत सिंह को मुख्य आरोपी बनाया गया है। उन्होंने कहा कि यह घटना अनंत सिंह की मौजूदगी में हुई और चुनाव आचार संहिता का गंभीर उल्लंघन है। हालांकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गोली लगने की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन शरीर पर अंदरूनी और बाहरी चोटें पाई गई हैं।

दूसरी ओर, अनंत सिंह ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि यह राजनीतिक साजिश है, जो उनके प्रतिद्वंद्वी सूरजभान सिंह ने रची है। वहीं, जनसुराज पार्टी के उम्मीदवार पीयूष प्रियदर्शी ने गिरफ्तारी पर कहा — “देर आए, दुरुस्त आए”, यह कार्रवाई पहले ही हो जानी चाहिए थी।

इस गिरफ्तारी ने मोकामा के चुनावी समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है। अब देखना यह होगा कि इस घटना का चुनाव परिणामों पर क्या असर पड़ता है। पुलिस मामले की आगे की जांच कर रही है और तीनों आरोपियों को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाएगा।

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मोहम्मद अज़हरुद्दीन ने तेलंगाना में मंत्री पद की शपथ ली, क्रिकेट के बाद राजनीति की नई पारी की शुरुआत

अज़हरुद्दीन

भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान और कांग्रेस नेता मोहम्मद अज़हरुद्दीन ने शुक्रवार को तेलंगाना कैबिनेट में मंत्री पद की शपथ ली। राज्यपाल जिष्णु देव वर्मा ने हैदराबाद स्थित राजभवन में आयोजित समारोह में उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई।

कैबिनेट में अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व

अज़हरुद्दीन, मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी की कैबिनेट में शामिल होने वाले पहले मुस्लिम मंत्री बने हैं। माना जा रहा है कि यह कदम कांग्रेस के अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व बढ़ाने के वादे की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। उनके शामिल होने से मंत्रिमंडल की कुल संख्या अब 16 हो गई है।

राजनीतिक विवाद भी शुरू

हालांकि, बीजेपी ने इस नियुक्ति पर आपत्ति जताते हुए इसे जुबली हिल्स विधानसभा उपचुनाव से पहले आचार संहिता का उल्लंघन बताया है। पार्टी का कहना है कि यह कदम चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकता है।

अज़हरुद्दीन

अज़हरुद्दीन का बयान

शपथ के बाद मोहम्मद अज़हरुद्दीन ने कहा, “यह मेरी नई पारी की शुरुआत है। मेरा लक्ष्य गरीबों और जरूरतमंदों के उत्थान के लिए काम करना है।”

क्रिकेट से राजनीति तक का सफर

अज़हरुद्दीन का यह कदम उनके क्रिकेट से राजनीति तक के लंबे और प्रेरणादायक सफर में एक नया अध्याय जोड़ता है। भारतीय क्रिकेट के सफल कप्तानों में शुमार अज़हरुद्दीन ने अब अपनी दूसरी पारी जनसेवा के मैदान में शुरू की है।

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Kerala Becomes ‘Extreme Poverty Free State : विपक्ष ने कहा – ये Data Fraud है!

Poverty Free

केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने शुक्रवार को ऐलान किया कि राज्य अब “अत्यंत गरीबी मुक्त (Extreme Poverty Free)” बन चुका है। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि चार साल के सुनियोजित प्रयास का नतीजा है। हालांकि, सरकार की इस घोषणा ने जहां पूरे राज्य में जश्न का माहौल बना दिया, वहीं विधानसभा में विपक्ष ने इसे “धोखा और डेटा फ्रॉड” करार देते हुए सदन का पूर्ण बहिष्कार किया।

Opposition Walkout : “ये सरकार झूठे आंकड़े पेश कर रही है”

विपक्ष के नेता वी.डी. सतीसन ने मुख्यमंत्री के बयान को “सदन की अवमानना” बताते हुए कहा “सरकार झूठे आंकड़ों पर महल बना रही है। जब एलडीएफ ने अपने घोषणापत्र में 4.5 लाख गरीब परिवारों की बात की थी, तो अब अचानक यह संख्या 64,006 कैसे रह गई?”

विपक्षी दलों ने इसे “fraudulent announcement” कहा और सदन से नारेबाजी करते हुए बाहर निकल गए।

मुख्यमंत्री विजयन ने जवाब दिया — “हम वही वादे करते हैं जिन्हें निभा सकें — और हमने निभाए हैं। यही हमारा जवाब है विपक्ष को।”

तिरुवनंतपुरम में सितारों से सजी जश्न की धूम

सरकारी घोषणा के साथ ही चंद्रशेखरन नायर स्टेडियम में एक भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें ममूटी, मोहनलाल और कमल हासन जैसे दिग्गज सितारे मौजूद थे। मंच पर सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ हुईं और राज्य के मंत्री भी शामिल रहे। मंत्री एम.बी. राजेश ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। हालांकि, इस आयोजन के बीच 23 अर्थशास्त्रियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एक ओपन लेटर जारी कर सरकार की गरीबी उन्मूलन पद्धति पर सवाल उठाए।

वहीं आदिवासी गोत्र महासभा ने इस ऐलान को “एक छलावा (deception)” बताया और फिल्म सितारों से कार्यक्रम से दूरी बनाए रखने की अपील की।

Poverty Free

Four-Year Journey: “Extreme Poverty Eradication Project”

यह उपलब्धि 2021 में शुरू की गई EPEP (Extreme Poverty Eradication Project) का नतीजा है, जो विजयन सरकार के दूसरे कार्यकाल का पहला कैबिनेट निर्णय था। स्थानीय निकायों और कुडुंबश्री नेटवर्क की मदद से राज्यभर में सर्वे किया गया, जिसमें 1,032 पंचायतों में 64,006 परिवार (1,03,099 व्यक्ति) अत्यंत गरीबी में पाए गए।

सरकार ने हर परिवार के लिए चार मानकों पर आधारित व्यक्तिगत योजना बनाई —

  1. खाद्य सुरक्षा
  2. सुरक्षित आवास
  3. न्यूनतम आय
  4. स्वास्थ्य सुविधा

इस मिशन पर ₹1,000 करोड़ से अधिक का निवेश किया गया।

  • 5,422 नए घर बनाए गए
  • 5,522 घरों का नवीनीकरण किया गया
  • 439 परिवारों को 28.32 एकड़ भूमि मिली
  • 34,672 परिवारों को रोजगार योजनाओं से ₹77 करोड़ की अतिरिक्त आय प्राप्त हुई

India’s Lowest Poverty Rate: Only 0.48%

नीति आयोग की 2023 की बहुआयामी गरीबी रिपोर्ट (MPI) के मुताबिक, केरल पहले ही देश का सबसे कम गरीबी वाला राज्य था, जहाँ गरीबी दर मात्र 0.55% थी। अब यह और घटकर 0.48% रह गई है, जबकि राष्ट्रीय औसत 11.28% है।

CM Vijayan : “यह है केरल मॉडल — Inclusive Growth का Symbol”

मुख्यमंत्री विजयन ने कहा — “यह सिर्फ सरकार की नहीं, बल्कि जनता की जीत है। हमने साबित कर दिया है कि अगर समाज और शासन साथ आएं, तो गरीबी को पूरी तरह खत्म किया जा सकता है।”

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CBI ने पंजाब के IPS अधिकारी हरचरण सिंह भुल्लर पर कसा शिकंजा, करोड़ों की बेहिसाब संपत्ति का खुलासा

CBI

केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने पंजाब पुलिस के निलंबित DIG हरचरण सिंह भुल्लर के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति (Disproportionate Assets) का नया मामला दर्ज किया है। यह कार्रवाई कुछ हफ्ते पहले हुए रिश्वतखोरी मामले के बाद की गई है, जिसमें भुल्लर को रंगे हाथों गिरफ्तार किया गया था।

रिश्वतखोरी से शुरू हुई जांच

16 अक्टूबर को CBI ने हरचरण सिंह भुल्लर को एक स्क्रैप डीलर से 5 लाख रुपये की रिश्वत लेने के आरोप में गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी के बाद एजेंसी ने चंडीगढ़, मोहाली और होशियारपुर में उनके ठिकानों पर छापे मारे, जहां से भारी मात्रा में नकदी, सोना, लग्जरी सामान और संपत्ति के दस्तावेज बरामद किए गए।

CBI

छापेमारी में मिला खजाना

CBI की जांच में सामने आया कि भुल्लर के पास उनकी घोषित आय से कहीं अधिक संपत्ति है। एजेंसी के अनुसार जब्त की गई संपत्ति में शामिल हैं –

  • 7.5 करोड़ रुपये नकद
  • 2.32 करोड़ रुपये मूल्य का सोना और चांदी
  • 26 महंगी ब्रांडेड घड़ियां
  • मर्सिडीज और ऑडी जैसी लग्जरी गाड़ियां
  • लगभग 150 एकड़ जमीन और 50 संपत्तियों के दस्तावेज

CBI की रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2024-25 में भुल्लर की घोषित आय मात्र 32 लाख रुपये थी, जबकि बरामद संपत्ति कई गुना अधिक है। अब एजेंसी यह जांच कर रही है कि इस संपत्ति को अर्जित करने में परिवार या अन्य सहयोगियों की कोई भूमिका थी या नहीं।

CBI ने यह मामला भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) के तहत दर्ज किया है। अधिकारियों के अनुसार, यह अब तक की सबसे बड़ी संपत्ति बरामदगी में से एक मानी जा रही है, जिसने पंजाब पुलिस की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

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पंजाब में ‘मुख्यमंत्री तीर्थ यात्रा योजना’ का दूसरा चरण शुरू – बुजुर्गों को मिलेगी मुफ्त तीर्थ यात्रा की सौगात

मुख्यमंत्री तीर्थ यात्रा योजना

पंजाब सरकार ने राज्य के वरिष्ठ नागरिकों के लिए एक बड़ी पहल की है। मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के साथ मिलकर ‘मुख्यमंत्री तीर्थ यात्रा योजना’ के दूसरे चरण की शुरुआत संगरूर के धूरी से की। यह चरण नौवें सिख गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी की 350वीं शहादत की वर्षगांठ को समर्पित है।

योजना का उद्देश्य

इस योजना का मकसद है — पंजाब के 50 वर्ष से अधिक उम्र के नागरिकों को देशभर के प्रमुख धार्मिक स्थलों की मुफ्त यात्रा की सुविधा देना। योजना का लाभ सभी धर्मों के लोगों को मिलेगा, जिससे सामाजिक और धार्मिक एकता को बढ़ावा मिलेगा।

मुख्यमंत्री तीर्थ यात्रा योजना

योजना की मुख्य विशेषताएं

पूर्णतः निःशुल्क यात्रा : सरकार श्रद्धालुओं की यात्रा, भोजन, ठहरने और अन्य सभी खर्च उठाएगी।

शामिल प्रमुख तीर्थ स्थल : श्री हरमंदिर साहिब (अमृतसर), दुर्गियाना मंदिर, श्री आनंदपुर साहिब, भगवान वाल्मीकि तीर्थ और माता नैना देवी मंदिर जैसे पवित्र स्थलों को शामिल किया गया है।

पारदर्शी चयन प्रक्रिया : हर विधानसभा क्षेत्र से 16,000 श्रद्धालुओं का चयन ड्रॉ प्रणाली से होगा।

स्वास्थ्य सुविधा : प्रत्येक यात्रा दल के साथ मेडिकल टीम भी तैनात रहेगी।

मुख्यमंत्री भगवंत मान ने कहा कि सरकार “लोगों के आध्यात्मिक और सामाजिक कल्याण” के लिए पूरी तरह समर्पित है। वहीं अरविंद केजरीवाल ने इसे “जनता के पैसे को जनता की सेवा में लगाने वाली ईमानदार पहल” बताया और श्रद्धालुओं से पंजाब की शांति और खुशहाली के लिए प्रार्थना करने की अपील की।

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6 साल बाद ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाकात : क्या पिघलेगा अमेरिका-चीन के बीच ट्रेड वॉर का बर्फ़?

अमेरिका-चीन

अमेरिका-चीन के बीच छह साल से जमे बर्फ़ जैसे रिश्तों में हल्की गर्माहट लौटती दिख रही है। लगभग 6 साल के लंबे अंतराल के बाद, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच एक अहम बैठक हुई। यह मुलाकात दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे व्यापारिक तनाव (Trade War) को कम करने की दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है।

सूत्रों के अनुसार, बैठक का मुख्य एजेंडा व्यापार सौदों को संतुलित करना और टैरिफ विवादों को सुलझाना था। ट्रंप के राष्ट्रपति कार्यकाल (2017-2021) में दोनों देशों के बीच व्यापारिक मतभेद चरम पर पहुंच गए थे, जब अरबों डॉलर के सामान पर भारी टैरिफ (Import Duties) लगा दिए गए थे। इसका असर न सिर्फ़ अमेरिका और चीन पर, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ा था।

यह मुलाकात खास इसलिए भी है क्योंकि ट्रंप अब अमेरिका के राष्ट्रपति नहीं हैं। बताया जा रहा है कि वे अपनी एशिया यात्रा के दौरान बीजिंग पहुंचे और वहीं शी जिनपिंग से आमने-सामने चर्चा की। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह बैठक ट्रंप की वैश्विक मंच पर वापसी और संभावित 2028 अमेरिकी चुनाव में उनकी दावेदारी के संकेत के रूप में देखी जा रही है।

अमेरिका-चीन

बैठक में प्रौद्योगिकी, बौद्धिक संपदा अधिकार (Intellectual Property Rights) और अमेरिकी कंपनियों को चीनी बाजार तक बेहतर पहुंच जैसे अहम मुद्दों पर भी चर्चा हुई। हालांकि दोनों पक्षों की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है, लेकिन माना जा रहा है कि इस मुलाकात से दोनों देशों के बीच संवाद का एक नया रास्ता खुला है।

विशेषज्ञों के अनुसार, फिलहाल किसी बड़े समझौते की उम्मीद नहीं है, लेकिन यह मुलाकात अमेरिका-चीन संबंधों में कूटनीतिक बातचीत की बहाली का संकेत देती है।

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8वां वेतन आयोग मंजूर : केंद्र सरकार के 1 करोड़ कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को मिलेगा फायदा

8वां वेतन

केंद्र सरकार ने अपने कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को बड़ी राहत दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में 8वें केंद्रीय वेतन आयोग (8th Central Pay Commission) के गठन के दिशानिर्देशों (Terms of Reference) को मंजूरी दे दी गई है। इस फैसले से 50 लाख से ज्यादा केंद्रीय कर्मचारी और करीब 69 लाख पेंशनभोगी, यानी 1 करोड़ से अधिक लोग, सीधे तौर पर लाभान्वित होंगे।

आयोग की संरचना

8वां वेतन आयोग की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई करेंगी। इसके साथ IIM बैंगलोर के प्रोफेसर पुलक घोष अंशकालिक सदस्य और पेट्रोलियम सचिव पंकज जैन सदस्य-सचिव होंगे। आयोग को अपनी रिपोर्ट 18 महीनों के भीतर सरकार को सौंपनी होगी।

कब से लागू होगी नई सिफारिश

आयोग की सिफारिशें 1 जनवरी 2026 से लागू की जाने की उम्मीद है, हालांकि कर्मचारियों को वास्तविक लाभ 2027 या 2028 से मिल सकता है। रिपोर्ट आने के बाद कैबिनेट की अंतिम मंजूरी जरूरी होगी।

8वां वेतन

कितना बढ़ेगा वेतन

शुरुआती अनुमानों के मुताबिक, वेतन में 20 से 30 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी संभव है। 7वें वेतन आयोग में जहां फिटमेंट फैक्टर 2.57 था, वहीं 8वें आयोग में इसे आर्थिक स्थिति और महंगाई दर को देखते हुए तय किया जाएगा। यह फैक्टर तय करता है कि मौजूदा मूल वेतन में कितनी वृद्धि होगी।

किन लाभों की समीक्षा होगी

8वां वेतन आयोग सिर्फ बेसिक पे नहीं, बल्कि महंगाई भत्ता (DA), मकान किराया भत्ता (HRA) और अन्य भत्तों की भी समीक्षा करेगा। आयोग की सिफारिशें लागू होने पर लाखों कर्मचारियों और पेंशनरों की आर्थिक स्थिति में सुधार आएगा। यह फैसला सरकार के लिए सामाजिक और राजनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है, जो देशभर में करोड़ों परिवारों की आय में सीधा इजाफा लाएगा।

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बिहार चुनाव 2025 : NDA कल पटना में जारी करेगा अपना घोषणापत्र, ‘नए बिहार’ के लिए हो सकते हैं बड़े ऐलान

NDA

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 को लेकर सियासी हलचल तेज़ हो गई है। पहले यह घोषणापत्र आज जारी होने वाला था, लेकिन अब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने इसे कल यानी 31 अक्टूबर को जारी करने का फैसला किया है। यह कार्यक्रम पटना में आयोजित होगा, जहां केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और एनडीए के सभी प्रमुख नेता मौजूद रहेंगे।

इस घोषणापत्र को “संकल्प पत्र” नाम दिया गया है और इसे ‘नए बिहार का नया भविष्य’ थीम पर तैयार किया गया है।

घोषणापत्र के संभावित मुख्य बिंदु

सूत्रों के अनुसार, एनडीए का यह घोषणापत्र हर वर्ग को साधने की कोशिश करेगा, खासकर महिलाओं और युवाओं को।

युवा और रोजगार : घोषणापत्र में युवाओं के लिए सरकारी और निजी क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर सृजित करने की दिशा में ठोस योजना पेश की जा सकती है।

महिला सशक्तिकरण : महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए 10,000 रुपये की आर्थिक सहायता और स्वरोजगार के लिए 2 लाख रुपये तक का कर्ज देने का वादा शामिल हो सकता है। साथ ही, विधवा महिलाओं के लिए पेंशन और उच्च शिक्षा में आरक्षण जैसे मुद्दे भी इस संकल्प पत्र का हिस्सा हो सकते हैं।

विकास और विरासत : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विकास नीतियों को आगे बढ़ाने पर जोर दिया जाएगा। इसमें हरिहर नाथ कॉरिडोर जैसे प्रोजेक्ट्स का ज़िक्र संभव है, जिनका उल्लेख पीएम मोदी ने हालिया रैलियों में किया था।

सामाजिक न्याय : अति पिछड़े और दलित वर्गों के कल्याण के लिए भी कई नई योजनाओं के वादे किए जा सकते हैं।

NDA

महागठबंधन से सीधा मुकाबला

NDA का यह घोषणापत्र सीधे तौर पर महागठबंधन के ‘तेजस्वी प्रण’ घोषणापत्र के जवाब के रूप में देखा जा रहा है। महागठबंधन ने हाल ही में जारी अपने घोषणापत्र में हर परिवार से एक सदस्य को सरकारी नौकरी, महिला सुरक्षा और किसानों के हितों को प्राथमिकता देने का वादा किया है।

एक तरफ पीएम मोदी का नारा है — “जंगलराज से दूर रहेगा बिहार, फिर से एनडीए सरकार”,

वहीं दूसरी ओर तेजस्वी यादव का दावा है — “बिहार को बाहरी नहीं, बिहार का बेटा चलाएगा।”

कल पर सबकी निगाहें

कल पटना में होने वाले NDA के घोषणापत्र लॉन्च पर पूरे बिहार की नज़र टिकी हुई है। सत्ताधारी गठबंधन किन वादों और योजनाओं के साथ जनता के बीच जाएगा, यह कल साफ हो जाएगा।

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रक्षा क्षेत्र में बड़ा फैसला : ‘मेक इन इंडिया’ को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने ₹79,000 करोड़ के हथियारों की खरीद को मंजूरी दी

मेक इन इंडिया

भारत सरकार ने आत्मनिर्भर भारत (Aatmanirbhar Bharat) अभियान को नई ऊँचाइयों पर ले जाने के लिए एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। रक्षा मंत्रालय की डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (Defence Acquisition Council – DAC) ने शुक्रवार को लगभग ₹79,000 करोड़ की सैन्य उपकरणों और हथियार प्रणालियों की खरीद को मंजूरी दे दी है। इसमें से ₹70,000 करोड़ से अधिक की खरीद घरेलू उद्योगों से की जाएगी — यानी यह ‘मेक इन इंडिया’ नीति को बड़ा प्रोत्साहन देने वाला कदम है।

बैठक की अध्यक्षता रक्षा मंत्री ने की, जिसमें Acceptance of Necessity (AoN) को मंजूरी दी गई। इस मंजूरी का उद्देश्य भारत की रक्षा उत्पादन क्षमता को सशक्त करना और विदेशी आयात पर निर्भरता को कम करना है।

तीनों सेनाओं के लिए क्षमता-वृद्धि का बड़ा कदम

इस स्वीकृति के तहत भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना — तीनों को अत्याधुनिक तकनीक और उपकरणों से लैस किया जाएगा।

  1. भारतीय थल सेना (Indian Army) : सेना को आधुनिक हथियार प्रणाली, लड़ाकू उपकरण और लॉजिस्टिक सपोर्ट सिस्टम मिलेंगे, जिससे दुर्गम इलाकों में भी ऑपरेशनल क्षमता में वृद्धि होगी।
  1. भारतीय नौसेना (Indian Navy) : नौसेना की समुद्री शक्ति को और मजबूत करने के लिए उन्नत युद्धपोत, पनडुब्बियाँ और एंटी-शिप मिसाइल सिस्टम शामिल किए जाएंगे। इससे भारतीय नौसेना की ‘ब्लू वाटर नेवी’ बनने की दिशा में बड़ी प्रगति होगी।
  1. भारतीय वायुसेना (Indian Air Force) : वायुसेना को अत्याधुनिक विमानों, निगरानी प्रणालियों और नई पीढ़ी के हथियारों से लैस किया जाएगा। इससे भारत की हवाई सुरक्षा और निगरानी क्षमता में जबरदस्त बढ़ोतरी होगी।

मेक इन इंडिया

 

 

आत्मनिर्भर भारत के मिशन को नई रफ्तार

सरकार का यह कदम केवल सेना की मजबूती तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की अर्थव्यवस्था और रक्षा उद्योग के लिए भी बड़ा अवसर है।इससे देश में रोजगार सृजन, नवाचार को प्रोत्साहन, और स्थानीय उद्योगों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के योग्य बनाने में मदद मिलेगी।

रक्षा मंत्रालय का यह निर्णय दोहरा उद्देश्य पूरा करता है

  1. भारतीय सशस्त्र बलों को आधुनिकतम तकनीक और उपकरण उपलब्ध कराना।
  2. देश के रक्षा निर्माण क्षेत्र को आत्मनिर्भर बनाना और विदेशी निर्भरता घटाना।

 

 रक्षा विशेषज्ञों की राय

रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि यह फैसला भारत को ‘डिफेंस एक्सपोर्ट हब’ बनाने की दिशा में एक मजबूत कदम है। वर्तमान में भारत रक्षा उपकरणों का बड़ा आयातक है, लेकिन ऐसे फैसलों से भविष्य में वह खुद एक निर्यातक के रूप में उभरेगा।

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तेजस्वी यादव बने मुख्यमंत्री उम्मीदवार, महागठबंधन ने दिया पूरा समर्थन – बिहार चुनाव 2025 में नई जंग शुरू

तेजस्वी यादव

बिहार की राजनीति में आज बड़ा मोड़ आया है। महागठबंधन (Mahagathbandhan) ने औपचारिक रूप से राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया है। इस फैसले के साथ ही बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की जंग अब और दिलचस्प हो गई है।

महागठबंधन का सर्वसम्मति से फैसला

पटना में हुई महागठबंधन की शीर्ष बैठक में RJD, कांग्रेस, और वामपंथी दलों (CPI, CPI(M), CPI(ML)) के वरिष्ठ नेताओं ने सर्वसम्मति से तेजस्वी यादव के नाम पर मुहर लगाई।बैठक के बाद संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में सभी दलों के नेताओं ने कहा कि तेजस्वी यादव बिहार के युवाओं की उम्मीद और बदलाव का प्रतीक हैं।

कांग्रेस नेता अजीत शर्मा ने कहा — “तेजस्वी यादव में बिहार को नई दिशा देने की क्षमता है। वे बेरोजगारी, शिक्षा और विकास के मुद्दों को केंद्र में रखकर चुनाव लड़ेंगे।”

तेजस्वी यादव की पहली प्रतिक्रिया — “यह बिहार के हर नौजवान की जिम्मेदारी”

तेजस्वी यादव ने गठबंधन के समर्थन के लिए सभी दलों का धन्यवाद किया और कहा कि यह चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि सोच के परिवर्तन का चुनाव है। “यह मेरे लिए सम्मान से बढ़कर जिम्मेदारी है। हमारा संकल्प है — बिहार को बेरोज़गारी, पलायन और भ्रष्टाचार से मुक्त कराना। हम ‘नौकरी, सिंचाई, दवाई और कमाई’ के वादे के साथ जनता के बीच जाएंगे।”

 

उन्होंने यह भी कहा कि उनकी प्राथमिकता रोजगार सृजन, शिक्षा में सुधार और किसानों की आय बढ़ाना रहेगा।

तेजस्वी यादव

NDA ने किया पलटवार

तेजस्वी यादव के नाम के ऐलान के बाद NDA (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) की तरफ से भी प्रतिक्रिया आई। भाजपा प्रवक्ता निखिल आनंद ने कहा कि “तेजस्वी यादव की राजनीति वादों पर टिकी है, काम पर नहीं।” हालांकि महागठबंधन के नेताओं का दावा है कि इस बार जनता “विकल्प नहीं, बदलाव” चुनेगी।

पिछले चुनाव के आंकड़े और इस बार की चुनौती

2020 के विधानसभा चुनाव में RJD ने सबसे ज़्यादा सीटें (75) जीतकर खुद को सबसे बड़ी पार्टी के रूप में स्थापित किया था, जबकि NDA ने बहुमत हासिल कर सरकार बनाई। राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले पांच वर्षों में तेजस्वी यादव की लोकप्रियता विशेष रूप से युवाओं और ग्रामीण इलाकों में तेज़ी से बढ़ी है, और यही उनकी सबसे बड़ी ताकत बनेगी।

सीट बंटवारे पर टिकी निगाहें

महागठबंधन अब सीट बंटवारे की रणनीति तय करने की तैयारी में है। सूत्रों के अनुसार, RJD अधिकांश सीटों पर लड़ेगी, जबकि कांग्रेस और वाम दलों को उनके पारंपरिक प्रभाव वाले इलाकों में सीटें दी जाएंगी। इसके साथ ही, गठबंधन “बदलता बिहार, नया भविष्य” थीम के तहत एक बड़े प्रचार अभियान की तैयारी कर रहा है।

बिहार में अब सीधी टक्कर

तेजस्वी यादव के मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनने के साथ ही अब बिहार की लड़ाई सीधी हो गई है — एक ओर NDA के अनुभवी नेता नीतीश कुमार, और दूसरी ओर महागठबंधन के युवा चेहरा तेजस्वी यादव। राजनीतिक गलियारों में इसे “अनुभव बनाम युवा जोश” की जंग कहा जा रहा है।

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कौन बनीं जापान की पहली महिला प्रधानमंत्री? जानिए सानाे ताकाइची की ऐतिहासिक जीत की पूरी कहानी

जापान

जापानी राजनीति में आज एक ऐतिहासिक क्षण देखने को मिला जब  सानाे ताकाइची को देश की पहली महिला प्रधानमंत्री के रूप में चुना गया। संसद के दोनों सदनों में हुए चुनाव में उन्हें निचले सदन में 237 और ऊपरी सदन में 125 मत मिले, जिससे उनकी जीत स्पष्ट बहुमत के साथ पक्की हुई।

ऐतिहासिक जीत और राजनीतिक यात्रा

64 वर्षीय सानाे ताकाइची, सत्तारूढ़ लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (LDP) की प्रमुख नेता हैं। वे पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे की करीबी मानी जाती हैं और उन्हें अक्सर जापान की “आयरन लेडी” कहा जाता है। ताकाइची ने अपनी राजनीतिक यात्रा में आर्थिक सुरक्षा मंत्री, आंतरिक मामलों की मंत्री जैसे अहम पद संभाले हैं और अब देश के सबसे बड़े राजनीतिक पद पर काबिज हो गई हैं।

उनकी जीत केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि जापान में लैंगिक समानता और महिला नेतृत्व की दिशा में एक बड़ा कदम है। इससे यह संदेश जाता है कि जापानी राजनीति में अब महिलाओं का प्रतिनिधित्व पहले से कहीं ज्यादा संभव हो गया है।

विचारधारा और नीतिगत प्राथमिकताएं

रक्षा और सुरक्षा: ताकाइची चीन के बढ़ते प्रभाव और ताइवान स्ट्रेट की सुरक्षा पर कड़ा रुख रखती हैं। जापान की रक्षा क्षमताओं के विस्तार में उनका समर्थन स्पष्ट है। अर्थव्यवस्था: वे वित्तीय नीति में खर्च समर्थक हैं और सुस्त वृद्धि, उच्च महंगाई और येन की कमजोरी जैसी समस्याओं का सामना करने के लिए प्रोत्साहनकारी कदम उठा सकती हैं।

जापान

 

सामाजिक मुद्दे: सामाजिक मामलों में वे पारंपरिक रुख रखने वाली नेता हैं। समलैंगिक विवाह और विवाह के बाद उपनाम नीतियों में बदलाव पर उनका आरक्षित रुख रहा है। हालांकि महिलाओं के स्वास्थ्य और परिवार-सहायता कार्यक्रमों को मजबूत करने पर उनका ध्यान रहेगा।

सियासी समीकरण और गठबंधन

उनकी ताजपोशी के रास्ते में कुछ बाधाएं भी आईं। LDP के दीर्घकालिक सहयोगी दल ने समर्थन वापस लिया, जिससे उनकी स्थिति अस्थिर हुई। लेकिन अंतिम क्षण में राजनीतिक समझौते और पार्टी के भीतर संतुलन ने उन्हें प्रधानमंत्री पद तक पहुँचाया।

तत्काल चुनौतियां

1. आर्थिक दबाव: महंगाई, सुस्त आर्थिक वृद्धि और जापान की दुनिया में सबसे अधिक ऋणग्रस्त स्थिति।

2. जन संतोष: कीमतों में वृद्धि और खाद्य-ऊर्जा आपूर्ति जैसी समस्याओं पर जनता का भरोसा बहाल करना।

3. विदेश नीति: अमेरिका के साथ सुरक्षा साझेदारी, चीन और कोरिया के साथ नाज़ुक रिश्ते—सभी पर संतुलित कूटनीति की जरूरत।

4. बाजार और निवेशक नजर: येन की चाल, बॉन्ड यील्ड और बैंक ऑफ़ जापान की नीति निवेशकों के लिए निगरानी का मुख्य केंद्र बनी रहेगी।

संभावित कैबिनेट और नेतृत्व का अंदाजा

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सत्सुकी कटायामा को वित्त मंत्री के रूप में नियुक्त किया जा सकता है। वे आर्थिक और राजकोषीय मामलों में अनुभवी हैं, और यह महिला नेतृत्व में एक और महत्वपूर्ण कदम होगा।

मूल संदेश और भविष्य की राह

सानाे ताकाइची की सरकार सुरक्षा, रक्षा और आर्थिक प्रोत्साहन पर ध्यान केंद्रित करेगी। आने वाले 100 दिनों में महंगाई पर राहत, ऊर्जा और खाद्य आपूर्ति पर कदम और येन स्थिरता पर घोषणाएं संभव हैं। क्षेत्रीय स्तर पर इंडो-पैसिफिक साझेदारों के साथ समन्वय उनकी प्राथमिकताओं में शामिल रहेगा। उनकी यह जीत सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि जापानी राजनीति और समाज में महिला नेतृत्व और नीति निर्माण में बदलाव का संकेत देती है।

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₹15,000 करोड़ निवेश पर मचा बवाल — तमिलनाडु सरकार बोली ‘वादा पक्का’, Foxconn ने कहा ‘नया नहीं है’

तमिलनाडु सरकार

तमिलनाडु सरकार और ताइवान की इलेक्ट्रॉनिक्स दिग्गज कंपनी Foxconn के बीच ₹15,000 करोड़ के निवेश को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। जहाँ एक ओर राज्य सरकार दावा कर रही है कि यह ऐतिहासिक निवेश तमिलनाडु में लाखों नौकरियों के अवसर खोलेगा, वहीं Foxconn ने स्पष्ट किया है कि “कोई नया निवेश” चर्चा में नहीं आया था।

विवाद की शुरुआत कैसे हुई?

यह विवाद 13 अक्टूबर को तब शुरू हुआ जब मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन और उद्योग मंत्री टी.आर.बी. राजा़ ने घोषणा की कि Foxconn कंपनी राज्य में ₹15,000 करोड़ का नया निवेश करेगी। यह घोषणा उस बैठक के बाद की गई थी जिसमें Foxconn के नए भारत प्रतिनिधि रॉबर्ट वू (Robert Wu) ने हिस्सा लिया था। राजा़ ने इसे “तमिलनाडु के औद्योगिक इतिहास का सबसे बड़ा इंजीनियरिंग रोजगार सृजन प्रोजेक्ट” बताया और कहा कि यह निवेश 1 लाख से अधिक इंजीनियरिंग नौकरियाँ पैदा करेगा।

Foxconn का जवाब — “नई डील नहीं हुई”

मुख्यमंत्री की घोषणा के कुछ ही घंटों बाद Foxconn की ओर से एक बयान जारी हुआ जिसमें कंपनी ने कहा, “बैठक में किसी नए निवेश पर चर्चा नहीं हुई। यह हमारी पहले से चल रही परियोजनाओं की निरंतरता मात्र है।”

तमिलनाडु सरकार

Foxconn के बयान से राज्य सरकार के दावे पर सवाल उठ खड़े हुए और सोशल मीडिया पर यह चर्चा छा गई कि क्या सरकार ने निवेश को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया।

राज्य सरकार का पलटवार — “एक साल से चल रही मेहनत अब रंग लाई”

तमिलनाडु सरकार ने तुरंत स्पष्टीकरण जारी किया। मंत्री राजा़ ने कहा कि यह “नया निवेश नहीं, बल्कि पहले से चल रही वार्ताओं का परिणाम है”, जिसे अब आधिकारिक रूप से सार्वजनिक किया गया है। उन्होंने कहा, “Foxconn इसे ‘नया निवेश’ नहीं कह सकती क्योंकि बातचीत एक साल से चल रही थी, लेकिन यह पहली बार है जब कंपनी ने आधिकारिक रूप से प्रतिबद्धता जताई है। यह तमिलनाडु के लिए एक ऐतिहासिक पल है।”

राजा़ ने यह भी कहा कि Foxconn की यह परियोजना राज्य की इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को नई दिशा देगी, और चेन्नई, होसूर तथा कांचीपुरम जैसे औद्योगिक इलाकों में नए संयंत्रों की संभावना को मजबूत करेगी।

Foxconn की भारत में भूमिका

Foxconn पहले से ही भारत में Apple iPhone असेंबली के लिए चेन्नई के पास स्रीपेरुंबुदुर (Sriperumbudur) में एक बड़ी यूनिट चला रही है। हाल के महीनों में कंपनी ने कर्नाटक और तेलंगाना में भी अपने निवेश बढ़ाए हैं।

तमिलनाडु सरकार का कहना है कि ₹15,000 करोड़ का यह निवेश कंपनी के सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट निर्माण के विस्तार से जुड़ा है। हालांकि Foxconn ने अब तक इस दावे की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।

तमिलनाडु सरकार

निवेश पर राजनीति भी गरमाई

विपक्षी दल AIADMK और BJP ने राज्य सरकार पर “राजनीतिक लाभ के लिए निवेश आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने” का आरोप लगाया है। विपक्ष का कहना है कि सरकार को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए कि Foxconn के साथ एमओयू (MoU) कब साइन हुआ और क्या इसके तहत कोई नई यूनिट स्थापित होने जा रही है या नहीं।

वहीं, उद्योग मंत्री राजा़ ने विपक्ष के आरोपों को “भ्रम फैलाने वाला” बताया और कहा कि तमिलनाडु सरकार अपने निवेश प्रतिज्ञाओं पर पारदर्शिता और सत्यनिष्ठा के साथ कायम है।

आर्थिक विशेषज्ञों की राय

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यह विवाद तकनीकी शब्दों का मामला है — जहाँ Foxconn इसे “नई प्रतिबद्धता” नहीं मान रही, वहीं सरकार “पुष्ट की गई निवेश योजनाओं” को सार्वजनिक रूप से घोषणा योग्य मान रही है। चेन्नई स्थित उद्योग विश्लेषक एस. राजगोपाल का कहना है, “सरकार और कंपनी दोनों सही हैं — Foxconn ने निवेश की योजना पहले बनाई थी, लेकिन अब यह औपचारिक रूप से तय हो गई है। यह निवेश तमिलनाडु को भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स हब के रूप में और मजबूत करेगा।”

आगे क्या?

राज्य सरकार ने कहा है कि परियोजना के शुरुआती चरण की औपचारिक प्रक्रिया अगले वित्त वर्ष की पहली तिमाही (FY26 Q1) से शुरू होगी। इसके तहत निर्माण, मशीनरी इंस्टॉलेशन और स्थानीय सप्लाई चेन तैयार करने का काम एक साथ चलेगा। Foxconn और सरकार के बीच सहमति के दस्तावेजों को अंतिम रूप देने के लिए एक संयुक्त समन्वय समिति गठित की जाएगी।

₹15,000 करोड़ के इस निवेश को लेकर जारी विवाद ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि भारत में बड़े औद्योगिक समझौते केवल कॉरपोरेट घोषणाओं से नहीं, बल्कि राजनीतिक दृष्टिकोण और सार्वजनिक धारणा से भी प्रभावित होते हैं।भले ही Foxconn इसे “नया निवेश” न मान रही हो, लेकिन तमिलनाडु सरकार के लिए यह एक राजनीतिक और औद्योगिक जीत के रूप में देखा जा रहा है — जो आने वाले वर्षों में राज्य की आर्थिक दिशा तय कर सकती है।

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Bihar Election 2025 : 6 और 11 नवंबर की जंग, नए नियम और चुनाव का नया रूप

Bihar Election

Bihar Election 2025 में बिहार विधानसभा चुनाव सिर्फ एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि नवाचार, पारदर्शिता और राजनीतिक बदलाव की महाकुंभ भी है। चुनाव आयोग ने घोषणा की है कि 6 नवंबर और 11 नवंबर को दो चरणों में वोटिंग होगी और 14 नवंबर को वोटों की गिनती होगी। इस बार ECI ने कई नए सुधार लागू किए हैं—हर बूथ पर 100% webcasting, EVM पर रंगीन फोटो और बड़े फॉन्ट, तथा हर बूथ में अधिकतम 1,200 वोटर की सीमा—सब बदलाव इस चुनाव को पारदर्शी बनाने की दिशा में हैं।

बदलाव की दिशा

इस चुनाव में आयोग ने 17 नई पहल पेश की हैं, जिन्हें आगे राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रयोग किया जा सकता है। इनमें से एक है बूथों पर mobile deposit facility, जिससे voters लाइन में खड़े न हों और जरूरी formalities तुरंत पूरी हो सकें। साथ ही, Voter Information Slip (VIS) जारी की जाएगी जिसमें QR कोड और बड़े फॉन्ट में बूथ और मतदान जानकारी दी जाएगी। और SC/ST मतदाताओं के लिए Braille VIS (ब्रेल भाषा में सूचना) का प्रावधान रखा गया है ताकि व्हिज़ुअली इम्पेयर्ड मतदाता भी सहज रूप से भाग ले सकें।

कौन-कौन मैदान में

इस चुनाव में NDA के नेता Nitish Kumar, Chirag Paswan, Upendra Kushwaha, Jitan Ram Manjhi जैसे पुराने और नए चेहरे मैदान में हैं। बदले की हवा में Tejashwi Yadav (RJD) और कांग्रेस हिस्सा ले रही है। इसके अलावा, राजनीतिक रणनीतिकार Prashant Kishor की Jan Suraaj Party भी नए एजेंडा लेकर खड़ी है, जिसमें पार्टी संरचना, उम्मीदवार चयन और clean politics जैसे मुद्दे मुख्य हैं।

Bihar Election

चुनौतियाँ और विवाद:

चुनाव से पहले SIR (Special Intensive Revision) प्रक्रिया ने विवादों को जन्म दिया है। करीब 65 लाख मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाये जाने की खबर आई है, जिसे विपक्ष ने गंभीर रूप से उठाया है। इस विवाद को SC में चुनौती दी गई है, जहां सवाल यह उठाए गए हैं कि यह प्रक्रिया निहित स्वार्थ को बढ़ावा नहीं दे रही हो। चुनाव आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि Aadhaar को वोटर पहचान हेतु प्रमाण नहीं माना जाएगा; सचमुच दस्तावेज जांच प्रक्रिया कड़ी होगी।

जनता की उम्मीद और चुनाव का मायना

इस चुनाव में 7.42 करोड़ से अधिक वोटर हिस्सा लेंगे, और लगभग 90,712 बूथ तैयार किए गए हैं। निर्णायक बदलावों के साथ—100% webcasting, mobile deposit facility, ब्रेल VIS, बड़े फॉन्ट वाले VIS और रंगीन फोटो वाले EVM—यह चुनाव “Mother of All Elections” कहा जा रहा है।

अब सवाल है—क्या इन नए कानूनों, सुधारों और डिजिटल पहल के बीच जीत सिर्फ वोटों की होगी, या जनता की आवाज़ व विकास की उम्मीद भी संजोएगी भारत की राजनीति को नया चेहरा देगा?

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तमिलनाडु में थलापति विजय की रैली में भगदड़ से 39 की मौत, 40 से अधिक घायल, भीड़ प्रबंधन पर उठे सवाल

थलापति विजय

करूर (तमिलनाडु), 27 सितंबर 2025 – दक्षिण भारत के सुपरस्टार और अब राजनीति में सक्रिय अभिनेता थलापति विजय की करूर में आयोजित चुनावी रैली शनिवार को दर्दनाक हादसे में तब्दील हो गई। उनकी पार्टी तमिझगा वेत्री कड़गम (TVK) की इस रैली में भगदड़ मचने से कम से कम 39 लोगों की मौत हो गई और 40 से अधिक लोग घायल हो गए। मृतकों में 17 महिलाएं और 10 बच्चे शामिल हैं। यह त्रासदी न केवल राज्य की राजनीति को हिला गई है, बल्कि भीड़ प्रबंधन और प्रशासनिक लापरवाही पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

हादसे की वजहें : भीड़, बिजली गुल और अफरा-तफरी

स्थानीय प्रशासन के मुताबिक, आयोजन स्थल पर करीब 30,000 लोगों के आने का अनुमान था। लेकिन विजय की लोकप्रियता इतनी ज्यादा निकली कि 60,000 से अधिक लोग करूर पहुंच गए। मैदान में खड़े लोगों के लिए न तो पर्याप्त जगह थी, न ही कोई व्यवस्थित निकास मार्ग। विजय को दोपहर 12 बजे मंच पर पहुंचना था, लेकिन वे लगभग 7 घंटे देर से शाम 7 बजे आए। इस बीच, तेज धूप और लंबे इंतजार से भीड़ बेचैन हो चुकी थी। जैसे ही विजय का प्रचार वाहन मैदान में दाखिल हुआ, अचानक बिजली गुल हो गई और पूरे इलाके में अंधेरा छा गया। घबराहट में लोग धक्का-मुक्की करने लगे।

बेहतर नज़ारा पाने के लिए कुछ लोग पास के पेड़ पर चढ़ गए थे। अचानक शाखा टूट गई और वे नीचे खड़े लोगों पर गिर पड़े। इससे भगदड़ और तेज हो गई। विजय को देखते ही हज़ारों समर्थक उनकी एक झलक पाने के लिए बैरिकेड तोड़कर मंच की तरफ दौड़ पड़े। तभी पूरा नियंत्रण बिगड़ गया। कुछ ही मिनटों में मैदान चीख-पुकार से भर गया। लोग एक-दूसरे पर गिरने लगे और दम घुटने से दर्जनों लोगों की जान चली गई।

थलापति विजय

विजय की प्रतिक्रिया : “यह मेरा व्यक्तिगत नुकसान है”

हादसे के दौरान विजय मंच पर मौजूद थे। उन्होंने पहले तो एम्बुलेंस के लिए रास्ता बनाने की अपील की, लेकिन जल्द ही जब उन्हें मौतों का अंदेशा हुआ तो उन्होंने कार्यक्रम रोक दिया। बाद में शोक जताते हुए उन्होंने कहा – “आज जो कुछ हुआ, उसने मेरा दिल तोड़ दिया है। मैं अपने प्रशंसकों को खो चुका हूँ, यह मेरे लिए व्यक्तिगत नुकसान है। हर प्रभावित परिवार के साथ मैं खड़ा हूँ।” विजय ने अपनी पार्टी की ओर से मृतकों के परिवारों को 20 लाख रुपये और घायलों को 5 लाख रुपये देने की घोषणा की।

सरकार की कार्रवाई और मुआवजा

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने इस हादसे को “अत्यंत दर्दनाक” बताते हुए न्यायिक जांच आयोग गठित करने की घोषणा की। उन्होंने मृतकों के परिजनों को 10 लाख रुपये और घायलों को 1 लाख रुपये मुआवजा देने का ऐलान किया। उन्होंने कहा –”यह केवल एक हादसा नहीं बल्कि एक चेतावनी है कि भीड़ प्रबंधन में कितनी खामियां हैं। सरकार दोषियों को बख्शेगी नहीं।” पुलिस ने इस मामले में TVK के महासचिव एन. आनंद समेत आयोजकों के खिलाफ लापरवाही का मामला दर्ज किया है।

राष्ट्रीय नेताओं की संवेदनाएँ

इस हादसे ने पूरे देश को हिला दिया है।

  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा – “तमिलनाडु की इस त्रासदी ने पूरे राष्ट्र को दुखी किया है। मेरी संवेदनाएँ पीड़ित परिवारों के साथ हैं।”
  • कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने लिखा – “राजनीतिक रैली को सुरक्षित बनाने की जिम्मेदारी नेताओं और प्रशासन की है। यह त्रासदी टाली जा सकती थी।”
  • राज्यपाल आर.एन. रवि ने इसे “मानवीय आपदा” करार देते हुए पीड़ित परिवारों को सांत्वना दी।

थलापति विजय

पीड़ित परिवारों का दर्द

रामलक्ष्मी नाम की एक महिला, जिनके भाई की इस हादसे में मौत हो गई, रोते हुए बोलीं – “हम तो बस विजय को देखने आए थे, लेकिन हमें उसका शव लेकर लौटना पड़ा। यह मौतें रोकी जा सकती थीं अगर इंतजाम पुख्ता होते।” वहीं घायल मुरुगन ने अस्पताल में कहा – “हम घंटों खड़े थे। अचानक लोग एक-दूसरे पर गिरने लगे। मैं बच गया लेकिन मेरे साथ आए दो दोस्त अब नहीं रहे।”

राजनीतिक पृष्ठभूमि और असर

विजय ने इस साल अपनी पार्टी तमिझगा वेत्री कड़गम (TVK) लॉन्च की थी। उनकी लोकप्रियता को देखते हुए अनुमान लगाया जा रहा था कि 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में वे बड़ा असर डाल सकते हैं। करूर की यह रैली उसी प्रचार अभियान का हिस्सा थी और इसे उनकी अब तक की सबसे बड़ी जनसभा माना जा रहा था। लेकिन इस त्रासदी ने विजय की छवि पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्ष पहले ही भीड़ प्रबंधन की लापरवाही का ठीकरा TVK पर फोड़ रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह हादसा विजय के चुनावी अभियान के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है।

हादसे के बाद बढ़ी सुरक्षा

हादसे के बाद विजय के चेन्नई स्थित घर पर सुरक्षा बढ़ा दी गई है। पुलिस ने भविष्य की रैलियों के लिए भीड़ प्रबंधन को लेकर नए दिशानिर्देश जारी किए हैं। करूर की यह त्रासदी सिर्फ एक राजनीतिक रैली में हुआ हादसा नहीं है, बल्कि भीड़ प्रबंधन की गंभीर लापरवाही की मिसाल भी है। विजय की लोकप्रियता ने रैली को भले ही ऐतिहासिक बना दिया हो, लेकिन असंगठित तैयारी ने इसे मौत का मंजर बना दिया।

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भारत के राष्ट्रीय राजमार्गों का रिकॉर्ड विस्तार : 2.87 लाख करोड़ रुपये के बजट के साथ निर्माण में तेजी

राष्ट्रीय राजमार्गों

भारत ने पिछले दस वर्षों में राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण और विस्तार में अभूतपूर्व प्रगति की है। केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी के अनुसार, 2014 में देश में राष्ट्रीय राजमार्गों की कुल लंबाई 91,287 किलोमीटर थी, जो अब बढ़कर 1,46,204 किलोमीटर हो गई है। इस दौरान 830 से अधिक प्रमुख परियोजनाओं को पूरा किया गया और औसतन निर्माण की गति 35 किलोमीटर प्रतिदिन तक पहुंच गई। इस उपलब्धि ने भारत को दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सड़क नेटवर्क संचालक देश बना दिया है।

हाल की चुनौतियाँ और धीमी गति

हालांकि, हाल के आंकड़े बताते हैं कि वित्त वर्ष 2024-25 में निर्माण की गति 29 किलोमीटर प्रतिदिन रह गई, जो पिछले वर्ष 34 किलोमीटर प्रतिदिन से कम है। इस दौरान कुल 10,660 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण हुआ। निर्माण की इस धीमी गति के पीछे मौसम की अनिश्चितताएँ, भूमि अधिग्रहण की जटिलताएं और परियोजना निष्पादन में चुनौतियाँ मुख्य कारण माने जा रहे हैं।

राष्ट्रीय राजमार्गों

बजट और निवेश

वित्त वर्ष 2025-26 में सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के लिए कुल ₹2.87 लाख करोड़ का बजट आवंटित किया गया है। इसमें राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) के लिए ₹1.87 लाख करोड़ शामिल हैं। यह बजट पिछले वर्ष की तुलना में 2.41 प्रतिशत अधिक है और इसके जरिए सरकार ने सड़क नेटवर्क के विकास, रखरखाव और नई परियोजनाओं के क्रियान्वयन को प्राथमिकता देने का स्पष्ट संदेश दिया है।

भविष्य की रणनीति और लक्ष्य

सरकार ने 2030 तक राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण की गति को 100 किलोमीटर प्रतिदिन तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। इस दिशा में आधुनिक मशीनरी, डिजिटल निगरानी और तकनीकी नवाचारों का इस्तेमाल किया जा रहा है। सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल के तहत परियोजनाओं में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाकर तेजी लाने का प्रयास किया जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा धीमी गति के बावजूद दीर्घकालिक रणनीति और वित्तीय समर्थन भारत को विश्व स्तर पर सड़क निर्माण और बुनियादी ढांचे में अग्रणी बना सकती है।

CareEdge रेटिंग्स के अनुसार, 2025-26 में निर्माण की गति 27-29 किलोमीटर प्रतिदिन रह सकती है। निर्माण गतिविधियों में इस संभावित गिरावट के बावजूद, लंबी अवधि में निवेश और तकनीकी उपाय सड़क विकास को मजबूत बनाएंगे।

आर्थिक और सामाजिक प्रभाव

राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क के विस्तार ने न केवल आर्थिक गतिविधियों को तेज किया है, बल्कि ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोड़ने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बेहतर सड़क नेटवर्क से परिवहन लागत घट रही है, माल और सेवाओं की आपूर्ति समय पर हो रही है, और व्यापार व उद्योगों के लिए नए अवसर पैदा हो रहे हैं। ईस्ट-वेस्ट और नॉर्थ-साउथ कॉरिडोर के निर्माण ने देश के विभिन्न हिस्सों को जोड़कर आर्थिक गति को और बढ़ावा दिया है।

राष्ट्रीय राजमार्गों

सड़क परियोजनाओं में सुरक्षा और टिकाऊपन पर भी ध्यान दिया गया है। आधुनिक संकेतक, फाटक, पुल और टोल प्लाजा न केवल यात्रा को सुरक्षित बनाते हैं, बल्कि निर्माण की गुणवत्ता को भी सुनिश्चित करते हैं। ठोस और टिकाऊ सामग्री का इस्तेमाल, डिजिटल निगरानी और जीपीएस आधारित ट्रैकिंग से निर्माण प्रक्रिया की निगरानी आसान और पारदर्शी बनी है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की इस उपलब्धि की सराहना की गई है। दूसरा सबसे बड़ा सड़क नेटवर्क और तेजी से बढ़ती राष्ट्रीय राजमार्ग लंबाई ने भारत को वैश्विक बुनियादी ढांचा विकास में अग्रणी बनाने में मदद की है।

निष्कर्ष

पिछले एक दशक में भारत ने राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण और विस्तार में रिकॉर्ड प्रगति की है। ₹2.87 लाख करोड़ के बजट के साथ, सरकार ने सड़क निर्माण की गति बढ़ाने, नेटवर्क को मजबूत बनाने और ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों को जोड़ने का स्पष्ट संदेश दिया है। चुनौतियां अभी भी हैं, लेकिन दीर्घकालिक दृष्टिकोण और वित्तीय समर्थन के कारण यह क्षेत्र आने वाले वर्षों में और तेजी से विकसित होने की संभावना रखता है।

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पीएम मोदी का ओडिशा दौरा : ₹60,000 करोड़ के पैकेज से स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास और कौशल विकास को बड़ी सौगात

पीएम मोदी

पीएम मोदी ने शनिवार को ओडिशा को अब तक की सबसे बड़ी विकास सौगात देते हुए ₹60,000 करोड़ से अधिक की परियोजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन किया। इन परियोजनाओं में स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल विकास और ग्रामीण आवास जैसे अहम क्षेत्र शामिल हैं। मोदी ने कहा कि ये कदम “विकसित भारत, विकसित ओडिशा” की दिशा में मील का पत्थर साबित होंगे।

स्वास्थ्य क्षेत्र में बड़ा निवेश

ओडिशा के लोगों को बेहतर चिकित्सा सुविधाएँ मुहैया कराने के लिए पीएम मोदी ने एमकेसीजी मेडिकल कॉलेज (बेरहामपुर) और वीआईएमएसएआर (संबलपुर) को सुपर स्पेशलिटी अस्पतालों में अपग्रेड करने की आधारशिला रखी। इन अस्पतालों में आधुनिक ट्रॉमा केयर यूनिट्स, मातृ एवं शिशु देखभाल केंद्र, डेंटल कॉलेज और बेड क्षमता में बढ़ोतरी होगी। मोदी ने कहा कि अब ओडिशा के मरीजों को जटिल इलाज के लिए राज्य से बाहर नहीं जाना पड़ेगा।

ग्रामीण आवास में 50,000 परिवारों को पक्का घर

आवास योजना के तहत प्रधानमंत्री ने अंत्योदय गृह योजना के 50,000 लाभार्थियों को स्वीकृति पत्र वितरित किए। इसके तहत कमजोर वर्गों — जैसे विकलांग, विधवा, और प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित परिवारों — को पक्के मकान और आर्थिक सहायता दी जाएगी। पीएम मोदी ने कहा – “गरीब का सपना है अपना घर। हमारी सरकार यह सपना पूरा करने के लिए हर संभव मदद कर रही है।”

पीएम मोदी

शिक्षा और अनुसंधान में ₹11,000 करोड़ का निवेश

प्रधानमंत्री ने आठ IITs (तिरुपति, पलक्कड़, भिलाई, जम्मू, धारवाड़, जोधपुर, पटना और इंदौर) के विस्तार का शिलान्यास किया। इस पर करीब ₹11,000 करोड़ का निवेश होगा। इससे अगले चार वर्षों में 10,000 नए छात्रों के लिए सीटें तैयार होंगी और आठ नए रिसर्च पार्क बनाए जाएंगे। मोदी ने कहा कि ये कदम भारत को नवाचार और अनुसंधान का वैश्विक केंद्र बनाएंगे।

कौशल विकास और युवाओं पर फोकस

युवाओं को रोजगार और प्रशिक्षण के अवसर देने के लिए पीएम मोदी ने ओडिशा स्किल डेवलपमेंट प्रोजेक्ट फेज-II की शुरुआत की। इसके तहत संबलपुर और बेरहामपुर में वर्ल्ड स्किल सेंटर्स खोले जाएंगे। यहाँ छात्रों को एग्रीटेक, नवीकरणीय ऊर्जा, रिटेल, समुद्री क्षेत्र और हॉस्पिटैलिटी जैसे उभरते क्षेत्रों में ट्रेनिंग मिलेगी। इसके साथ ही 130 उच्च शिक्षा संस्थानों में मुफ्त वाई-फाई सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। इस योजना से प्रतिदिन 2.5 लाख छात्रों को मुफ्त डेटा पैक का लाभ मिलेगा।

पीएम मोदी

 

डबल इंजन सरकार उम्मीदें पूरी कर रही है

बीजेपी सांसद बैजयंत जय पांडा ने कहा कि ओडिशा को जो विकास चाहिए था, वह अब डबल इंजन सरकार से पूरा हो रहा है। “आज स्वास्थ्य से लेकर शिक्षा, आवास से लेकर कौशल विकास तक हर क्षेत्र में बड़े प्रोजेक्ट शुरू हुए हैं। यह ओडिशा के सुनहरे भविष्य की नींव है।”

विकसित भारत, विकसित ओडिशा

मोदी ने कहा कि ये सभी प्रोजेक्ट मिलकर ओडिशा को आत्मनिर्भर बनाएंगे और युवाओं को नए अवसर देंगे। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे इन योजनाओं का अधिक से अधिक लाभ उठाएँ और राज्य को विकास की नई ऊँचाइयों तक पहुँचाएँ। कुल मिलाकर, पीएम मोदी का यह दौरा केवल परियोजनाओं का शिलान्यास भर नहीं, बल्कि ओडिशा के लिए एक समग्र विकास पैकेज साबित हुआ है, जिसमें ₹60,000 करोड़ से अधिक का निवेश स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल और आवास जैसी मूलभूत ज़रूरतों को पूरा करने पर केंद्रित है।

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UN में भारत-पाकिस्तान में तीखी नोकझोंक: शरीफ के झूठे दावों पर भारत का पलटवार, कहा – “ड्रामेबाजी से सच नहीं बदलता”

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